महामारी में गाँव लौटे कामगारों के जीविका की समस्या

 संतोष कुमार राय

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादापिगरियशी” यह मातृभूमि प्रेम के लिए ऐसे ही नहीं कहा गया है। इसका जीवंत उदाहरण आज के समय में दिखाई दे रहा है। संकट के इस समय में आम जनमानस में अपने गाँव लौटने की जैसी बेताबी दिखी, उससे आज के विकसित भारत की छिपी हुई सच्चाई बाहर आ गई। कोरोना महामारी ने शहरों में जैसा भय और अविश्वास का माहौल बनाया उससे शहरों में काम करने के लिए आने वाले लोगों का शहरों के प्रति न सिर्फ विश्वास कम किया, बल्कि एक बार फिर भारत के गाँवों पर लोगों का विश्वास दृढ़ हुआ। अपनी मेहनत और खून-पसीने से जिस शहर को शहर कहलाने लायक मजदूरों ने बनाया-चमकाया, महामारी के समय में वही शहर मजदूरों के लिए बेगाने और डरावने लगने लगे। कोरोना के भय ने आम कामगारों के मन में जिस किसी एक के प्रति अगाध श्रद्धा और अटूट विश्वास पैदा किया वह भारत के गाँव हैं। एक बार फिर आधुनिक शहरों पर परंपरागत गाँव भारी पड़े। मजदूरों ने हरसंभव प्रयास किया कि वे किसी भी तरह से अपने गाँव पहुँच जाएँ। बहुतों ने तो जान की बाजी लगाकर अपने गाँव तक पहुँचने की कोशिश की। कुछ पूर्णबंदी से पहले तो कुछ पूर्णबंदी के दौरान हृदय विदारक कष्ट उठाकर अपने गाँव पहुँचने का प्रयास करते रहे और अब भी कर रहे हैं। जबकि सरकार की ओर से इन मजदूरों को जहाँ थे वहीं रोकने की हरसंभव कोशिश भी होती रही। अंततः सरकारों को भी इन कामगारों की जिजीविषा के आगे अपनी राह बदलनी पड़ी और अब देश के अलग-अलग हिस्सों से मजदूरों को श्रमिक विशेष ट्रेन तथा बस चलाकर उन्हें उनके प्रदेश, फिर उन्हें उनके गाँव तक पहुंचाया जा रहा है।

अब जब मजदूर अपने गाँव आ गये हैं और आ रहे हैं तो इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठना स्वाभाविक है। जैसे कि शहरों से वापस आने के बाद इनके जीविकोपार्जन के लिए अभी गाँवों में क्या व्यवस्था है? क्या गाँव में इनका भरण-पोषण हो जाएगा या फिर इन्हें गाँव छोड़कर शहर ही जाना पड़ेगा? इतनी बड़ी संख्या में मजदूर जब ग्रामीण क्षेत्रों में आ रहे हैं तो आम ग्रामीण की इनके लिए क्या राय है? इन सवालों को लेकर जब थोड़ी गहराई में उतरने की कोशिश की तो ग्रामीण यथार्थ की अनेक परतें खुलीं। सबसे पहली बात यह कि इन मजदूरों के गाँव आने के बाद जो प्राथमिक तौर पर दिखा वह यह कि इनके आने से सभी प्रसन्न हैं अर्थात गाँव में स्थायी रहने वाले भी और ये मजदूर भी। मजदूर इसलिए प्रसन्न हैं कि इस महामारी से बाहर निकलकर वे अपनी जन्मभूमि पर आ गये हैं और उन्हें यह विश्वास है कि यहाँ उन्हें कुछ नहीं होगा। जहाँ तक रोजगार का प्रश्न है तो भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और कृषि में इतने तरह के कार्य हैं कि उसमें अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है और पहले भी इन मजदूरों को मिलता रहा है। ग्रामीण किसानों में मजदूरों के आने से प्रसन्नता है कि कृषि कार्य अब लगभग मशीनों के सहारे किसी तरह से हो पाता था और पिछले दो दशक से कृषि कार्य मजदूरों के अभाव में लगभग उपेक्षित हो गया था, उसे फिर से वही सम्मान और संपन्नता मिल सकती है। उदाहरण के लिए जब संपूर्णबंदी हुई तो गाँव में गेहूं की कटाई चल रही थी। मजदूरों के अभाव में किसान गेहूं को हार्वेस्टर से कटवाते थे जिसमें अच्छा खासा व्यय होता था। उसके बाद पशुओं के चारे के लिए भूसा बनवाना पड़ता था और उसमें भी उतना ही व्यय होता था। लेकिन मजदूरों के बढ़ने से इस बार एक ही काम को दो बार नहीं करवाना पड़ा और बड़े पैमाने पर मजदूरों ने गेहूं की कटाई में सहभागिता की। इसी तरह खेतों में गर्मी की सब्जी, गन्ना, सूरजमुखी, मूंग जैसी अनेक चीजें लगी हुई हैं, जिनके लिए बड़े पैमाने पर मजदूरों की आवश्यकता होती है। किसान प्रसन्न हैं कि उन्हें आसानी से मजदूर मिल जाएंगे और उन्हें अच्छा उत्पादन और मजदूरों को कार्य मिलेगा।

यहाँ यह भी समझने की जरूरत है कि अब ग्रामीण भारत की तस्वीर बहुत हद तक बदल चुकी है। परिवहन के साथ अन्य संसाधनों में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है जिससे ग्रामीण भारत का उत्पादन आसानी से शहरों में और दूसरे देशों में पहुँच रहा है। सरकार की ओर से भी गाँवों में रहने वाले मजदूरों के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं जिसका लाभ इन मजदूरों को भी मिलेगा। मनरेगा के तहत ग्रामीण भारत में रोजगार गारंटी की योजना पिछले कई वर्षों से चल रही है। वहीं खाद्यान्न वितरण से भी गाँव में रहने वाले मजदूरों का जीवन बहुत आसान हुआ है। पिछले पाँच-छः वर्षों में बड़े पैमाने पर आवास, शौचालय, बिजली और उज्जवला के तहत गैस कनेक्सन देकर सरकार ने ग्रामीण जीवन की तस्वीर को बदल दिया है। शहरों से गाँव आए मजदूरों को बड़े पैमाने पर ग्रामसभाओं के द्वारा मनरेगा के तहत काम दिया जा रहा है। वहीं कृषि, पशुपालन, मछली पालन, बागवानी आदि में भी खूब काम मिल रहा है। गाँव में रोजगार को लेकर जब मजदूरों से बात करने कोशिश की तो उनका उत्तर कुछ इस तरह का था। उन्होने बताया कि शहरों में मासिक कार्य मिलता था जबकि गाँवों में यह दैनंदिन होता है। शहरों में खर्च भी अधिक था, जिसमें सबसे बड़ा खर्च रहने का था। गाँव में रहने का कोई खर्च नहीं लगता, वहीं बिजली-पानी पर भी बहुत कम खर्च होता है। इसलिए शहर की अपेक्षा गाँव में बहुत कम व्यय करके भी आराम से रहा जा सकता है। उन्होने बताया कि अब गाँवों में भी काम इतना बढ़ गया है कि यहाँ भी अच्छा काम मिल रहा है। खेती-किसानी के अतिरिक्त भी अनेक क्षेत्र हैं जिनमें बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हुआ है। इस उत्तर में जो आत्मसंतोष था वह गाँव के प्रति उनके विश्वास और आत्मीयता को प्रकट कर रहा था।

इसका एक दूसरा पक्ष भी है। मजदूरों के आने से किसानों का पक्ष भी जानना आवश्यक था। जब किसानों से इन मजदूरों को लेकर सवाल किया तो उनका कहना था कि जबसे ग्रामीण मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ कृषि की रीढ़ बैठ गई। हम सभी मशीनों के सहारे खेती कर रहे थे जबकि खेती में बहुत सारे ऐसे काम हैं जो मजदूरों के बिना संभव नहीं हो पाता। इन मजदूरों के आ जाने से खेती-बारी की स्थिति में बहुत सुधार हो जायेगा।

इस सारी स्थितियों को देखते हुए गाँव आए मजदूरों को लेकर फिलहाल ऐसी कोई बड़ी परेशानी दिखाई नहीं दे रही। आगे की स्थिति कैसी होगी यह समय तय करेगा। लेकिन एक बात तय है कि ग्रामीण भारत भी अब हर तरह से रोजगारोन्मुख हो गया है और ऐसे अनेक क्षेत्र सृजित हुए हैं जहाँ बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं। यदि सरकार की ओर से ग्रामीण और कृषि विकास की योजनाओं को थोड़ा और विस्तार दे दिया जाय तो गाँव सिर्फ मजदूरों को रोजगार ही मुहैया नहीं कराएंगे, अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में भी बड़ी भूमिका निभायेंगे।

(31 मई2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


संकट के समय गाँव का गँवई बोध

 संतोष कुमार राय

17 मई, 2020 के पांचजन्य के अंक में प्रकाशित
10 मई2020 के युगवार्ता में प्रकाशित

ग्रामीण का तद्भव गँवार होता है लेकिन दोनों के प्रयोग के संदर्भ और व्याख्या में बहुत बड़ा फर्क है। आम तौर पर आधुनिक और शहरी भारत में गँवार का मतलब अनपढ़ और मूर्ख जैसा ही प्रतीत कराया जाता है। लेकिन ग्रामीण बोध या गंवई बोध जितना आत्मीय, संवेदनशील, मानवीय और बुद्धि-संपन्न होता है आधुनिक शिक्षा संपन्न भारत में शायद ही देखने को मिले। इसका एक जीवंत और प्रेरणादायी उदाहरण पूर्वी उत्तर प्रदेश और उससे लगे हुए बिहार के कुछ गाँवों में देखने को मिला। 

हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि पूरे भारत को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार से ही उपलब्ध होती है। यही वे श्रमिक हैं जिनके श्रम से आज का भारत विकास के अनेक पायदान चढ़कर आगे बढ़ा है। पिछले एक माह से अधिक समय से भारत में संपूर्ण बंदी लागू है। देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले मजदूर, जिन्हें हजारों की संख्या में दिल्ली की सरकार ने भयानक असंवेदनशीलता और अमानवीयता का परिचय देते हुए बसों में भर-भरकर उत्तर प्रदेश की सीमा पर लावारिस और लाचार बनाकर छोड़ दिया था, वे मजदूर तमाम संघर्ष के बाद जब अपने गाँव पहुंचे तो उन्होने जिस संवेदनशीलता और जागरूकता का परिचय दिया उससे हमें अद्भुत प्रेरणा और सीख मिलती है।

पिछले महीने की 12 तारीख को बिहार के बक्सर जिले के एक गाँव के 40 कामगार लगभग 15 दिन के संघर्ष के बाद अनेक दिन के भूखे-प्यासे अपने गाँव पहुँचे। गाँव आने के बाद उन्होने गाँव के बाहर से ही गाँव में रहने वाले लोगों और गाँव के मुखिया को फोन करके बुलाया और सभी ग्रामीणों के साथ एक बैठक किया और मुखिया के सामने उन लोगों ने प्रस्ताव रखा कि हम सभी दिल्ली से आ रहे हैं और देश में जैसी महामारी फैली है उसमें हमारा सीधे गाँव में प्रवेश करना ठीक नहीं है। हम सभी चाहते हैं कि हमें 14 दिन तक गाँव के बाहर रहने की व्यवस्था की जाय जिससे हम लोगों की वजह से गाँव में किसी को भी किसी भी तरह का नुकसान न हो और कोरोना के संक्रमण से हमारा गाँव सुरक्षित रहे। मुखिया के साथ ग्रामीणों ने इस प्रस्ताव का हृदय से स्वागत किया और गाँव के बाहर एक विद्यालय में उनके रहने की व्यवस्था की गई। बिना किसी सरकारी सहायता ग्रामीणों ने 14 दिनों तक उन कामगारों के रहने-खाने की उत्तम व्यवस्था किया। उसके बाद सभी कामगार सहर्ष अपने-अपने घर गये। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिले जिससे महानगरीय जीवन जीने वालों को सीख लेनी चाहिए। यहीं ग्रामीण शिक्षा है। यही गाँव का संस्कार है। पिछले एक महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा अनेक जगहों पर देखने को मिला जो किसी विद्यालय या विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता। एक ओर शहर के लोग हस्पतालों से भाग र्हए थे, चिकित्सा सेवा में लगे लोगों पर हमला कर रहे थे ठीक उसी समय भारत के सुदूर गाँवों में गहरी मानवता अपना संस्कार प्रकट कर रही थी। 

आपदा के समय सामान्यतः हम ऐसी जगहों की ओर जाते हैं जिन पर हमारा अटूट विश्वास होता है। कोरोना महामारी ने महानगरों में जैसा भय और असंवेदनशीलता का माहौल पैदा किया गया उसमें ग्रामीण समुदाय से जुड़े लोग अपने गाँवों में सुरक्षित पहुँचने के लिए बेताब दिखे। एक बार फिर गाँव और गाँव के लोगों के प्रति विश्वास और सद्भाव मजबूत हुआ है। यहीं वास्तविक भारत बसता है जो कभी विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित था।


लाकडाउन में ग्रामीण भारत सरकार और प्रशासन के साथ

संतोष कुमार राय 

कोरोना वायरस एक वैश्विक महामारी बनकर उभरा है। एक ऐसी महामारी जिसके वायरस को शायद ही देखा जा सकता हो। इसका खतरनाक रूप विश्व के कई देशों को तबाह कर दिया है। यह बात हर भारतीय को अब ठीक से समझ में आ गई है। वैसे भारत जैसे देश और उसमें भी ग्रामीण भारत में लॉक डाउन करा देना कितना कठिन और असहज है, इससे हम सभी परिचित हैं। शुरुआती कुछ दिन के अफवाहों को छोड़ दिया जाय तो कोरोना को लेकर सरकार की ओर जारी हर एहतियात और निर्देश को लोगों ने बहुत गंभीरता से लिया है। भारत की अव्यवस्थित चिकित्सा सुविधाओं और उसमें भी भगवान भरोसे चलने वाली ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था के मद्देनजर आम जन में इसे लेकर बहुत खौफ और भय जैसा माहौल रहा और यह चिंता सभी के मन में थी और अभी भी है कि अगर स्थिति बिगड़ गई तो इलाज तो बहुत दूर, हस्पतालों में पहुँचना भी आसान नहीं होगा। अमेरिका, इटली, स्पेन और चीन जैसे समृद्ध राष्ट्र जब इस महामारी के सामने घुटने टेक दिये हैं तो फिर भारत जैसे अल्पविकसित और अविकसित देश की क्या औकात है।

इस दौरान जो स्थिति रही उसे देखते हुए यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि 130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश को इस महामारी से कैसे बचाया जा सकता है? क्या सरकार के पास ऐसे संसाधन मौजूद हैं जिनके सहारे देश को इस महामारी से बाहर निकाला जा सकता है? शायद नहीं और इसे भारत की ग्रामीण जनता बहुत गहराई से समझ रही है। फिर इससे बचने का एकमात्र और अंतिम उपाय यही था कि सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पालन किया जाय और इस महामारी को फैलने से रोका जाय, अन्यथा इसकी भयावहता व्याप्त होने में बहुत अल्प समय लगेगा।

अक्सर ऐसा होता है कि ग्रामीण भारत मीडिया की नजर में उस तरह नहीं आ पाता जैसा कैमरे में महानगरीय चमक-दमक को सहेजा जाता है। महानगरीय खबरों की बहुलता के बाद कुछ छोटे शहरों की खबरें आती हैं उसके बाद ग्रामीण भारत की ओर कैमरा घूमता है जो स्क्रीन पर जगह बनाने में लगभग नगण्य ही रहता है। जहाँ तक कोरोना के मद्देनजर भारत बंद का प्रश्न है तो पिछले लगभग 15 दिनों में जो जागरूकता और गंभीरता देखने को मिली है वह सहज ही हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती है। 12-13 मार्च के आस-पास जब भारत में कोरोना के केस बढ़ने लगे उस समय लोगों के मन में अनायास ही भय जैसा बन गया। सरकार की ओर से जब कुछ सुझाव दिये जाने लगे तो लोगों का ध्यान कोरोना से बचने के उपायों की ओर गया। प्रारंभिक चरण में जब राज्य सरकारों की ओर से विद्यालय, कालेज और सिनेमाघरों को बंद करने का आदेश हुआ, साथ ही आम लोगों के लिए जब साफ-सफाई के सुझाव और सुरक्षित रहने की चिकित्सकीय सलाह दी गई तो आम जनमानस पूरी तरह सचेत हो गया। वहीं विश्व में कोरोना से मची तबाही की जो खबरें आयीं उसका भी असर आम लोगों पर हुआ। लेकिन अभी तक वैसी सजगता नहीं आयी थी जैसी कोरोना से बचने के लिए जरूरी थी।

कोरोना से बचने के लिए प्रधानमंत्री ने जब एक दिन के जनता कर्फ़्यू की घोषणा किया तो सभी को यह समझ में आ गया कि इससे बचाव का यही रास्ता है। कुछ एक अपवादों और कुछ अफवाहों पर ध्यान न दिया जाय तो जनता कर्फ़्यू भारत के इतिहास में एक सफलतम कर्फ़्यू में गिना जाएगा, साथ ही इससे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का भी सहज अनुमान हो गया कि उनके एक छोटे से अनुरोध पर पूरे देश में बाजार, दुकानें, सड़के, गाडियाँ सबकुछ बंद रहा। भारत जैसे देश में इस तरह के बंद को सफल बना देना कितना कठिन है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है जहाँ प्रतिरोधी आवाज में निकलने वाला हर तीसरा वाक्य लोकतंत्र की हत्या होता है। लेकिन यह हुआ। न सिर्फ हुआ, बल्कि इसी से आगे के बंद की राह भी निकली। मतलब प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह एक प्रयोग था कि लोग इसे किस रूप में ले रहे हैं और कितना सहयोग कर रहे हैं। एक दिन के जनता कर्फ़्यू के मद्देनजर कुछ दूकानदारों, कुछ ग्राहकों और कुछ अन्य व्यवसाय से जुड़े हुए लोगों से बात करने की कोशिश की गई। जिसमें सभी का जवाब लगभग एक जैसा ही था कि प्रधानमंत्री ने अनुरोध किया है तो हमारे लिए ही किया है। उन्हें हमारी चिंता है तभी किया है। इसलिए हम सभी का यह सामूहिक कर्तव्य है कि हम सभी इसे सफल बनाने में सहयोग करें और ऐसा हम सबने किया।

22 मार्च के जनता कर्फ़्यू की सफलता के बाद सरकार को समझ में आ गया कि कोरोना से निपटने के इस तरीके को आगे बढ़ाया जा सकता है। 24 मार्च की मध्य रात्रि से कोरोना वायरस से बचाव को लेकर संपूर्ण भारत में 21 दिन का लंबा लाक डाउन कर गया, जिसकी घोषणा 24 मार्च को खुद प्रधानमंत्री ने की और समस्त देशवासियों से हाथ जोड़कर अनुरोध किया कि वे घर से बाहर ना निकलें। शहरी और महानगरीय भारत में जहाँ इसे लागू कराने में प्रशासनिक सहयोग लेना पड़ा तो वहीं ग्रामीण भारत खुद इसे सफल बनाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखा रहा है। पिछले 15 दिनों में पूर्वी उत्तर प्रदेश और उससे सटे हुए बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में जैसी जागरूकता देखने को मिली है, वह न सिर्फ सराहनीय है बल्कि इस महामारी से बचाव में सहयोग न करने वाले लोगों और इसे गंभीरता से न लेने वालों के लिए अनुकरणीय भी है।

21 दिन के लाक डाउन को लेकर जब कुछ व्यावसायियों से बात की गई तो सभी का जवाब कोरोना को हराने और देश को बचाने के पक्ष में था। बक्सर में होल सेल के कपड़ा व्यवसायी राजेश से जब पूछा कि इस बंद को वे अपने व्यवसाय के से जोड़कर कैसे देख रहे हैं तो उनका जवाब कुछ इस तरह था। उन्होने कहा कि लाक डाउन देश के लिए है, देश के लोगों के लिए है जबकि मेरा व्यवसाय भी देश और देश के लोगों से ही है। अगर देश और लोग ही नहीं रहेंगे तो मैं व्यवसाय किसके बीच और किसके लिए करूँगा। इसलिए इस बंद को सफल बनाने के लिए मैं हर तरह के नुकसान के लिए तैयार हूँ। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की दुकानों पर किराना की होल सेल सप्लाई करने वाले भुवन का जवाब तो और हौसला देने वाला था। उसी सवाल के जवाब में उन्होने कहा कि आज राष्ट्र को हमारी जरूरत है। अगर हम राष्ट्र के किसी भी काम आ गए तो यह हमारा सौभाग्य होगा। धंधा सिर्फ जीवन यापन का साधन है। लेकिन यह साधन नहीं भी रहे ग और राष्ट्र रहेगा, लोग स्वस्थ रहेंगे, हम स्वस्थ रहेंगे तो अपनी मेहनत से सबकुछ लूटा के भी दोबारा खड़ा कर सकते हैं। उन्होने कहा कि ऐसे समय में हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है कि हमारे पर जो भी संसाधन है उसके साथ हम अपने ग्राहकों और जरूरतमंदों के बीच खड़ा रहे। प्रशासन के आदेश के अनुसार हम सभी हर तरह से अपने लोगों के साथ अंतिम सांस तक खड़े रहेंगे। वहीं अन्य लोगों में कुछ ग्राहकों, कुछ छोटे दूकानदारों, कुछ किसानों, कुछ मजदूरों से भी बात की गई। सभी जा जवाब कोरोना से बचाव के लिए सरकार के हर आदेश का पालन कराने के पक्ष में ही था। ये सारे जवाब सरकार और प्रशासन को न सिर्फ हौसला देंगे, बल्कि इस महामारी को परास्त करके संगठित और मजबूत राष्ट्र का सर्वोत्तम उदाहरण विश्व के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

ग्रामीण भारत की यह तस्वीर कोरोना की लड़ाई में जैसा उदाहरण बन रहा है वह भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। इस बीच दैनंदिन श्रमिकों और कुछ गरीब लोगों के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ दिक्कतें भी आयी हैं लेकिन सरकार और प्रशासन की संवेदनशीलता और सजगता ने उससे भी निपटने का रास्ता बना लिया है। कुलमिलाकर आम जन इसे अपनी सुरक्षा, अपने परिवार तथा बच्चों की रक्षा के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। इससे एक उम्मीद बंधी है कि अगले 21 दिनों में भारत कोरोना से बहुत हद तक निपटने में कामयाब होगा।   


असफल प्रेम का इंडियापा

संतोष कुमार राय 

इंडियापा लोकप्रिय कथा लेखन की अच्छी रचना है। वैसे तो लेखकीय घोषणा में इसे उपन्यास कहा गया है लेकिन यह सिर्फ उपन्यास नहीं है। यह आत्मकथा भी हो सकता है, संस्मरण भी हो सकता है। वर्तमान दौर कथा लेखन के लोकप्रिय शैली का दौर है और अँग्रेजी भाषा में यह आज के भारत में खूब पढ़ा जा रहा है। इंडियापा भी हिंदी में इसी शैली का एक बेहतरीन प्रयास है, जिसमें रूमानियत भी है, उत्साह भी है, बचपना भी है, लगाव भी है, सम्मान भी है दुख भी है, उदासी भी है, निराशा भी है, आरोप-प्रत्यारोप भी है और भारतीय युवाओं के प्रेम की पारंपरिक परिणति प्रेम और विवाह का द्वंद्व भी है। 

लेखक विनोद दूबे खुद मर्चेंट नेवी में कैप्टन हैं और रचना का मुख्य पात्र सागर भी। ऐसा लगता है कि इस रचना का ज्यादातर हिस्सा लेखक के जीवन के इर्द-गिर्द ही घूमता दिखाई दे रहा है। सागर और भक्ति की प्रेम कथा की मोबाईल शुरुआत और वैवाहिक अंत ऐसी कोई नायाब चीज नहीं है, जिस पर इससे पहले या इससे अलग कुछ नहीं लिखा गया है। लेकिन लेखक की यह कोशिश सराहनीय है कि अच्छी हिंदी जानने समझने के बावजूद लेखक ने इसे आज की पीढ़ी की मानसिकता के अनुरूप हिंगलिशिया आकार दिया है। बीच-बीच अँग्रेजी के शब्दों को रोमन में लिखा गया है। हिंदी के अनेक प्रयोग जो व्याकरणिक दृष्टि से गलत हैं लेकिन आम बोलचाल में प्रचलित हैं, उनका धड़ल्ले से प्रयोग हुआ है, जैसे वो। इस उपन्यास की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपन्यास  बिलकुल पुराने, घिसा हुए विषय पर आधुनिक शैली में लिखा गया है।   

इसकी पृष्ठभूमि में बनारस है, लेकिन इसमें बनरसीपन का पूर्णतः अभाव है। इसका कारण बहुत साफ है। वह यह कि लेखकीय मानसिकता ठेठ बनारसी नहीं है, वह आयातीत है या लेखक खाँटी बनारसी नहीं बन पाया है। क्योंकि उपन्यास में कचौरी-जलेबी की महक और गंगा की घाटों और कुछ गलियों के सिवा वैसा कुछ उभरा नहीं है, जिससे बनारस की भाषा और भूगोल को समझा जा सके। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह आज के कनवेंट कल्चर के लिए एक उत्साही प्रयास है।

इसकी कथा शैली भी वैसी ही है जैसे तुलसीदास ने राम कथा कहने सुनने की प्रक्रिया में ही पूरा रामचरित मानस तैयार कर दिया। इसमें भी सागर और भक्ति के प्रेमकथा को गंगा के उस पार रेत पर पूरे मनोयोग से सागर ने सारिका को सुनाया है। अन्य सहयोगी पात्र की भूमिका में राजू हैं।

मुख्य बात यह है कि इस उपन्यास की पूरी कथा का अधिकतम हिस्सा कृत्रिम (आर्टिफिसियल) और नितांत सतही है। वह वास्तविकता से बहुत दूर है। माँ को इसमें बड़े आराम से लेखक ने सागर को एक आज्ञाकारी-संस्कारी बालक बनाने की आड़ में नाहक ही खलनायक बना दिया है, जबकि वास्तव में बनारस जैसे शहर की मानसिकता इतनी संकीर्ण नहीं है, जैसा लेखक ने आदिम बना दिया है। समाज बहुत तेजी से बदला है लेकिन लेखक ने सागर को जिस तरह से माँ के सामने बिना कुछ कहे नतमस्तक कर दिया है, इसे हजम करना थोड़ा कठिन है। पिता के सामने ऐसा हो सकता था लेकिन माँ तो माँ होती है। अधिकतर जगहों पर तो ऐसे मामलों में माँ ही खेवनहार बनती है। सागर को लेखक ने जैसा भोला-भाला दिखाया है वह आज के युवाओं के लिए संदेहास्पद है, वह भी बनारसी युवा के लिए। मजे कि बात यह है कि पूरे उपन्यास में कहीं भी सागर और भक्ति का प्रेम सामाजिक संघर्ष का शिकार नहीं होता है और न ही परिवार के लोगों को इसकी खबर मिल पाती है और भक्ति-सागर घंटों बनारस की घाटों और शहरों में घूमते रहते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है कि बनारस में इतनी सुंदर लड़की, जिसका लेखक ने पूरे मनोयोग से वर्णन किया है, उसके सौंदर्य को इत्मीनान से गढ़ा है, उसका कोई और प्रेमी न हो, सागर का उन प्रेम पुजारियों से सामना न हो, वे सागर और भक्ति के घर तक इस प्रेमकथा को पहुंचाए न—  इसे हजम करना बड़ा मुश्किल है।

लेखक ने पूरी कथा को एकरैखिक और व्यक्तिगत कथा बना दिया है, जबकि यह बहुआयामी (मल्टी डाइमेन्सनल) होने की भरपूर जगह थी। चूंकि विनोद दूबे युवा और उत्साही लेखक हैं, इसलिए अगली रचनाओं में इन कमियों को जरूर पूरा करेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। कुलमिलाकर इस रचना में भरपूर सरसता है और नयी पीढ़ी इसे खूब पसंद भी करेगी। इसमें ज्यादातर युवाओं के जीवन का कुछ न कुछ हिस्सा उन्हें मिल ही जाएगा। इसलिए इसका पठनीय होना स्वाभाविक है। 

(30 सितंबर, 2018 के युगवार्ता में प्रकाशित)


स्वाधीनता आंदोलन का ऐतिहासिक गाँव गंगा में विलीन होने की ओर...

संतोष कुमार राय 


भारत में सरकारी व्यवस्था की उपेक्षा न तो नई बात है और न ही कोई नायाब चीज, लेकिन जब यह व्यवस्था देश के स्वर्णिम अतीत की अनदेखी करने लगती है तो आवाज उठाना स्वाभाविक हो जाता है। दरअसल यह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थिति देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भारत की बड़ी ग्राम पंचायतों में से एक शेरपुर के अस्तित्व का सवाल है। वैसे तो किसी भी गाँव का गंगा या किसी अन्य नदी में विलीन हो जाना उस गाँव के लोगों के लिए कितना कष्टकारी होता है इसका अनुमान लगाना कठिन है। उत्तर प्रदेश और बिहार के ऐसे अनेक गाँव हैं जो बरसात में नदियों की भेंट चढ़ जाते हैं और सरकारी अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। अचानक से हँसता-खेलता गाँव, समाज नदी की भेंट चढ़ जाता है और एक झटके में पूरा गाँव बेघर हो जाता है। फिर शुरू होती है सरकारी सहायताओं के नाम पर असहाय करने वाली सुनियोजित लूट।

          शेरपुर ग्राम पंचायत का बड़ा हिस्सा, जिसकी हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन गंगा की कटान की भेंट चढ़ चुकी है। 1942 के आंदोलन में इस ग्राम पंचायत ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। इतिहास में दर्ज है कि 18 अगस्त 1942 को इस गाँव के आठ नौजवान शहीद हुए और अंग्रेजों को पूर्वांचल छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। इस तरह के गौरवशाली अतीत गाँव आज अदद सरकारी सहायता के लिए असहाय की तरह गुहार लगा रहा है, जिसे पिछले कई वर्षों से सरकारी नुमाइंदों द्वारा नजरंदाज किया जाता रहा है। छोटी-छोटी योजनाओं में उलझाकर सरकारी अमला अपनी खानापूर्ति कर लेता है।

          दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस ग्राम पंचायत में सिर्फ मतदाताओं की संख्या जो ग्रामपंचायत में दर्ज है वह 25 हजार से अधिक है, साथ ही इस ग्राम पंचायत के हजारों लोग अन्य शहरों में भी हैं। मोटे तौर पर अनुमानित वॉटर लगभग 40 हजार हैं। यानी पूरी ग्राम पंचायत से जुड़ी हुई जनसंख्या एक लाख के आस-पास होगी। ऐसी स्थिति यदि यह ग्राम पंचायत गंगा में गिर जाती है तो कितना नुकसान होगा। और बेघर लोग कहाँ जायेंगे। सरकारी लापरवाही का नतीजा यह है कि ग्राम पंचायत का एक हिस्सा सेमरा, जिसकी कुल आबादी 15 हजार से अधिक है, का ज़्यादातर हिस्सा और हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन गंगा में विलीन हो चुकी है। बेघर लोग दर दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं। सेमरा के लोगों की बदहाली कल्पना से परे है। कटान में गाँव के गिरने के बाद जिन लोगों के पास दूसरी जगहों पर  पास जमीन बची थी उन्होंने तो जैसे तैसे झुग्गी-झोपड़ी में  रहने की व्यवस्था कर लिया, जिनके पास पैसे थे और जमीन नहीं थी वे आस-पास के गाँवों में जमीन खरीदकर बस गये, लेकिन एक बड़ा हिसा उन गरीब लोगों का है जिनके पास न तो जमीन है और न पैसे हैं। वे पिछले कई वर्षों से दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। कभी किसी प्राथमिक विद्यालय में, कभी किसी माध्यमिक विद्यालय में, कभी किसी इंटर कालेज में, कभी कस्बे की अनाज मंडी में तो कभी सड़कों के किनारे खुले आसमान के नीचे अपनी जिंदगी काट रहे हैं। प्रत्येक बरसात का मौसम इन गाँवों के लिए कहर की तरह आता है। हर साल गाँव का कुछ न कुछ हिस्सा जरूर गिरता है।


           हर बार चुनावी वादे में गाँव को बचाने के राजनीतिक वादे होते हैं। कुछ सहयोग भी होता है, बावजूद इसके गाँव गिर रहे हैं। कटान को रोकने के लिए अब तक कोई ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया  गया है जिसे यहाँ उल्लिखित किया जाये। । ऐसा नहीं है कि इसकी ख़बर शासन-प्रशासन में बैठे देश और प्रदेश अधिकारोयोन और नेताओं को नहीं है। गाँव के लोगों अनेक बार देश और प्रदेश की सरकारों और मंत्रियों को लिखते रहे हैं, बताते रहे हैं लेकिन यह अनदेखी इस ऐतिहासिक गाँव के अस्तित्व को मिटाने की ओर ले जा रही है। इस ग्राम पंचायत के कटान की खबर जिलाधिकारी से लेकर देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सड़क परिवहन एवं जल संसाधन मंत्री, संचार व रेल राज्यमंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, लोकसभा क्षेत्र के सांसद व स्थानीय विधायक सहित ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहां ग्रामीणों ने उम्मीद से गुयाहर नहीं लगाई है। लेकिन अभी तक ठोस काम के नाम पर हर जगह से सिर्फ आश्वसन मिला है।

          यहाँ समझने की बात यह है कि यह ग्राम पंचायत देश की एक बड़ी ग्राम पंचायत है, जिसके पास अपना कालेज, अनेक स्कूल, हास्पिटल जैसी सरकारी सम्पदा भी कम नहीं है। दूसरी ओर देश और प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत किसानों का क्षेत्र है। तीसरी और महत्वपूर्ण कि यह भारतीय इतिहास की धरोहर है। इसे बचाने की व्यवस्थित योजना नहीं बनी तो राष्ट्रीय आंदोलन का जीवंत स्मारक महज कुछ ही वर्षों गंगा में विलीन हो जाएगा और लाखों लोग बेघर और मजबूर हो जायेंगे। 


परंपरागत कृषि पर औपनिवेशिक मार

संतोष कुमार राय

 





एक जमाने में भारत की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि होती थी। जिसकी अपनी वैश्विक पहचान यह थी कि वह बिना किसी बाहरी सहयोग के अपने भीतर से ही भरपूर, सात्विक और पौष्टिक उत्पादन का स्रोत पैदा करती थी। ऐसा माना जाता है कि अंग्रेज भारत से जाने के बाद भी यहाँ की अर्थव्यवस्था पर गिद्ध दृष्टि लगाये हुए थे। यही कारण था कि भारतीय सरकारों को सहयोग की आड़ में साजिश परोसते रहे। मजे कि बात यह है कि उन सरकारों और अब उनके अनुयायियों की जमात इसे अपने गौरवपूर्ण कार्य के रूप में प्रस्तुत करती रही है। 

इसे समझने की आवश्यकता है कि इसमें औपनिवेशिक साजिश कहाँ और कैसे हुई? इसके मूल में हरित क्रांति ही है। आज जिस गैर रासायनिक खेती की वकालत की जा रही है इसकी सबसे उन्नत तकनीक भारत में विकसित थी। हरित क्रांति का भारत में आगमन जिन कारकों को आधार बनाकर हुआ उसमें उत्पादन क्षमता और बीज अहम कारक थे। लेकिन आज बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि हरित क्रांति ही आज के कृषि संकट का मूल आधार है।

यहाँ इस बात को स्पष्ट करना आवश्यक है कि आज के कृषि संकट के मूल में हरित क्रांति भूमिका कैसे रही? इस संदर्भ में इस बात को समझने की जरूरत है कि भारत में पायी जाने वाली मिट्टी की पोषण क्षमता किस तरह के अनाजों के उत्पादन के अनुकूल रही है। मिट्टी की सेहत बढ़ाने के पारंपरिक उपाय किस तरह से पर्यावरण अनुकूल थे, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। यह औपनिवेशिक चाल ही थी कि अनेक विदेशी कंपनियों के द्वारा भारत के विरुद्ध सर्वे रिपोर्ट तैयार करवाकर लगातार भारत को पिछड़ा, भूखा, अविकसित और तकनीक विहीन घोषित करने की साजिश चलती रही, जिसे भारत कि सरकारें समझने में नाकाम रहीं हैं। परिणाम स्वरूप उन्हीं विदेशी संस्थानों से निकले हुए लोगों ने सबसे पहले भारतीय समाज पर अपने ज्ञान की धौंस को स्थापित किया तथा परंपरागत ज्ञान और तकनीक को पिछड़ा और गँवारू घोषित करने में लगे रहे। सरकारें और सरकारों में शामिल लोग बिना सोचे-समझे उनके सुझाओं को लागू करते रहे। उसी का परिणाम है रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक दवाइयों और विदेशी बीजों का बड़े पैमाने पर प्रयोग। इसका बेतहासा प्रयोग उदारीकरण के बाद देखने को मिला। उदारीकरण के बाद की भागमभाग में भारत में कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी का बड़े पैमाने पर निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के बाद हाईब्रिड प्रजातियों ने भारतीय बीजों को धीरे-धीरे नष्ट करते रहे। दुर्भाग्य है कि अभी तक इस दिशा में किसी भी तरह की स्थायी सरकारी योजना नहीं बनी है, जबकि आम जनमानस में जागरूकता आयी है लेकिन इस जनजागरुकता की सीधी टक्कर दुनिया की सबसे ताकतवर बीज कंपनियों से है। एक ओर पूंजीवादी समय की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और दूसरी ओर उनसे टक्कर लेते हुए असहाय छोटे किसानों का वित्त विहीन समुदाय। मजे की बात है कि देश के कोने कोने तक इन बीज कंपनियों की पहुँच हो गई है। इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर कंपनियों का जाल बिछ चुका है। मोनसेंटो इंडिया लिमिटेड, सिंजैंटा इंडिया लिमिटेड, पायनियर हाईब्रिड इंटरनेशनल इंक और बायर क्राप साइंस जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियां बीज कारोबार में पूरी तरह जड़ जमा चुकी हैं। बेल्जियम, अमेरिका और उत्तरी कोरिया समेत कई देशों की कंपनियों ने बीज क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक आंकड़े के मुताबिक हाल के वर्षों में बीजों के आयात में भरी वृद्धि हुई है। 2014-15 में 22,292 टन, 2015-16 में 23,477 टन और 2016-17 में 21,064 टन बीजों का आयात किया गया। इसमें से अधिकतर फल, फूल, सब्जियों आदि के साथ अनाज के बीज शामिल हैं।

इसके दुष्परिणाम को समझने के लिए विदर्भ की वर्तमान हालत सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। विदर्भ पारंपरिक ज्वार के लिए अनुकूल क्षेत्र रहा है जबकि पिछले कुछ समय से बीटी कपास और सोयाबीन की खेती सर्वाधिक हो रही है। इसी तरह मोटे अनाज, दलहन और तिलहन पर भी इसका असर हुआ है लिहाजा स्वावलंबी खेती लगभग मिटने के कगार पर पहुँच गई है। इसका कारण यह है कि विदर्भ में 56 प्रतिशत उथली मिट्टी है जो देशी कपास के लिए सर्वोत्तम है। देशी बीजों से ये फसलें कम पानी में भी पैदा हो जाती थीं। सूखे की स्थिति में भी कुछ उपज हो ही जाता था। लेकिन बीटी कपास और सोयाबीन ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया। बीटी कपास के महंगे बीजों से किसानों पर आर्थिक संकट का बोझ बढ़ गया। पहले सफेद सोना नाम से खूब बढ़ावा दिया गया जिसमें यह दावा भी था कि इससे इतना कपास पैदा होगा कि किसानों की आय में कईगुना वृद्धि हो जायेगी, साथ ही यह भी कहा गया कि इसमें कीट-पतंगों का प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन परिणाम सारे दावों के विपरीत आये। सैकड़ों सालों से संरक्षित देशी बीज लगभग समाप्त हो गये हैं और 95 प्रतिशत की हिस्सेदारी मोनसेंटों के बीजों का हो गया है। अपने बीजों को बचाने की दिशा में सरकार बहुत देर से सजग हुई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत राष्ट्रीय पौध आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो ने राष्ट्रीय जीन बैंक बनाया है, जिसके पास 1584 पौध प्रजातियों की 3,88,210 किस्में संरक्षित हैं। इन संरक्षित बीजों का उपयोग नए संकर किस्मों के विकास में हो रहा है। दुखद पहलू यह है कि इसकी गति बहुत धीमी है और इसकी चपेट में सिर्फ विदर्भ ही नहीं पूरा देश आ गया है, जिसके चंगुल से देश के किसानों को बाहर निकलना आसान नहीं है।

(19 अगस्त, 2018 के युगवार्ता में प्रकाशित)


पतंजलि फूड पार्क पर मेगा ड्रामा

 संतोष कुमार राय 

उत्तर प्रदेश का सरकारी तंत्र अपनी लचर कार्यशैली के लिए सुप्रसिद्ध है। इसबार इसका कोपभाजन बना पतंजलि फूड पार्क। पिछले मंगलवार को बाबा रामदेव के सहयोगी और पतंजलि एमडी आचार्य बालकृष्ण द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से नाराजगी व्यक्त करते हुए मीडिया को यह सूचना दी गई कि नोएडा में बनने वाले फूड पार्क को कहीं और स्थानांतरित किया जायेगा। यह सूचना उन्होने केंद्र सरकार के उस आदेश के परिप्रेक्ष्य में दिया जिसमें केंद्र सरकार ने मेगा फूड पार्क के लिए जून तक का समय दिया था। उन्होने ट्वीट से यह जानकारी साझा करते हुए लिखा, “आज ग्रेटर नोएडा में केंद्रीय सरकार से स्वीकृत मेगा फूड पार्क को निरस्त करने की सूचना मिली। श्रीराम व कृष्ण की पवित्र भूमि के किसानों के जीवन में समृद्धि लाने का संकल्प प्रांतीय सरकार की उदासीनता के चलते अधूरा ही रह गया। पतंजलि ने प्रोजेक्ट को अन्यत्र शिफ्ट करने का निर्णय लिया। आचार्य बालकृष्ण ने ट्विटर पर इसकी एक प्रतिकात्मक तस्वीर भी साझा किया।

दरअसल पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क का शिलान्यास यूपी की समाजवादी पार्टी की सरकार में नवंबर 2016 में किया था। इसे 1666.8 करोड़ रुपए के निवेश से तैयार किया जाना था। ये फूड पार्क 455 एकड़ में बनना है और ऐसा दावा किया गया था कि इसके शुरू होने के बाद 8 हजार से ज्यादा लोगों को सीधे तौर पर रोजगार मिलेगा। अब ग्रेटर नोएडा में बाबा रामदेव का समूह केंद्र की खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की महत्वाकांक्षी योजना के तहत मेगा फूड पार्क लगाना चाहता है। उसके लिए समूह के पास अलग से कोई 50 एकड़ जमीन नहीं है। वह उस 455 एकड़ जमीन में से करीब 50 एकड़ पर मेगा फूड पार्क बनाना चाहती है। जरूरी शर्तें पूरा करने वाले समूह को केंद्र की ओर से मेगा फूड पार्क के लिए 150 करोड़ रुपए की सब्सिडी भी देने की योजना है। पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क को यूपी सरकार की ओर से 455 एकड़ जमीन देने का फैसला कैबिनेट की बैठक में लिया गया था और संबंधित आदेश के मुताबिक जमीन पर पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क बनना है। ऐसे में उसी जमीन के एक हिस्से पर मेगा फूड पार्क बनाने के लिए केंद्र से जरूरी मंजूरी और सब्सिडी हासिल करने के लिए पतंजलि को यूपी सरकार से इस बाबत आदेश और स्वीकृति की जरूरत है। यानी यूपी सरकार को कैबिनट से नया प्रस्ताव पास कराना होगा कि पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क के 455 एकड़ में से करीब 50 एकड़ मेगा फूड पार्क के लिए दिए जाते हैं। पतंजलि समूह बीते सवा साल से इसी आदेश को पाने की कोशिश कर रहा था। 

(फोटो- आचार्य बालकृष्ण के ट्विटर से)

मंगलवार की देर रात पतंजलि आयुर्वेद के एमडी आचार्य बालकृष्ण के एक कड़े ट्वीट ने उसकी राह महज कुछ ही घंटों बना दी। हुआ यूं कि आचार्य बालकृष्ण के ट्वीट को मीडिया की सुर्खिया बनते देर नहीं लगी। उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद इसे सुलझाने की घोषणा किया, साथही उन्होने बाबा रामदेव से बात कर इसे तत्काल हल करने के लिए आश्वस्त भी किया। उसके बाद से ही यूपी के सरकारी तंत्र में अविश्वसनीय तेजी आयी। मेगा फूड पार्क के लिए अलग से जमीन दिए जाने का प्रस्ताव कैबिनेट की बैठक के लिए बनाया जा रहा है जिसे 12 जून की कैबिनेट बैठक में पास कराने की तैयारी है। जिसमें यमुना औद्योगिक प्राधिकरण क्षेत्र में यूपी सरकार की ओर से पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क के लिए आवंटित जमीन में से करीब 86 एकड़ जमीन को पतंजलि समूह की ही एक और कंपनी पतंजलि फूड प्रोडक्ट्स को मेगा फूड पार्क बनाने के लिए स्थानांतरित किया जायेगा, बसर्ते कोई नया कानूनी पेंच नहीं फंसा तो।

इस पूरे प्रकरण ने उत्तर प्रदेश को उद्यमियों के लिए आकर्षक स्थान बनाने और औद्योगीकरण के लिए हर मुमकिन सहूलियतें देने के योगी सरकार के दावों को मजबूत कर दिया है। योगी सरकार ने कुछ महीने पहले इन्वेस्टर्स समिट के जरिए यह माहौल बनाने में कामयाबी पाई थी कि यूपी की छवि बदलेगी। पतंजलि प्रकरण से उत्तर प्रदेश की कार्यसंस्कृति अभूतपूर्व बदलाव और तेजी देखने को मिली है। प्रदेश के विकास और औद्योगीकरण के लिए इसे एक सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए।

(17 जून, 2018 के युगवार्ता में प्रकाशित) 

सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...