फेसबुक पर ब्लाक करने के संदर्भ में...

सन्तोष कुमार राय

            मित्रों, आजकल फेसबुक पर अपने फ्रेंड्स को ब्लाक करने का मामला खूब चल रहा है। जैसे बचपन में हम अपने किसी दोस्त से नाराज हो जाते थे तो अक्सर कहा करते थे कि मैं तुमसे कट्टी हो गया और बातचीत उस दिन बंद हो जाती थी। उस समय अच्छी बात यह थी कि फिर हम जब अगले दिन मिलते थे तो हम उसी निश्छलता से मिलते थे जिससे हम पहले दिन मिले थे। कोई गिला-शिकवा नहीं रहता था। आज हम बहुत अधिक सिकुड़ गए हैं और व्यक्तिगत संवाद की नापसंदगी के आधार पर हम अपने दोस्तों से संबंध-विच्छेद कर लेते हैं। आज हम अपने आस-पास के लोगों की बुराइयों को पहले देखते हैं, अच्छाईयों को बाद में। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक आदमी में सिर्फ बुराई ही बुराई भरी पड़ी हो। बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे हम न तो देखने की इच्छा रखते हैं और न ही कोशिश करते है। कुछ दिन पहले ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। कई दिनों से मैं इस ऊहापोह में था कि इस बात को आप सभी से साझा करूँ या नहीं, लेकिन आज सोचा करना चाहिए। उस दिन ऐसा हुआ कि मैंने उस मित्र से आनलाईन बात कर रहा था जो कि खुद को प्रतिष्ठित साहित्यकार मानता है। असल में थोड़ी प्रतिष्ठा मिलने पर हम मनुष्यों के अंदर थोड़ा दंभ तो आ ही जाता है। हम लोग मर्यादापुरुषोत्तम तो हैं नहीं। वह अपनी आदत के अनुसार लगातार व्यंग्य करता जा रहा था (यह उसकी फितरत है। अपने से बड़े-बुजुर्गों पर व्यंग्य करके, उन्हें चिढ़ा करके खुद को श्रेष्ठ साबित करता रहता है।) बात आगे बढ़ती गई। मौका मिला मैंने भी उसी का व्यंग्य उठाकर उसी पर रख दिया, जिसका उसे अंदाजा नहीं था। वह तिलमिला गया, क्योंकि अभी तक मैं उससे बहुत ही आदर और सम्मान की भाषा में बात कर रहा था। उसके अंदर का वास्तविक मनुष्य जाग गया और फिर क्या मुझे मेरी औकात बताने से लेकर देख लेने तक पहुंचा दिया। जितना कह सकता था कहा। मुझे बहुत अच्छा लगा। अच्छा इसलिए लगा क्योंकि पहले तो यह पता चला कि वास्तव में इसकी व्यंग्य करने और बरदास्त करने की सीमा क्या है। दूसरा कि वास्तव में यह मी द्वारा दिये जाने वाले आदर और सम्मान का हकदार है या नहीं (वह यह भी कह सकता था कि वह मेरे पास आदर और सम्मान मांगने तो नहीं आया था)। उसने तुरंत मुझे ब्लाक कर अपने मानसिक छोटेपन का त्वरित परिचय दिया। मुझे अच्छा लगा जिसे आप सभी से साझा कर रहा हूँ...... 

कर्नाटक में कांग्रेस की नहीं, भाजपा के अंतर्कलह की जीत हुई है !


सन्तोष कुमार राय
          तुलसीदास की एक चौपाई है ‘जहां सुमति तंह संपति नाना। जहां कुमति तंह बिपति निधाना।’ कर्नाटक के संदर्भ में भाजपा के लिए ये पंक्तियाँ बिलकुल सही और सटीक बैठती है। इसमें संदेह नहीं की भाजपा की चुनावी रणनीति में अनेक खामियाँ रही है, जिसे खत्म करने के वजाय वह ढोती रही है। यह कार्य भाजपा पिछले कई वर्षों से कर रही है और कुछ लोगों के मनमानेपैन के नतीजे को भुगत रही है।  क्या कारण है पार्टी हित जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी पार्टी देर से फैसले ले रही है? आखिर पार्टी पर किसका दबाव काम कर रहा है? क्या वास्तव में भाजपा में व्यक्तिगत हित पार्टी हित से ऊपर हो गया है? इस तरह के कई सवाल हैं जो कर्नाटक में भाजपा की हार के बाद उठ रहे हैं। पार्टी का शिथिल रवैया येदियुरप्पा से लेकर गडकरी तक अनेक प्रमुख मुद्दों पर जारी रहा है जिससे भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। वह कौन सी राजनीति है जिसमें एक आदमी पार्टी के विरोध में इस हद तक चला जाता है कि उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। आखिर भाजपा का अनुशासन कहाँ गया। भाजपा को अपने जिस अनुशासन और राष्ट्रीयता पर गर्व था वह कहाँ गया। येदियुरप्पा को पार्टी ने कौन सा अनुशासन सिखाया था जिसने पूरी पार्टी को ही ललकार दिया और इसका लाभ विपक्षी पार्टी को मिल गया।
          भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त इस देश की जनता का जनाधार अगर कांग्रेस के साथ गया है तो यह ताज्जुब की ही बात है। मौजूदा भारतीय राजनीति को देखकर यह कहना कहीं से भी उचित नहीं है कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत हुई है। यह भाजपा के अंतर्कलह की जीत है। कांग्रेस के नेता कर्नाटक की जीत पर कुछ ज्यादा ही इतरा रहे हैं। यह न तो राहुल गांधी की मेहनत का फल है और न ही कांग्रेस के विकास के मॉडल का। अच्छा तो यह रहता कि कांग्रेसी नेता अपनी पीठ थपथपाने के के वजाय येदियुरप्पा का शुक्रियादा कर आते। कांग्रेस के लिए येदियुरप्पा ने जो रास्ता तैयार किया वह बाधा-विहीन था, जिसका बखूबी लाभ कांग्रेस को मिला है।
          इस चुनाव के नतीजे को दो रूप में देखा जाना चाहिए। पहला, भाजपा की ढुलमुल और अदूरदर्शी राजनीति है। भाजपा ने येदियुरप्पा के साथ जो किया वह कहीं से भी उचित और सार्थक कदम नहीं था, लेकिन येदियुरप्पा ने भी जिस पार्टी की इतने दिनों तक सेवा की उसके लिए भी या अशोभनीय ही है। शायद यह पार्टी के बड़े नेताओं और येदियुरप्पा के बीच संवादहीनता का ही नतीजा है। इस विवाद को चुनाव से पहले मिलकर सुलझा लेना अधिक अच्छा रहा होता। यह भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की कार्यप्रणाली की हार है। उनकी सोच की हार है। भाजपा भी कांग्रेस की तरह दिल्ली से ही फैसला सुनाने की आदत का शिकार हो रही है। यह पहली बार नहीं हुआ है, जब इस तरह के फैसलों के इतने घातक परिणाम आए हैं। इससे पहले भी इसका खामियाजा भाजपा को कई राज्यों में भुगतना पड़ा है।
          दूसरा, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उभरकर सामने आया है वह है क्षेत्रीय नेताओं की अहमियत का है। कर्नाटक चुनाव ने भाजपा को क्षेत्रीय नेताओं की अहमियत का बोध करा दिया है। लगभग यही घटना कई साल पहले उत्तर प्रदेश में हुई थी। पार्टी ने कल्याण सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया और राजनाथ सिंह को अचनाक पार्टी का अगुवा बना दिया था। उस घटना ने भाजपा को प्रदेश और देश दोनों से बाहर कर दिया। उससे भी इन्होंने सीख लेने की जहमत नहीं उठाई और मीडिया की नजर में अपनी पाक-साफ छवि दिखाने के चक्कर में डूब गए। अगर इतना ही साफ दिखने की शौक था तो पार्टी ने नरेंद्र मोदी को क्यों नहीं निकाला? क्या उनके ऊपर आरोप नहीं लगे थे? क्या वे आरोप बेबुनियादी थे? यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा में भी व्यक्ति के अनुसार फैसले होते हैं। इस बार भाजपा को जो नुकसान हुआ है वह साधारण नहीं है। इसका प्रभाव लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।
          आगे के चुनावों में अगर भाजपा को अपने पक्ष में परिणाम चाहिए तो पहले उसे आंतरिक कलह पर जीत हासिल करनी होगी। यह राजनाथ सिंह के लिए आसान नहीं है। आज पूरा देश भ्रष्टाचार और मंहगाई से त्राहि-त्राहि कर रहा है। वर्तमान सरकार ने जिस तरह की स्थिति पैदा की है, वह आम आदमी को मारने के लिए काफी है। ऐसी स्थिति का अगर सही उपयोग भाजपा नहीं कर पा रही है, और अगर नहीं कर पाएगी तो इससे बुरा इस देश के लिए और भाजपा के लिए कुछ भी नहीं हो सकता है। पार्टी के बड़े नेता इस तरह के मुद्दों को सुलझाकर सही रणनीति के साथ काम करेंगे तभी कोई सार्थक परिणाम सामने आयेगा, अन्यथा कर्नाटक की ही तरह देश में अन्य चुनावों में भी वे हार का ही सामना करेंगे। 

यूपीए की नाकामी का नतीजा है कुपोषण


सन्तोष कुमार राय
          आज भारत के लिए कुपोषण शब्द किसी गाली से कम नहीं है। यह सत्ता के लोगों को सुनने में जरूर हल्का लगता होगा लेकिन देखने में यह बहुत ही भयावह है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया है। किया है, और कागज पर तो इसके लिए अनेक पेज भरे पड़े हैं। लेकिन वास्तविक जमीन पर यह बहुत ही खतरनाक रूप ले चुका है। कुपोषित बच्चों की स्थिति बहुत ही नाजुक होती जा रही है। कुपोषण में जी रहे बच्चे आपको हर जगह मिल जायेंगे जरूरत है आँख खोलकर देखने की। चौराहों पर या फिर रेलगाड़ियों में भीख मांगते बच्चे तो हर जगह दिखाई देते हैं वे क्या हैं? घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाले बच्चे क्या हैं? चाय की दुकानों और ढाबों पर काम करने वाले बच्चे क्या हैं? आज का पढ़ा-लिखा समाज अपनी नैतिकता खो चुका है और वह अंधा होता जा रहा है। हमारे राजनेता भी इसी ओर अग्रसर हैं और इसे लगातार अनदेखा कर रहे हैं। अभी तक यह देश जाति के दंश से उबर नहीं पाया है, लेकिन उससे पहले ही इसे पूंजीवाद के दुष्परिणामों का सामना करना पद रहा है जो न चाहते हुए भी वर्ग विभाजन की विशाल खाई में जा रहा है।
          आखिर उन बच्चों का दोष क्या है? क्या यह दोष है कि उनका जन्म किसी सोनिया गांधी और किसी मनमोहन सिंह के घर नहीं हुआ है? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर उचित पोषण मिले तो इस देश का हर बच्चा राहुल गांधी बन सकता है या फिर उनसे फ्रैंक और तेज। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता वर्ग ने जो बंदरबाट मचाई है वह कहीं से भी लोकतंत्र की रक्षा का प्रयास नहीं है बल्कि एक ही आँचल में साम्राज्यवाद और सामंतवाद का नया अवतार है। यह वही अवतार है जिससे हमारे देश के लोग सैकड़ों वर्षों तक लड़ते रहे। उस लड़ाई की कीमत को भूलकर सत्ता की मादकता में लोग अंधे हो रहे हैं और अपनी नाकामियों को लगातार छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
          दरअसल मनुष्य का स्वभाव जितना सरल होता है उतना ही जटिल भी, जितना नैतिक रूप से मजबूत होता है उतना ही कमजोर भी, जितना कर्मठी होता है उतना ही कामचोर भी, जितना बहादुर होता है उतना ही कायर भी। ये सारे गुण-अवगुण ही किसी मानव को महामानव और महाभ्रष्ट तथा किसी संस्था को उत्कृष्ठ और निकृष्ट बनाते हैं। लोकतन्त्र का विस्तार पहले मनुष्य से लेकर अंतिम मनुष्य तक होता है। लेकिन क्या भारतीय लोकतन्त्र इस पैमाने पर खरा उतरता है? भारतीय राजनीति आज जिस जगह पहुँच गई है उसमें किसी बाहरी या किसी मायावी या किसी अदृश्य सत्ता का योगदान नहीं है। हम इसे भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते। यूपीए गठबंधन को चलाने का जो कांग्रेस का सत्ता मोह है उसने भारत के विकास को हर पायदान पर आघात पहुंचाया है। चाहे आर्थिक स्तर पर हो या फिर विदेश, चाहे ग्रामीण विकास हो या फिर सुरक्षा। यह कहना गलत नहीं होगा कि मनमोहन सिंह की सरकार में अपनी कमजोरियों और नाकामियों को स्वीकार करने के नैतिक साहस का नितांत अभाव है। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए कांग्रेस राजनीति के जिस घटिया स्तर पर उतर आई है वह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
          अपनी ही बनाई हुई नीतियों में मनमोहन सरकार उलझती रही है और उसे भी सही सलामत लागू कराने में असफल रही है। उदाहरण के लिए हम सरकार द्वारा चलाये जा रहे खाद्यान्न सुरक्षा योजना को देख सकते हैं। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों के लिए अनाज देने की जो योजना चल रही है क्या वह हर जगह पहुँच पाई है? क्या उसका सही सलामत वितरण हो रहा है? ऐसा नहीं है और इसकी जानकारी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को है। केंद्र सरकार की चुप्पी का कारण है गठबंधन, और राज्य सरकारें इसका नाजायज फाइदा उठा रही हैं। ग्राम पंचायतों में अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि गरीबी रेखा के दायरे में किसे और किस आधार पर शामिल किया जाय। पूरी तरह मनमानी हो रही है और जिसे मन किया उसे शामिल किया, नहीं मन है तो छोड़ दिया, चाहे वह कितने भी गरीब क्यों न हो। यह इस योजना की जमीनी हकीकत है। यह किसी एक गाँव या क्षेत्र या फिर प्रदेश की बात नहीं है हर जगह की ऐसी ही स्थिति है। नतीजा यह हो रहा है कि भारत के असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले ग्रामीण मजदूरों के बच्चे कुपोषण से लगातार मर रहे हैं।  
          हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुपोषण से मरने वाला विश्व का हर चौथा बच्चा भारत का होता है। भारत की ग्रामीण जनता का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो मजदूर है। मजदूरी के सहारे ही उनका जीवन चलता है। अगर मिल गई तो ठीक नहीं तो फाँका। ये सारे मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं जिनके पास महीनों तक कोई काम नहीं रहता है। इनके परिवार के स्वास्थ्य और शिक्षा किसके भरोसे है? यह कहना सरासर गलत होगा कि इसके लिए कोई नीति नहीं है, अनेक नियम कानून बनाए गए हैं लेकिन सबकी स्थिति ढाक के तीन पात ही है। सरकार इस बात की दुहाई देती रही है कि हमने ये कानून दिये हमने वो कानून दिये लेकिन उस कानून का क्या मतलब जो सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गई हो। सरकार सैफ कानून बनाने से नहीं बच सकती जब तक वह कानून अपने पूरे रूप में लागू न हो।
          घोटालों के अर्थशास्त्र में फंसी मनमोहन सरकार के पास आरोप-प्रत्यारोप के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। ‘पंडित होहिं जे गाल बजावा’ की स्थिति में सरकार के अनेक नेता लगे हुए हैं और पिछली वाजपेयी सरकार पर सारा दोष मढ़ रहे हैं। मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि इसमें वाजपेयी सरकार कहाँ से आ जाती है। अगर वाजपेयी सरकार से भारत की जनता इतनी ही खुश होती तो फिर यूपीए की सरकार नहीं बनती। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह देश सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी का नहीं है। कांग्रेस का काम सिर्फ बीजेपी के आरोपों का जवाब देना और बीजेपी पर आरोप लगाना नहीं है। यह देश आम जनता का है और कांग्रेस को इस देश के लोगों को जवाब देना है।
          स्वतंत्रता के बाद से आज तक इस देश ने विकास के अनेक चरण पार किया है। क्या कारण है कि इतने सालों बाद भी इस समस्या का मुकम्मल समाधान नहीं हो पाया है। इस तरह की समस्याओं के सामने सरकारी तंत्र लाचार क्यों हो जाता है। अगर सरकार इस समस्या पर गहराई से विचार नहीं करेगी तो आने वाले समय में यह और भयावह ही होगी और पता नहीं कितने बच्चे इस काल के गाल में समा जाएंगे।

वामपंथ की भारत में स्थिति

सन्तोष कुमार राय
          मुक्तिबोध की बहुचर्चित लंबी कविता ‘अंधेरे में’ की एक पंक्ति है ‘तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब......!’ यहाँ इस पंक्ति को उद्धृत करने का कारण साफ है कि भारतीय चिंतन परंपरा की मठाधीशी से कहीं न कहीं रचनाकार नाखुश है और इसे तोड़कर जनवादी विचारधारा को स्थापित करना चाहता है। लेकिन क्या यह चाहने भर से हो सकता है? क्या इस विचारधारा को भारत में लागू करना इतना आसान है? हम सभी जानते हैं कि मुक्तिबोध किस विचारधारा के पक्षधर थे, और वे किस तरह के मठों को तोड़ने की बात कर रहे थे। लेकिन क्या इतना आसान है उन मठों को तोड़ना, जो परंपरा से पोषित हैं? वैचारिक धरातल पर जिस विचारधारा को स्थापित करने की कोशिश है क्या उसी में इस तरह के मठ नहीं बन सकते हैं या यह कहें कि बन गये हैं? मुक्तिबोध उसी दौर के रचनाकार हैं जब वामपंथ भारतीय राजनीति और भारतीय साहित्य में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा था। एक विचारधारा के स्तर पर वामपंथ भारत के लिए नया था लेकिन अपने क्रिया-कलापों के लिए नया नहीं था। इसके आने से पहले भी भारत के अनेक साहित्य-चिंतकों ने अपनी जनपक्षधरता को अपने लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त किया था। दरअसल वामपंथ का भारत में विकास न होने के कई पहलू हैं। इनमें प्रमुख हैं भारतीय मानसिकता, भारतीय लोगों की मानसिक बनावट, भारतीय परिवेश, भारतीय जीवन पद्धति तथा भारतीय संस्कृति और समाजिक संरचना। इसकी चिंता करने के भी अपने खतरे हैं। पहला यह कि आज तक जिसने भी भारतीय वामपंथ की कमियों या उसके अविकसित होने पर चिंतन करने की कोशिश की, उसकी स्थिति और उपस्थिति से असहमत हुआ, उसे एक स्वर में दक्षिणपंथी, परंपरावादी और जड़ जैसे अनेक उपमानों से नवाजा गया। इसका असर उस व्यक्ति पर हो या न हो, कुछ समय के लिए ही सही उसका उत्साह जरूर भंग हो जाता है, और कई बार उसकी वैचारिक समानता के लोग भी नजरंदाज करने लगते हैं। दूसरा यह कि वामपंथी राजनीति भी कहीं न कहीं वामपंथी कम, भारतीय वामपंथी अधिक हो गई है। एक खास तरह के लोगों की व्यक्तिगत आशा-आकांक्षाओं में फँसती गई है। एक बात साफ है और वह किसी भी विचारधारा पर लागू हो सकती है, वह यह कि अगर कोई भी विचारधारा किसी भी समाज में स्थापित होती है तो इसके दो कारण होते हैं। पहला उस विचारधारा की बनावट उस समाज की बनावट के अनुरूप हो तथा दूसरा कि उसके मानदंडों को सही-सही लागू किया जाय। मुझे लगता है कि भारत में वामपंथ को लगातार भारतीय वामपंथियों की व्यक्तिगत सोच के हिसाब से लागू करने की कोशिश हुई है जिसे आम जनमानस ने नकार दिया है। एक बात स्पष्ट है कि इस विचारधारा का उदय जिस समाज में हुआ था वह समाज भारतीय मानस से बहुत अलग तरह का था। आज भारत में उसे अपनाने वाले पुरोधा भी तो इसी देश के हैं। ऐसे में यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि इसका समुचित विकास होगा।
           वामपंथ की भारतीय स्थिति पर सोचना, विचार करना और कुछ खोजना जितना असमंजस भरा है उतना ही जटिल भी है। इस पर विचार करने से पहले जरूरत है कि हम वामपंथी विचारधारा की वैश्विक पृष्ठभूमि पर भी ध्यान दें। आज वामपंथ की वैश्विक स्थिति क्या है? कितने देश ऐसे हैं जहां यह विकसित अवस्था में है? और अगर इसे वैश्विक पृष्ठभूमि पर आम जनमानस ने उस रूप में स्वीकार नहीं किया, जैसी यह घोषणा करता था तो इसके पीछे क्या कमी है? इस तरह के कई सवाल हैं जो भारतीय राजनीति में और भारतीय साहित्य में वामपंथ की स्थिति को लेकर हमारे सामने आते हैं। वामपंथ की मूल अवधारणा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध की है लेकिन इसके विपरीत भारतीय समाज लगातार पूंजीवादी चंगुल में जकड़ता जा रहा है। आज के भारतीय राजनेता और भारत की सरकार अपने देश को भी अमेरिकी चश्मे से देखते हैं और वामपंथी नेता भी पिछली यूपीए सरकार के उसी चश्मे के समर्थक रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार भी सरकार का हिस्सा होते लेकिन सीटों की संख्या इस लायक नहीं थी। जिस क्षेत्र से चुनकर आते थे वहाँ की जनता ने भी इन पर विश्वास करना उचित नहीं समझा। आज का भारतीय वोटर पहले से अधिक समझदार हो गया है। उसे पता है कि सरकार में शामिल होने के बाद संसद के भीतर हाथ उठाकर समर्थन देना और बाहर आकर विरोध करना किस तरह की राजनीति है।
          बहरहाल, सबसे पहले इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय मानसिकता को देखने की जरूरत है, जो एक खास तरह की धार्मिक और परंपरावादी परिवेश में विकसित हुई है। जाहिर सी बात है कि भारत की राजनीति भी उसी मानसिकता की ऊपज है, समर्थन और विरोध के तरीके भी उसी से पैदा हुए हैं। ऐसे में कोई नई विचारधारा आए और उसे समाप्त करके अपना आधिपत्य जमा ले, यह उतना आसान नहीं है जितना बुद्धिजीवी वर्ग सोचता है। बुद्धिजीवी वर्ग के सोचने का रास्ता अलग है और सर्वहारा का उसे स्वीकार-अस्वीकार करने का अलग। और एक बात साफ़ है कि जब तक किसी भी विचारधारा को उसके सही रूप में सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती उसका विकास काल बहुत छोटा होता है।
          अगर वामपंथी विचारधारा पूरी तरह से भारतीय समाज में अपनी जड़ जमा लेती तो इसके दो कारण हो सकते थे। पहला यह कि अगर भारतीय लोग अपनी पारंपरिक मान्यताओं से ऊब गए होते और किसी ऐसे वैचारिक आधार की तलाश कर रहे होते जो उन्हें कुछ नया और सही राह सुझाता। दूसरा यह कि इसके साथ भी कुछ ऐसा आस्थावादी चक्कर होता और इससे भी किसी तरह के सवाल करने की इजाज़त नहीं होती, लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय राजनीति और भारतीय विचारधारा पर अनेक बार प्रहार हुए हैं, उसे जड़ से उखाड़ने की लगातार कोशिश हुई है। मुगलों और अंग्रेजों दोनों ने अपने-अपने तरीके से पूरी कोशिश की और बहुत हद तक प्रभावित भी किया। लेकिन उखड़ने के बजाय उसकी जड़ और नीचे तक जमती गई। आज के दौर में वामपंथ के लिए यह सिद्ध करना बहुत कठिन है कि उसके सारे सरोकार आम लोगों से जुड़े हैं। और अगर यह मान भी लिया जाय कि उसके सरोकार आम लोगों से जुड़े हैं तो जो राजनीतिक पार्टियां इस देश में जातिगत पैमाने पर काम कर रही हैं उनके सामने यह विचारधारा किस तर्क के आधार पर टिकेगी। वामपंथी वैचारिकता के दो प्रमुख आधार हैं, पहला राजनीति और दूसरा साहित्य। राजनीति को लेकर सवाल है कि वास्तव में आज वामपंथ की भारतीय पृष्ठभूमि क्या है? क्या भरतीय लोगों में इसके प्रति कोई सहज स्वीकार्य भाव है या फिर मुट्ठीभर बुद्धिजीवियों का सिर्फ शौकिया बौद्धिक संसाधन है? अगर भारतीय मानसिकता को वामपंथ अपनी ओर आकर्षित कर लेता तो आज भारतीय राजनीति में इसकी ऐसी स्थिति नहीं होती। वामपंथी राजनीति को लेकर शुरू से ही एक खास तरह का संदेह बना हुआ है। वास्तव में इसका उदय जिस तरह की राजनीतिक हालात में हुआ वह किसी भी तरह से भारतीय समाज से नहीं जुड़ता है। इस बात को स्वीकार करना किसी भी वामपंथ समर्थक के लिए आसान नहीं लेकिन इससे मुँह मोड़कर इसकी पड़ताल भी नहीं की जा सकती। असलियत यह है कि वामपंथ ‘क्लास’ की विसंगतियों से पैदा हुआ एक वैचारिक और राजनीतिक आंदोलन है, जबकि भारतीय राजनीति में आज भी ‘क्लास’ की संरचना पश्चिम जैसी मुखर नहीं हुई है। भारतीय राजनीति में ‘कास्ट’ एक अहम तत्व है जो वामपंथी वैचारिक सरोकारों को कहीं भी टिकने नहीं देता है।
          यह धारणा आम रही है कि पूंजीवाद के कमजोर होने पर वामपंथी पार्टियों का वर्चस्व बढ़ेगा लेकिन विश्व के किसी भी देश में यह दिखाई नहीं दिया। पूरा विश्व आर्थिक महामारी से जूझ रहा था। अमेरिका जैसे घोर पूंजीवादी देश इस महामारी में हिल गये लेकिन वामपंथी राजनीति का किसी भी तरह से उभार देखने को नहीं मिला। अगर अमेरिका या अन्य पूंजीवादी देशों को छोड़ भी दिया जाय तो भारत में इसका क्या हस्र हुआ। पिछली यूपीए सरकार में वामपंथी भी शामिल थे, और न सिर्फ शामिल थे बल्कि उस सरकार को चलाने में अपना सार्थक योगदान भी दिया। कितना बड़ा अंतर्विरोध है कि जहां कांग्रेस अमेरिकी पूंजीवाद की ओर हमेशा ललचाई निगाहों से देखती है और अमेरिका के लिए पलक-पांवड़े बिछाई रहती है उसी की ओर भारतीय वामपंथी पार्टियां उसी निगाह से देखती हैं। फिर कैसा विरोध और कैसे वैचारिकता। यह कहना गलत नहीं होगा कि वामपंथी पार्टियों की राजनीति और बुद्धिजीवियों के चिंतन में अब मेल नहीं है। अगर इसे अलगा के देखा जाए तो दोनों के लिए अच्छा होगा। कुलमिलाकर आज के भारत में वामपंथी राजनीति का कोई ऐसा चमत्कृत भविष्य नजर नहीं आ रहा है फिर भी आने वाले समय में कोई चमत्कार हो जाय तो कुछ नहीं कहा जा सकता।  

अति का भला न बोलिये...

                                                                               सन्तोष कुमार राय
        ऐसा कहा जाता है कि कई बार बोलना बहुत ही जरूरी होता है लेकिन कहाँ बोला जाय, किसके लिए बोला जाय और कितना बोला जाय, इसकी अगर तमीज़ हो तो बोलना सार्थक होता है । एक कहावत है कि ‘भैंस के आगे बीन बजावे भैंस करे पगुराय’ इसे उलटा करके अगर आज के बोलने वालों पर लागू किया जाय तो शायद उनकी योग्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है ।
          बात आज के भारतीय समाज की है जो अपनी तुलना विश्व के विकसित देशों से करने के लिए आतुर है, लेकिन मानसिकता आज भी कई सौ साल पहले की है । कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक जघन्य अपराध की घटना घटी। जिसे लेकर लोगों में बयानबाजी की होड़ मच गई । इस होड़ में भारतीय नेताओं का एक ऐसा वर्ग सामने आया जिसने अपने गंदे वाचालपन को सोदाहरण सिद्ध कर दिया। सबसे पहले भारत के प्रधानमंत्री का बयान आया कि ‘मेरी भी तीन बेटियाँ हैं और मैं इसका दर्द समझता हूँ।’  यह कितना बचकाना सा बयान था। मुझे लगता है कि लोगों का दर्द समझने के लिए उस दर्द का होना बिलकुल जरूरी नहीं है। अगर ऐसा ही है तो जो आंदोलन हुआ उसमें कितने ऐसे लोग थे जिनके पास बेटियाँ हैं? जिस देश का प्रधानमंत्री ऐसा बयान देते हैं वहाँ उनकी विरादरी के और लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। लेकिन  प्रधानमंत्री के बयान के बाद एक लंबी फेहरिस्त है जिसने अपने स्वभाव के अनुसार छिछले तरीके से लोकप्रियता हासिल करने की सायास कोशिश की। राजनेता से लेकर धर्मनेता तक, सबने कुछ न कुछ सड़ा-गला कहा ही। रामकथा का धंधा करने वाले आशाराम बापू ने भी पर्याप्त हाथ धोने की कोशिश की और तमाम तरह के दिशा निर्देश दे डाले। मसलन, अगर लड़की ने भाई बना लिया होता तो ऐसा नहीं होता और न जाने क्या-क्या? भारतीय धर्म और भारतीय संस्कृति का पर्याप्त ज्ञान उनको होगा ऐसा मैं मान के चलता हूँ क्योंकि उनका यह धंधा बहुत दिनों से चल रहा है और मेरे अनुमान से वे इसके माहिर खिलाड़ी हैं। अब अगर यह पूछें कि आपके कृष्ण की माता का कंस कौन लगता था? वह भी तो भाई ही था? और अगर यह काम इतना ही अच्छा था तो सीता ने रावण को भाई क्यों नहीं बना लिया? और तो और राम और लक्ष्मण ने सूर्पणखा के साथ क्या किया? वह भी तो उनकी बहन हो सकती थी? इन्द्र ने अहिल्या के साथ क्या किया? पूरी की पूरी धार्मिक मानसिकता ही एकतरफा है जिसमें इस तरह के बयान से आगे की उम्मीद नहीं की जा सकती। कहीं न कहीं अपनी संकुचित सोच और घृणित मानसिकता का यह नंगा प्रदर्शन है। संघ प्रमुख ने भी अपने ज्ञान को थोपने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने भी जल्दबाज़ी में कई आड़े-तिरछे बयान फेंक दिये। उनका इस तरह का बयान इसलिए भी बहुत गलत नहीं है क्योंकि उनकी मानसिक बनावट ही वैसी है। वे कभी भी समता और समानता की बात नहीं कर सकते। उनकी तानाशाही मानसिकता कभी भी स्त्री-पुरुष समानता की बात कर ही नहीं सकती। वे भले ही खुद को भारतीय संस्कृति और संस्कार का रक्षक बताते हैं लेकिन हमेशा एकतरफा ही सोचते हैं। किसी मौलाना ने भी इसमें अपने ज्ञान की उल्टी कर ही दिया क्योंकि यह भारत है और भारत में सबको बोलने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
          बहरहाल सभी ने अपने नैतिक उपदेश से भारतीय समाज को तमाम नसीहत दे डाली लेकिन कभी भी अपने गिरेबाँ में झांकने की जहमत नहीं उठाई। अगर झाँकते तो शायद मनुष्य के दर्द, मनुष्य की पीड़ा, मनुष्य के अधिकार और आज के समय की मांग और सोच को नजरंदाज नहीं करते। आज अगर इन लोगों की सोच को समाज पर लागू कर दिया जाय तो इस देश को ये लोग फिर से सतीप्रथा तक पहुंचा सकते हैं। क्या जब हमारा समाज आधुनिक नहीं था तो इस देश में ऐसी घटनाएँ नहीं होती थीं? जो लोग आधुनिकता और आधुनिक समाज को दोष दे रहे हैं उन्हें शायद भारतीय इतिहास का ज्ञान नहीं है। भारत के अधिकतर राजा ऐसे ही हुए हैं जो स्त्रियों के संबंध में आज के इन दरिंदों से बेहतर नहीं थे। इस तरह की दरीन्दगी भारतीय समाज में नई नहीं है।
          कुलमिलाकर इस तरह की परंपरावादी और जड़ और छद्म मानसिकता का अब कोई असर नहीं होने वाला है। खुशी की बात यह है कि अब इस तरह के अनैतिक और जघन्य मामलों पर आम लोग किसी का मुंह नहीं देख रहे हैं बल्कि खुद विरोध कर रहे हैं। आगे आने वाले समय में इस तरह के विरोध और मुखर होकर उभरेंगे, ऐसा संकेत इस आंदोलन ने भारतीय शासन व्यवस्था को दे दिया है। 

आम चुनाव के रिहर्सल होंगे विधानसभाओं के चुनाव


सन्तोष कुमार राय 
समकालीन सरोकार में प्रकाशित.... 

          किसी शायर ने लिखा है ‘कितना मुश्किल होता है जवाब दे पाना, जब कोई खामोश रहकर भी सवाल करता है’ । आज भारत की जनता पर डर और खामोशी दोनों का असर है । पिछले दस वर्षों में बेकाबू महँगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है । बड़ी-बड़ी इमारतें और बड़े-बड़े पार्क तो बहुत बने और बन भी रहे हैं लेकिन आम जनता से उनका क्या सरोकार है ? लोगों के मन में डर इस बात का है कि आने वाला समय कैसा होगा और जीवन कैसे चलेगा ? लगातार भ्रष्टाचार और महँगाई से त्रस्त लोगों के लिए यह निर्णय लेना कठिन है कि वे किसे चुने और क्यों चुने ? आज की भारतीय राजनीति में आरोप और प्रत्यारोप का प्रयोग एक महत्वपूर्ण औज़ार के रूप हो रहा है । इसका कारण है देश की जनता के दिमाग को विकास के मुद्दों से भटकाया जाय और सभी पार्टियों के नेता आपस में तू-तू मैं-मैं का खेल खेलते रहें ।  देश का विकास आज महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं रह गया है । आज एक-दूसरे को कोसने और जनता के बीच में ‘आत्मश्लाघा का प्रदर्शन’ और ‘परनिंदा’ की कलात्मकता का दक्षतापूर्ण प्रदर्शन ही हमारे देश के राजनेताओं की प्राथमिक योग्यता बन गई है । इसके बहुत सारे नमूने हमें आए दिन दिखाई पड़ते हैं ।  इसका ताजा उदाहरण हमें आने वाले समय में गुजरात और हिमाचल प्रदेश तथा कुछ समय बाद महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में दिखाई दे सकते हैं ।
          गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित हो गई है लेकिन अभी महाराष्ट्र में कुछ देर है । गुजरात और महाराष्ट्र का इस बार का चुनाव कई मामलों में पिछले चुनाव से भिन्न होगा । तुलनात्मक रूप से यह चुनाव पिछले चुनावों से अधिक गंभीर होगा क्योंकि दोनों प्रदेशों में एकदूसरे की प्रबल विरोधी पार्टियों की सरकार है । गुजरात में बीजेपी है तो महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी गठबंधन । इस चुनाव को लेकर मौजू सवाल यह है कि यह चुनाव किन-किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा और जनता इस चुनाव में किस आधार पर वोट देगी ? दोनों प्रदेशों में दोनों पार्टियों की चुनावी रणनीति अलग होगी क्योंकि मुद्दे अलग-अलग हैं । यह चुनाव इसलिए भी और अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद लोकसभा चुनाव होगा जिस पर इसके परिणाम का प्रभाव पड़ सकता है, या यह कहा जाय कि इन दो बड़े राज्यों के चुनाव से ही लोकसभा के परिणाम की दिशा तय होगी । इसलिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होगा । यह चुनाव सिर्फ जनता के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहेगा । दोनों पार्टियों को अपना पक्ष जनता के सामने रखना होगा । गुजरात की लड़ाई सीधे-सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच है जबकि महाराष्ट्र में यह चुनाव बहुमुखी होगा । इस चुनाव पर सभी पार्टियों की निगाह है और सभी अपने-अपने हिसाब से जनता के सामने अपनी शुद्धता को सिद्ध करने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं ।
          दरअसल आज की राजनीति में जनता की समस्याओं और विकास की कोई जगह बची ही नहीं है । भ्रष्टाचार और मंहगाई के दलदल में फांसी हुई भारत की जनता आज दर्दके mकेयारे कराह र है और उसकी कराह सुनने वाला कोई नहीं है । सभी लोग अपना हित साधने में लगे हुए हैं ।  सारे के सारे नेता एकदूसरे पर आरोप लगाने और जनता को बेवजह बहकाने की कोशिश करते हैं । सबसे पहले हम गुजरात पर नजर डालें । गुजरात का यह चुनाव पिछले चुनाव के  मामले में कई तरह से अलग होगा । इसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं । नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता का कोई पैमाना नहीं है लेकिन पिछले चुनाव की बात की जाय तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच बहुत बड़ा अंतर था जो कहीं न कहीं गुजरात में मोदी की लोकप्रियता का ही द्योतक है, पर आज जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं उसमें ‘अपने मुंह मिया मिटठू बनाना’ की बात बहुत आम है । इस चुनाव में मोदी जिस विकास का दावा पेश कर रहे हैं वह कितना जमीनी है, यह तो आने वाले समय में गुजरात की जनता ही तय करेगी, और यह भी कि जनता को यह विकास कितना पसंद आया इसका पता परिणाम आने पर ही चलेगा । लेकिन कांग्रेस इस विकास के दावे को लगातार नीचा दिखाने की कोशिश जरूर करेगी । लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए की गुजरात की जनता कांग्रेस को अपना मत देगी । इस पर तो संदेह है । यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है कि दोनों पार्टियों के अपने कमजोर पक्ष भी हैं जिसे अगर नजरंदाज किया गया तो उनको भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है । गुजरात बीजेपी में पिछले कई सालों से आंतरिक कलह की भी बात आती रही है और यह बहुत गलत भी नहीं है ।  मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी कार्यशैली कई नेताओं को पसंद नहीं है जिसका समय-समय पर वे विरोध भी होता रहा है । इन नेताओं ने एक नई पार्टी का गठन भी किया है जो चुनाव मैदान में आ गई है । यह बीजेपी के लिए बहुत सुखद नहीं है । इसका अगर थोड़ा भी प्रभाव पड़ेगा तो बीजेपी का नुकसान हो सकता है । कांग्रेस की लगातार कोशिश रहेगी कि वह इसे मजबूत करे जिससे बीजेपी की स्थिति कमजोर हो । इन सारी बातों के वावजूद भी कांग्रेस के लिए अपने को बेदाग सिद्ध करना बहुत मुश्किल है । पूरे भारत की निगाह केंद्र पर है । केंद्र में कांग्रेस समर्थित यूपीए की सरकार है जिसके घोटाले और भ्रष्टाचार की फेहरिस्त दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है । इस सरकार ने भ्रष्टाचार का ऐसा खुला खेल खेला है जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक नहीं हुआ था । बावजूद इसके कांग्रेस के नेता आम आदमी के हित की बात कर रहे हैं और इन लोगों ने आम आदमी को जहां तक पहुँचा दिया है वहाँ जनता इन्हें कैसे स्वीकार करेगी समझ से परे है ।
          दरअसल कांग्रेस के लिए यह चुनाव आसान नहीं है । पिछले आठ वर्षों के कांग्रेसी शासन पर अगर नजर दौड़ाई जाय और उसमें आम आदमी की जगह तय की जाय तो बहुत मुश्किल होगा यह खोजना की आम आदमी के लिए कांग्रेस ने कौन सी जगह दी है । गुजरात की जनता के सामने कांग्रेस किस तरह के विकास का दावा प्रस्तुत करेगी जिस पर यह विश्वास किया जाय कि वास्तव में ये दावे इस बार पूरे होंगे । कांग्रेस ने पिछले दोनों कार्यकाल में जैसा केन्द्रीय सुशासन भारत को दिया है उससे कोई भी अनजान नहीं है । यह बहुत मुश्किल सवाल है कि गुजरात की जनता कैसे कांग्रेस के इन दावों को स्वीकार करेगी । टू जी, कामनवेल्थ और अब कोयला जिस तरह से केंद्र सरकार की करतूत के नमूने सामने आए हैं उसे जनता के सामने झूठा साबित करना बहुत कठिन है । यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और इसके बाद भी कांग्रेस के नेता जनता के बीच में विकास की बात कर रहे हैं । समय के बदलाव ने भारतीय जनता के स्वभाव को थोड़ा बदल दिया है । वह समय समाप्त हो गया जब नेहरू परिवार के नाम पर भारत के लोग वोट दिया करते थे । आज की जनता पहले से अधिक तार्किक और जागरूक हुई है । उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव परिणामों को देखा जा सकता है । राहुल गांधी की चमक इतनी फीकी पड़ी कि आज पता ही नहीं चल रहा है कि भारतीय राजनीति में राहुल कहाँ हैं । लेकिन कांग्रेस को अभी भी सीख नहीं मिली है और वह इस चुनाव में भी विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है । गुजरात चुनाव इसलिए भी कांग्रेस के लिए कठिन होगा क्योंकि कांग्रेस अभी तक टूजी से उबरी नहीं थी कि कोयले ने काला कर दिया । उसके बाद कांग्रेस ने एफ़डीआई के माध्यम से खुद अपने वोट बैंक के बड़े हिस्से को अलग कर दिया । भारतीय जनता का एक बड़ा तबका जो कि छोटे व्यापारियों का है जिसे एक बड़ा नुकसान कांग्रेस ने एफडीआई के रूप में दिया है । इस वर्ग का वोट भी बीजेपी को ही मिलेगा । कांग्रेस जिन मुद्दों पर गुजरात में चुनाव लड़ेगी उससे वह खुद केन्द्र में घिरी हुई है ।
          केंद्र सरकार के सभी फैसलों का सीधा असर जनता पर पड़ता है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार दुहाई देते रहे हैं कि मंहगाई कम होगी लेकिन मंहगाई में लगातार बृद्धि हुई है । यह चुनाव मंहगाई की मार से छटपटाई हुई जनता का चुनाव होगा । राज्य सरकारों के लिए ऐसे मामलों में बहुत आसान होता है कि वह सारा का सारा दोष केंद्र के ऊपर थोप दे । और सही भी है राज्य सरकारें कुछ कर भी नहीं सकतीं । यहाँ कुछ मुद्दों पर बीजेपी कमजोर दिखाई दे रही है । सबसे पहला मुद्दा बीजेपी  का आंतरिक कलह ही है । यह भी कुछ हद तक इस चुनाव को प्रभावित कर सकता है ।
          दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न गुजरात सरकार के पिछले कार्यकाल में हुए दंगों का है । जांच एजेंसियों ने भले ही नरेंद्र मोदी को बेदाग साबित कर दिया हो लेकिन जनता के हृदय में उनकी छवि आज भी एक कट्टरतावादी नेता की ही है । इस छवि से बाहर निकलने के किए मोदी और बीजेपी लगातार सेकुलर होने के हथकंडे आजमा रही है लेकिन यह ऐसा मामला है जो किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है । यह बहुत हद तक सही भी है कि उनके कार्यकाल में अगर इस तरह की बर्बरता का प्रदर्शन हुआ है तो उसका खामियाजा भी उनको भुगतना चाहिए । यह मामला अभी और ताजा हो गया है जबसे उन दंगों में लिप्त गुनहगारों को सजा सुनाई गई है । मोदी की करीबी मंत्री को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है जो उनकी संलिप्तता के लिए काफी है । यह जरूरी नहीं कि किसी अपराध में आप खुलकर सामने आएं तभी आपको अपराधी करार दिया जाएगा । कहीं न कहीं मोदी की सह उन लोगों को थी जिन्होंने इस तरह के कुकृत्य को अंजाम दिया । अब अगर जनता के दिमाग में ऐसी छवि है तो इसका प्रभाव गुजरात चुनाव पर जरूर पड़ेगा ।
          कुल मिलाकर अगर समग्रता में इस चुनाव का मूल्यांकन किया जाय तो जो तस्वीर सामने आ रही है या जो अनुमान लगाया जा सकता है वह यह कि यह चुनाव भी मोदी का ही होगा । कांग्रेस पर जनता भरोसा करेगी, इसमें दुविधा है । रही बात विकास की तो उसमें भी गुजरात बहुत पीछे नहीं है । कांग्रेस कुछ सीटों को इधर-उधर जरूर कर सकती है लेकिन सरकार एक बार फिर मोदी बना सकते है अगर सारे समीकरण सही-सही रहे तो । इसप्रकार गुजरात का यह चुनाव बीजेपी का चुनाव हो सकता है ।
          अब एक नजर महाराष्ट्र पर । अभी महाराष्ट्र के चुनाव में काफी समय है लेकिन जिस तरह की राजनीतिक उठापटक चल रही है उसे देखकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता । एनसीपी कभी भी कांग्रेस का हाथ छोड़ सकती है । अभी महाराष्ट्र में जिस तरह के भ्रष्टाचार सामने आए हैं उससे बौखलाई एनसीपी के सभी मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया और अगर बात कुछ और आगे बढ़ी तो समर्थन भी वापस ले सकते हैं । इस प्रदेश में चुनावी समीकरण बहुमुखी है । बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन का भी कोई भरोसा नहीं है । उधर राज ठाकरे शिवसेना को लगातार नुकसान पहुंचाते रहे हैं ।  कांग्रेस लगातार राज ठाकरे को मौन समर्थन देती रही है । वही हालत कुछ-कुछ एनसीपी का भी होने वाला है । यहाँ भी चाचा-भतीजे की लड़ाई की सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी है । अगर अजीत पवार बगावत करते हैं तो इसका प्रभाव एनसीपी पर जरूर पड़ेगा । यह कहना गलत नहीं होगा कि जब भ्रष्टाचार के सभी मामले उजागर हो जाएंगे इनके आपसी आरोप-प्रत्यारोप शुरू होंगे और फिर इस पूरे मामले को मैं अच्छा और मैं अच्छा मे फंसाकर समाप्त कर दिया जाएगा । महाराष्ट्र के लिए अभी कुछ भी कहना बहुत कठिन है की यहाँ ऊँट किस करवट बैठेगा ।
          कुल मिलाकर दोनों प्रदेशों की राजनीतिक गहमागहमी में मुद्दा जनता को ही तय करना है और चुनाव भी जनता का ही होगा । दोनों प्रदेशों में जनता के लिए असमंजस की स्थिति बनी रहेगी । लेकिन एक बाट साफ है कि इन चुनावों के बाद यह तस्वीर साफ हो जाएगी की केंद्र पर किसका कब्जा होगा या फिर मिलीजुली सरकार बनाने के बाद मनमोहन सिंह की तरह रोना रोते रहेंगे कि सरकार को बचाना जरूरी । इन तमाम सवालों के बीच यह चुनाव हो रहा है और यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में कुछ जवाब मिलेंगे । 

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे.....


          सन्तोष कुमार राय
मुक्तिबोध ने लिखा है कि ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे, तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब’... असीम पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उसे गिरफ्तार किया गया, यह कितना सही है ?  समाज कितना बदल गया है, हम कितने छोटे हो गये हैं, हमारा आत्म कितना दूषित हो गया है, हम कितने आत्ममुग्ध होते जा है, वास्तव में हम कितने कायर और डरपोक हो गये है । हिन्दी साहित्य में एक लंबी परम्परा रही है जो लगातार सत्ता के विरोध में लिखती रही है । इस परंपरा में नागार्जुन, हरिशंकर परसाई, धूमिल, रघुवीर सहाय के अतिरिक्त स्वाधीन भारत में और स्वाधीनता से पहले भी ऐसे अनेक लेखक और विचारक हुए हैं जिन्होंने सत्ता का विरोध किया है लेकिन किसी के साथ ऐसा अन्याय नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो शायद ये सभी लेखक या तो जेल में रहे होते या फिर इयानके लेखन पर रोक लगा दिया गया होता ।
          भारत सरकार की हालत आज 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' की हो गई है । ये लोग कभी भी अपने गिरेबान में झाँकने की कोशिश नहीं करते । आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहने के बावजूद जनता के सामने सफाई दे रहे हैं । यह तो तानाशाही है, जो लोग इसे लोकतन्त्र कहते हैं उन्हें लोकतन्त्र की तमीज नहीं है । और अगर यह लोकतन्त्र है तो लानत है ऐसे लोकतन्त्र पर जिसमें आदमी को सही बात कहने के लिए देशद्रोही करार दिया जाता है ।
          असीम त्रिवेदी के ऊपर मुकदमा चलाना एक तरह से आज के राजनेताओं के छोटेपन को ही दर्शाता है । असीम सच के साथ हैं और म्हम उनके साथ । यह कहना गलत नहीं होगा की अब हमारी शासन व्यवस्था भी तालीबानी शासन जैसी हो गई है । लेकिन यह कोई नई बात नहीं है इससे पहले भी इस तरह के वाकया हो चुके हैं । हुसैन साहब के साथ जो हुआ वह क्या था ? कहाँ से वह लोकतन्त्र का समर्थक था और कुछ वैसा ही रूख असीम के साथ भी व्यक्त किया जा रहा है ।
          आज भारत का हर नागरिक डरा-डरा महसूस कर रहा है । उसे लगातार यह चिंता सता रही है कि पता नहीं कल उसे किस जुर्म में गिरफ़्तारकर लिया जाएगा जो उसने किया ही नहीं है । भारतीय राजनीति में लोकतन्त्र के नाम पर जैसे परिवार तंत्र पल रहा है और जो लोग उसकी वकालत कर रहे हैं वे खुद इस देश के गद्दार हैं । अगर शर्म नाम की भी कोई चीज होती है तो आज के नेता जैसे जैसे घोटालों में फंसे हैं नैतिकता के आधार पर और उनकी लोकतंत्रीय दुहाई के आधार पर खुद राजनीति से बाहर क्यों नहीं निकाल जाते हैं । भूख, गरीबी और महंगाई से त्रस्त जनता की आवाज को देशद्रोह करार देना तानाशाही मानसिकता का ही द्योतक है ।
          मीडिया के द्वारा यह आवाज़ उठाई जा रही है कि लेखकों, विचारकों को अपनी सीमा निर्धारित करनी चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति का दायरा क्या होगा । मुझे लगता है कि यही सवाल आज इस देश के कर्णधारों से पूछा जाना चाहिए कि आपकी सीमा क्या है ? सरकार में शामिल लोग मनमानी लूट करें और इस देश की जनता नमाशबीन की तरह देखती रहे । उसे अपना विरोध दर्ज करने की भी अधिकार नहीं है ? क्या यह देश सिर्फ लूटेरों और भ्रष्टाचारियों का है ? अगर ऐसा है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में दूसरी बार स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा जाएगा । बड़ी कुर्बानियों के बाद यह देश बचा है । असीम को जेल में बंद कर देने से अभिव्यक्ति बंद नहीं होगी। हजारों ऐसे लोग पैदा हो जाएंगे जो विरोध करेंगे ।

हाँ ! हम ही दोषी हैं....


सन्तोष कुमार राय
कितना मजेदार होता है दोष देने वाले को ही दोषी बना देना । बचपन में जब किसी गलती पर हम झूठ का सहारा लेते थे और अपने छोटे भाई या बहन को दोषी सिद्ध करा देते थे और मन ही मन अपने बच निकलने की खुशी से गदगद हो जाते थे ।  लेकिन अचानक हमारी खुशी काफ़ुर हो जाती थी और हमारा बाल मन भयभीत हो उठता था । हमारे अभिभावक जब भाई-बहन को पीटना शुरू करते थे तो उसके रोने की आवाज हमें भी दहशत में डाल देती थी और अचानक हमारे मुंह से अपनी गलती का स्वीकार भाव निकलता था और हम भी भाई बहनों के साथ रोना शुरू कर देते थे । लेकिन उस गलती को स्वीकार करने के बाद जो संतोष मिलता था उसको बयां करना कठिन है । एक बात सच है कि मनुष्य जिस दिन गलती स्वीकार करना सीख जाता है उसी दिन उसके अन्तर्मन में ईमानदारी का स्थायी वास हो जाता है ।  
          अब समय बादल गया है और आज हम जिस समाज में जी रहे हैं और जिस समाज को देख रहे हैं, वह समाज न तो गलती स्वीकार करने का है और न ही ईमानदारी को अपना उसूल बनाने का । आज के समय में जो व्यक्ति ऐसा कर रहा है या तो उसे आज का समाज पागल करार देता है (जैसा दिग्विजय सिंह ने अन्ना को और अरविंद केजरीवाल को कहा था) या फिर वह खुद पागल हो जाता है। भारत सरकार के हमारे ईमानदार प्रधान मंत्री जी को ही देख सकते हैं । कितने ईमानदार हैं ! जब वे बोलते हैं... क्या कहने । ऐसा लगता है जैसे एक–एक शब्द से ईमानदारी की गंगा बह रही हो और सारे देशवासी उसमें भीगकर उन्हें तहे दिल से आशीर्वाद दे रहे हों । और देखकर तो लगता है कि इतना आशीर्वाद तो भागीरथ को भी लोगों ने नहीं दिया होगा । और यही नहीं जब गंगा के बरक्स सोनिया जी बोलती है तो जो मातृत्व झलकता है उसके लिए इस संसार में शब्द नहीं हैं । लेकिन अब क्या किया जाय ये जो कोयला है न इसने पता नहीं कहाँ से कुछ काला कर दिया । कितनी मुश्किल से राजा और कलमाड़ी को किनारे किया था और राहुल जी के लिए रास्ते को साफ सुथरा किया जा रहा था कि इसी में कैग वालों ने नया तमाशा खड़ा कर दिया । और विपक्ष को तो बस ऐसे मौके का इंतजार ही है । जमीन पर कुछ नहीं कर सकते, जनता के लिए कुछ नहीं कर सकते, तो क्या हुआ अगर विपक्ष का दर्जा मिला है तो देशवासियों को यह तो बता ही सकते हैं कि अगर हमे नहीं चुनोगे तो हम संसद ही नहीं चलने देंगे । अपने पिताजी का क्या जाता है । सरकार भी जनता की है और देश भी जनता का है और संसद को चलाने के लिए जो पैसा आता है वह भी जनता का है । तो विपक्ष का क्या है ? विपक्ष को तो जनता ने चुना नहीं है । कितनी अजीब बात है हर जगह पक्ष का चुनाव होता है, कहीं भी विपक्ष का चुनाव नहीं होता है । तो फिर विपक्ष क्यों जनता के लिए काम करे । अब चुने हो तो भुगतो ।
          खैर ले देकर यह सत्र भी रूखा-सुखा समाप्त हो गया लेकिन जनता बबूल के पेड़ से आम की प्रतीक्षा में पेड़ को निहारती रही । अब सरकार अपने पर लगे हुए कोयले के दाग को धोने की मंसा जाहिर कर चुकी है, क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने कल कह दिया कि विपक्ष अलोकतांत्रिक है और कैग ने जो भी आरोप लगाया है उसका जवाब दिया जाएगा । मुझे भी लगता है कि सरकार इस साल के इलाहाबाद के कुंभ में अपने दाग को पूरी तरह से भले न धो पाये लेकिन त्रिवेणी के पानी से पोछकर अगले चुनाव में जरूर आएगी अपनी प्यारी और ईमानदार दोषी जनता के बीच ।
          लेकिन दोष तो अभी भी बाकी है । आखिर कोयला का दोषी कौन है, अगर दोष दिखावे के छापे से अलग सिद्ध होता है तब । तो मेरा मानना है और मुझे लगता है कि हमारे पूर्व और वर्तमान कोयला मंत्री जी लोग भी यही कहेंगे कि साहब हम तो जनता के सेवक हैं आखिर कुछ लोगों को दिया तो वे भी तो इसी लोकतन्त्र के अंग हैं । इसमें बहुत बौखलाने की क्या जरूरत है । और अगर जनता ऐसे विपक्ष को चुनकर भेजेगी तो हम क्या कर सकते हैं । इसके लिए तो जनता ही दोषी है और मैं भी उसी दोषी जनता की ओर से हूँ ।

सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...