हाँ ! हम ही दोषी हैं....
कर्ज, किसान और आत्महत्या
राजनीतिक व्यापार और देश का भविष्य
सन्तोष कुमार राय
मुद्दा अधूरी ‘अर्थ-नीति’ का है!
हाशिये का लेखन और आत्मकथा की संस्कृति
हाशिये का लेखन आज की मुख्यधारा का लेखन है। जिस समाज को वर्चस्वशाली लोगों ने मनमाने तरीके से विधान बनाकर मुख्यधारा से अलग रखा हुआ था, उस समाज के लेखन ने भारतीय मानस की छद्म सामाजिकता को बेनकाब कर दिया है। भारत का सामाजिक विकास विभाजन के रूप में अधिक, संगठन के रूप में कम हुआ है। अपने को ऊंचा दिखाने की होड़ में एक बड़े मानव समुदाय को पशुवत जीवन जीने के लिए मजबूर करने वाला वर्चस्वशाली तबका आज भी हाशिये के समाज की समस्याओं को स्वीकार नहीं कर रहा है। आखिर एक जैसे दिखने वाले मनुष्यों में ही इस तरह का भेद करने का अधिकार किसने दिया? क्या भारतीय समाज की संरचना को बनाने वाले लोगों की बुद्धि उस समय भ्रष्ट हो गई थी जब वर्णव्यवस्था की आधारशिला राखी गई? इस तरह के मानवताविरोधी कदम को आम जनमानस पर थोपने का साहस कैसे हुआ? जाहीर सी बात है की उस समय के वर्चस्वशाली लोगों ने मनमने तरीके से समाज की संरचना निर्मित की जो बाद में चलकर जाती के भयावह रूप में हमारे समाज को अनगिनत हिस्सों में बाँट दिया और हम एक होते हुए भी इतने हिस्सों में बंट गए।
भारत का विकास लेकिन पिछड़े किसान
किसी भी देश का विकास सिर्फ देश के मुट्ठी भर लोगों के विकास से तय नहीं होता, उसके लिए जरूरी है कि देश की बहुतायत जनता के विकास को ध्यान में रखा जाय। भारत में भी विकास का कुछ ऐसा ही पैमाना दिखाया जा रहा है जो एक खास वर्ग के विकास को दर्शाता है। आज भी भारत के किसान अन्य विकसित देशों की अपेक्षा बहुत पिछड़े हैं, चाहे आर्थिक स्थिति के मामले में हो या तकनीक के मामले में। इस पिछड़ापन का क्या कारण है? आखिर इसमें देश की सरकार की क्या भूमिका हो सकती है? कृषि कार्य में आज भी भारतीय ग्रामीण जनता का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा कार्यरत है, फिर भी सरकार उस वर्ग की उपेक्षा क्यों कर रही है? क्या देश के विकास में सिर्फ वही क्षेत्र आते हैं जो आर्थिक रूप से अधिक सहयोगी हैं। ऐसे अनेक सवाल हैं जो किसानों की समस्याओं से जुड़े हैं।
संजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को करीने से....
लगी है होड़ सी देखो अमीरी औ गरीबी में
पेट्रोल की बढती कीमत का सरकारी पैमाना
सन्तोष कुमार राय
पेट्रोल की बढी हुई कीमत देशवासियों को लिए नई परेशानी के रूप में हर रोज सामने आ रहा है। अब किसी को यह पता नहीं है कि किस चीज की कीमत कब बढेगी और कितनी बढेगी। आज भारत में जिस तरह से बेतहासा मंहगाई बढ़ रही है उसमें जीवन कितना कठिन होता जा रहा है इसका अंदाजा अभी भी सरकारी अमला को नहीं है। दिल्ली की नज़र से देश की अर्थव्यस्था को देखना कितना न्यायसंगत है। यह आज के राजनेताओं की समझ में न तो आ रहा है और न ही वे इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम आदमी की समस्या को कौन समझेगा, यह आज के मध्यवर्गीय समाज के लिए बड़ा प्रश्न है।
असल बात यह है कि आज का सत्ताधारी वर्ग इस बात से बेखबर है कि देश के लोगों पर क्या गुजर रहा है। जिस तरह से मंहगाई के बोझ तले आम आदमी का जीवन दबता जा रहा है उसे देखकर सरकार की बेखबरी का अंदाजा लगाया जा सकता है। मंहगाई की मार ऐसी बढ़ती जा रही है कि आम आदमी का जीवन दुर्लभ हो रहा है। नमूने के लिए पेट्रोल की बढी हुई कीमत को देखा जा सकता है। आखिर सरकार के इस रवैये के पीछे उसकी मंसा क्या है? वह इन बढ़ी हुई किमतों को किस रूप में देख रही है। कई बार छठे वेतनमान को इसका आधार बनाया गया लेकिन सरकार के पास तो यह आंकड़ा है कि इस देश में कितने लोगों को यह वेतनमान मिलता है फिर जो लोग इसके दायरे में नहीं आते है उनके लिए सरकार के पास क्या विकल्प है? इस बढ़ी हुई मंहगाई की सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ रही है जो किसी भी वेतनभोगी वर्ग में नहीं आते हैं। आज कृषि कार्य की बुनियादी जरूरतों में डीजल और पेट्रोल शामिल हो गया है, जिसकी कीमत बढ़ने पर उनकी परेशानी का बढ़ना लाजमी है। भारत में पिछले दश साल में पेट्रोल की जो मुल्यबृद्धि ही है उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक मध्यवर्गीय जीवन जीने वाला आदमी उसके साथ कैसे चल सकता है। साल 2002 में पेट्रोल की कीमत जून से दिसम्बर तक की अवधि में 11 बार परिवर्तित हुई। पहले यह कीमत पैसे में बढ़ती थी अब इसे रूपये में बढ़ाया जा रहा है। जून से लेकर अगस्त तक पेट्रोल की कीमत 29 रूपये के आस-पास थी, सितम्बर में इसमें कुछ पैसे की बृद्धि हुई, फिर अक्टूबर में भी बृद्धि हुई उसके बाद नवम्बर में कमी आयी और 1 दिसम्बर 2002 को पेट्रोल की कीमत 28.91 प्रति लीटर(दिल्ली) थी। 2003 के अंत तक यह बढ़कर 33.7 हो गया। 2004 के अंत में यह 37.84 तथा 2005 में बढाकर 43.49 कर दिया गया। 2006 में लगभग 1 रूपये की बृद्धि के साथ 44.45 तक ही पंहुचा। इसके बाद इसकी कीमत में थोड़ी कमी आयी और 2007 में यह 43.52 पर बना रहा। उसके बाद जो सिलसिला जारी हुआ वह आज मुम्बई में 68.33 तक पहुंच गया है। 2008 में 45.62, 2009 में 44.72 तथा 2010 के अंत तक यह बढ़कर 55.87 हो गया। जनवरी 2011 में तेल की कीमत बढ़ाकर 58.37 कर दिया गया। अब पिछ्क्ले तीन बार की बृद्धि के बाद पेट्रोल की कीमत 71 रूपये हो गयी है।
पिछले साल जून से लेकर अब तक पेट्रोल की कीमत दस बार बढाई जा चुकी है। अभी और बढने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि सरकार की उदारता जनता के साथ नहीं उद्योगपतियों के साथ है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेती है कि यह गठबन्धन की सरकार है और यह गठबन्धन की मजबूरी है, तो क्या यह मान लिया जाय कि मंहगाई भी गठबन्धन की ही मजबूरी है। हो सकता है कि सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले लोग इस मंहगाई को झेल जाय लेकिन गैरसरकारी और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का जीवन कैसे चलेगा, इसका सरकार के पास कोई जवाब है? मजबूरी में सरकार चलाने का मतलब यह नहीं है कि जनता को मंहगाई के बोझ तले दबाकर मार दिया जाय। सत्ताधारी वर्ग को इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
आज यह कहना कठिन है कि कौन समस्याओं से नहीं जूझ रहा है, लेकिन इसमें भी सर्वाधिक पीड़ित मध्यवर्गीय किसान ही हैं। किसान इसलिए क्योंकि उन्हें अपनी बुनियादी जरूरत की पुर्ति के लिए इस व्यवस्था व्दारा दी गयी सुव्यवस्थित मंहगाई से सीधे-सीधे जूझना पड़ता है। किसानों को गरीबी रेखा से नीचे की सरकारी सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं क्योंकि उनके पास थोड़ी बहुत जमीन भी है। दरअसल यह जमीन उन्हें और कुछ दे या न दे उनके क्लास को तो अवश्य ही परिवर्तित कर देती है और यह क्लास उन्हें समस्याओं के सिवा और कुछ नहीं देता है। जमीन के व्दारा मिले हुए क्लास और कमरतोड़ मंहगाई के बीच किसान पिसने के लिए अभिशप्त हैं। आने वाले समय में कम से कम सरकार के व्दारा कोई ऐसा कदम उठता नहीं दिख रहा है जो किसानों और भारत की बहुसंख्यक मध्यवर्गीय जनता के दर्द को समझे और दूर करे।
सरकार और देश के लिए यह खुशी की बात है कि आज हमारा देश किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं जूझ रहा है, जूझ रहा है तो अपनों के व्दारा दी गयी कुव्यवस्था से। ऐसा नहीं है कि इसका समाधान नहीं है, समाधान है लेकिन सरकारी अमला इस तरह की जहमत उठाना नहीं चाहता है। हमारे वित्त मंत्री ने लगातार देश की विकास दर में बृद्धि को अपना और सरकार का सराहनीय प्रयास बताया है लेकिन क्या उन्हें पता है कि इस देश के गरीब मजदूर और किसान अपना भरण-पोषण कैसे करते हैं? इस देश के नेताओं के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि वे चुनाव के बाद इस देश को दिल्ली की नजर से ही देखते हैं जबकि देश को दिल्ली होने में उतना ही समय लगेगा जितना समय दिल्ली को न्यूयार्क या लंदन, जो आज की स्थिति को देखते हुए असंभव के अलावा कुछ नहीं लग सकता है। जब तक हमारे नेता देश के रूप में गांवो को नहीं समझेंगे सुधार नहीं हो सकता। होना तो यह चाहिए कि विकास की गति गांवो की ओर से शुरू हो लेकिन यह इसके विपरीत दिल्ली से चल रही है। यह दृष्टि को दिग्भ्रमित करने का सबसे बड़ा कारण है। यहां के नेता और सरकार में सम्मिलित लोग नीचे से उपर देखने के वजाय उपर से नीचे देखते हैं। और जब तक वे उपर से नीचे देखते रहेंगे इस देश का विकास कागज पर ही होता रहेगा।
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