आज़ादी के इतने सालों बाद भी पूर्वांचल बुनियादी सुविधाओं के लिए
तरस रहा है। किसी भी समाज के विकास जो बुनियादी सुविधाएं है उनमें बिजली, पानी, सड़क,
इलाज और शिक्षा है। आप जैसे ही बनारस से पूर्व की ओर बढ़ेंगे आपको
सहज विश्वास नहीं होगा कि आप उसी देश या प्रदेश में जा रहे हैं जो भारत का ही एक
अहम हिस्सा है। सड़कें ऐसी हैं कि आप 2 घंटे का रास्ता 5
घंटे में तय करेंगे। घोर अशिक्षा का शिकार है यह क्षेत्र। कई कई दिनों तक बिजली नहीं रहती
हैम पानी की तो बात ही नहीं है आज भी कई गांवों के लोग नदियो का प्रदूषित पानी
पीते हैं। किसानों के लिए किसी प्रकार की सुविधा नहीं है जबकि कृषि ही एकमात्र इस
क्षेत्र के जीविकोंपार्जन का साधन है। स्वास्थ्य की हालत तो पूछिए मत बस किसी दिन
मंत्री और मुख्यमंत्री को बोल दीजिये की अपनी अम्मा को सामान्य लाइन में दिखा के
बता दें। नानी याद आ जाएगी। मतलब यह कि आज जिस हालत में यह क्षेत्र पहुंचा है उसके
लिए किसे जिम्मेदार माना जाय? किसी जमाने में देश का वह हिस्सा अँग्रेजी हुकूमत की जड़ हिला देता था उसे
इन सरकारों ने बिकलांग बना दिया। दो सरकारों का नाम मैं यहाँ खुलकर लेना चाहूँगा
जिसने पूर्वांचल के साथ सौतेला व्यवहार किया और ये दोनों हैं सपा और बसपा। मजे की
बात यह है कि जब भी इनकी प्रदेश में सरकार रही है सर्वाधिक सहभागिता इस क्षेत्र की
ही रही है। ये वोट पूर्वांचल से लेते रहे और विकास पश्चिमी उत्तर प्रदेश और सैफई
करते रहे। मैं किसी भी क्षेत्र के विकास को बुरा नहीं मानता हूँ लेकिन उसमे भेदभाव
नहीं होना चाहिए। इस क्षेत्र में गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, कुशीनगर और देवरिया प्रमुख हैं। क्षेत्रीय
पार्टियों ले आत्मविश्वास का एक नमूना देखिये। सपा ने बसपा के समय के प्रख्यात
घोटालेबाज बाबूसिंह कुशवाहा की पत्नी को खड़ा किया है। बसपा ने पड़ोसी जिले के किसी
कैलाश यादव को खड़ा किया है जो कभी सपा में हुआ करते थे। दोनों मूलरूप से बाहर के
हैं और आपस में अदला-बदली करते रहे हैं। यही नहीं दिली के पास के कोई नेता डी पी
यादव हैं, वे भी पहुंचे हैं। सपा-बसपा ऐसे चुनाव लड़ रही है
जैसे उन्होने विकास का सारा पैसा वहीं लगाया है। भाजपा ने गाजीपुर के सबसे पुराने
नेता मनोज सिन्हा को खड़ा किया है। सिन्हाजी बेहद ईमानदार और सुलझे हुए नेता हैं। 1999
से 2004 तक सिन्हाजी यहाँ के सांसद थे। उस
दौरान उनके फंड का समुचित और सही उपयोग क्षेत्र के विकास में हुआ था। पहली बार उस
क्षेत्र के अनेक गाँवो को पक्की सड़के नसीब हुई। उससे पहले सड़के नहीं थी लोग घुटने
तक कीचड़ में धंस के बाहर जाते थे। लेकिन सिन्हाजी ने जिला के विकास को जहां छोड़ा
था वह आज भी उसी जगह खड़ा है। मसलन ग्रामीण इलाके में जो सड़के बनीं थी आज तक उन पर
दूसरे लोगों एक टुकड़ा तक नहीं डाला। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे वहाँ की जनता वाकिफ
है। इस बार के चुनाव में स्थिति बिलकुल बदल गई है। इस बार जाति और धर्म छोटा पड़
गया है। इस बार का मतदान पूर्वांचल के लोग विकास के मुद्दे पर करने जा रहे हैं।
बनारसी राजनीतिक मिज़ाज और इस बार का चुनाव
सन्तोष कुमार राय
इस बार के चुनाव में नरेंद्र मोदी के
नाम को जिस तरह से चर्चा का केंद्र बनाया गया है उस लिहाज से मोदी का बनारस से
चुनाव लड़ना बनारस और मोदी दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह
भी एक बड़ा सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बनारस के साथ
बने रहेंगे? मेरा अनुमान है कि ऐसा होगा नहीं और पिछले
60 वर्षों से अपनी भावुकता और बनारसीयत के अंदाज में ठगे गए बनारसी इस बार भी ठगे
जाएंगे और नरेंद्र मोदी चुनाव के बाद इस सीट को छोड़ देंगे और फिर गुजरात की सीट को
लेकर प्रधानमंत्री बन जाएंगे। बहरहाल यह एक कयास है सच्चाई नहीं है। जहाँ तक फायदे
की बात है तो मोदी के बनारस आ जाने से भाजपा के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आएगा
और उसका प्रभाव पूर्वांचल के साथ बिहार पर भी पड़ेगा। मतदाताओं के लिए जिन सीटों पर
असमंजस की स्थिति रहेगी उन सीटों पर भी वे मोदी के नाम पर भाजपा जे जुड़ सकते हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि जाति और धर्म का जो बीज इन क्षेत्रों में बहुत
पहले बोया गया था उसका फल कई पार्टियों ने काट लिया है। जहाँ तक भाजपा का सवाल है
तो उसने भी धर्म के आधार पर अपना आंदोलन यूपी के अयोध्या में ही शुरू किया था
जिसके कुछ छींटे बनारस भी आए थे और इस सीट को 90 से 2009 तक,
बीच में 2004 को छोड़कर भाजपा का बना दिये। इस बार का चुनाव कई मायनों में दूसरे
तरह का है। इस लिहाज से वाराणसी में मोदी की दावेदारी का विश्लेषण बहुत जरूरी है।
अभी तक मुख्य रूप से वाराणसी की दावेदारी में तीन नाम आए हैं जिन्हे ध्यान में
रखकर वाराणसी के मतदाताओं पर विचार होना चाहिए। मोदी के समानांतर इस चुनाव में
अरविंद केजरीवाल भी आ रहे हैं। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे पूर्वांचल के
प्रख्यात बाहुबली मुख्तार अंसारी भी मोदी के समक्ष होंगे,
जिनका अतीत कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में घूमता रहा है। इस क्षेत्र के अतीत पर
अगर ध्यान दिया जाय तो यह क्षेत्र भाजपा के बाहुबली विधायक कृष्णानंद राय का कार्य
क्षेत्र रहा है। कृष्णनन्द और मुख्तार की लड़ाई में निश्चित तौर पर मतदाताओं के दो
पक्ष बने हैं और वे आज भी उसी तेवर के साथ काम कर रहे हैं जिसके नमूने कभी-कभी
देखने को मिल जाते हैं। यह सच्चाई है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी
मुस्लिम वोटरों का एक बड़ा तबका मोदी को स्वीकार नहीं कर रहा है। बनारस में मुस्लिम
वोटरों की संख्या ठीक-ठाक है। दूसरा वर्ग वह है जो यहाँ जाति की लड़ाई लड़ता है।
अतीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा को बनारस में कुछ एक अपवादों को छोड़कर
सवर्ण वोटरों की पार्टी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी स्थिति में परंपरागत भाजपा
विरोधी वोटर खुद को मोदी के विरोध में स्थापित करेगा। जहां तक केजरीवाल की बात है
तो उन्हे भाजपा जिस तरह हल्के में ले रही है दरअसल वैसी स्थिति है नहीं। भाजपा के
नेताओं की सबसे बड़ी कमी है कि वे कभी भी अपने विरोधियों की क्षमता को स्वीकार नहीं
करते और अपनी राग ही अलापने में अपनी बहदुरी समझते हैं। इसका परिणाम 2004, 2009 और कुछ महीने पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखा चुके हैं फिर भी
सच्चाई से आंखे मोड़ रहे हैं। केजरीवाल जितने खतरनाक कांग्रेस के लिए हैं उससे कम
भाजपा के लिए नहीं हैं। जहाँ तक बनारस में वोटरों की बात है तो हम इसे तीन वर्गों
में देख सकते हैं। पहला वह है जो परंपरागत भाजपा का वोट है। दूसरा वह है जो
क्षेत्रीय पार्टियाँ, मसलन सपा, बसपा
और मुख्तार की पार्टी के वोटर हैं जो कभी सपा तो कभी बसपा पर वोट करते रहे हैं।
तीसरा वर्ग कांग्रेस का है। कांग्रेस का वोट बँटेगा यह तय है लेकिन यह भी तय है कि
वह मोदी को उस हिसाब से नहीं मिलेगा जैसा भाजपा अनुमान लगा रही है। अगर इस चुनाव
में केजरीवाल नहीं होते तो शायद मोदी को इसका लाभ मिल जाता लेकिन केजरीवाल अगर
सेंध लगायेंगे तो मोदी के लिए खतरा हो सकता है जो कि 2009 में मुरली मनोहर जोशी को
नहीं था।
मोदी के बनारस आने से निश्चित तौर पर भाजपा
को लाभ होगा। लेकिन 90 के दशक मे भाजपा ने राजनीति में जो प्रयोग किया था उसका
प्रभाव इस चुनाव में मोदी की सीट पर भी पड़ेगा। देश के विकास की जगह राजनीति में भाजपा
ने नया प्रयोग किया और एक खास समुदाय की आस्था को मुद्दा बनाया और राम मंदिर के
आधार पर आम चुनाव में आए जिसका कई प्रान्तों में त्वरित लाभ मिला। वह पहला दौर था
जब राजनीति में सत्ता की नाकामियों को गिनाने की बजाय लीक से हटकर बिलकुल नायाब
मुद्द सामने आया। भाजपा की पारंपरिक सीट की तलाश करते हुए नरेंद्र मोदी बनारस आ
गये। अब यह देखना होगा कि इस सीट पट भाजपा के साथ अन्य दल किस तरह से आते हैं। अगर
सपा और बसपा ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया तो मोदी की सीट का निकालना बहुत मुश्किल
है। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है और मुख्तार अंसारी सपा के पूर्व नेता भी हैं
आज सपा से उनकी नज़दीकियाँ भी है और इसका लाभ मुख्तार को मिल सकता है। वैसे अभी कुछ
भी साफ साफ नहीं कहा जा सकता है लेकिन भाजपा और मोदी का यह फैसले को बहुत योग्य
नहीं कहा जा सकता।
आंदोलनधर्मी राजनीति बनाम राजनीतिक स्थायित्व का प्रश्न
सन्तोष कुमार राय
लोकतंत्र
में परिवर्तन एक सच्चाई है और यह सच्चाई समय-समय पर घटित होती रही है। प्रतिरोध और
परिवर्तन का बहुत ही गहरा रिश्ता है। भारतीय राजनीति के संदर्भ यह बात अधिक सही और
सटीक है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध भी हमारे लोकतंत्र का हिस्सा
है। हर परिवर्तन से हम स्थायित्व की अपेक्षा करते हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है। ।
आखिर क्या कारण है कि आज तक भारतीय जनमानस का मिजाज परंपरागत राजनीति के प्रति स्थिर
नहीं हुआ है या फिर हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था आम जनमानस की आकांक्षा-अपेक्षा
और विचार के अनुकूल विकसित नहीं हो पाई है ? इसके लिए हमें
स्वातंत्र्योत्तर राजनीति को कई टुकड़े में देखने की जरूरत है। इसका पहला हिस्सा 1975
से पहले का है। यह दौर भारतीय राजनीति की एकदलीय व्यवस्था का दौर है। यहाँ यह कहना
गलत होगा कि उस दौर में विपक्ष-विहीन सरकार काम करती रही है लेकिन सच्चाई यही है
कि सत्ता के लिए वह दौर विपक्ष-विहीन ही रहा है। इसका कारण बहुत साफ है। वह पूरा
का पूरा दौर बिखरे हुए विपक्ष का दौर रहा है जबकि लोकतंत्र की मर्यादा को बचाने के
लिए सबसे जरूरी है संगठित और व्यवस्थित विपक्ष। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब-जब
विपक्ष संगठित और व्यवस्थित हुआ है भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव हुए हैं।
इमरजेंसी के बाद का दौर संगठित विपक्ष
का दौर है। भारतीय लोकतंत्र के स्वरूपगत बदलाव का दौर है। जो राजनीति सिर्फ दिल्ली
को ओर देखती रहती थी उसकी दिशा बदल गई। भारत के गाँव जिस विकास की बाट जोहते-जोहते
पाँच साल में मृत प्राय हो जाते थे, पहली बार
उनकी ओर दिल्ली को मुड़कर देखना पड़ा। तात्पर्य यह कि भारत में राजनीति का
विकेन्द्रीकरण हुआ। क्षेत्रीय राजनीति का उभार हुआ। लगभग सभी प्रदेशों में
क्षेत्रीय पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके नफा-नुकसान अलग हुए। वह एक अलग बहस का विषय
है। लेकिन एक बात साफ है कि भारत जैसे
बहुभाषा-भाषी, बहु-सांस्कृतिक,
बहु-जातीय और बहु-धार्मिक देश में राजनीतिक पार्टी एक क्यों ? इस तरह के बदलाओं को दिशा देने के लिए समय-समय पर बदलाव धर्मी नेताओं का उदय
हुआ, जिन्होने भारतीय समाज के प्रतिरोध को सार्थक और सही
दिशा दी।
दरअसल प्रतिरोध लोकतंत्र की अहम ईकाई
है। इस इकाई के अनेक नेता हुए हैं। इनमें लोहिया, जेपी, राजनारायण वाजपेयी, आडवाणी जैसे नेताओं का नाम लिया
जा सकता है। इन नेताओं ने आम जनता के मानस को न सिर्फ समझा बल्कि उसके सहारे भारत
की राजनीतिक सत्ता की दिशा को भी परिवर्तित करने का साहस किया। यह कहना गलत नही
होगा कि भारतीय जनमानस बदलाव-धर्मी है। उसे राजनीति और समाज की एकरसता स्वीकार
नहीं है। वह किसी भी ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं करता जो एक समय के बाद परंपरागत
हो जाय, या जो सामाजिक बदलाव की गति में आम जनमानस के कदम से
कदम मिलाने के बजाय अपनी जड़ मानसिकता को थोपने का काम करे।
स्वाधीन भारत के जितने भी राजनीतिक
आंदोलन हुए हैं वे सभी किसी-न-किसी अस्वीकार भावना को लेकर ही हुए हैं। कुछ
बुद्धिजीवी भारत के राजनीतिक आंदोलनों को असफल मानते हैं, साथ ही यह आरोप भी लगाते हैं कि ये आंदोलन दिशाहीन थे और आमजन को
दिग्भ्रमित कर दिये थे, इसीलिए सफल नहीं हुए। मेरा मानना है
कि राजनीतिक आंदोलन में असफलता के लिए न तो कोई जगह होती है,
और न ही असफलता जैसी कोई चीज होती है। उसमें जो कुछ भी होता है वह सिर्फ सफलता का
प्रतीक होता है। स्वतंत्रता के बाद से सन् 75 तक भारतीय जनता ने उस समय की सरकार
को कई मौके दिये और लगातार आशा की निगाह से देखती रही कि सुधार के दिन आएंगे, लेकिन वे दिन नहीं आए और जनता का सरकार से मोहभंग हो गया। इस मोहभंग का
ही नतीजा था कि एक जमी-जमाई सरकार को जनता ने सत्ता से अपदस्थ कर दिया। उस दौर में
इंदिरा गांधी जैसी नेता को राजनारायण ने हरा दिया। कोई तो ऐसी बात रही होगी जिसे
जनता ने अस्वीकार किया। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले नेताओं ने भारतीय राजनीति
का केन्द्रीकरण कर दिया। 47 से लेकर आज तक भारत की राजनीति और सत्ता तंत्र कांग्रेस
के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। केंद्रीकृत राजनीति को तोड़ने के अनेक प्रयास हुए।
जनसंघ का विकसित रूप आज भाजपा है जिसने निरंतर कांग्रेस का विरोध किया और सत्ता
में भी आए लेकिन कांग्रेस ने फिर कब्जा जमा लिया। मनमोहन सिंह की सरकार को इन पांच
वर्षों में जितने आंदोलनों का सामना करना पड़ा है शायद ही किसी सरकार को ऐसी दुर्दशा
से गुजरना पड़ा होगा। भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के रूप में अनेक आंदोलनो में
सक्रिय भूमिका निभाया तो वहीं अलग-अलग समाज के लोगों ने भी आंदोलन किया जो अपने
प्रारूप में सफल रहे।
आंदोलन से पैदा हुई राजनीति पर
सत्ताधारी वर्ग अक्सर यह आरोप लगता है कि अमुक पार्टी और अमुक नेता संविधान विरोधी
हैं, अराजक हैं, फासिस्ट हैं। सत्ताधारी वर्ग खुद को
संविधान का सबसे बड़ा रक्षक और जनता का हितैषी बताता है। 77 के आंदोलनकारी नेता संवैधानिक
ढांचे के विरोधी नहीं थे। लेकिन उनका विरोध इस ढांचे के अंदर आई औपनिवेशिक
मानसिकता से जरूर था। लोहिया और जयप्रकाश नारायण द्वारा खड़ा किए गए समाजवादी
आंदोलन को राजनारायण जैसे कार्यकर्ताओं ने ही सही मुकाम तक पहुंचाया। हम कल्पना भी
नहीं कर सकते कि अगर उस चुनाव में कांग्रेस की हार नहीं होती तो देश का राजनीतिक
दंभ कहाँ होता। सरकार और आम आदमी के बीच
कितनी दूरी होती। उस दौर में भारतीय जनता ने सत्ताधारी नेताओं को यह एहसास करा
दिया कि वह जिसे चुनकर सदन तक पहुंचा सकती है उसे जमीन पर भी ला सकती है।
प्रतिरोध की राजनीति के त्वरित परिणाम
नहीं होते। इसके परिणाम दूरगामी होते हैं। त्वरित परिणाम प्रतिकात्मक और अस्थिर
होते हैं। अगर जनता पार्टी की सरकार से यह उम्मीद की जाती कि वह पाँच वर्ष तक शासन
करेगी तो यह असंभव था। उस सरकार में शामिल लोगों की राजनीतिक चेतना सत्ता-गामी
नहीं बल्कि प्रतिरोधी परंपरा की थी। प्रतिरोधी परंपरा कहीं भी समझौतावादी नहीं हो
सकती। उसका धर्म और स्वभाव दोनों ही विरोध का होता है। यह विरोध ही है जो उसे
अपनों से भी अलग करता है। जिन लोगों के साथ विरोध किया गया बाद में वे भी विरोधी
हो गए।
प्रतिरोधी राजनीति की सफलता और असफलता
का संदर्भ सरकार चलाने से नहीं है। मैंने उपर कहा भी है कि इस तरह की राजनीति के
परिणाम त्वरित नहीं होते, बल्कि दूरगामी होते हैं। उस
समय के प्रतिरोध ने स्वतंत्र भारत की राजनीति की परिभाषा ही बदल दिया। पहली बार
भारतीय राजनीति में विपक्ष की अहमियत का एहसास हुआ। 77 तक छुट्टे घोड़े की तरह चल
रही मनमानी राजनीति को लगाम लगी और प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इस प्रतिरोध
का आकलन उस दौर में कैसा हुआ या किस तरह का परिणाम रहा यह उतना अहम नहीं है। उसकी
अहमियत यह है कि उसने प्रतिरोध की राजनीति की संस्कृति को नया और वास्तविक जन्म
दिया। इससे पहले तक स्वतंत्र भारत में प्रतिरोध भी उन नेताओं के एहसान तले दबकर हो
रहा था और वह अपनी क्षमता खो चुका था। राजनीति के इस मोड़ ने भविष्य के लिए जो नींव
तैयार की उसने भारतीय राजनीति की परिभाषा बदल दी। एकपक्षीय और एक-दलीय राजनीति का
अवसान हो गया। क्षेत्रीय राजनीति का विकास हुआ। आम जनमानस,
जो लगातार एक असहाय की तरह दिल्ली को देख रहा था उसने अपने होने का एहसास कराया और
दिल्ली को भी अपनी ओर देखने के लिए मजबूर किया। जनता पार्टी की सरकार के बनाने से
ज्यादा महत्वपूर्ण उसका बिखरना था, ऐसा मैं मानता हूँ। अगर
वह सत्ता चला ले जाती तो फिर इस देश को कई दशक तक प्रतिरोधी मस्तिष्क के पैदा होने
के लिए इंतजार करना पड़ता। उन नेताओं को अपने होने का ज्ञान था और वे ऐसे थे जिन्हे
राजभवन से ज्यादा प्रिय आमजन का साथ था। उन्होने पुनः उसे ही चुना। अंत में हम इस
बिन्दु पर भी विचार कर सकते हैं कि आज जिस तरह से प्रतिरोध की राजनीति मुख्यधारा
के परेशानी का सबब बन जा रही है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ सरकार को चलाने में
अपनी भूमिका अदा कर रही हैं उनकी पृष्ठभूमि में वे ही प्रतिरोध हैं जिन्हें असफल
और आलोकतांत्रिक कहा जाता है। अगर इस देश में आंदोलन नहीं होते तो शायद इस देश का
चेहरा और बुरा होता और लोकतंत्र के नाम पर कौन सा तंत्र चलता इसका अनुमान लगाना
मुश्किल है। इतने प्रखर विरोध और बदलाव के बावजूद भारतीय राजनीति जिस तरह से
परिवारवाद के चंगुल में जकड़ती जा रही है वह भविष्य के लिए चिंता का विषय है। बावजूद
इसके प्रतिरोध है और रहेगा।
प्रेमचंद और दलित प्रश्न : जेकरे खातिर चोरी कईली उहे कहे चोरवा--नामवर सिंह
सन्तोष कुमार राय
इसका कुछ हिस्सा रिपोर्ट के रूप मे यथावत
के इस अंक में प्रकाशित हुआ है....
दलित
चिंतकों और साहित्यकारों ने प्रेमचंद के लेखन पर एकबारगी प्रश्नचिन्ह लगाया है।
उन्हें दलित विरोधी घोषित किया है। सामंती और वर्ण-व्यवस्था का पोषक कहा है।
ब्राह्मणवादी कहा है और न जाने क्या-क्या कहा है। यह किसी भी संवेदनशील साहित्य
प्रेमी के लिए ग्राह्य नहीं है। इन्हीं बातों से आहत होकर नामवर सिंह ने प्रेमचंद
के लेखन में अभिव्यक्त दलित संदर्भ को दलित आलोचकों द्वारा नकारने और उन्हें खारिज
करने पर कहा कि ‘जेकरे खातिर चोरी कईली उहे कहे चोरवा’। पिछले
दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में ‘प्रेमचंद
के अध्ययन की नई दिशाएँ’ विषय पर एक संगोष्ठी हुई जिसके वक्ता हिंदी के वरिष्ठ
आलोचक नामवर सिंह, दलित साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम, मृदुला
गर्ग और रोहिणी अग्रवाल थीं। इसका संचालन और संयोजन डॉ.ओमप्रकाश सिंह ने किया। हिंदी
साहित्य में दलित विमर्श को लेकर पिछले दो दशकों से जद्दोजहद चल रही है। इतने
दिनों बाद भी इस क्षेत्र में कोई सम्यक दिशा नहीं बन पायी है,
जिसे लेकर दलित और गैर दलित बातचीत कर सकें। हिंदी के सभी बड़े आलोचक इस विषय पर
बहुत साफ-साफ बोलने से बचते रहे हैं, खासकर वामपंथी
आलोचक। इस कड़ी में नामवर सिंह का भी नाम आता है। नामवर सिंह ने पिछले दस वर्षों
में दलित साहित्य को लेकर कम से कम दो दर्जन से अधिक संगोष्ठियों में तमाम
अंतर्विरोधी बातें कही हैं। कई जगह वे दलित साहित्य की वैचारिकी,
साहित्यकारों की ऊर्जा संपन्न दृष्टि और उसके विकास की उर्वर जमीन की गाहे-बगाहे
तारीफ करते रहे हैं, लेकिन उसकी रचनात्मकता की दिशा को लेकर आलोचना भी किया
है। इस बार नामवर जी दलित वैचारिकी की आलोचना की जगह हमलावर के रूप में दिखे।
हिंदी
की अन्य संगोष्ठियों की तरह यह भी अपने विषय के एक पक्ष पर ही अंत तक चलती रही।
जहां प्रेमचंद के साहित्य के अध्ययन के अनेक पहलुओं पर चर्चा परिचर्चा होनी चाहिए
थी वहाँ प्रेमचंद बनाम दलित बनाकर पूरी बातचीत हुई। संगोष्ठी की शुरुवात जयप्रकाश
कर्दम के वक्तव्य से हुई। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद साहित्य के गांधी हैं। उनके लेखन
में दलितों के लिए करुणा का भाव है। दलित जीवन के प्रति उनकी मुखरता अस्पष्ट है।
उनमें दलित पक्षधरता का अभाव है। वे उनकी आवाज नहीं बन पाते। सामंती समाज की
आलोचना वे दबी जुबान से करते हैं। वर्ण-व्यवस्था को नकार नहीं पाते। उदाहरण के रूप
में उन्होंने रंगभूमि, ठाकुर का कुआं, सद्गति और कफन को लिया। जयप्रकाश कर्दम का इशारा उसी
अनसुलझे सवाल की ओर था जो पिछले कई वर्षों से हिंदी की संगोष्ठियों में छाया हुआ
है। दलित लेखकों को गैरदलित में सहानुभूति नजर आती है और गैर दलित खुद को दलितों
का हितैषी सिद्ध करने के लिए बेताब हैं। सहानुभूति और स्वानुभूति के झगड़े में
पूर्वाग्रह और दुराग्रह को फैलने को पूरा अवकाश मिला है। दलित लेखकों का मानना है
कि गैरदलित दलित साहित्य कैसे लिखा सकता है? और
अगर प्रेमचंद को दलित हितैषी कह देंगे तो फिर आज के रचनाकारों को कैसे खारिज कर
सकते हैं, जो गैरदलित होते हुए भी घोषित तौर पर दलित जीवन के पक्ष
में लिख रहे हैं। यही कारण है कि अन्य दलित आलोचकों की तरह जयप्रकाश कर्दम ने भी
गैर दलित की लेखकीय सहानुभूति को खारिज किया।
दूसरे
वक्ता के रूप में नामवर जी ने प्रेमचंद के विषय में दलित चिंतकों के विचारों से सहमति
व्यक्त की और प्रेमचंद को सामंतों का मुंशी कहने प्रख्यात दलित आलोचक डॉ.धर्मवीर
को आड़े हाथों लिया। प्रेमचंद के चिंतन की भूमि को उन्होंने गांधी से जोड़ा और कहा
कि इन्हें क्या कहा जाय ये लोग तो गांधी को भी नहीं छोड़ते। जिस तरह से ये लोग गांधी और प्रेमचंद का
कुपाठ करते हैं मुझे भय है कि किसी दिन ये लोग अंबेडकर का भी कुपाठ न कर दे। अगर
गांधी को हिन्दी उपन्यासों में देखना हो तो रंगभूमि के सूरदास को देखना चाहिए। उन्होंने
दलित लेखकों की रचनात्मकता को कटघरे में खड़ा किया। रचनात्मकता और साहित्य की विमर्शात्मक
राजनीति को अलगाते हुए कहा कि दलित लेखकों ने प्रेमचंद का कुपाठ किया है। उन्होंने
सद्गति के हवाले से कहा कि ‘सद्गति कहानी में दुखी चमार द्वारा काटी जा रही लकड़ी की
गांठ ही वर्ण व्यवस्था का प्रतीक है जिसे प्रेमचंद कटवा रहे हैं। लेकिन यह दलित
लेखकों को समझ में नहीं आता’। डॉ.धर्मवीर
की कफन संबंधी टिप्पणी, ‘जिसमें उन्होंने कहा है कि बुधिया के पेट में पल रहा
बच्चा जमींदार का है’। इसके संबंध में उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए
कहा कि उनको कैसे पता कि वह बच्चा किसी जमीदार का है। उनकी आत्मकथा के प्रसंग में
कहा कि अगर उनकी पत्नी के साथ उनके संबंध खराब है इसका मतलब यह नहीं कि पूरे देश
की स्त्रियों को वे खराब कहेंगे। यह कहीं से भी न्याय संगत नहीं है। धर्मवीर की
आलोचनात्मक समझ को उन्होंने सभी दलित लेखकों के ऊपर रखते हुए उनका विरोध किया। साथ
ही उन्होंने दलित लेखको को नसीहत देते हुए कहा कि अच्छा यह होता कि दलित लेखक
प्रेमचंद की साहित्यिक समझ को आगे बढ़ाए होते और अगर ऐसा हुआ होता तो आज दलित
साहित्य की स्थिति कुछ और होती। आगे उन्होंने कहा कि दलित लेखकों ने अपने लेखन को
प्रेमचंद जैसा बनाने के बजाय अपनी ऊर्जा को आरोप-प्रत्यारोप में जाया किया है। उन्होंने
दो टूक कहा कि मैं दलित लेखकों को चुनौती देता हूँ कि वे अपने लेखन में प्रेमचंद
की बराबरी करके दिखाएँ। दृढ़ आराधन का उत्तर आराधन से दें। उन्होंने चुटकी के अंदाज
में कहा की कपोल से कपोल रगड़े जाते हैं, पैरों से मर्दित
नहीं किए जाते। लेकिन इस आरोप और प्रत्यारोप में नामवर जी भी उन लेखकों को भी
नजरंदाज कर जाते हैं जो वास्तव में दलित लेखन की गहराई को अभिव्यक्त कर रहे हैं।
ओमप्रकाश वाल्मीकि और तुलसी राम सरीखे संवेदनशील और संतुलित लेखकों पर प्रश्नचिन्ह
लगाना या नजरंदाज करना वैसा ही है जैसे डॉ.धर्मवीर का प्रेमचंद संबंधी दृष्टिकोण।
संगोष्ठी
के अगली वक्ता के रूप में रोहिणी अग्रवाल थी। उन्होंने प्रेमचंद के करुण भाव को
दलितों और स्त्रियों के लिए नाकाफी बताया। उनका कहना था कि दलित और स्त्री किसी की
करुणा जनित सहानुभूति के भूखे नहीं हैं, वे
इसका प्रातिकार करते हैं। लेकिन उनकी बातों से असहमति व्यक्त करते हुए वरिष्ठ
महिला कथाकार और स्त्री विमर्शकार मृदुला गर्ग ने कहा कि करुणा को इतना छोटा करके
नहीं देखा जा सकता। प्रेमचंद एक ऐसे कथाकार हैं जो करुणा के माध्यम से मानवीय
संवेदना की गहराई तक जाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद एक ईमानदार कथाकार हैं उन्होंने
अपने लेखन में करुणा का भाव जगाया है, टिप्पणी नहीं की है। क्योंकि टिप्पणी करना लेखक का काम नहीं है, यह आलोचक या पाठक का
काम है। आगे उन्होंने कहा कि आज भी दलित और स्त्री विमर्श वहीं खड़ा है जहाँ
प्रेमचंद ने छोड़ा था। आज इसकी बहुत अधिक जरूरत है कि अपनी राजनीतिक सौदेबाजी को
छोड़कर उसकी वास्तविक भाव भूमि पर विचार किया जाय और उसे अभिव्यक्ति प्रदान की जाय।
लेकिन इसके बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वास्तव में प्रेमचंद को हम किस दृष्टि
और वैचारिक आग्रह के साथ नए संदर्भों में देखें। दरअसल आज का साहित्य लेखन इस तरह
की राजनीतिक बहसों में फंस गया है कि उसे हमारे आलोचक स्पष्ट करने के बजाय और उलझा
रहे हैं। यह विमर्श कम पूर्वाग्रह अधिक होता जा रहा है। साहित्य में जिस तरह की
उदारता की जरूरत होती है उसका आज सर्वथा अभाव है।
खेती न किसान को भिखारी को न भीख, बलि...
सन्तोष
कुमार राय
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सर्वसम्मत
भूमिका निभाने वाले लोगों में स्वतंत्रता के बाद अगर किसी को सर्वाधिक नजरंदाज
किया गया है तो वे भारत के किसान हैं। किसी भी देश के विकास को तब तक विकास नहीं कहा
जा सकता जब तक कि उस देश के अन्नदाताओं की समस्याओं का मुकम्मल समाधान न हो। यह
दौर किसानों की ‘हत्या’ बनाम ‘आत्महत्या’ का है। यह दौर किसानों के स्वाभिमान को
कुचलने का है। यह दौर ईमानदारी की निलामी का है। यह दौर मानवता के चरम क्षरण का
है। आज किसानों की बड़े पैमाने पर हत्या हो रही है, या यूं
कहें कि भारत का सत्ताधारी वर्ग पूँजीपतियों के साथ मिलकर ऐसी साजिश रच रहा है
जिसमें फंसकर किसान तड़प-तड़प कर दम तोड़ दें। देश आजाद हुआ और किसानों ने इसमें उस
हद तक सहयोग किया जहाँ वे लगभग बर्बाद हो गये। अपनी बर्बादी की परवाह किए बिना
किसानों ने भारत के स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई लड़ी। लेकिन आजादी के बाद यह देश
दलालों और भ्रष्टाचारियों के हाथों में चला गया। अब जरूरत है दूसरे स्वाधीनता की
लड़ाई की जिससे किसानों के अधिकारों की रक्षा हो सके, उन्हें
वह वाजिब अधिकार और सम्मान मिल सके जिसके वे हकदार हैं।
यह देश कृषि प्रधान देश है। हमारी
संस्कृति कृषि जीवन पर आधारित है। कृषि हमारे लिए सिर्फ पेट भरने का साधन मात्र
नहीं है। वह हमारी संस्कृति है, हमारी सभ्यता है, हमारी जीवन शैली है, हमारी अस्मिता है, और हमारा स्वाभिमान है। हमें उस पर गर्व है। कुछ दिनों पहले भारत सरकार
ने अपना आम बजट संसद में पेश किया जिसमें उन्होने देश के विकास में आर्थिक मदद
करने वाले क्षेत्रों की हिस्सेदारी का खाका प्रस्तुत किया और यह बताया कि हमारे वार्षिक
विकास में कृषि क्षेत्र की भूमिका बहुत कम है। भारतीय अर्थव्यवस्था के सहयोग में
सर्वाधिक भूमिका औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले पूँजीपतियों की है। अगर यह
पूछा जाय कि औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग खाते क्या हैं, तो क्या उनका जवाब क्या होगा? यह कितनी बड़ी
अदूरदर्शी और मूर्खतापूर्ण नीति है जिसमें जीवन की प्रमुख जरूरत की तुलना औद्योगिक
उत्पादों से होती है जिनके बिना भी जीवन संभव है। अगर तुलना की ही बात है तो वह
तुलना सिर्फ एक, दो या पाँच-दस साल की नहीं होनी चाहिए। पिछले
सौ-दो सौ सालों की तुलना करिये और फिर बताइये कि इस देश में कृषि क्षेत्र की क्या
भूमिका रही है।
किसानों के हितों की रक्षा के लिए जिस
लड़ाई की शुरुआत स्वामी सहजानंद ने शुरू किया उसका अवसान भी उनके अवसान के साथ ही
हो गया। स्वतंत्र भारत के नए शासक भी बहुत हद तक औपनिवेशिक शोषण की प्रणाली में ही
दीक्षित हुए थे। इसलिए देश की कमान हाथ में आने के बाद उनके स्वभाव और कार्यशाली
में भी वही मादकता आ गई जो मादकता उनके पूर्ववर्ती शासकों में थी। अपने समय की
भयावहता को ध्यान में रखकर जयशंकर प्रसाद ने लिखा कि ‘अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन होता है’। वहीं
भारतीय राजनीति और नेताओं को देखकर धूमिल ने लिखा कि, ‘कुर्सियाँ वही हैं, बस टोपियाँ बादल गईं हैं’। भारत का सत्ताभोगी वर्ग लगातार किसानों की परेशानियों से खुद को दूर करता
चला जा रहा है। आजादी के बाद की पहली पीढ़ी का शासन काल कुछ-कुछ किसान चेतना से
प्रभावित लगता है। उसका कारण यह है कि उस पीढ़ी में अनेक नेता ऐसे थे जिन्होंने
आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनमें से अधिकतर किसान परिवारों से
थे। जैसे-जैसे इस देश का तथाकथित विकास (मैं आज के विकास को विकास नहीं मानता
क्योंकि यह इस देश की नब्ज के साथ भेदभाव अधिक हुआ है विकास कम।) होता गया या
यह कहा जाय कि जैसे-जैसे इस देश में दोयम दर्जे की राजनीतिक का विकास होता गया वैसे-वैसे
आम लोगों का शोषण और अधिक बढ़ता गया।
आज किसानों का भविष्य अंधकार में है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस अंधकार को और सघन किया जा रहा है जिससे किसी भी तरह
का प्रतिरोध न हो। पिछले
चौदह-पन्द्रह वर्षों से इस देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि
इससे पहले किसानों की दशा बहुत अच्छी थी, बिलकुल भी नहीं। किसान इससे पहले भी शोषित था और आज भी शोषित है। दरअसल
भारत में जब से नवपूंजीवाद का आगमन हुआ है तब से किसानों का जीवन और कठिन हो गया
है। वैसे तो किसानों के उपर मुगल काल से लेकर अंग्रेजों तक सभी ने कड़ा रूख ही
अख्तियार किया है और जिससे जितना बन पड़ा है शोषण किया है या जिसको जितनी जरूरत रही
है उतना शोषण किया है। इसी तरह के शोषण की एक बानगी मध्यकालीन कवि तुलसीदास ने
व्यक्त किया है। उन्होंने अपने समय की भयावहता को इन शब्दों में व्यक्त किया है “खेती
न किसान को भिखारी को न भीख बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी, जीविकाविहीन लोग सद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों कहाँ जाई, का करी....।” यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में जब लोकतंत्र नहीं था तब भी, और जब लोकतंत्र आया तब भी, किसान शोषण से मुक्त नहीं हुए। दरअसल किसान
विश्व का एक ऐसा समाज है जिसके बिना जीवन की परिकल्पना असम्भव है, फिर भी हमारे
यहाँ प्रकारांतर से किसान उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। इस
उपेक्षा और अपमान का उदाहरण है हमारे देश के किसानों की आत्महत्या।
किसानों की आत्महत्या के दस्तावेज़ जबसे
उपलब्ध हैं, अगर आज के संदर्भ में उसे ही आधार बनाया
जाय तो भी हमारी बात स्पष्ट हो जायेगी। उदाहरण के तौर पर विदर्भ, बुंदेलखंड, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु को देखा जा
सकता है, जहां कुछ जागरूक लोगों के द्वारा किसानों की आत्महत्या
को पहली बार 1997-98 में रिकार्ड में दर्ज करवाया गया। उसके बाद से आज तक किसानों की आत्महत्या में लगातार बढ़ोत्तरी
ही हुई है और यह बद्स्तूर जारी है। ऐसा नहीं है कि इस ओर सरकार का ध्यान नहीं गया
है, गया भी है और कई तरह के कर्जमाफी की राजनैतिक-अवसरवादी घोषणाएं भी हुई हैं, पर इसमें कोई अंतर नहीं आया है। आज
देश के किसान जिस व्यवस्था में खड़े हैं उसमें आत्महत्या कोई बड़ी बात नहीं है। इसके
सिवा और कोई रास्ता उनके पास अपनी अस्मिता की रक्षा का नहीं है। किसानों की
आत्महत्या के जिन कारणों पर बात होती है उनमें गरीबी, महँगाई
आदि तो है ही जिस पर बहुतों ने लिखा है। एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारण और भी है जो
आज के अति-गतिमान समय में बहुत से लोगों के लिए हास्यास्पद के सिवा और कुछ भी नहीं
है, लेकिन किसान संस्कृति और जीवन के लिए उससे बड़ा कुछ भी
नहीं है और वह है अपनी मर्यादा और अस्मिता की रक्षा। मुझे यह कहने में कोई गुरेज
नहीं है कि आज जिन किसानों ने आत्महत्या की है उनमें से एक बड़ा भाग ऐसा भी है
जिसने अपनी मर्यादा की रक्षा न कर पाने की वजह से अपनी जान गवाई है। यहाँ हमें
प्रेमचंद का ‘गोदान’ याद आता है जिसमें
एक किसान को किस तरह से मजदूर बना दिया जाता है और लगातार अपनी मर्यादा की रक्षा
के लिए जूझता हुआ मर जाता है। मैं गोदान में होरी की मृत्यु को इस व्यवस्था के
द्वारा की गई हत्या मानता हूँ। उदाहरण के लिए विदर्भ की एक घटना को देखा जा सकता
है। दरअसल, किसानों की आत्महत्या के जो प्रमुख कारण हैं उनमें कृषि से होने वाले
पैदावार में लगातार आने वाली कमी भी है। उसके बाद किसानों की मूल समस्या कर्ज की
है, जो फसल के नुकसान हो जाने पर वे ब्याज पर पैसा देने वालों से लेते हैं। इस देश
में व्यक्तिगत तौर पर मिलने वाला कर्ज एक व्यवसाय का रूप धारण कर चुका है जो
प्रशासन के अवैध संरक्षण में खूब फल फूल रहा है। इस तरह के कर्ज में फंसने के बाद
फिर बाहर निकलना बहुत कठिन हो जाता है। अभी कुछ दिनों पहले विदर्भ का एक किसान तीस
हजार रुपये का कर्ज न देने के कारण आत्महत्या कर लिया। इस पर कई लोगों ने यह सवाल
उठाया कि इतने कम पैसे के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा? जब इसका पता लगाया गया
तो पता चला कि उसने कर्ज तीन साल पहले लिया था जब उसकी कपास की फसल बर्बाद हो गयी
थी। वह खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा लेकिन सेठों का मूलधन
वैसा ही बना रहा। कर्ज का ब्याज चुकाने की वजह से वह अपने परिवार का भरण-पोषण भी
बड़ी मुश्किल से कर पा रहा था। ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से एक दिन सेठ
पैसा मांगने उसके घर आ गया और गाँव के सभी लोगों के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को
भला-बुरा कहने लगा। उस किसान को जब इसका पता चला तो शर्म के मारे घर नहीं आया और
अपने खेत पर ही आत्महत्या कर लिया। इसका कारण कर्ज तो था ही, साथ में वह अपमान भी
था जो इस अनैतिक और मूल्यहीन समाज ने उसे दिया। दरअसल इसे बताने का उद्देश्य यह है
कि भारत अगर अपनी नैतिकता के लिए जाना जाता है तो वह इन्हीं गांवों में बची हुई
है। वैश्विक परिदृश्य में जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई दी जाती है वह किसी
पूंजीपति के घर नहीं पैदा हुई थी। उस संस्कृति का विकास इन्हीं किसानों के घर हुआ
था। आज के समाज में थोड़ी बहुत मानवता और नैतिकता अगर बची हुई है तो वह इस किसानों
के यहाँ ही है। लेकिन आज का आधुनिकतावादी समाज उस नैतिक मूल्यों को लगातार समाप्त
करने पर तुला हुआ है और वह दिन दूर नहीं जब चारों ओर अनैतिकता और असभ्यता का बोल
बाला होगा।
आज यह किसी को भी नहीं पता है कि आने वाले घंटे में कितने किसान आत्महत्या
कर लेंगे। यदि आत्महत्या के आंकडों पर नजर डाली जाय तो आज के किसानों की स्थिति
समझ में आयेगी। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में इसे रिकार्ड में
दर्ज किया गया। उसके अनुसार 1997-98 में छ: हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की।
यह सिलसिला 2006 से 2008 के बीच भयानक बढ़ गया और पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत
से भी ज्यादा की बृद्धि हुई। 2008 में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विदर्भ दौरा
भी हुआ और किसानों के हित में कई घोषणाएं भी हुई लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। उस
समय के लोकसभा चुनाव में यूपीए के नेताओं ने इन घोषणाओं को पानी पी-पीकर गिनाया और
भुनाया, लेकिन किसानों की यह दरूण दशा लगातार बढ़ती रही और आज तक उसे रोका नहीं जा
सका। इसका प्रभाव घटने के बजाय अन्य प्रांतों के किसानों पर भी पड़ा, मसलन
बुन्देलखण्ड, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी छिटपुट खबरें
आयीं। इन आत्महत्याओं के रिकार्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रोत हैं जो किसी
वर्ष संख्या को बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत यह है
कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहाँ आत्महत्या करने वाले किसानों
के अनाथ बच्चों की चित्कार न गूंजती हो। इधर एक
चिंताजनक बात यह भी आयी है कि आज से दस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या
किया था अब उनकी नयी पीढ़ी भी उसी कार्य को करने के लिए अभिशप्त है।
हमारे
यहाँ आत्महत्या जैसे कृत्य को बहुत हेय माना गया है लेकिन पश्चिम में इसे कुछ
लोगों ने बहादुरी का कार्य माना है और उनके यहाँ इसे विरोध के एक हथियार के रूप
में भी देखा गया है। किसानों की स्थिति उपरोक्त में से कोई भी नहीं है, क्योंकि न
तो वे कोई हेय कृत्य करना चाहते हैं और न ही वे बहादुरी का मरणोपरांत पुरस्कार
चाहते हैं। असल में वे इस बर्बर व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करते हैं।
क्योंकि आदमी जीवन और समाज से जब हार जाता है तभी इस तरह का कार्य करता है। यहाँ
सारी लड़ाई भूख की है। भूख मनुष्य को कितना निरीह, कमजोर और मूक बना सकती है इसका
अदांजा सहज रूप से नहीं लगाया जा सकता। हम सोच सकते हैं कि पचीस हजार या पचास हजार
जैसी छोटी रकम के कर्जदार आत्महत्या क्यों करेंगे? वे जिस देश में रहते हैं उसका अगर
इतिहास लिखा जायेगा तो निश्चित तौर पर वह घोटालों और भ्रष्टाचार का अभी तक का
सर्वोत्तम उदाहरण होगा। मूल्यहीनता के ऐसे परिवेश में यदि किसानों के पास कोई
रास्ता नहीं रहेगा तो वे क्या करेंगे? आज किसानों के साथ खड़ा होने वाला कोई दिखाई
नहीं दे रहा है। आज कोई स्वामी सहजानंद जैसा किसान हितैषी नहीं है। यह समस्या किसानों
के सामने बहुत बड़ी है कि उनकी समस्या को कौन सुनेगा और उसे वे किसे सुनायेगे ? समाज में प्रत्यक्ष रूप से काम करने वाला दो
वर्ग है। पहला वर्ग राजनेताओं का है तथा दूसरा वर्ग कुछ उन पेशेवर समाज चिंतकों का
है जो इस तरह के लोगों की मदद करने की बजाय उसे लगातार जिंदा रखना चाहते हैं जिससे
उन्हें सेवा करने का कोई भारी भरकम पुरस्कार मिले और उनकी दुकान चलती रहे। अभी तक
जो आंकड़े कुछ समाज कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकारी दस्तावेज के रूप में मौजूद
है उनके अनुसार पिछले 14 वर्षों में सिर्फ विदर्भ में यह संख्या पचास हजार से अधिक
है।
उपर्युक्त
दोनों कारणों के अतिरिक्त तीसरा कारण है लगातार बढ़ती हुई महँगाई। आज से दस साल
पहले तक वही किसान खेती बारी करके अपने परिवार का भरण पोषण कर लेते थे लेकिन आज वे
असमर्थ हैं। इसका कारण सिर्फ प्राकृतिक आपदा ही नहीं है। इसका कारण उनके ऊपर
लगातार लादी जाने वाली मंहगाई भी है जो उन्हें आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए
मजबूर कर रही है। क्योंकि यह इसी देश में हो सकता है कि जब प्याज किसान के पास
नहीं होता है तो अस्सी रुपये किलो के भाव से बिकता है और जब किसान के पास होता है
तो कोई आठ रुपये भी नहीं पूछता है। किसानों के लिए इस देश में कोई भी वेतन आयोग की
सिफारिस नहीं की जाती ऐसे में क्या उन्हें अपने पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना
चाहिए, यह सवाल खुद को किसानों का हितैषी बताने वाली सरकार के लिए भी है। यह
गिनाने से कुछ नहीं होने वाला है कि हमने यह किया और वह किया। सरकार का काम ही है
देश को सुरक्षा देना। असल में सरकार जो कुछ भी करती है वह भी अपनी संपूर्णता में
लोगों को नहीं मिलता है। आज यह भी जरुरत है कि सरकार द्वारा की गयी सहायता को
जरुरतमंद लोगों तक पहुँचाया जाय। हमारा देश चाहे जितना आधुनिक हो जाय अगर हमारे
देश के किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो ऐसी आधुनिकता और विकास कम से कम हमारे देश
के उन लोगों के लिए व्यर्थ ही सिद्ध होगा जिनका जीवन कृषि आधारित है, क्योंकि
हमारे यहाँ आज भी आधे से अधिक आबादी कृषि से अपना गुजारा करती है। इसलिए आज हमें
यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे किसान बचें और कृषि संस्कृति भी को भी बचाया जाय
तभी विकास की असली अर्थवत्ता सिद्ध होगी। किसी भी देश का विकास सिर्फ देश के मुट्ठी भर लोगों के विकास
से तय नहीं होता, उसके लिए जरूरी है कि देश की बहुतायत जनता के विकास को ध्यान में रखा
जाय। भारत में भी विकास का कुछ ऐसा ही पैमाना दिखाया जा रहा है जो एक खास वर्ग के
विकास को दर्शाता है। आज भी भारत के किसान अन्य विकसित देशों की अपेक्षा बहुत
पिछड़े हैं, चाहे आर्थिक स्थिति के मामले में हो या तकनीक के
मामले में। इस पिछड़ापन का क्या कारण है? आखिर इसमें देश की
सरकार की क्या भूमिका हो सकती है? कृषि कार्य में आज भी
भारतीय ग्रामीण जनता का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा कार्यरत है, फिर
भी सरकार उस वर्ग की उपेक्षा क्यों कर रही है? क्या देश के
विकास में सिर्फ वही क्षेत्र आते हैं जो आर्थिक रूप से अधिक सहयोगी हैं। ऐसे अनेक
सवाल हैं जो किसानों की समस्याओं से जुड़े हैं। पिछले
दस वर्षों से इस देश में किसानों के आत्महत्या की खबरें आ रही है। देश के विभिन्न
हिस्सों के हजारों किसान आत्महत्या कर लिए लेकिन सरकार की ओर से कोई भी ऐसा ठोस
कदम नहीं उठाया गया जो किसानों तक पहुंचे और उन्हें राहत पहुंचा सके। दरअसल हमारे
देश में इस तरह की समस्याओं को लगातार दबाने की कोशिश की जाती है जिससे सरकार और
प्रशासन पर किसी तरह के आरोप न लगे।
पिछले
बजट में सरकार की ओर से किसानों के लिए कई राहत पैकेज की घोषणा की गई लेकिन अभी तक
उसका असर किसानों के आम जन जीवन पर दिखाई नहीं दे रही है। केंद्र और राज्य के बीच
में आखिर ये किसान क्यों पीस रहे हैं? अगर केंद्र सरकार की ओर से इस तरह के बजट की घोषणा होती है तो उसे
किसानों तक पहुँचाने की व्यवस्था भी केंद्र को करना चाहिए। इस तरह के विवादों में
उलझने के बाद आम आदमी क्या कर सकता है। उत्तर प्रदेश में किसानों की बदहाली कैसी
है इससे केंद्र अंजान नहीं है। महाराष्ट्र के विदर्भ की क्या हालत है इससे पूरा
विश्व वाकिफ है कि यहाँ के कितने किसानों ने इस दुर्व्यवस्था के चलते जान दे दी और
अभी भी यह सिलसिला थमा नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि विदर्भ में आत्महत्या
करने वाले किसानों की संख्या विश्व के किसी भी क्षेत्र से अधिक है। आखिरकार इस
आत्महत्या के लिए कौन जिम्मेदार है? किसानों की इस दुर्दशा
के लिए सरकार की कोई ज़िम्मेदारी बनती है या नहीं? हमारी
व्यवस्था अपने नैतिक दायित्वों से कब तक पीछे हटती रहेगी?
क्या इस देश में आत्महत्या करने वाले किसान अधिकार विहीन हैं? क्या उनकी समस्या इस देश की समस्या नहीं है? क्या
वे सिर्फ वोट देने तक सीमित हैं? अब यह समय आ गया है कि
किसानों को स्पष्ट किया जाय। सरकार को अब किसानों की समस्याओं को देश की मुख्य
समस्या में शामिल करना होगा। किसानों की रक्षा सरकार का कर्तव्य है। इसे अनदेखा
नहीं किया जा सकता। किसान इस देश की संस्कृति और सभ्यता से जुड़े हैं,साथ ही किसानों की रक्षा के द्वारा ही इस देश की कृषि संस्कृति की रक्षा
हो सकती है। किसानों के विकास को अनदेखा करके देश के विकास की परिकल्पना अधूरी है।
देश के विकास को प्रतिशत में बताने से देश की जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जनता
पर तभी प्रभाव पड़ेगा जब उनका जीवन आसान होता है। सरकार की नीतियों में शामिल राहत
योजनाओं का संपूर्ण लाभ किसानों को मिले इसका ध्यान प्रशासन को रखना होगा, अन्यथा किसी भी कागजी योजना का कोई मतलब नहीं है।
भारतीय श्रम की अनवरत उपेक्षा
सन्तोष कुमार राय
राष्ट्रीय
सहारा में प्रकाशित
यह कितनी बड़ी विडंबना
है कि जहां हर छोटी बड़ी घटनाओं में लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, वहाँ का श्रमिक वर्ग लगातार उपेक्षा का शिकार होता रहा है। आज यह सवाल
उठना स्वाभाविक है कि श्रमिकों के जीवन का आधार क्या है? कहने
के लिए जब देश विकास के न जाने कितने पायदान ऊपर चढ़ चुका है ऐसे में इस देश का
श्रमिक वर्ग उपेक्षित क्यों है? उन लोगों की पूंजी क्या है? उनके पास किस प्रकार की पूंजी है? और जो है उसे किस
कोटि में रखा जाय? चल या अचल? असल में श्रमिकों
के पास श्रम के अलावा कोई भी चल-अचल संपत्ति नहीं होती है। लेकिन जब उसकी उचित कीमत
नहीं मिलती है तब गरीब मजदूर या तो भूख से तड़फड़ा कर मर जाता है या फिर आत्महत्या
कर लेता है। आज भारत के श्रमिक वर्ग की
हालत पर किस तरह से बात की जाय यह बहुत ही कठिन है। दरअसल स्वतन्त्रता के बाद से लेकर
आज तक भारत में श्रमिकों के लिए न तो कोई उपयुक्त कानून बना और न ही कोई ऐसा कदम उठाया
गया, जिससे उन्हें उनके किए का उचित मूल्य सही समय पर मिले।
पिछले दिनों भारत में श्रम मंत्रालय का 44वां श्रम सम्मेलन हुआ जिसका समापन भाषण
प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने दिया था। पिछले सात-आठ वर्षों से प्रधानमंत्री
भारत के विकास दर को बढ़ाने की बात करते आ रहे हैं। इस सम्मेलन में भी उन्होंने इसे
बढ़ाकर नौ प्रतिशत तक ले जाने की बात की। आज एक मौजू सवाल है कि यह बढ़ी हुई विकास
दर का जो पैमाना लगातार दिखाया जा रहा है उससे इस देश के श्रमिकों को क्या लाभ
होगा? दूसरा यह कि अगर नौ की जगह अठारह प्रतिशत ही विकास दर
हासिल कर ले तो क्या वे अपने शोषण और जहालत भरी जिंदगी से बाहर निकल जाएँगे? उस सम्मेलन के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि सरकार की चिंता श्रमिकों के
हित में लगातार बनी हुई है और यह उम्मीद की जा सकती है कि आगे भी बनी रहेगी, लेकिन इसका परिणाम क्या होगा यह अभी तक अंधकार में है और आगे भी अंधकार
में ही रहने की संभावना है।
मजदूरों के
अधिकारों को लेकर विश्व में कई बार आंदोलन हुए हैं और मार्क्स जैसे बड़े चिंतकों का
लेखन ही इसी पर केन्द्रित और इसे ही समर्पित रहा है। लेकिन आज इस विकास की दौड़ में
उन्हें लगभग उपेक्षित कर दिया गया है जिनके लिए कभी सर्वाधिक चिंता व्यक्त की जाती
थी। भारत जैसे बड़े देश में जहाँ श्रमिकों की बड़ी तादात है, ऐसे देश में भी उनके हक की बात करने से सत्ताधारी वर्ग कतराता है, बावजूद इसके आज का शासक वर्ग लगातार दंभ भर रहा है कि वह पहले से अधिक
मानव रक्षक और मनवातावादी है। इस तरह के जुमले अक्सर राजनीतिक सभाओं में सुनने को
मिलते रहते हैं, लेकिन भारत में श्रमिकों की स्थिति में आज
भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। सरकार भारतीय श्रम को किस रूप में देख रही है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है।
किसी भी
देश और समाज का विकास मुट्ठीभर लोगों के विकास और जीवन शैली पर आधारित नहीं होता, वह संपूर्ण समाज के विकास का हिमायती होता है। आज का भारतीय समाज गैर
सरकारी क्षेत्रों में काम कर रहे श्रमिकों के प्रति बहुत ही संकीर्ण और दोहरा
बर्ताव कर रहा है। सरकार भी उनके लिए उदासीन ही है। अभी तक कोई ऐसा प्रवाधान नहीं
है जिसमें यह सुनिश्चित किया जा सके कि नीजी क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर
अधिकतम कितने घंटे काम करेंगे। घरेलू मजदूर, भारी काम करने
वाले मजदूर, और विभिन्न कार्यालयों में काम करने वाले
मजदूरों के लिए किसी भी तरह का प्रावधान नहीं है। ऐसे में हम सरकार की नियत और
कर्म पर कैसे विश्वास करें कि वह आम लोगों की हितैषी है। समाज के विकास की जैसी
दलील दी जा रही है वह कहीं से भी स्पष्ट नहीं है कि यह विकास किस वर्ग को आधार
बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। जहां तक मैं समझता हूँ किसी भी देश या समाज के
विकास का पैमाना उस देश की बहुतायत जनता के विकास को ध्यान में रखकर ही गढ़ा जाता
है लेकिन यहाँ तो बिलकुल उल्टा है। यहाँ मुट्ठीभर लोगों की विकसित हैसियत के आधार
पर इसका निर्धारण किया जाता है और उसे सभी के ऊपर थोप दिया जाता है। आज सरकार और
विपक्ष दोनों को इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत है कि वास्तव में इस देश की श्रमिक
जनता का भी समुचित विकास हो सके।
पहले जैसा दिखाई नहीं देता
सन्तोष कुमार राय
मेरे द्वारा रचित एक छोटी सी कविता है जिसे आज ब्लाग पर
आप लोगों के लिए प्रकाशित कर रहा हूँ। अगर अच्छी लगे तो.....
अब मुझे पहले जैसा दिखाई नहीं देता,
लेकिन ये क्या? अभी तो
शास्त्रों के अनुसार एक चौथाई ही कटी है जिंदगी।
पहले की तरह अब बहुत कुछ बुरा भी नहीं लगता।
पहले किसी की छोटी से छोटी गलती पर भी उलझ
जाता था।
क्यों?
लेकिन आज! आज तो बड़े से बड़े अपराध को भी
देखकर चुप हो जाता हूँ,
और न सिर्फ चुप हो जाता हूँ, बल्कि
आगे बढ़ जाता हूँ।
थोड़ी देर रुककर कुछ सोचने की जहमत भी नहीं
उठाता।
अब मेरे कानों को भ्रष्टाचार, लूट, बलात्कार जैसे शब्दों से पहले जैसी घबराहट नहीं होती।
मेरे कान इन्हें सुनने के आदी हो चुके हैं...
कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं समाज के प्रति
अपना उत्तरदायित्व खो चुका हूँ?
रात को सोते समय सोचता हूँ कि अब मुझे पहले
जैसा दिखाई नहीं देता।
क्योंकि पहले दिल से देखता था अब आँख से
देखता हूँ....
फेसबुक पर ब्लाक करने के संदर्भ में...
सन्तोष कुमार राय
मित्रों, आजकल
फेसबुक पर अपने फ्रेंड्स को ब्लाक करने का मामला खूब चल रहा है। जैसे बचपन में हम
अपने किसी दोस्त से नाराज हो जाते थे तो अक्सर कहा करते थे कि मैं तुमसे कट्टी हो गया
और बातचीत उस दिन बंद हो जाती थी। उस समय अच्छी बात यह थी कि फिर हम जब अगले दिन
मिलते थे तो हम उसी निश्छलता से मिलते थे जिससे हम पहले दिन मिले थे। कोई गिला-शिकवा
नहीं रहता था। आज हम बहुत अधिक सिकुड़ गए हैं और व्यक्तिगत संवाद की नापसंदगी के
आधार पर हम अपने दोस्तों से संबंध-विच्छेद कर लेते हैं। आज हम अपने आस-पास के
लोगों की बुराइयों को पहले देखते हैं, अच्छाईयों को बाद में।
ऐसा कैसे हो सकता है कि एक आदमी में सिर्फ बुराई ही बुराई भरी पड़ी हो। बहुत कुछ
ऐसा होता है जिसे हम न तो देखने की इच्छा रखते हैं और न ही कोशिश करते है। कुछ दिन
पहले ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। कई दिनों से मैं इस ऊहापोह में था कि इस बात को
आप सभी से साझा करूँ या नहीं, लेकिन आज सोचा करना चाहिए। उस
दिन ऐसा हुआ कि मैंने उस मित्र से आनलाईन बात कर रहा था जो कि खुद को प्रतिष्ठित
साहित्यकार मानता है। असल में थोड़ी प्रतिष्ठा मिलने पर हम मनुष्यों के अंदर थोड़ा
दंभ तो आ ही जाता है। हम लोग मर्यादापुरुषोत्तम तो हैं नहीं। वह अपनी आदत के
अनुसार लगातार व्यंग्य करता जा रहा था (यह उसकी फितरत है। अपने से बड़े-बुजुर्गों
पर व्यंग्य करके, उन्हें चिढ़ा करके खुद को श्रेष्ठ साबित
करता रहता है।) बात आगे बढ़ती गई। मौका मिला मैंने भी उसी का व्यंग्य उठाकर उसी पर
रख दिया, जिसका उसे अंदाजा नहीं था। वह तिलमिला गया, क्योंकि अभी तक मैं उससे बहुत ही आदर और सम्मान की भाषा में बात कर रहा
था। उसके अंदर का वास्तविक मनुष्य जाग गया और फिर क्या मुझे मेरी औकात बताने से
लेकर देख लेने तक पहुंचा दिया। जितना कह सकता था कहा। मुझे बहुत अच्छा लगा। अच्छा
इसलिए लगा क्योंकि पहले तो यह पता चला कि वास्तव में इसकी व्यंग्य करने और बरदास्त
करने की सीमा क्या है। दूसरा कि वास्तव में यह मी द्वारा दिये जाने वाले आदर और सम्मान
का हकदार है या नहीं (वह यह भी कह सकता था कि वह मेरे पास आदर और सम्मान मांगने तो
नहीं आया था)। उसने तुरंत मुझे ब्लाक कर अपने मानसिक छोटेपन का त्वरित परिचय दिया।
मुझे अच्छा लगा जिसे आप सभी से साझा कर रहा हूँ......
कर्नाटक में कांग्रेस की नहीं, भाजपा के अंतर्कलह की जीत हुई है !
सन्तोष
कुमार राय
तुलसीदास की एक चौपाई है ‘जहां सुमति तंह संपति नाना। जहां कुमति तंह बिपति निधाना।’ कर्नाटक के संदर्भ में भाजपा के लिए ये पंक्तियाँ बिलकुल सही और सटीक
बैठती है। इसमें संदेह नहीं की भाजपा की चुनावी रणनीति में अनेक खामियाँ रही है, जिसे खत्म करने के वजाय वह ढोती रही है। यह कार्य भाजपा पिछले कई वर्षों
से कर रही है और कुछ लोगों के मनमानेपैन के नतीजे को भुगत रही है। क्या कारण है पार्टी हित जैसे संवेदनशील मुद्दे
पर भी पार्टी देर से फैसले ले रही है? आखिर पार्टी पर किसका
दबाव काम कर रहा है? क्या वास्तव में भाजपा में व्यक्तिगत
हित पार्टी हित से ऊपर हो गया है? इस तरह के कई सवाल हैं जो
कर्नाटक में भाजपा की हार के बाद उठ रहे हैं। पार्टी का शिथिल रवैया येदियुरप्पा
से लेकर गडकरी तक अनेक प्रमुख मुद्दों पर जारी रहा है जिससे भाजपा को भारी नुकसान
उठाना पड़ा है। वह कौन सी राजनीति है जिसमें एक आदमी पार्टी के विरोध में इस हद तक
चला जाता है कि उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। आखिर भाजपा का अनुशासन कहाँ
गया। भाजपा को अपने जिस अनुशासन और राष्ट्रीयता पर गर्व था वह कहाँ गया।
येदियुरप्पा को पार्टी ने कौन सा अनुशासन सिखाया था जिसने पूरी पार्टी को ही ललकार
दिया और इसका लाभ विपक्षी पार्टी को मिल गया।
भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त इस देश
की जनता का जनाधार अगर कांग्रेस के साथ गया है तो यह ताज्जुब की ही बात है। मौजूदा
भारतीय राजनीति को देखकर यह कहना कहीं से भी उचित नहीं है कि कर्नाटक में कांग्रेस
की जीत हुई है। यह भाजपा के अंतर्कलह की जीत है। कांग्रेस के नेता कर्नाटक की जीत
पर कुछ ज्यादा ही इतरा रहे हैं। यह न तो राहुल गांधी की मेहनत का फल है और न ही कांग्रेस
के विकास के मॉडल का। अच्छा तो यह रहता कि कांग्रेसी नेता अपनी पीठ थपथपाने के के
वजाय येदियुरप्पा का शुक्रियादा कर आते। कांग्रेस के लिए येदियुरप्पा ने जो रास्ता
तैयार किया वह बाधा-विहीन था, जिसका बखूबी लाभ
कांग्रेस को मिला है।
इस चुनाव के नतीजे को दो रूप में देखा
जाना चाहिए। पहला, भाजपा की ढुलमुल और अदूरदर्शी
राजनीति है। भाजपा ने येदियुरप्पा के साथ जो किया वह कहीं से भी उचित और सार्थक कदम
नहीं था, लेकिन येदियुरप्पा ने भी जिस पार्टी की इतने दिनों
तक सेवा की उसके लिए भी या अशोभनीय ही है। शायद यह पार्टी के बड़े नेताओं और
येदियुरप्पा के बीच संवादहीनता का ही नतीजा है। इस विवाद को चुनाव से पहले मिलकर सुलझा
लेना अधिक अच्छा रहा होता। यह भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की कार्यप्रणाली की
हार है। उनकी सोच की हार है। भाजपा भी कांग्रेस की तरह दिल्ली से ही फैसला सुनाने
की आदत का शिकार हो रही है। यह पहली बार नहीं हुआ है, जब इस
तरह के फैसलों के इतने घातक परिणाम आए हैं। इससे पहले भी इसका खामियाजा भाजपा को
कई राज्यों में भुगतना पड़ा है।
दूसरा, जो
कि बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उभरकर सामने आया है वह है क्षेत्रीय नेताओं की
अहमियत का है। कर्नाटक चुनाव ने भाजपा को क्षेत्रीय नेताओं की अहमियत का बोध करा
दिया है। लगभग यही घटना कई साल पहले उत्तर प्रदेश में हुई थी। पार्टी ने कल्याण
सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया और राजनाथ सिंह को अचनाक पार्टी का अगुवा बना
दिया था। उस घटना ने भाजपा को प्रदेश और देश दोनों से बाहर कर दिया। उससे भी इन्होंने
सीख लेने की जहमत नहीं उठाई और मीडिया की नजर में अपनी पाक-साफ छवि दिखाने के
चक्कर में डूब गए। अगर इतना ही साफ दिखने की शौक था तो पार्टी ने नरेंद्र मोदी को
क्यों नहीं निकाला? क्या उनके ऊपर आरोप नहीं लगे थे?
क्या वे आरोप बेबुनियादी थे? यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा में भी व्यक्ति के
अनुसार फैसले होते हैं। इस बार भाजपा को जो नुकसान हुआ है वह साधारण नहीं है। इसका
प्रभाव लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।
आगे के चुनावों में अगर
भाजपा को अपने पक्ष में परिणाम चाहिए तो पहले उसे आंतरिक कलह पर जीत हासिल करनी
होगी। यह राजनाथ सिंह के लिए आसान नहीं है। आज पूरा देश भ्रष्टाचार और मंहगाई से
त्राहि-त्राहि कर रहा है। वर्तमान सरकार ने जिस तरह की स्थिति पैदा की है, वह
आम आदमी को मारने के लिए काफी है। ऐसी स्थिति का अगर सही उपयोग भाजपा नहीं कर पा रही
है, और अगर नहीं कर पाएगी तो इससे बुरा इस देश के लिए और
भाजपा के लिए कुछ भी नहीं हो सकता है। पार्टी के बड़े नेता इस तरह के मुद्दों को
सुलझाकर सही रणनीति के साथ काम करेंगे तभी कोई सार्थक परिणाम सामने आयेगा,
अन्यथा कर्नाटक की ही तरह देश में अन्य चुनावों में भी वे हार का ही सामना करेंगे।
यूपीए की नाकामी का नतीजा है कुपोषण
सन्तोष कुमार राय
आज भारत
के लिए कुपोषण शब्द किसी गाली से कम नहीं है। यह सत्ता के लोगों को सुनने में जरूर
हल्का लगता होगा लेकिन देखने में यह बहुत ही भयावह है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने
इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया है। किया है,
और कागज पर तो इसके लिए अनेक पेज भरे पड़े हैं। लेकिन वास्तविक जमीन पर यह बहुत ही
खतरनाक रूप ले चुका है। कुपोषित बच्चों की स्थिति बहुत ही नाजुक होती जा रही है।
कुपोषण में जी रहे बच्चे आपको हर जगह मिल जायेंगे जरूरत है आँख खोलकर देखने की।
चौराहों पर या फिर रेलगाड़ियों में भीख मांगते बच्चे तो हर जगह दिखाई देते हैं वे
क्या हैं? घरेलू नौकर के रूप में काम करने वाले बच्चे क्या
हैं? चाय की दुकानों और ढाबों पर काम करने वाले बच्चे क्या
हैं? आज का पढ़ा-लिखा समाज अपनी नैतिकता खो चुका है और वह
अंधा होता जा रहा है। हमारे राजनेता भी इसी ओर अग्रसर हैं और इसे लगातार अनदेखा कर
रहे हैं। अभी तक यह देश जाति के दंश से उबर नहीं पाया है,
लेकिन उससे पहले ही इसे पूंजीवाद के दुष्परिणामों का सामना करना पद रहा है जो न
चाहते हुए भी वर्ग विभाजन की विशाल खाई में जा रहा है।
आखिर उन बच्चों का दोष क्या है? क्या यह दोष है कि उनका जन्म किसी सोनिया गांधी और
किसी मनमोहन सिंह के घर नहीं हुआ है? मैं दावे के साथ कह
सकता हूँ कि अगर उचित पोषण मिले तो इस देश का हर बच्चा राहुल गांधी बन सकता है या
फिर उनसे फ्रैंक और तेज। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता वर्ग ने जो बंदरबाट मचाई है वह
कहीं से भी लोकतंत्र की रक्षा का प्रयास नहीं है बल्कि एक ही आँचल में
साम्राज्यवाद और सामंतवाद का नया अवतार है। यह वही अवतार है जिससे हमारे देश के
लोग सैकड़ों वर्षों तक लड़ते रहे। उस लड़ाई की कीमत को भूलकर सत्ता की मादकता में लोग
अंधे हो रहे हैं और अपनी नाकामियों को लगातार छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
दरअसल मनुष्य का स्वभाव जितना सरल होता
है उतना ही जटिल भी, जितना नैतिक रूप
से मजबूत होता है उतना ही कमजोर भी, जितना कर्मठी होता है
उतना ही कामचोर भी, जितना बहादुर होता है उतना ही कायर भी। ये
सारे गुण-अवगुण ही किसी मानव को महामानव और महाभ्रष्ट तथा किसी संस्था को उत्कृष्ठ
और निकृष्ट बनाते हैं। लोकतन्त्र का विस्तार पहले मनुष्य से लेकर अंतिम मनुष्य तक
होता है। लेकिन क्या भारतीय लोकतन्त्र इस पैमाने पर खरा उतरता है? भारतीय राजनीति आज जिस जगह पहुँच गई है उसमें किसी बाहरी या किसी मायावी
या किसी अदृश्य सत्ता का योगदान नहीं है। हम इसे भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते। यूपीए
गठबंधन को चलाने का जो कांग्रेस का सत्ता मोह है उसने भारत के विकास को हर पायदान
पर आघात पहुंचाया है। चाहे आर्थिक स्तर पर हो या फिर विदेश,
चाहे ग्रामीण विकास हो या फिर सुरक्षा। यह कहना गलत नहीं होगा कि मनमोहन सिंह की
सरकार में अपनी कमजोरियों और नाकामियों को स्वीकार करने के नैतिक साहस का नितांत
अभाव है। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए कांग्रेस राजनीति के जिस घटिया स्तर पर
उतर आई है वह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
अपनी ही बनाई हुई नीतियों में मनमोहन
सरकार उलझती रही है और उसे भी सही सलामत लागू कराने में असफल रही है। उदाहरण के
लिए हम सरकार द्वारा चलाये जा रहे खाद्यान्न सुरक्षा योजना को देख सकते हैं। गरीबी
रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों के लिए अनाज देने की जो योजना चल रही है क्या
वह हर जगह पहुँच पाई है? क्या उसका सही
सलामत वितरण हो रहा है? ऐसा नहीं है और इसकी जानकारी केंद्र
सरकार और राज्य सरकारों को है। केंद्र सरकार की चुप्पी का कारण है गठबंधन, और राज्य सरकारें इसका नाजायज फाइदा उठा रही हैं। ग्राम पंचायतों में अभी
भी यह स्पष्ट नहीं है कि गरीबी रेखा के दायरे में किसे और किस आधार पर शामिल किया
जाय। पूरी तरह मनमानी हो रही है और जिसे मन किया उसे शामिल किया, नहीं मन है तो छोड़ दिया, चाहे वह कितने भी गरीब
क्यों न हो। यह इस योजना की जमीनी हकीकत है। यह किसी एक गाँव या क्षेत्र या फिर
प्रदेश की बात नहीं है हर जगह की ऐसी ही स्थिति है। नतीजा यह हो रहा है कि भारत के
असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले ग्रामीण मजदूरों के बच्चे कुपोषण से लगातार
मर रहे हैं।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुपोषण
से मरने वाला विश्व का हर चौथा बच्चा भारत का होता है। भारत की ग्रामीण जनता का एक
बड़ा हिस्सा ऐसा है जो मजदूर है। मजदूरी के सहारे ही उनका जीवन चलता है। अगर मिल गई
तो ठीक नहीं तो फाँका। ये सारे मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं जिनके पास महीनों तक
कोई काम नहीं रहता है। इनके परिवार के स्वास्थ्य और शिक्षा किसके भरोसे है? यह कहना सरासर गलत होगा कि इसके लिए कोई नीति नहीं
है, अनेक नियम कानून बनाए गए हैं लेकिन सबकी स्थिति ढाक के
तीन पात ही है। सरकार इस बात की दुहाई देती रही है कि हमने ये कानून दिये हमने वो
कानून दिये लेकिन उस कानून का क्या मतलब जो सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गई हो।
सरकार सैफ कानून बनाने से नहीं बच सकती जब तक वह कानून अपने पूरे रूप में लागू न
हो।
घोटालों के अर्थशास्त्र में फंसी मनमोहन
सरकार के पास आरोप-प्रत्यारोप के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। ‘पंडित होहिं जे गाल बजावा’ की
स्थिति में सरकार के अनेक नेता लगे हुए हैं और पिछली वाजपेयी सरकार पर सारा दोष मढ़
रहे हैं। मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि इसमें वाजपेयी सरकार कहाँ से आ जाती
है। अगर वाजपेयी सरकार से भारत की जनता इतनी ही खुश होती तो फिर यूपीए की सरकार
नहीं बनती। और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह देश सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी का
नहीं है। कांग्रेस का काम सिर्फ बीजेपी के आरोपों का जवाब देना और बीजेपी पर आरोप
लगाना नहीं है। यह देश आम जनता का है और कांग्रेस को इस देश के लोगों को जवाब देना
है।
स्वतंत्रता के बाद से आज तक इस देश ने
विकास के अनेक चरण पार किया है। क्या कारण है कि इतने सालों बाद भी इस समस्या का मुकम्मल
समाधान नहीं हो पाया है। इस तरह की समस्याओं के सामने सरकारी तंत्र लाचार क्यों हो
जाता है। अगर सरकार इस समस्या पर गहराई से विचार नहीं करेगी तो आने वाले समय में
यह और भयावह ही होगी और पता नहीं कितने बच्चे इस काल के गाल में समा जाएंगे।
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