पराली का हो वैकल्पिक उपयोग


संतोष कुमार राय

          प्रदूषण की समस्या दिल्ली और आसपास के इलाकों में जिस तरह धुंध और धुएँ के रूप में फैली है, जिसे स्मोग के नाम से जाना जा रहा है, वह अनायास नहीं है। यदि इसका उचित समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में यह और खतरनाक रूप ले सकती है। दरअसल इसका सबसे बड़ा और खतरनाक कारण पराली को खेतों में जलाना और उससे निकलने वाला धुआँ है। जहाँ भी धान की खेती हो रही है, वहाँ और उसके आस-पास के इलाकों के लिए यह एक विकट समस्या का रूप ले रहा है। अब चिंता की बात यह है कि इसका समाधान क्या है? कैसे इससे निजात मिलेगी? सरकार और कृषक दोनों के स्तर पर इसका संयुक्त समाधान क्या हो सकता है? इस तरह के कई सवाल हैं जो इससे जुड़े हैं और हमारे जीवन से भी जुड़े हैं।
            दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में फैली धुंध पर जैसा हो हल्ला हो रहा है वह वास्तविक समस्या की जड़ में पहुँचने की बजाय बेमतलब शोर है। राज्यों की तू-तू मैं-मैं और दोषारोपण से सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और गैर ज़िम्मेदारी को समझा जा सकता है। क्या यह पूरा सच है कि शहरों में चलने वाले वाहनों और उनकी बेतहासा बढ़ती हुई संख्या ही केवल जिम्मेदार है ? जिसे लेकर दिल्ली सरकार पिछले वर्ष के नाटक को इस वर्ष भी दोहराना चाहती थी। असल में यह एक दिल्ली सरकार का नाटक और ढोंग है जो उसका सरकारी स्वभाव बन गया है। किसी भी समस्या की गंभीरता को समझे बिना उस पर इवेंट करना, उसे उत्सवी रूप देना एक तरह की नकारा मानसिकता की पहचान है।
            दिल्ली वालों के लिए साफ हवा, साफ पानी और साफ वातावरण की महती जरूरत है, क्योंकि दिल्ली माननीयों का शहर है। अब समय ने यह संकेत दे दिया है कि माननीयों को भी दिल्ली के बाहर देखना होगा और समय रहते बाहर वालों के विषय में सोचना होगा। दिल्ली में अन्य जगहों की तरह खेती किसानी नहीं होती, लेकिन जहां खेती होती है, वहाँ का धुआँ दिल्ली के जीवन को दमघोंटू बना रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला दिल्ली की सघनता, जिसमें ऊंचे-ऊंचे भवनों के कारण हवा की गति अवरुद्ध हो जाती है। दूसरा सघन बसावट और पेंड-पौधों की कमी की वजह से यह अधिक देर तक वातावरण में रुका रहता है। दिल्ली से सटे अन्य क्षेत्रों में धुआँ ज्यादा देर तक नहीं टिकता क्योंकि वहाँ की हवा साफ है और उसमें आक्सीजन की मात्रा अधिक है, पेड़-पौधे अधिक हैं तथा ग्रामीण आबादी की सघनता कम है, जबकि दिल्ली-एनसीआर की सघनता वहाँ की अपेक्षा कई गुना अधिक है, साथ ही यहाँ की हवा में औद्योगिक और वाहनों से निकलने वाली अनेक जहरीली गैसों का प्रभाव भी बहुत अधिक है। दिल्ली के लोगों को यह सोचना पड़ेगा कि बाहर का धुआँ जहां से पैदा होता है उसकी समुचित और स्थायी व्यवस्था की जाय, जो आर्थिक दृष्टि से भी किसानों के लिए लाभकारी हो। तभी इससे निजात मिलेगी।  
            अब इसका समाधान क्या हो सकता है? या तो किसानों पर पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया जाय, जो नितांत अस्वाभाविक और तानासाही आदेश होगा। दूसरी बात यह कि यदि सरकारी तंत्र ने ऐसा कर भी दिया तो इसका सीधा असर कृषि उत्पाद पर पड़ेगा, जो इससे भी अधिक खतरनाक हो सकता है। वास्तव में समस्या की जड़ में किसानों की स्थिति है। आज की खेती का अधिकांश मशीनों से हो रहा है। लिहाजा पराली जैसे अनेक कृषि अपशिष्टों की जरूरत बहुत कम रह गई है। दूसरी ओर किसान को दूसरी फसल के लिए खेत को जल्द से जल्द खाली करना होता है इसलिए उसके सामने जलाने के सिवा कोई दूसरा आसान विकल्प नहीं ही। पहले पराली का उपयोग पशुओं के चारे के लिए होता था। कृषि मजदूरों की उपलब्धता अधिक थी इसलिए यह बहुत आसान होता था। आज वैसी स्थिति नहीं है। अब पराली को किसी नए उत्पाद के रूप में उपयोगी बनाना होगा जिससे कुछ धनोपार्जन भी हो।

            इसके दो रास्ते हैं—पहला सभी तरह के कृषि उत्पादों से कोयला बनानाऔर दूसरा इससे प्लाई बनाना तथा इसके उपयोग को बढ़ाना। इसका सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण के लिहाज से है और यह दो तरह का है। उद्योगों को चलाने के लिए जो कोयला उपयोग होता है उसके खनन में कमी आयेगी, जिससे हमारी खनिज सम्पदा लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी और यह पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा सिद्ध होगा। इसका दूसरा लाभ यह होगा कि जो धन खदानों से कोयला निकालने में खर्च होता है उसका बेहतर उपयोग कृषि अपशिष्ट से कोयला बनाने में किया जाय तो इसका सीधा-सीधा आर्थिक लाभ किसानों और खेतिहर मजदूरों को मिलेगा। शहरों और औद्योगिक इकाइयों पर दिनोंदिन बढ़ने वाला बोझ भी कम होगा। उदाहरण के लिए नारियल के अपशिष्ट से बनने वाले कोयले को देखा जा सकता है जो अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में निर्यात होता है। दूसरा धन की भूसी का कोई उपयोग नहीं होता था लेकिन आज धान की भूसी से तेल निकलता है और उसकी अच्छी कीमत मिलती है। इस प्रकार पर्यावरण और कृषि के अनुकूल सरकार को ध्यान देना होगा तभी मुकम्मल समाधान निकल सकता है। बिना किसी व्यस्थित समाधान के इससे मुक्त होना लगभग असंभव है।  

गाय से क्यों दूर हुए किसान ?


सन्तोष कुमार राय

          आज यह कहना कि गाय भारतीय संस्कृति और सभ्यता में महत्वपूर्ण स्थान रखती है न सिर्फ आज के समय के लिहाज से अप्रासंगिक लगता है बल्कि जमीनी सच्चाई को देखने पर हास्यास्पद भी लगता है। किसी भी संस्कृति और सभ्यता का निर्माण उस समुदाय के रहन-सहन और जीवन निर्वाह से होता है। जीवन निर्वाह के तौर-तरीकों और संसाधनों का निरंतर विकास ही संस्कृति और सभ्यता का रूप ले लेता है। गाय मानव जीवन के निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन और संसाधन थी। गाय का या गो वंश का संबंध धर्म, संस्कृति और सभ्यता से जोड़ना बिना मतलब पांडित्य प्रदर्शन का एकालाप है। गाय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा है या नहीं है इसका आज के किसान जीवन से बहुत अधिक लेना देना नहीं है। आखिरकार यह नौबत क्यों आ गई कि जिनकी गाय थी, जो गाय पर ही आधारित थे, जिनका जीवन गाय के बिना या गो वंश के बिना चल ही नहीं सकता था, उन्हें आज के बुद्धिजीवी बता रहे हैं कि गाय को बचाइए और संरक्षित करिए। अब प्रश्न उठता है कि हम भारतीय गायों की बात करें या फिर आभारतीय गायों की भी। यह एक बड़ा संकट है कि जब से भारत में आभारतीय गायों का प्रचलन बढ़ा है तब से स्थिति बदल गई है। दुग्ध पैदावार की दृष्टि से आभारतीय गायें आज भारतीय किसानों की पहली पसंद बन गई है। एक गाय कई गायों के बराबर दूध देती है जिसमें खर्च और मेहनत दोनों कम हो गई। लेकिन इसी के साथ जो बड़ा संकट पैदा हुआ वह यह कि विदेशी नस्ल की गायों के बछड़ों की हमारे यहाँ कोई उपयोगिता नहीं है। फिर उनका क्या होगा ? 
          दरअसल गाय भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हुआ करती थी, और यह 90 के दशक तक चलता रहा। इसे समझने की महती आवश्यकता है कि जिन्हें गाय रखना है वे गाय के लिए न तो कोई आंदोलन कर रहे हैं और न ही किसी आंदोलन में शरीक हो रहे हैं। फिर ये आंदोलन किसके लिए और क्यों हो रहे हैं? किसानों के जीवन की वास्तविकता की अगर पड़ताल की जाय तो हमें 90 के दशक का विश्लेषण करना होगा। इस विश्लेषण के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, पहला आर्थिक उदारीकरण और विदेशी कंपनियों के विस्तार का है और दूसरा बेतहासा मांस निर्यात का है। 90 के दशक में भारतीय कृषि को पूरी तरह से बैंक आधारित ऋण के अधीन कर दिया गया और यह दूरगामी रणनीति के तहत किया गया। अनेक किसान अपने पूरे जीवन में भी ऋण चुका नहीं सके और उनकी बर्बादी की कहानी तैयार हो गई। बड़े किसानों को बैंकों और विदेशी कंपनियों ने तोड़ा और छोटे किसानों को मांस निर्यात ने। मांस का निर्यात किसानों को कृषि और पशुपालन से दूर करने का बहुत महत्वपूर्ण कारण है जिसने छोटे किसानों को कृषि से अलग कर दिया। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है, बल्कि यह अधूरी सच्चाई है। पूरी सच्चाई को न तो आंदोलनकारी बुद्धिजीवी बता रहे हैं और न ही सरकार। यह सच्चाई पूरी तभी हो सकती है जब इसमें महँगाई को शामिल किया जाएगा। 90 के दशक से 2016 तक गोवंश की कीमत कितनी बढ़ी है इसका अंदाजा सिर्फ किसान को है आंदोलनकारियों को नहीं। 90 के दशक में जिस गाय की कीमत 1500 रुपये होती थी आज 50 हजार है। ऐसा क्यों हुआ ? यह इसलिए हुआ कि मांस निर्यात में सारी दुधारी गायें कटती गईं और देखते-देखते मात्र 25 वर्षों में उनकी संख्या बहुत कम हो गई। किसान जिस गाय की कीमत आज 15 हजार लगता है कसाई उसकी कीमत 30 हजार देता है, मजे कि बात है कि पालक का खर्च भी लगभग 30 हजार ही आता है। बेचने वाला भी किसान है और लेने वाला भी किसान है फिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसका भी कारण बहुत साफ है। बढ़ती हुई महँगाई का असर किसानों और पशुपालकों पर भी हुआ है। गाय ले लेना अगर संभव भी हुआ तो उसका खर्च वहन करना बहुत कठिन है। गाय की उपयोगिता अब सिर्फ दूध देने तक सिमट गई है। अब वह जीवन निर्वाह का साधन या संसाधन नहीं रह गई है। पहले उसके दूध के साथ-साथ गोबर और बछड़ों का उपयोग होता था। अब गोबर की जगह अनेक प्रकार के उर्वरक आ गए। उपले की जगह एलपीजी गैस आ गई। फिर गोबर का स्वरूप अब कचरे से अधिक कुछ नहीं है। मशीनों के बेतहासा उपयोग ने बछड़ों की उपयोगिता खत्म कर दी। बढ़ती हुई महँगाई का असर यह हुआ कि छोटे किसानों ने बड़े पैमाने पर कृषि कार्य छोड़ दिया और शहरों में जाकर मजदूरी करने लगे। किसानों की क्षमता महँगाई के अनुसार नहीं बढ़ पायी है और न ही इसका कोई वैकल्पिक उपाय निकाला गया है।

          गाय को बचाने के आंदोलन का कोई मतलब नहीं होगा जब तक सीधे तौर पर किसान खुद इसका नेतृत्व नहीं करेंगे, और किसान तभी नेतृत्व करेंगे जब उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी होगी कि वे गाय रखने में सक्षम होंगे। इसलिए बहुत जरूरी है कि गाय के आंदोलन के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और महँगाई को रोकने की दिशा में सरकार के स्तर पर व्यवस्थित योजनाएँ लायीं जाय और उनका सीधा लाभ किसानों को मिले। अन्यथा सरकार गाय खरीदकर दे देगी तो भी किसान नहीं लेगा, और यही जमीनी सच्चाई है, इससे आँख नहीं चुराया जा सकता। अब इस आंदोलन के स्वरूप को बदलने और उसकी दिशा को परिवर्तित करने की जरूरत है। तभी कुछ सार्थक परिणाम निकल सकता है।  

मैं आता रहूँगा तुम्हारे लिए...


सन्तोष कुमार राय

          चंद्रकांत देवताले समकालीन कविता के लोकप्रिय और चहेते कवि रहे हैं। चंद्रकांत देवताले का जाना एक ऐसे कवि का जाना है, जिसने हमारे जीवन के अनेक मोहक और संघर्ष के क्षणों के साथ गहरी संवेदनाओं को पिरोकर कविता बना दिया। आम जीवन के साथ, उनकी कविताओं में वह सबकुछ समाहित है जिसे हम जीते हैं, जिसे हम जानते हैं, जिसे हम देखते हैं, जिसे हम महसूस करते हैं। उनकी कविताओं में जितनी बेबाकी है उतनी ही गहराई है। एक सकारात्मक दृष्टिकोण और विचार के कवि के रूप में हिंदी जगत में अपनी पहचान बनाने वाले चंद्रकांत देवताले के जाने से हिंदी जगत एक खालीपन का अनुभव कर रहा है। अपने जीवन की और कविता की भरपूर उम्र जीने के बाद उनका जाना बहुत अस्वाभाविक नहीं है। चंद्रकांत देवताले ने आधुनिक हिंदी कविता के जिस पक्ष को अपनी कविताओं में जगह दी वह कोई नायाब या बहुत अलग चीज नहीं थी। बहुत साधारण से साधारण विषय को उठाकर बड़ी कविता बना दिया। यह विशेषता आज बिरले दिखाई देती है। यदि वैचारिक प्रतिबद्धता से थोड़ा अलग होकर देखा जाय तो चंद्रकांत देवताले की कविताओं में एक आशा, उम्मीद, सकारात्मकता, जिजीविषा और रिश्तों के प्रति गहरी आत्मीयता दिखाई देती है। जबकि उनके समकालीन और समवैचारिक अनेक कवियों में अनेक तरह के नैराश्य और अवसाद का भाव दिखाई देता है।
          वैसे तो चंद्रकांत देवताले ने अस्सी वर्ष का अच्छा जीवन जिया, लेकिन रचनाकर का जीवन कभी लंबा कहाँ हो पाता है। हमेशा ऐसा लगता है कि कुछ दिन और रह जाते तो कुछ और दे जाते। लौटना चंद्रकांत देवताले की कविताओं में कई जगह आया है। बेटी के घर से लौटते हुए शीर्षक कविता में लिखते हैं कि-- सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते / दुनिया में सबसे कठिन है शायद / बेटी के घर लौटना।
          किसी भी साहित्यकार की अपनी वैचारिक पक्षधरता उसकी वैचारिक बनावट के अनुसार होती ही है और देवताले की कविताओं में भी उनका वैचारिक मोह कहीं-कहीं सामने आया ही है, लेकिन देवताले कविताओं में सजग और चौकन्ने दिखते हैं, जिससे कविताएं नारा नहीं बन पायी है, बल्कि गहरी संवेदनाओं के साथ अभिव्यक्त हुई हैं, जैसे—उसके कुचले सपनों की मुट्ठीभर राख / किस हंडिया में होगी या अथवा / और रोजमर्रा की चीजें / लाता होगा कितना जर्जर पारदर्शी शरीर पर / पेट में होंगे कितने दाने 
या घास-पत्तियां / उसके इर्द-गिर्द कितना घुप्प होगा / कितना जंगल में छिपा हुआ जंगल / मृत्यु से कितनी दुरी पर या नजदीक होगी।
देवताले ने जीवन और जगत के अनेक पक्षों को अपनी कविताओं में बहुत ही सहज ढंग से शामिल किया है। सामान्य जीवन की जरूरतों को, उसके अनेक रूपों को, संबंधों को, जनजीवन की रोज़मर्रा की अनेक समस्याओं पर कविताएं हैं, जैसे-- मैं उसे नहीं बता पाया / की कसाईख़ाने में काम करते शाकाहारी की तरह / मै ज़िन्दा हूँ इस दुनिया में / और शामिल हूँ उन्ही में जो / अपनी करुणा की तबाही और / अपने साहस की हत्या के लिए / दूसरों को अपराधी समझ रहे हैं।
          चंद्रकांत देवताले अपनी कविताओं माध्यम हमारे बीच हमेशा रहेंगे। मानवता की गहरी परख उनकी कविताओं का आधार है। उनकी कई कविताओं में बार-बार आने की बात आती है। और यह साचा भी है कि जब भी समकालीन कविता और काव्यात्मक संवेदना की चर्चा होगी, चंद्रकांत देवताले हमेशा हमारे बीच उपस्थित रहेंगे। यही कारण है बड़ा साहित्यकार कभी भी दुनिया से जाता नहीं है बल्कि वह जाने के बाद भी अमर हो जाता है। रचनाकार की रचनाएँ उसे अमरत्व प्रदान करती हैं। वह हमेशा अशेष रहता है। कुलमिलाकर श्रद्धांजलि स्वरूप यह कहा जा सकता है कि चंद्रकांत देवताले हिंदी कविता के वर्तमान हैं जो किसी न किसी रूप में साहित्य जगत को हमेशा झकझोरते रहेंगे।




आज का समय और साहित्य
सन्तोष कुमार राय
            एक समय में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया था और यह उस समय के साथ-साथ किसी भी काल-खंड के लिए सच है। आज जिस तरह से समय बदला है,  साहित्य में वैसा न तो बदलाव हुआ है और न ही आज के साहित्य में अपने समय को समेट लेने की कोई चाहत दिखाई देती है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी अपने समय के यथार्थ को क्यों नहीं देख पा रहे हैं? क्या कारण है कि हमारा समाज दिनोंदिन पतन के गर्त में समा जाने को आतुर है और इससे सचेत करने वाले देख नहीं प रहे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं वह अपने हर रूप में संक्रमण काल है। हम दिशाहीन विकास की बुनियाद पर आगे बढ़ रहे हैं। हमारे पास कोई भी ऐसा प्रारूप नहीं है जिसे विकास की सही दिशा कहा जाय। असल में जिसे विकास कहा जा रहा है वही आज समय के समय के संक्रमण का जन्मदाता है। जीवन के भागदौड़ में ठहराव के लिए कहीं कोई जगह नहीं बची है।
            दरअसल ऐसी स्थिति में साहित्य दिशा-निर्माता या युग-निर्माता की भूमिका अदा करता रहा है। लेकिन आज वह खुद दिग्भ्रमित और दिशाहीन है। कुछ इसी तरह के ऊहापोह का समय 1857 के बाद का था, जब साहित्यकारों के लिए धार्मिक रूढ़ियों के नाम पर चलाये जा रहे सामाजिक बंधनों के विरुद्ध बोलना शुरू किया। उस समय सामाजिक रूढ़ियों पर बोलना आसान नहीं था। लेकिन उस समय के साहित्य निर्माताओं ने इसकी पहचान की और इसके खिलाफ एकजुट होकर लिखना-बोलना शुरू किया। जिसका परिणाम हमें आधुनिक राष्ट्र के रूप में मिला। वह समय एक बनती हुई भाषा और बनते हुए राष्ट्र का समय था। उस समय के साहित्यकारों ने जितनी मजबूती के साथ भाषा का पक्ष लिया उतनी ही मजबूती के साथ वे राष्ट्र के साथ भी खड़े हुए। इसके अनेक उदाहरण हमें उस दौर के साहित्य में मिल जाएंगे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद आदि अनेक रचनाकर ऐसे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष किया। उन साहित्यकारों ने भारत के अतीत को बार-बार उद्धृत किया और ज़ोर देकर बताया कि हमारा समाज कैसा था और आज हम कैसे हो गए हैं। जिसका सीधा-सीधा असर उस दौर के समाज पर पड़ा।
            आज के साहित्यकारों-रचनाकारों के लिए भी अपने समय की समस्याओं को पहचानने की जरूरत है। हम जिस समय में जी रहे हैं वह वास्तव में विसृंखल मान्यताओं के जबरन स्थापित होने का समय है। पारिवारिक-सामाजिक बंधन हमारी वैश्विक पहचान थी जो आज छिन्न-भिन्न हो गई है। व्यक्तिवाद इस कदर आगे बढ़ गया है कि हमारे पीछे क्या है और कैसा है इसे देखना तो बहुत दूर की बात है उस पर रुककर सोचना भी दुरूह हो गया है। ऐसी स्थिति में रचनाकारों का दायित्व बढ़ जाता है। इस समय की सचाई से आम जनमानस को रूबरू करना आज उनका नैतिक कर्तव्य है। समाज की विकृतियों की पहचान जितनी बारीकी से वे कर सकते हैं आम लोग नहीं कर सकते। फिर से एकबार उन्हे भारतीय संस्कृति के उन पहलुओं पर समाज का ध्यान आकर्षित करना होगा जिनसे हमारे समाज को सही दिशा मिल सकती है।
            यह कहना गलत नहीं होगा कि आज का साहित्यकार अपने समय की सच्चाई को नजरंदाज कर रहा है। वह अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की तरह समय और समाज से जुड़ नहीं पा रहा। सामाजिक मान्यताओं और जीवन शैली में लगातार आ रही गिरावट को वह गंभीरता से नहीं ले रहा है। कोई भी रचना तभी दीर्घायु होती है जब उसमें अपने समय के व्यापक जनसमुदाय का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ हो। जिन रचनाओं में व्यापक जनसमुदाय का यथार्थ निहित होता है वे अनायास ही उस समाज से जुड़ जाती हैं और उसका हिस्सा बन जाती हैं। आज इसका भाव खटकता है जबकि आज जितनी अधिक मात्र में रचनाएँ हो रहीं है शायद ही कभी हुई हो। आज रचनाकारों के लिए छपने का संकट नहीं है फिर भी हमारे अपने रचनाकार से उस तरह से नहीं जुड़ पा रहे हैं जैसा जुड़ना चाहिए।
            कुलमिलाकर यह कहना चाहिए कि आज के रचनाकारों पर हमरे समय का बहुत बड़ा दायित्व है। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी। आज जिस तरह से मनुष्य के जीवन को सुरक्षा देने वाली प्रकृति का दोहन हो रहा है, पर्यावरण में जतनी तेजी से बदलाव आ रहा है, जल, जंगल, पहाड़ आदि जिस तरह से खत्म किए जा रहे हैं उसके दुष्परिणामों की चेतावनी कौन देगा। आज के साहित्य को भी समाज का दर्पण बनाना पड़ेगा, समाज की प्रतिछाया को साहित्य में जगह देनी होगी, आम जनमानस को उसके यथार्थ से न सिर्फ अवगत कराना होगा बल्कि उसे आज की भयावहता के दुष्परिणामों से सचेत भी करना होगा तभी साहित्यकारों के दायित्व सही मायने में पूरे होंगे।

सन्तोष कुमार राय
यथावत में प्रकाशित 
          ‘उठ जाग मुसाफिर प्रख्यात साहित्यकार विवेकी राय द्वारा विरचित ललित निबंध संग्रह है। इस संग्रह में कुल दस निबंध संकलित हैं जो अपने कलेवर में जीवन और जगत के अनेक अनुभवों से परिपूर्ण हैं। विवेकी राय हिंदी जगत के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने ग्रामीण जीवन के यथार्थ को अपने साहित्य का आधार बनाया। वे जिस अंचल में रहते हैं वह अंचल ही उनके साहित्य का प्रेरणा स्रोत है, वही शब्द है, वही छंद है, वही राग है और वही साज और आवाज है। वहाँ की बोली-बानी, तीज-त्योहार, रहन-सहन, दुख-दर्द, आशा-निराशा, छल-छद्म को वहाँ की सामाजिक पहचान के साथ, उसकी तह तक जाकर अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। यह निबंध संग्रह उनके रचनात्मक विकास का बहुत ही महत्वपूर्ण चरण है। जिस तरह से उन्होंने अपने अनुभवों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति अपने कथा-साहित्य में की है उसी तरह से अनुभव के लालित्य को इन निबंधों में अत्यंत रोचक तरीके से व्यक्त किया है। ग्रामीण जीवन का लालित्य यहाँ चिंता के रूप में भी आया है।
          विवेकी राय उम्र के 88वें वर्ष में भी साहित्य-सर्जना को उसी लगन के साथ पुष्पित-पल्लवित कर रहे हैं जिस लगन के साथ उन्होने साहित्य की दुनिया में पहला कदम रखा था। इस निबंध-संग्रह को समझने के लिए विवेकी राय के साहित्यिक सफर को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस संग्रह के निबंध अनेक जगहों पर इनके पूर्ववर्ती साहित्य की ओर झाँकने के लिए विवश कर देते हैं। हिंदी उपन्यास लेखन में विवेकी राय का आविर्भाव बबूल (1967) के साथ होता है। उसके बाद पुरुषपुराण’, लोकऋण’, श्वेतपत्र’, सोना माटी’, समर शेष है’, मंगल भवन और अमंगलहारी के रूप में उनके कथा लेखन का विस्तृत परिक्षेत्र विकसित हुआ है। इन सभी उपन्यासों का यहाँ उल्लेख करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि उठ जाग मुसाफिर के निबंध भी किसी न किसी रूप में इन उपन्यासों से जुड़ते हैं और यही एक सुचिंतित साहित्यकार की संवेदनात्मक गहराई होती है। ऐसा लगता है जैसे यह निबंध संग्रह उनके कथा लेखन के बृहद अनुभव का निचोड़ है। जिस तरह की सरसता इन निबंधो में है वह बिरले देखने को मिलती है। विवेकी राय मूलतः ग्रामीण जीवन से अभिप्रेरित साहित्यकार हैं। उनका संपूर्ण साहित्य ग्रामीण अनुभूतियों में रचा-बसा है। बबुल से लेकर उठ जाग मुसाफिर तक विवेकी राय की समर्थ और यथार्थवादी रचनात्मक दुनिया ही उनकी पहचान है। उठ जाग मुसाफिर में दस निबंध हैं जो लगभग समाप्त होती हुई इस साहित्यिक विधा के लिए पुनर्जीवन की तरह हैं।

          उठ जाग मुसाफिर का पहला निबंध मेरी दिनचर्या : कुछ आयाम है। यह निबंध किसी भी उस मनुष्य के जीवन के अनुभव का हिस्सा हो सकता है जिसके मन में अपनी जमीन के लिए अगाध सम्मान और प्रेम का भाव होगा। पाठक इसके हर हिस्से में खुद को, परिवार के किसी बुजुर्ग को, उसके मनोभावों को, उसकी सोच को देख सकता है। जिस तरह से नई पीढ़ी आधुनिकता के भागमभाग में बेचैन है और बुजुर्ग लगभग एकल और उपेक्षित जीवन की निराशा से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह संग्रह हमें नए सिरे से अपने परिवेश को, अपने कर्तव्य को समझने के लिए प्रेरित करते हैं। लेखक की ऊर्जा देखते बनती है, वे लिखते हैं, “मैं मुंह बिराती सी जर्जर दीवार नहीं हूँ। चिन्मय सत्य हूँ, रचनाकार हूँ, बाहर नहीं भीतर हूँ। और आत्मविश्वास का तो कहना ही क्या, मसलन--  “मेरा यह पड़ाव समय का जबर्दस्त सत्य है। यह समस्त भ्रम-तमस को फाड़कर आँखें खोल देता है।” इसके अनेक हिस्से ऐसे हैं जो पाठक की संवेदना को अनुभूति की उस गहराई तक ले जाते हैं जहां वह रचना में खुद के जीवन से एकाकार हो जाता है। दूसरा निबंध नमो वृक्षेभ्यः आंखे खोलने वाला है। एक वृक्ष को आधार बनाकर लिखा गया यह लेख उनके अध्ययन के विस्तार का से अवगत कराता है। इस निबंध को पढ़ते समय प्रसिद्ध ललित निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कुटज याद आता है।  एक वृक्ष आज की आवाज का अद्भुत मानवीकरण किया है। लिखते हैं, “ऐसा लग रहा है, यह पर्यावरण-विध्वंसकों की चुनौती को स्वीकार करता है, उनके विरुद्ध शंखनाद करता नया रुद्रावतार है, साक्षात रुद्र प्रतीक, जिसको यजुर्वेद के ऋषि ने बहुत पहले ठीक से जाना था और सम्मानित किया था, नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः।” उसके बाद उठ जाग मुसाफिर है। इस निबंध में एक अद्भुत कथात्मक लय दिखाई देती है। ऐसा लगता है अपने जीवन की इस लंबी यात्रा के अनुभव के हर क्षेत्र को इस निबंध में रचनाकार ने निचोड़कर रख दिया है। इसे पढ़ते हुए स्वानुभूति और सहानुभूति का सवाल भी सामने आ जाता है। साहित्य में सहानुभूति को प्रथम श्रेणी का नहीं माना जा रहा है। स्वानुभूति ही यथार्थ की अभिव्यक्ति का मानक बनती जा रही है। यह निबंध स्वानुभूति की अभिव्यक्ति का मानक हो सकता है। बानगी के लिए हम देखा सकते हैं। लिखते हैं, “कुसमय की साफ-सुथरी, सात्विक और सुवासित अभिव्यक्तियाँ व्यक्ति के जीवनव्यापी ऊंचे सोच और उत्कृष्ट चिंतनाभ्यास की फलश्रुति होती है। ऐसे जीवन-संबल वाला व्यक्ति राग रहित हो, तो मुक्त हास बिखेर सकता है। जिसको दुनिया जीवन की सांझ कहती है वह उसका प्रभात होता है। उस प्रभात शिखर से आवाज देता है उठ जाग मुसाफिर।” आगे के निबंधों में केना, ग्रीष्म बहार, ततः किम और तीनडँड़िया चोट से उभरा समय और सवाल हैं। तीनों के विषय अलग-अलग हैं लेकिन अभिव्यक्ति का विस्तार वही है। ज्ञान के अनेक छोर इस तरह से हिलोरे ले रहे है मानों हजारों नदियो का जल एक साथ एक जगह एकरूप हो रहा हो। उसके बाद के तीन निबंध---चिंता भारत के उजड़ते गाँवों की, गाँव पर बनाम गाँव में और सवाल जीवन का है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ये तीनों निबंध इस संग्रह के हृदय हैं। गाँव विवेकी राय के लेखन का केंद्र रहे हैं। यहाँ भी उन्होने इसके उजड़ने की चिंता को उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की है। उनकी चिंता कुछ इस तरह व्यक्त हुई है—“लगता है, गाँव भीतर से उठकर सड़क पर आता जा रहा है। किसान दुकान बनाता जा रहा है। खेत में खड़ा है तो उसका चेहरा कुछ और तरह का है तथा सड़क पर कुछ और तरह का।” और वहीं जो सबसे बड़ी समस्या है कि, “किसानी मरी तो किसान कहाँ बचेगा?” इस तरह अनेक सवाल इस संग्रह में हैं जो हमें झकझोरने के लिए, हमें अंदर से हिला देने के लिए काफी हैं। उपन्यासकार के रूप में अपने रचनात्मक जीवन की शुरुआत करने वाले इस प्रतिभाशाली साहित्यकार ने ललित निबंध की विधा को भी अपेक्षित ऊंचाई दी है, लेकिन हिंदी की एकपक्षीय नगरीय बोध की आलोचना ने ग्रामीण बोध को स्वीकार नहीं किया। आज जिस तरह से गाँव उपेक्षित है उसी तरह से ग्रामीण लेखन भी। दोनों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है। हिंदी की शास्त्रीय परंपरा में आचार्य अभिनव गुप्त ने लोक को साहित्य के आधार के रूप में परिभाषित किया है लेकिन आधुनिक आलोचकों के लिए लोक में रचा-बसा गाँव महत्वपूर्ण नहीं रहा। उन्होने भी पश्चिम को ही विचार का आधार समझा। फणीश्वरनाथ रेणु और विवेकी राय को छोड़कर अभी तक किसी भी कथाकार के पास ऐसा सामर्थ्य नहीं है कि गाँव को उसकी संपूर्णता में अभिव्यक्त कर सके। इतिहास, लोक और साहित्य में  भी किसी न किसी रूप में जिंदा रहता है। जहां पुस्तकीय इतिहास मौन या असमर्थ हो जाता है वहाँ साहित्य में प्रकट तथ्य ही इतिहास ही प्रतिपूर्ति करते हैं। विवेकी राय जैसे साहित्यकार को अगर जीवित इतिहास कहा जाय तो यह उनके लिए बहुत ही सार्थक होगा।

उद्योग का आख्यान


सन्तोष कुमार राय
यथावत में प्रकाशित 
राजेश माहेश्वरी हमारे समय के उन चुनिन्दा कथाकारों में से हैं जो अपने कार्यक्षेत्र की अनेकानेक व्यस्तताओं के बावजूद साहित्य सृजन करते हैं। व्यवसाय और शौक दोनों अलग-अलग हैं। लेकिन आज का समय इसके विपरीत सिद्धांत गढ़ रहा है। आज शौक को ही व्यवसाय बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिससे अनेक तरह के सामाजिक अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं। राजेश माहेश्वरी का साहित्य सृजन उनका शौक है। उनका जीवन जैसा बहुआयामी है उसी तरह उनका लेखन भी विविधताओं से भरा हुआ है।  यहाँ राजेश माहेश्वरी की तीन रचनाएँ हैं जो साहित्य की तीन विधाओं में लिखी गई हैं। रात के ग्यारह बजे उपन्यास है, वे बहत्तर घंटे कहानी संग्रह है तथा पथ आत्मकथा है।
रात के ग्यारह बजे
रात के ग्यारह बजे एक उपन्यास है। उपन्यास की कहानी के मूल में हमारे संबंध हैं। प्रेम, त्याग, नैतिकता, मानवीयता आदि अनेक बातें है जो उपन्यासकर के मन मस्तिष्क में हैं जिन्हे प्रसंगानुकूल उपन्यास में उतारा गया है। आधुनिक उपन्यासों में अक्सर सामाजिक बुराइयों की भरमार होती है जबकि समाज में सिर्फ बुराइयाँ ही नहीं होती। इस उपन्यास में लेखक ने राकेश के रूप में जिस पात्र को खड़ा किया है वह हर तरह की मानवीय कमजोरियों के बाद भी एक सकारात्मक व्यक्तित्व के रूप में खड़ा हुआ है। अनीता, मानसी, पल्लवी, गौरव, आनंद आदि हमारे समाज की और हमारे आस-पास की अच्छाइयों और बुराइयों के रूप हैं। उपन्यास के संदर्भ में लेखक ने लिखा है, “ मानव के संदर्भ में जब हम नारी को देखते हैं तो उसके दोनों रूप हमारे सामने आते हैंएक सृजनकर्ता के रूप में और दूसरा संहारक के रूप में ।” वर्तमान समय के स्त्री विमर्श की धारा से हटकर लेखक ने एक नया विचार दिया है । उनके इस लेखन को विमर्श के खेवनहार किस रूप में देखेंगे यह अलग विषय है लेकिन जिस बेबाकी से राजेश माहेश्वरी ने अपनी बात रखी है वह गौर करने योग्य है। इस उपन्यास के मूल में सकारात्मक दृष्टिकोण है । यथा, “यदि हमारे कर्म सकारात्मक हों तो हमारा भाग्य भी हमारा साथ देता है ।” इस उपन्यास में आज के समय की सच्चाई है जो आधुनिक युवाओं के संबंधों के खोखलेपन को बयां करती है। भावनाओं के प्रवाह की गति में जीवन को छोड़ देने को लेखक ने बेसहारा बनने जैसा ही माना है। कुलमिलकर यह उपन्यास हमारे समाज का सच्चा चित्र प्रस्तुत करता है।
वे बहत्तर घंटे
          वे बहत्तर घंटे कहानी संग्रह है। इसमें छोटी-छोटी 26 कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों के विषय में विविधता है। ज़्यादातर कहानियाँ उपदेश प्रधान हैं। लेखक ने समाज को नैतिकता और आदर्श में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश किया है जैसे हार का मोती। लेकिन समाज तो मोतियों के बिखरने से भी बनाता है। यहाँ लेखक की दृष्टि प्रायः सभी कहानियों में कुछ न कुछ आदर्शमूलक उपदेश देने की है। लेखक का अनुभव औद्योगिक दुनिया की खूबियों और खामियों से भरा पड़ा है । वह उसी तर्ज पर समाज को एकरैखिक चलाने का प्रयास कर रहा है लेकिन समाज की गति तो चक्रिय होती है। उसका यथार्थ आदर्श से बहुत अलग होता है। वे बहत्तर घंटे की कहानियाँ माँ, हृदय परिवर्तन, जिद, बुद्धिमान और बुद्धिहीन आदि के माध्यम से लेखक ने कोई न कोई उपदेश देने की कोशिश की है। राजेश माहेश्वरी की कहानियों को पढ़कर लगता है जैसे हम भारतेन्दु युग के उपदेश प्रधान उपन्यास पढ़ रहें हों। वास्तव में अब साहित्य उपदेश प्रधान शैली से बहुत आगे निकाल चुका। इस तरह की कहानियों का औचित्य व्यक्तिगत जीवन में चाहे जो भी हो सामाजिक यथार्थ से इनका कोई खास लगाव नहीं बन पाता। इस तरह की कहानियाँ लेखकीय संतुष्टि के लिए छप जाएँ तो अलग बात है नहीं तो आम लेखक का लिखा हुआ होता शायद ही पुस्तक का आकार ले पाता।
पथ
पथ कहने को तो आत्मकथा है लेकिन आत्मकथा जैसा कुछ इसमें दिखाई नहीं देता। पढ़ने पर ऐसा लगता है कि कुछ अपनी बात कहने के बाद लेखक लगातार उद्योग-धंधों के पुष्पित-पल्लवित होने के गुर सिखा रहा है। आत्मकथा सिर्फ अपनी बात या अपनी समस्याएँ नहीं होता है। उसमें अपने समय और समाज का सच भी होता है । अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के अतिरिक्त भी समाज में कुछ है । इसमें ऐसा लगता है जैसे लेखक ने मान लिया है कि हम अगर असफल हैं तो दुनिया असफल है, हम यदि सफल हैं तो दुनिया सफल है। लेखक एक बड़े औद्योगिक घराने से आते हैं इसलिए उनका वास्तविक लगाव भी जमीन के लोगों से नहीं हो सकता और उनसे उस तरह का लिखने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। लेकिन इतनी उम्मीद तो जरूर की जा सकती है कि कुछ भी लिखते समय लेखक की आँख खुली रहे और वह भारत को देखने की कोशिश करे। उनकी दृष्टि का पता चलता है जब वे लिखते हैं कि,, चैंबर आफ कामर्स का अपना कोई आय का स्रोत नहीं होता है। सरकार को चाहिए कि वह व्यापारी अथवा उद्योगपति द्वारा यदि कोई राशि चैंबर को दी जाती है तो उस राशि पर उसे आयकर में छूट प्रदान करनी चाहिए ।” मुख्य समस्या यह है ।
          कुल मिलकर यदि तीनों पुस्तकों का अगर सम्मिलित मूल्यांकन किया जाय तो जो बात निकलकर आती है वह यह कि लेखक ने अपने जीवन क्षेत्र की आदर्शमूलक बातों को ही अलग-अलग विधाओं में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है। लेखक खुद उद्योगपति हैं इसलिए वे चाहते हैं कि इस देश में उद्योग साफ-सुथरे हों, जिनमें निरंतर विकास हो। उद्योगपति भी नैतिकता सम्पन्न हों। समाज में किसी तरह की कोई बुराई न हो। इसे लेखक की भली मानसिकता कहा जा सकता है । लेकिन आज हमारे समाज में नैतिकता और आदर्श कितना बचा है या उसका कितना पालन हो रहा है उससे हम सभी परिचित हैं। इसलिए इस तरह के आदर्श सिर्फ लिखने के लिए ही अच्छे होते हैं । 

निर्वासन-- विकास की दुखद गाथा


सन्तोष कुमार राय
            निर्वासन उपन्यास वर्तमान कथा लेखन से अलग एक नई पृष्ठभूमि के साथ आया है। वैसे तो हिन्दी कथा लेखन में यह परंपरा रही है कि अपने समय के हर कथाकार को अतीत के किसी न किसी कथाकार के साथ जोड़ दिया जाता  है और ऐसा अखिलेश के बारे में भी लिखा जा सकता है। लेकिन यह ठीक नहीं है क्योंकि हर कथाकार अपने समय मे समझ विकसित करता है। बहुत दिनों बाद हिन्दी में विमर्श की धारा से बिलकुल अलग एक नई चेतना का उपन्यास आया है। इसके के माध्यम से अखिलेश ने तथाकथिक विकसित भारत की अद्यतन विसंगतियों सुव्यवस्थित तरीके से अभिव्यक्त किया है। जिस तरह से हम पूंजीवादी सभ्यता के पीछे आंधी दौड़ लगा रहे हैं उसके अनेक दुष्परिणामोंकी ओर उपन्यासकार ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है।
             निर्वासन एक ऐसा शब्द है जिसका भारतीय समाज से बहुत ही गहरा और परंपरागत संबंध है। गुलामी के दिनों में जो मजदूर भारत से बाहर गये उनसे लेकर वर्तमान समय के पूंजीवादी विकास के भागमभाग के हर पहलू को अखिलेश ने छूने की कोशिश की है। विलुप्त होती भारतीय परंपरा और खोती हुई मानवीय पहचान को निर्वासन में विशेष रूप से उभारा गया है। आज हम आधुनिकता के आवरण में पश्चिमी संस्कृति का अंधाधुंध अनुसरण कर रहे हैं। भौतिकवाद की गुलामी में भारतीय मध्यवर्ग बुरी तरह से जकड़ गया है। उसके अनेक पहलुओं को इस उयपन्यास में देखा जा सकता है। निर्वासन के संबंध में कथाकार काशीनाथ सिंह से लिखा है कि, मन भर गया था एक अर्से से विमर्शों के सादे और सपाट निर्जीव यथार्थ से भरे उपन्यासों को पढ़ते हुए। ऐसे ही में अखिलेश का यह उपन्यास- जैसे भीड़-भाड़ और गर्द-गुबार से बाहर ताजी हवा का झोंका। इस वक्तव्य से उपन्यास और विमर्श दोनों को लेकर कई सवाल हो सकते हैं। आज तक हिंदी के लेखकों को विमर्शों में अनेक तरह की नई संभावनाएं और नई ऊर्जा दिखाई देती थी। लेकिन इस एक दशक के छोटे से समय में ही उनसे ऐसा मोहभंग हो गया कि वे निर्जीव और सपाट हो गई। पता नहीं यह विचार विमर्शों के प्रतिरोध में व्यक्त हुआ है या फिर निर्वासन के समर्थन में।
            अखिलेश ने निर्वासन की कथा को वर्तमान से लेकर सुदूर अतीत के औपनिवेशिक काल तक जोड़ा है। वर्तमान समय की सत्ता का प्रतिनिधि रूप उन्होंने संपूर्णानंद बृहस्पति के रूप में खड़ा किया है। पत्रकारों की पत्रकारिता को बहुगुणा के रूप में। वहीं आधुनिकता से ऊबे और घबराए हुए प्राध्यापक के रूप में सूर्यकांत के चाचा को दिखाया है। लेखक ने बड़ी कुशलता से एक साथ परंपरा और आधुनिकता के जन उपयोगी पक्षों को उपन्यास में जगह दी है जो उनके लेखन की विशेषता है। एक तरफ संपूर्णानंद बृहस्पति को बीभत्स परंपरागत व्यक्तित्व के रूप में खड़ा किए हैं, वहीं दूसरी ओर सूर्यकांत के पिता को सामंती मानसिकता के पोषक के रूप में। चाचा एक ओर पत्नी और बच्चों के जीवन जीने के तौर तरीकों को स्वीकार नहीं करते लेकिन शराब पीते वक्त वे सारे परंपरागत उसूलों को भूल जाते हैं। आधुनिकता विरोधी होने की बात पर चाचा ने कहा है, ये कौन सा आधुनिकपन है रे। आधुनिकता वह है जिसके सामने पुराना मिट जाने में बेहतरी समझे। वह अपने आप चली जाय। जो आधुनिकता पूराने को जबरदस्ती मिटाती है, तबाह करती है- पुराने को बरबाद करके काबिज होती है वह सच्ची आधुनिकता नहीं है। यह इस उयपन्यास का अंतर्विरोध भी हो सकता है जो यह तय नहीं कर पाता है कि आधुनिकता और परंपरा के बीच कैसे सामंजस्य बिठाया जाय। वर्तमान राजनीति की तुच्छता ऊपर से लेकर ग्राम पंचायत तक, बहुत ही जीवंत रूप में सामने आयी है। इस उपन्यास में राम अजोर पांडे भी कम महत्वपूर्ण पात्र नहीं हैं। उनके आने से इसकी कहानी औपनिवेशिक काल से लेकर आधुनिक काल तक विस्तृत हो गई है। या यह कहा जाय कि एक मजदूर के विकास की कहानी का विकसित रूप एक पूंजीपति राम अजोर पांडे हैं तो गलत नहीं होगा। गोसाईगंज का हर आदमी भगेलू पांडे और राम अजोर पांडे से अपना संबंध जोड़ने में लगा हुआ है, एक विचित्र दृश्य खड़ा हुआ है आज के समय और समाज का।
            निर्वासन एक ओर वर्गीय चरित्रों के विकराल चेहरे को बेनकाब करता है तो वहीं वह जातिगत चरित्रों की सर्जना भी करता है। आज का भारत किस तरह से भौतिकता के पीछे भाग रहा है उसके अनेक उदाहरण इस उपन्यास में मौजूद हैं। झूठ और फरेब के कितने जाल बुने जा सकते हैं इसे भी इस उपन्यास में बखूबी प्रस्तुत किया गया है। निर्वासन भारत के विकास की दुखद गाथा है। लेखक ने जिन प्रसंगों को के माध्यम से अपनी चिंता को जाहिर किया है वे वाकई हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं। क्या आधुनिक बनने की आपाधापी हमने सचमुच अपना बहुत कुछ खो दिया है? क्या अब हमारी परंपरागत जीवन पद्धति अप्रासंगिक हो गई है? क्या घर में बड़े बुजुर्ग सिर्फ पैसा कमाने की मशीन हो गए हैं? क्या उनकी सोच-समझ की कोई अर्थवत्ता नहीं है? निर्वासन में अखिलेश ने अनेक ऐसे सवालों पर हमें सोचने के लिए मजबूर कर दिया है जो हमारे आस-पास पैर जमा चुके हैं और हम निरंतर अमानवीय और संवेदनहीन होते जा रहे हैं।
            यह उपन्यास अनेक तरह के वैचारिक टकरावों से भरा हुआ है। आज के लेखक को जितना जरूरी लगता है एक सार्थक रचना करने की उससे ज्यादा जरूरी लगता है अपनी वैचारिक जमात में बने रहने की भी। अखिलेश भी उससे बच नहीं पाये हैं। वे परंपरा को तो बचाने की वकालत करते हैं लेकिन परंपरागत होकर नहीं। आधुनिकता को स्वीकार करते हैं लेकिन अतिवादी होकर नहीं। उसी प्रकार आज सेकुलर होना भी एक खास वर्ग का फैशन बन गया है। कोई परंपरागत और धार्मिक होने का आरोप न लगाए इसलिए जरूरी है कि राम मंदिर और अयोध्या की अपनी रचना में एक नकारात्मक परिक्रमा करा दी जाय। इससे जाति और जमात दोनों बच जाती है। इस तरह के अंतर्विरोध भी इस उपन्यास में हैं जो हमें अनायास ही खटकते हैं। 

पितृसत्ता और भारतीय कानून में महिलाओं के उत्तराधिकार


सन्तोष कुमार राय
यथावत में प्रकाशित 
          उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार पुस्तक के माध्यम से अधिवक्ता और लेखक अरविंद जैन ने भारतीय समाज का एकपक्षीय और विवादास्पद कानून तथा पुरुष वर्चस्व की वास्तविक सच्चाई को सामने रख दिया है। समाज की निर्मिति दो को मिला के ही होती है वह स्त्री और पुरुष हैं, लेकिन दोनों के अधिकार में इतना भेद, वह भी सिर्फ सामाजिक या जुबानी नहीं कानूनी भी। इस पुस्तक में अनेक उदाहरणों के साथ इसकी विस्तृत और आंखें खोलने वाली पड़ताल की गई है। भारतीय समाज व्यवस्था एक पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था है जिसमें महिलाओं के उत्तराधिकार या अधिकार को न तो ठीक से सामाजिक स्वीकृति मिली है और न ही कानूनी। भूमिका में लेखक ने बहुत साफ-साफ लिखा है कि, “गर्भपात के कानूनी आधिकार देने का मुख्य उद्देश्य औरत की कोख पर नियंत्रण करके राष्ट्र की जनसंख्या का नियंत्रण भी था और स्त्री को पुरुष के आनंद की वस्तु बनाना भी। स्त्री को देह का स्वामित्व और उपभोग की आजादी का पाठ पढ़ाये बिना, यह सब कैसे संभव हो सकता था?”
          अभी तक हमारे समाज में स्त्री के जीवन के सारे फैसले पुरुष ही करते आ रहे हैं, कुछ-एक अपवादों को छोड़कर। कानून बन गये, न्यायालयों के अनेक फैसले भी आ गये लेकिन क्या उन्हें उनके जीवन के निर्णय का अधिकार मिला? अभी भी पिता की संपत्ति में पुत्री की हिस्सेदारी नहीं बन पायी है। कानून बन गये लेकिन जमीन पर कितने उतरे? धर्म-संप्रदाय को लेकर, धर्मांतरण को लेकर, पुत्र-पुत्री पर अधिकार को लेकर, संपत्ति को लेकर, जमीन-जायदाद को लेकर बाल विवाह को लेकर, विधवाओं को लेकर, स्त्री स्वामित्व आदि को लेकर भारतीय कानून व्यवस्था आज के समय में भी अस्पष्टता बोध की शिकार है। जैसे—“हिन्दू विवाह अधिनियम में एक और विसंगति है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह वर्जित है और ऐसा करने वाले व्यक्ति को 15 दिन की कैद या सजा या 100 रुपये का जुर्माना हो सकता है। लेकिन जो मुकदमे आज तक निर्णित हुए हैं, उनमें देखा गया है कि इस तरह के विवाह भले ही दंडनीय अपराध हैं लेकिन अवैध नहीं हैं।” यह एक विसंगति है जबकि लेखक ने बाल विवाह अधिनियम के तहत अनेक विसंगतियों का जिक्र किया है।
          उत्तराधिकार भारतीय समाज में अभी भी बहुत ही पेचीदा मामला है। कहने को तो हम उत्तर-आधुनिक हो गये है लेकिन क्या वास्तव में हमारी समझ भी उत्तर आधुनिक हुई है? शायद नहीं, क्योंकि जिन समजाइक मान्यताओं से सामाजिक विकृति का जन्म होता है, हम आज उनका पोषण करते हैं। संजय गांधी की मृत्यु के बाद इन्दिरा गांधी की तानाशाही का विस्तार से जिक्र किया गया है। मेनका गांधी की कानूनी लड़ाई का भी उल्लेख है। जैसे, संजय गांधी की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकार को लेकर हुए गृह-युद्धऔर अदालती लड़ाई को संक्षेप में जानना जरूरी है। .....मृत्यु के बाद 3 फरवरी 1982 को मेनका गांधी ने संजय गांधी द्वारा छोड़े 473058 रुपए के शेयरों को अपने और बेटे के नाम करवाने के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत याचिका दायर की क्योंकि उनका विवाह विशेष विवाह आधनियम के अधीन हुआ था। नोटिस के जवाब में इन्दिरा गांधी ने कहा था कि संजय गांधी की माँ होने के नाते, उनका एक तिहाई हिस्सा बनता है, जो वह वरुण के पक्ष में छोड़ना चाहती हैं।.... श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा अपना हिस्सा अपने पोते वरुण के लिए छोड़ने के पीछे सही-सही क्या कारण और उद्देश्य रहे होंगे, कहना मुश्किल है।........ ।
दरअसल मुखिया होने पर, औरत भी पितृसत्ता के रूप में ही व्यवहार करने लगती है। अब उत्तराधिकार के प्रश्न को ठीक से समझा जा सकता है। समाज और कानून दोनों ने स्त्री को किस तरह से कमजोर, लाचार और निरीह बनाने की कोशिश की है, यह पुस्तक इस बात का जीवंत दस्तावेज़ है।
          अंत में यह पुस्तक एक ऐसी बहस के साथ हमारे सामने है जिससे न सिर्फ पुरुष बल्कि पूरी भारतीय मानसिकता ही आँख चुराने की कोशिश करती है। इसमें उत्तराधिकार, विशेषकर स्त्री के उत्तराधिकार, और न सिर्फ उत्तराधिकार बल्कि वास्तविक अधिकार की लड़ाई को बहुत ही संयत ढंग से प्रस्तुत किया गया है। स्त्री का जीवन विडंबनाओं से बाहर कब और कैसे होगा? अगर ये विडंबनाएं प्राकृतिक होती तो कुछ हद तक स्वीकार भी किया जा सकता है लेकिन यहाँ तो कानूनी और सामाजिक हैं, जिन्हें जबरन उनके ऊपर थोपा गया है। अब जरूरत है कि इस बहस को किसी निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया जाय। 

जासूसी उपन्यासकार के संस्मरण



संतोष कुमार राय
यथावत में प्रकाशित 
          अपने समय के लोकप्रिय उपन्यासकार गोपालराम गहमरी का उन चुनिंदा कथाकारों में हैं जिन्होंने हिंदी उपन्यास को न सिर्फ लोकप्रिय बनाया बल्कि उनके लेखन को पढ़ने के लिए अनेक गैर हिंदी भाषी लोगों ने हिंदी सीखा । गोपालराम गहमरी के संस्मरण नाम से उनके संस्मरणों का बेहतरीन संपादन संजय कृष्ण ने किया है । यह संकलन कई मायनों में हमारे लिए उपयोगी है । सबसे पहले तो इस संकलन के आ जाने से गोपालराम गहमरी फिर से हमारे सामने आ गए अन्यथा पुराने साहित्य में ज़्यादातर नाम अब सिर्फ इतिहास में दर्ज रहने की कगार पर पहुँच गये हैं । इसके लिए संपादक संजय कृष्ण को धन्यवाद के पात्र हैं । गहमरी जी के समय और समाज को समझने का यह विश्वसनीय दस्तावेज है । हिंदी साहित्य और समाज के इतिहास को भी इसके माध्यम से बहुत कुछ समझा जा सकता है । हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासों की परंपरा को थोड़ा अलगाकर अगर देखा जाय तो गहमरी जी का नाम हिंदी के पहले जासूसी उपन्यासकार के रूप में आता है । जासूसी उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जिस सूक्ष्मता से गहमरी जी ने समाहित किया है वह अतुलनीय है । भारतीय समाज में फैली सामाजिक-धार्मिक बुराइयों को लेकर जो सामाजिक आंदोलन चल रहे थे उनकी प्रत्यक्ष छाया गहमरी जी के लेखन में दिखाई देती है ।
          गोपालराम गहमरी के संस्मरण पुस्तक हिंदी उपन्यास से अलग नई विधा के रूप में भी अपनी जगह बनती है । जहाँ तक संस्मरणों के लेखन का सवाल है तो उस दौर के लेखन में कुछ-एक आत्मकथाएँ जरूर प्रकाशित हुई है लेकिन कोई ऐसा संस्मरण नहीं दिखाई देता जिसे इस विधा की प्रारंभिक कृति माना जाय । बहुत बाद में संस्मरण को साहित्य की एक विधा के रूप में स्वीकृति मिली है । इस लिहाज से इसकी महत्ता और अधिक बढ़ जाती है ।
          प्रस्तुत संकलन में जिन संस्मरणों को शामिल किया गया है उनमें— मेरा बचपन, मेरे संस्मरण, साहित्यिक संसमरण, भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र का भाषण, आँखों देखि घटना, कुंभ यात्रा आदि 21 संस्मरण संकलित हैं । इसमें उस समय के व्यक्तियों पर कुछ रोचक और महत्वपूर्ण संस्मरण हैं जिनमें भारतेन्दु, रामपाल सिंह, प्रथम नारायण मिश्र, बाल मुकुन्द गुप्त, तिलक आदि महत्वपूर्ण हैं । भारतेन्दु को याद करते हुए लिखते हैं कि, “भारतेन्दु हरिश्चंद्र वहाँ आमंत्रित हुए । उनकी मंडली सब समान से लैस वहाँ पहुंची । मैं उनदिनों बाबू राधाकृष्ण दास से ही परिचित था । वह बच्चा बाबू कहलाते थे । उन्होने दुःखिनीबाला नामक एक छोटा सा ग्रंथ लिखा था । मैं उन दिनों 18 वर्ष का था, हिंदी लिखने की रुचि थी, सामर्थ्य कम । भारतेन्दु की मंडली भरके दर्शन मुझे वहीं बलिया में हुए थे और भारतेन्दु के दर्शन पाकर अपने तई कृतार्थ हुआ । बड़ी श्रद्धा भक्ति से वहाँ भारतेन्दु के नाटक लोगों ने देखे । भारतेन्दु ने स्वयं हरिश्चंद्र बनकर सत्य हरिश्चंद्र का नाटक स्टेज पर खेला था ।” इसी तरह अन्य साहित्यकारों को संस्मरणों में याद किया है ।
          साहित्यिक संस्मरण बहुत ही रोचक हैं । प्रताप नारायण मिश्र को याद करते हुए लिखते हैं कि “सबेरे ही मैं चौतरे पर बैठा नीम की दातुन कर रहा था कि सामने से एक देवता मस्त चाल से झूमते हुए चौतरे पर चढ़कर बोले—“तुमहूं बल मकुनवा की नाई सबेरे सबेरे लकड़ी चबत हौ ।..... आप तो मुझे पहचानते न होंगे । मेरा एक बौड़म कागज  ब्राह्मण नाम का है, जो आपके यहाँ भी जाता है ।” इन संस्मरणों में एक ओर साहित्यकारों को अपनी नजर से देख रहे हैं वहीं उस समय की कुछ समस्याओं पर भी व्यंग्य कर रहे हैं । हिन्दी भाषा और साहित्यकारों की चुप्पी को याद कराते हुए हिन्दी की चिंदी में लिखते हैं कि, “हिन्दी में अब अशुद्धियों की नाव दिनों-दिन बोझिल होती जा रही है । ऐसे अवसर पर हिन्दी के मर्मज्ञ सुलेखकों की चुप्पी और आफत ढा रही है । बड़े दुख की बात है कि हिन्दी के वर्तमान महारथी नए हिन्दी लेखकों के अनर्थ चुपचाप देख रहे हैं ।”
          गहमरी जी के संस्मरणों में पर्याप्त विविधता है । साहित्यकारों के अलावा लोकमान्य तिलक की जमानत पर भी लिखा है, “तैयब जी ने पचास-पचास हजार की दो ज़मानतें और पचास हजार का तिलक महाराज का जाती मुचलका लेकर छोड़ देने की आज्ञा सुना दी । यह बंगवासी केस से दसगुना थी । उस समय अदालत में खड़ी जनता ने जो ताली बजाकर हर्ष ध्वनि की उसकी पूर्ति अदालत के बाहर खड़ी पाँच छह हजार जनता ने उसी सुर में कर दी ।” इस तरह के कई विषयों को गहमरी जी ने उठाया है जो हमारे इतिहास का हिस्सा हैं । यहाँ सबकुछ लिखना संभव नहीं है । यह संकलन साहित्य, समय और समाज के अनेक पक्षों को पाने भीतर समेटे हुए है जिसे जानने के लिए पढ़ना आवश्यक है ।


          

बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता पूर्वांचल


आज़ादी के इतने सालों बाद भी पूर्वांचल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। किसी भी समाज के विकास जो बुनियादी सुविधाएं है उनमें बिजली, पानी, सड़क, इलाज और शिक्षा है। आप जैसे ही बनारस से पूर्व की ओर बढ़ेंगे आपको सहज विश्वास नहीं होगा कि आप उसी देश या प्रदेश में जा रहे हैं जो भारत का ही एक अहम हिस्सा है। सड़कें ऐसी हैं कि आप 2 घंटे का रास्ता 5 घंटे में तय करेंगे। घोर अशिक्षा का शिकार है यह क्षेत्र। कई कई दिनों तक बिजली नहीं रहती हैम पानी की तो बात ही नहीं है आज भी कई गांवों के लोग नदियो का प्रदूषित पानी पीते हैं। किसानों के लिए किसी प्रकार की सुविधा नहीं है जबकि कृषि ही एकमात्र इस क्षेत्र के जीविकोंपार्जन का साधन है। स्वास्थ्य की हालत तो पूछिए मत बस किसी दिन मंत्री और मुख्यमंत्री को बोल दीजिये की अपनी अम्मा को सामान्य लाइन में दिखा के बता दें। नानी याद आ जाएगी। मतलब यह कि आज जिस हालत में यह क्षेत्र पहुंचा है उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाय? किसी जमाने में देश का वह हिस्सा अँग्रेजी हुकूमत की जड़ हिला देता था उसे इन सरकारों ने बिकलांग बना दिया। दो सरकारों का नाम मैं यहाँ खुलकर लेना चाहूँगा जिसने पूर्वांचल के साथ सौतेला व्यवहार किया और ये दोनों हैं सपा और बसपा। मजे की बात यह है कि जब भी इनकी प्रदेश में सरकार रही है सर्वाधिक सहभागिता इस क्षेत्र की ही रही है। ये वोट पूर्वांचल से लेते रहे और विकास पश्चिमी उत्तर प्रदेश और सैफई करते रहे। मैं किसी भी क्षेत्र के विकास को बुरा नहीं मानता हूँ लेकिन उसमे भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस क्षेत्र में गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, कुशीनगर और देवरिया प्रमुख हैं। क्षेत्रीय पार्टियों ले आत्मविश्वास का एक नमूना देखिये। सपा ने बसपा के समय के प्रख्यात घोटालेबाज बाबूसिंह कुशवाहा की पत्नी को खड़ा किया है। बसपा ने पड़ोसी जिले के किसी कैलाश यादव को खड़ा किया है जो कभी सपा में हुआ करते थे। दोनों मूलरूप से बाहर के हैं और आपस में अदला-बदली करते रहे हैं। यही नहीं दिली के पास के कोई नेता डी पी यादव हैं, वे भी पहुंचे हैं। सपा-बसपा ऐसे चुनाव लड़ रही है जैसे उन्होने विकास का सारा पैसा वहीं लगाया है। भाजपा ने गाजीपुर के सबसे पुराने नेता मनोज सिन्हा को खड़ा किया है। सिन्हाजी बेहद ईमानदार और सुलझे हुए नेता हैं। 1999 से 2004 तक सिन्हाजी यहाँ के सांसद थे। उस दौरान उनके फंड का समुचित और सही उपयोग क्षेत्र के विकास में हुआ था। पहली बार उस क्षेत्र के अनेक गाँवो को पक्की सड़के नसीब हुई। उससे पहले सड़के नहीं थी लोग घुटने तक कीचड़ में धंस के बाहर जाते थे। लेकिन सिन्हाजी ने जिला के विकास को जहां छोड़ा था वह आज भी उसी जगह खड़ा है। मसलन ग्रामीण इलाके में जो सड़के बनीं थी आज तक उन पर दूसरे लोगों एक टुकड़ा तक नहीं डाला। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे वहाँ की जनता वाकिफ है। इस बार के चुनाव में स्थिति बिलकुल बदल गई है। इस बार जाति और धर्म छोटा पड़ गया है। इस बार का मतदान पूर्वांचल के लोग विकास के मुद्दे पर करने जा रहे हैं।

सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...