सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय 

उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजनागत निर्णय के बावजूद प्रशासन की नाकामी कहें या साजिश कहें, इसका लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है. हालिया मामला जो संज्ञान में आया है वह पिछले साल के  बाढ़ राहत का है. दरअसल यह मामला सामने तब आया जब पिछले साल के बाढ़ राहत का पैसा कुछ लोगों के खाते में आया. पिछले साल इसी समय पूर्वांचल के गंगा नदी के करीबी क्षेत्रों में बाढ़ आयी थी जिसमें बड़े पैमाने पर किसानों का नुकसान हुआ. सरकार की ओर से हरसंभव तात्कालिक सुविधाएँ मुहैया कराई गईं. उस समय भी सरकारी मदद में प्रशासनिक वर्ग अनेक तरह से भ्रष्टाचार करने की कोशिश में लगा रहा और जहाँ तक संभव था किया भी. तात्कालिक मदद का लाभ इसलिए लोगों को मिल गया क्योंकि उसमें प्रशासन वर्ग के लाभान्वित होने की भी भरपूर गुंजाईश थी. 

यह पूरा मामला फसल नुकसान पर मिलने वाले मुआवजे का है. कायदे से यह मुआवजा पिछले साल अक्तूबर-नवंबर तक मिल जाना चाहिए था, जिससे किसान अपनी अगली फसल की बुआई में इसका उपयोग करते. लेकिन उस समय यह किसानों को नहीं मिला. एक साल बाद जब इसकी जानकारी हुई तो पता चला कि पूर्वांचल की एक ग्राम पंचायत में लगभग 10 हजार से अधिक किसान हैं जो बाढ़ प्रभावित थे, जिनमें से सिर्फ डेढ़-दो सौ लोगों को बाढ़ राहत की राशि निर्गत की गई है. इस संबंध में जब तहसील मुख्यालय से और लेखपाल से जानकारी लेने की कोशिश हुई तो उसने बड़े सरल तरीके से कह दिया गया कि पैसा वापस चला गया. लेकिन इसकी जिम्मेदारी किसकी है यह तय करने वाला कोई नहीं है. क्या इसके लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या सरकार की ओर से मिलने वाले लाभ को लोगों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी तय नही होनी चाहिए? हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि इससे प्रभावित होने वाला वह वर्ग है जो किसी का विरोध भी नहीं कर सकता. वह मायूस होने के सिवा और कुछ भी नहीं कर सकता.

दरअसल यह एक नमूना है जो हम सभी के संज्ञान में आ गया. इस सन्दर्भ में मुझे धूमिल की एक कविता की एक पंक्ति याद आ रही है जिसमें उन्होंने लिखा है कि कुर्सियां वही हैं, बस टोपियाँ बदल गई हैं’. यह पंक्ति आज की प्रशासनिक स्थिति पर एकदम सही बैठती है. सरकार बदली लेकिन प्रशासनिक वर्ग के कार्य करने का तरीका नहीं बदलता. विश्व के समानांतर विकास का सपना देखने वाले लोगों के लिए यह सबक है यदि भारतीय प्रशासन की ऐसी ही कार्यशैली रही तो विकास के सपने को तिलांजलि दे देनी चाहिए. उत्तर प्रदेश की सरकार जिस मानसिकता और लगन से काम कर रही है उसे धरासायी करने का काम यही वर्ग कर रहा है. यदि सरकार को वास्तव में किसानों की भलाई करनी है तो प्रशासनिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में सरकार पर इसका असर पड़ सकता है.

योगी सरकार ने जिस संजीदगी से प्रदेश के विकास और आम जन की रक्षा के लिए काम किया है वह सराहनीय है. जिस तरह से योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का संकल्प लिया है वह अत्यंत प्रसंशनीय है लेकिन सरकार लाख कोशिश के बावजूद प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुई है. बाढ़ राहत का मामला सिर्फ एक उदहारण है. ऐसे न जाने कितने मामले हैं जिनके साथ प्रशासन मनमानी करता रहा है. यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इस तरह की चीजें सामने आ रही हैं. इससे पहले की सरकारों में भी यही स्थितियां रही हैं. वही आदत अब भी बनी हुई है. इस तरह के मामले जो जनता से सीधे तौर पर जुड़े हो, उनका त्वरित समाधान होना चाहिए जिससे सरकार के विरुद्ध एंटी इनकम्बेंसी न फैले. साथ ही सरकार की योजनाओं का लाभ उन लोगों को सही समय से मिले जो वास्तव में इसके हकदार हैं.  

(7 सितंबर, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


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