सोमवार, 4 दिसंबर 2017

कृषक जीवन संघर्ष और आत्महत्या

संतोष कुमार राय
2 दिसंबर के राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप) में प्रकाशित 

          पिछले लगभग बीस वर्षों से भारत में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी अमले के संज्ञान  में होने के बावजूद आत्महत्याओं का सिलसिला घटा नहीं है। आंकड़ों को सरकारी बाबुओं द्वारा छोटा-बड़ा किया जाता रहा है, लेकिन अभी भी किसानों की मूल समस्या, जो आत्महत्या का मुख्य कारण बनती रही है, किसी स्थाई निदान की ओर बढ़ती नजर नहीं आ रही। अब सवाल यह है कि आखिर वह कौस से कारण हैं जिनका निदान नहीं हो सकता या जो अभी तक किसानों की एक बड़ी आबादी को इसमें धकेल चूके हैं ? क्या सरकारी स्तर पर इसकी जवाबदेही बनती है या नहीं ? और यदि बनती है तो उसका क्या स्वरूप है तथा इस ओर अभी तक किस तरह के प्रयास हुए हैं?
आत्महत्या के प्रमुख क्षेत्र और स्थिति
दरअसल सबसे पहले किसानों की आत्महत्या की खबरें 1997-98 में विदर्भ से आयीं, जो कि महाराष्ट्र का एक हिस्सा है। उसके बाद बुंदेलखंड, आंध्र और तेलंगाना से। हालांकि 97 से अब तक किसानों के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएँ भी बनाई गईं, जिनमें कर्जमाफ़ी, सिंचाई, फसल बीमा और मूल्य निर्धारण आदि। इन सबके बावजूद जमीनी सच्चाई यही है कि अभी भी किसानों की आत्महत्या पूरी तरह रुकी नहीं है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में आत्महत्याओं को रिकार्ड में दर्ज किया गया, जिसके अनुसार 1997-98 में छह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2006 से 2008 के बीच पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि इन घटनाओं में हुई। 2012 से आंकड़ों के स्वरूप में कुछ गणितीय बदलाव कर दिया गया है, लेकिन किसानों की आत्महत्या न तो कम हुई है और न ही बंद हुई है। इन आत्महत्याओं के रिकार्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रोत हैं, जो किसी वर्ष संख्या बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों के अनाथ बच्चों की चीत्कार न गूंजती हो।
चिंताजनक स्थिति
एक चिंताजनक बात यह देखने में आयी है कि आज से बीस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनकी भावी पीढ़ी भी उसी राह पर जाने को मजबूर है। किसान व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करने को अभिशप्त हैं। जबकि हमारा समाज आज एक भी ऐसा ठोस कदम बता पाने की स्थिति में नहीं है जो इस पीढ़ी के लिए किया हो। दूसरों का भरण करने वाले आज जिस तरह से दुनिया छोड़ रहे हैं वह किसी भी सभ्य और विकसित समाज के लिए कलंक से कम नहीं है। यह भी विचारणीय है कि जिन किसानों ने अत्महत्या कर लिया उनके बच्चों और विधवाओं के लिए सरकारी स्तर पर अभी तक कोई भी ऐसा प्रयास नहीं किया गया जिससे उनका भरण-पोषण हो सके। यह नैतिक पतन, अमानवीयता और संवेदनाहीनता की  पराकाष्ठा है।
प्रमुख कारण : सरकारी कर्ज या निजी कर्ज         
किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदाएं तथा फसल नुकसान। कर्ज की व्याख्या सरकारी अमला अपने तरीके से करता रहा है। दरअसल किसानों द्वारा लिया जाने वाला कर्ज का बड़ा हिस्सा गैर सरकारी है जो सरकारी तंत्र की आड़ में बिकराल रूप धारण कर चुका है। यदि इस पूरे प्रकरण को विदर्भ के संदर्भ में देखा जाय तो स्थिति साफ हो जायेगी। विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण कृषि पैदावार में होने वाली कमी, प्रकृतिक आपदाएँ, खराब बीज और उर्वरक की उपलब्धता है। साथ ही वह कर्ज, जिसे किसान अच्छी फसल की उम्मीद में लेता है लेकिन नुकसान होने पर ब्याज के नाम पर निरंतर चुकाने के लिए अभिशप्त हो जाता है और मूलधन यथावत बना रहता है। दरअसल विदर्भ में निजी तौर पर दिया जाने वाला ऐसा कर्ज बड़े व्यवसाय के रूप प्रशासन की नाक के नीचे चोरी-छुपे खूब फल-फूल रहा है। इसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है। लिहाजा एक बड़ा वर्ग किसानी छोड़ रहा है। उसकी बजाय वह शहरी मजदूरी को अच्छा समझता है जो कहीं से भी उचित नहीं है। आने वाले समय के लिए यह एक नये संकट की आहट है।
          कुछ दिन पहले एक किसान ने तीस हजार रुपये का कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर लिया। सवाल उठा कि इतनी सी रकम के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा। लेकिन जब उसकी पड़ताल हुई तो पता चला कि उसने तीन साल पहले कपास की फसल बर्बाद होने पर जो कर्ज लिया था बाद में खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा लेकिन मूलधन जहां का तहां बना रहा। बराबर ब्याज चुकाते रहने से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा गया। यहाँ तक तो ठीका था लेकिन उसके लिए जो बात सबसे अधिक परेशान करने वाली वह यह कि ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से सेठ पैसा मांगने घर आ गया और पूरे गांव के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को भला-बुरा कहने लगा। किसान को इसका पता चला तो उसने खेत पर ही आत्महत्या कर ली। आम नागरिक के लिए यह बहुत बड़ी बात नहीं होगी लेकिन किसान समाज के लिए इससे बड़ी बात नहीं हो सकती। सारी लड़ाई मर्यादा की रक्षा की है। इसे समझने की जरूरत है कि जिस देश का किसान मर्यादा विहीन हो जाएगा वह देश मर्यादित कैसे हो सकता है। दूसरा एक बड़ा कारण विदेशी कंपनियों के बेतहासा शोषण का भी है। समान्यतः देशी बीज और खाद के स्वरूप को कुछ देशी और कुछ विदेशी कंपनियों ने खत्म कर दिया। अब किसानों के सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि उन्हे हर साल नए बीज खरीदने होते हैं जिसमें एक बहुत बड़ी रकम की आवश्यकता होती है और कर्ज का किस्सा असल में यहीं से शुरू होता है। दूसरा बड़ा कारण है जमाखोरी का, जिसमें किसानों के उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिलता और कई बार तो उतना भी नहीं मिलता जितनी उनकी लागत होती है। उदाहरण के लिए प्याज को देखा जा सकता है। अनेक ऐसे किसान है जिंहोने प्याज 2 रुपये किलो की दर से बेचा जो आज 60 रुपये की दर से मिल रही है। सरकार की ओर से इसकी व्यवस्था नहीं होगी तो किसान मरेगा ही। आर्थिक संरक्षण के नाम पर किसानों के लिए किसी आयोग की सिफारिश नहीं की जाती। ऐसे में क्या उन्हें अपनी पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना चाहिए? इस सवाल का जवाब कौन देगा? सरकार या किसान। सच यह है कि सरकार ने किसानों के लिए अब तक जो कुछ किया है, उसकी तुलना में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

          यदि कृषि क्षेत्र उपेक्षित होगा और किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो शेष आधुनिकता और विकास का कम से कम उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा जिनका जीवन कृषि आधारित है। उन्हीं का क्यों, हम सभी का क्यों नहीं। ऐसा कौन है जिसका जीवन कृषि आधारित नहीं है। यह चिंता सिर्फ किसानों की नहीं है, बल्कि यह चिंता हम सभी की है। किसान नहीं रहेंगे तो हम नहीं रहेंगे। इस बात को अपने दिल-दिमाग में बैठना होगा। किसानों पर एहसान करने की कत्तई जरूरत नहीं है। अपने जीवन के लिए उन्हें बचाने की जरूरत है। जिस तरह से हमें स्वस्थ रहने के लिए पर्यावरण की जरूरन है उसी तरह जिंदा रहने के लिए किसान की जरूरत है। किसान खुशहाल हों और कृषि संस्कृति को बल मिले, तभी विकास की असल अर्थवत्ता सिद्ध होगी। 

भारतीय चिकित्सा प्रणाली को पुनर्जीवन


सन्तोष कुमार राय


          ‘आजादी के बाद जरूरत थी जो था उसे संरक्षित किया जाय, जहां जरूरी हो परिवर्तन किया जाय यह वक्तव्य पिछले 17 अक्टूबर को अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने दिया। यह वाक्य आज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक और अनुकरणीय है जितना आजादी के बाद था। फिर इसका निहितार्थ क्या था? प्रधानमंत्री द्वारा कही हुई इस बात का अतीत से कोई जुड़ाव था क्या ? वास्तव में यह पड़ताल का विषय है। आयुर्वेद भारतीय समाज के लिए सिर्फ एक चिकित्सा पद्यति मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, जीवनशैली और भारतीय मेधा का अहम हिस्सा है। फिर भी उसके विकास और उत्थान में अभी तक कांग्रेसी सरकारें हिला-हवाली क्यों करती रहीं हैं, यह समझ से परे है। यही वह चिकित्सा पद्यति है जो भारतीय प्रकृति, पर्यावरण, परिवेश और जीवन के अनुकूल विकसित हुई थी, लेकिन दुर्भाग्य की छाया में इसका बहुत कुछ विलीन हो गया, बावजूद इसके अभी भी बहुत कुछ है जिसे संरक्षित और संवर्धित करने का एक सराहनीय प्रयास अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के रूप में हुआ है।
          जैसा कि किसी भी नये संस्थान की स्थापना के उद्देश्यों में राजनैतिक मंशा का बहुमूल्य योगदान होता है, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की स्थापना में भी इसकी कमतर भूमिका नहीं है। अक्सर सरकारें बदलती हैं तो पिछली सरकार की योजनाओं का विकास या तो अवरुद्ध हो जाता है या फिर उसकी गति धीमी हो जाती है, जिससे स्थापना की लंबी अवधि की कहानी तैयार होती है। कुल मिलाकर अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान भी इन अग्नि परीक्षाओं से गुजरने के बाद अब अपने संपूर्णता और व्यवस्थित स्वरूप में आम जन की सेवा के लिए शुरू हो गया है।
परिकल्पना से स्थापना तक
          अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान से पहले इसका स्वरूप एक आयुर्वेद अस्पताल बनाने का था, जिसका प्रस्ताव 2002 में एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी द्वारा लाया गया था। इसकी परिकल्पना आधुनिक सुविधाओं से संपन्न अस्पताल खोलने की थी, लेकिन बीएचयू जयपुर और जामनगर आयुर्वेद चिकित्सालयों को ध्यान में रखते हुए सहमति नहीं बन पायी। उसके बाद एक ऐसे संस्थान की परिकल्पना प्रस्तुत की गई जो अस्पताल के साथ-साथ एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से संपन्न अकादमिक और शोध संस्थान के रूप में विकसित हो। इस पर आम सहमति के बाद निर्माण का स्वरूप तैयार हुआ, जिसके कुछ दिन बाद ही सरकार बदल गई और सत्ता एनडीए से यूपीए के हाथों में आ गई। इस संस्थान के संबंध में यह सिर मुड़ते ओले जैसी स्थिति बन गई जिसे किसी भी सरकार के शासन काल में नहीं होना चाहिए था, क्योंकि इसका सीधा संबंध जनता से था। ऐसा भी नहीं था कि यूपीए के शासन में नई संस्थाओं का निर्माण नहीं हुआ या यह एकलौती संस्था थी जिसका खर्च वहन कर पाना सरकार के लिए बहुत भारी पड़ सकता था। अनेक संस्थाएं बनीं लेकिन अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान लंबे समय तक परिकल्पना के गर्भ में ही पड़ा रहा। ऐसी स्थिति में यूपीए सरकार की मंशा पर, उसकी कार्यशैली पर और उसके भेदभाव पूर्ण नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर वह कौन सी मजबूरी थी जिसके कारण यूपीए-1 के पाँच वर्ष के शासन काल में इस संस्थान को खड़ा नहीं किया जा सका? इसका सीधा मतलब यह भी हो सकता है कि कहीं न कहीं यूपीए और कांग्रेस सरकार को अँग्रेजी की विदेशी कंपनियों को लगातार लाभ पहुँचाते रहने की प्रतिबद्धता रही होगी। इसका यह भी मतलब हो सकता है कि इस संस्थान के बनने से भारतीय चिकित्सा प्रणाली पुनर्जीवित हो सकती थी जिसे कुछ समय के लिए ही सही रोक कर रखा जाय। लेकिन यूपीए-2 के शासनकाल में सरकार का सुस्त ही सही एक सकारात्मक कदम आगे बढ़ा। 2012 में डॉ अभिमन्यु कुमार को इसका निदेशक नियुक्त किया गया। जहाँ से इसके निर्माण की वास्तविक और जमीनी शुरुआत हुई। क्योंकि वास्तविकता यही है कि इसके लिए 2004 से पहले जो कार्य हुआ उसमें 2012 तक कोई विशेष प्रगति नहीं हुई और न ही इसे स्थापित करने में किसी ने विशेष रुचि दिखाई। 2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद इसे और गति मिली जिसके परिणाम के रूप यह संस्थान आज हमारे सामने है।
आयुर्वेद की आवश्यकता क्यों ?
          आयुर्वेद का सीधा संबंध पर्यावरण और प्रकृति से है। इस पद्यति की औषधियों का मूल आधार प्रकृति और वनस्पतियाँ हैं। भारत की बनावट और प्रकृति निर्भरता के अनुकूल इसका विकास हुआ है। प्रदूषण के भयावहता के बीच में शरीर को बिना किसी आंतरिक और अतिरिक्त क्षति पहुंचाए यह अनेक असाध्य और सामान्य बीमारियों से स्थायी रूप से मुक्त करता है। ऐसी उपचार विधि किसी भी अन्य चिकित्सा पद्यति में अभी तक उपलब्ध नहीं है। इसका दूसरा पहलू यह है कि उयाह पूरी तरह भारतीय जमीन पर आसानी से उपलब्ध और निर्मित औषधि है। यही कारण है कि इसकी कीमत अन्य की अपेक्षा बहुत कम है।
अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान का स्वरूप और चिकित्सा सुविधाएं
          इस संस्थान के संबंध में निदेशक डॉ अभिमन्यु कुमार ने इसका विस्तृत और अखिल भारतीय स्वरूप का खाका सामने रखा जो वाकई भारत को नवजीवन देने जैसा है। अखिल भारतीय स्वरूप से पहले यह संस्थान लिटमास टेस्ट साबित होगा कि वास्तव में सरकार इसका किस रूप में विस्तार करे। वैसे प्रधानमंत्री ने अपनी इच्छा जरूर व्यक्त किया कि आयुर्वेद का हास्पिटल प्रत्येक जिले मे होना चाहिए। डॉ कुमार ने दिल्ली के सरिता विहार स्थित इस संस्थान के निर्माण पहले चरण के कार्यों का विस्तृत विवरण दिया, जिसमें परिसर का स्वरूप, मुख्य रूप से पंचकर्म और प्रतिदिन की नैदानिक सुविधाएं (ओपीडी) हैं। इसके साथ ही इसमें अकादमिक और शोध का एक विस्तृत और व्यवस्थित पक्ष शामिल है जो न सिर्फ अखिल भारतीय है बल्कि इसका ढांचा अंतरराष्ट्रीय रखा गया है, जो आयुर्वेद में रुचि रखने वाले दूसरे देशों के लिए भारत के प्रति बड़े आकर्षण का केंद्र बन रहा है।
          यह संस्थान 10 एकड़ के परिसर में अवस्थित है जिसमें से पाँच एकड़ में पहले चरण का कार्य पूरा हो गया है शेष पाँच एकड़ के भवन निर्माण की प्रक्रिया में हैं। इसके स्वरूप को अन्य संस्थानों से अलग रखा गया है जिसके मुख्यतः तीन पहलू हैं। पहला अकादमिक, दूसरा पेसेंट केयर और तीसरा रिसर्च है। अकादमिक के अंतर्गत देश के विभिन्न लगभग तीन सौ से अधिक अंडरग्रेजुएट आयुर्वेद कालेजों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए यह पोस्ट ग्रेजुएट और रिसर्च को तरजीह दी गई है। पोस्टग्रेजुएट में कुल 13 विशेषज्ञता विभाग हैं जिनमें अभी कुलमिलकर 56 विद्यार्थियों के प्रवेश की जगह बनाई गई। वहीं रिसर्च यानी पीएच.डी. में अभी 26 सीटों दाखिला की प्रक्रिया चल रही है जिसका निकट भविष्य में विस्तार किया जाना है। 200 बेड का यह हास्पिटल तमाम सरकारी हास्पिटलों की अवधारणों से कहीं अलग अपनी नयी पहचान और आमजनमानस में विश्वास जगाने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। 18 ओपीडी हैं, जिनमें कुछ स्पेशल और कुछ सुपर स्पेशल सुविधाओं से संपन्न हैं। जैसे डाईबीटीज़, न्यूरोमेटोलोगी, चाइल्डमेंटल, कंप्यूटर विजन सिंड्रोम जैसी आधुनिक बीमारियों पर विशेष ध्यान दिया गया है। फिलहाल ओपीडी में प्रतिदिन एक हजार से अधिक मरीज आ रहे हैं जो किसी भी नये संस्थान के लिए शुभ संकेत है। शोध और गुणवत्ता पूर्ण सुविधाओं की दृष्टि से आयुर्वेद में अनेक संभावनाएं हैं, जिसके लिए यह संस्थान न सिर्फ भारत के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। अभी तक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ आयुर्वेद और योग को लेकर सहमति बनी है, जैसे यूरोपियन एकेडमी फॉर आयुर्वेद जर्मनी, मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान दिल्ली, एम्स दिल्ली तथा आईसीएमआर प्रमुख हैं। 

          इस संस्थान के अखिल भारतीय स्वरूप के स्थापित होने में कुछ बाधाएँ भी हैं। स्वाभाविक है कि किसी भी संस्थान की स्थापना और विस्तार में होती ही हैं। लेकिन यदि सरकार इसके स्वरूप को विस्तार देने की ओर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त कर रही है तो इसमें संदेह नहीं कि आने वाले समय में आयुर्वेद भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना के रूप में दिखाई देगा। इसके लिए आवश्यक है कि इसकी स्वायत्तता को और बढ़ाया जाय, क्योंकि अभी तक यह संस्थान आयुष मंत्रालय के अधीन है। साथ ही इससे सरकारी हस्तक्षेप से जितना हो सके बचाया जाय जिससे यह अपनी वांछित प्रगति कर सके और इसका उपयोग व्यापक जन समुदाय को स्वस्थ रखने में हो सके। 

सिनेमा मनोरंजन मात्र नहीं


          संतोष कुमार राय

          पद्मावती पर बनी फिल्म को लेकर जैसा विवाद चल रहा है यह किसी भी समाज, देश, कला, कलाकार और उद्योग के लिए कहीं से भी ठीक नहीं है। फिर भी विवाद है तो उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता, बल्कि उसकी वास्तविकता और विवाद में आने वाले लोगों की अपेक्षाओं को समझना चाहिए। ऐसा क्यों है कि एक सामान्य सी फिल्म को लेकर आम जनमानस का एक बड़ा हिस्सा नाराज है? यदि ठीक से इसे समझा जाये तो ये वही लोग हैं जिनके प्रेम, लगाव और आकर्षण से भारतीय फिल्म उद्योग आज बुलंदियों पर है। क्या उस समाज की बातों को नजरंदाज करना और अपनी बातों को जबरन थोपना किसी भी कलाकार और फिल्मकार के लिए ठीक है? कला और कलाकार का सम्मान ईश्वरीय तत्त्व के समकक्ष होता है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में आज ढाई हजार वर्ष पूर्व इसकी सम्यक और समृद्ध व्याख्या हुई है। फिर ऐसा क्या है जिसको लेकर आम जनमानस के मन में फिल्मों के प्रति इस तरह का क्षोभ और आक्रोश पैदा हो रहा है? यह अनायास तो बिलकुल नहीं है। यदि सिनेमा को सिर्फ उद्योग और मनोरंजन की दृष्टि से देखें तो इस तरह का विरोध किसी भी उद्योग के लिए शत-प्रतिशत गलत है। लेकिन जैसे ही सिनेमा की सामाजिक और राष्ट्रीय पक्षधरता पर ध्यान जाता है इस तरह का विरोध एकदम सही लगने लगता है।
          दरअसल आज सिनेमा, और न सिर्फ सिनेमा बल्कि धारावाहिक भी जहाँ खड़ा है, अब वह सिर्फ उद्योग नहीं है। उसका दायरा बढ़ा है और बहुत अधिक बढ़ा है। अब भारतीय सिनेमा सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक हो गया है। जब किसी भी सार्वजनिक प्रभाव के माध्यम का दायरा बड़ा हो जाता है तो उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी बड़ी हो जाती है। सिनेमा देखने वाले सभी लोगों को मध्यकालीन इतिहास का ज्ञान नहीं है। उन्हें वे तथ्य मालूम नहीं हैं जिनके साथ भारत की अस्मिता जुड़ी हुई है। उन्हें मुसलमान शासकों की क्रूरता का एहसास नहीं है। उन्हें यह पता नहीं है कि भारतीय मध्यकाल में भारत के लोगों को किस तरह के अपमान के घूंट पीने पड़े थे। ऐतिहासिक फिल्में बनाना बहुत अच्छी बात है लेकिन फिल्मों के अनुसार इतिहास को बना लेना थोड़ा असंगत है। अनेक फिल्में इतिहास की कथाओं को लेकर बनीं हैं और अनेक धारावाहिक भी बने हैं लेकिन उसके समझदार लेखकों ने अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार कथाओं को ले लिए बाकी सारे पात्रों और दृश्यों को फिल्म की आवश्यकता के अनुसार काल्पनिक बना लिया। कई ऐसी भी फिल्में और अनेक धारावाहिक भी बने हैं जो इतिहास और मिथकों के वास्तविक स्वरूप को ही स्थापित किए हैं और उनका बहुत सम्मान हुआ है। महाभारत और रामायण इसके प्रमुख उदाहरण हैं। फिल्मों में 1857 को लेकर कई फिल्में बनी, इतिहास के एक समय के आधार पर उमराव जान बनी, मुगले आजम, भगत सिंह और भी अनेक नाम हैं।   
          वास्तविक मुद्दा फिल्म उद्योग की जवाबदेही से जुड़ा है, जिसे फ़िल्मकारों और फिल्म लेखकों को गंभीरता से समझना होगा।उसका प्रमुख कारण है कि आज की पीढ़ी इन फिल्मों में दिखाये गए स्रोतों को वास्तविक मानती है और उसी के आधार पर अपनी धारणा बनाती है।  एक समय में सामाजिक विश्वास का सबसे बड़ा स्रोत वेद हुआ करता था। यदि वेद में  किसी बात का उल्लेख किया गया है तो वह अकाट्य और अतर्क्य है। इसके पीछे कोई प्रतिबंध नहीं बल्कि आस्था और विश्वास था। आधुनिक काल में समाचार पत्रों ने आम जनमानस के विचारों में ऐसी ही जगह बनाई। कोई भी सूचना यदि समाचार पत्र में प्रकाशित हो गई तो वह सही मानी जाती थी। आम आदमी के लिए वह विचारों के निर्माण और पक्षधरता का प्रमुख स्रोत होता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। क्योंकि समाचार माध्यमों और स्रोतों की बेतहासा वृद्धि और आपसी होड़ ने उसकी विश्वसनीयता को बुरी तरह प्रभावित किया है।

          इसी तरह फिल्में आज सिर्फ संदेश तक सीमित नहीं हैं बल्कि आज की पीढ़ी पर उनका प्रभाव बहुत गहरा पड़ रहा है। खासकर जब भारत के इतिहास, मिथक, संस्कृति और सभ्यता को केंद्र में रखकर फिल्में बनती हैं तो फ़िल्मकारों की ज़िम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि फिल्म देखने वाली पीढ़ी की धारणा और उसको प्राप्त होने वाले तथ्य और संदेश का दूरगामी परिणाम हो सकता है। फिल्म जगत की आज बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वे आम जनमानस को भारत के गौरव से परिचित कराएं, उन्हें दिखाएँ कि हमारा गौरवशाली इतिहास क्या रह है। इठस के प्रेरक प्रसंगों को उनकी सकारात्मकता में जनता के सामने लाएँ। अपनी संस्कृति और सभ्यता को छिन्न-भिन्न करना कहीं से भी फिल्मों के लिए और उसके दर्शक वर्ग के लिए उचित नहीं होगा। फिल्में अब सिर्फ व्यवसाय और मनोरंजन नहीं हैं। इसकी गंभीरता को फिल्म बनाने वाले और उसका विरोध करने वाले दोनों को समझना होगा। पद्मावती में कहीं न कहीं बड़ी चूक हुई है। जिसे यदि सुधार लिया गया होता तो शायद यह बखेड़ा ऐसा नहीं होता बल्कि संजय लीला भंसाली की सकारात्मक लोकप्रियता और बढ़ जाती। 

पराली का हो वैकल्पिक उपयोग


संतोष कुमार राय

          प्रदूषण की समस्या दिल्ली और आसपास के इलाकों में जिस तरह धुंध और धुएँ के रूप में फैली है, जिसे स्मोग के नाम से जाना जा रहा है, वह अनायास नहीं है। यदि इसका उचित समाधान नहीं हुआ तो आने वाले समय में यह और खतरनाक रूप ले सकती है। दरअसल इसका सबसे बड़ा और खतरनाक कारण पराली को खेतों में जलाना और उससे निकलने वाला धुआँ है। जहाँ भी धान की खेती हो रही है, वहाँ और उसके आस-पास के इलाकों के लिए यह एक विकट समस्या का रूप ले रहा है। अब चिंता की बात यह है कि इसका समाधान क्या है? कैसे इससे निजात मिलेगी? सरकार और कृषक दोनों के स्तर पर इसका संयुक्त समाधान क्या हो सकता है? इस तरह के कई सवाल हैं जो इससे जुड़े हैं और हमारे जीवन से भी जुड़े हैं।
            दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में फैली धुंध पर जैसा हो हल्ला हो रहा है वह वास्तविक समस्या की जड़ में पहुँचने की बजाय बेमतलब शोर है। राज्यों की तू-तू मैं-मैं और दोषारोपण से सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और गैर ज़िम्मेदारी को समझा जा सकता है। क्या यह पूरा सच है कि शहरों में चलने वाले वाहनों और उनकी बेतहासा बढ़ती हुई संख्या ही केवल जिम्मेदार है ? जिसे लेकर दिल्ली सरकार पिछले वर्ष के नाटक को इस वर्ष भी दोहराना चाहती थी। असल में यह एक दिल्ली सरकार का नाटक और ढोंग है जो उसका सरकारी स्वभाव बन गया है। किसी भी समस्या की गंभीरता को समझे बिना उस पर इवेंट करना, उसे उत्सवी रूप देना एक तरह की नकारा मानसिकता की पहचान है।
            दिल्ली वालों के लिए साफ हवा, साफ पानी और साफ वातावरण की महती जरूरत है, क्योंकि दिल्ली माननीयों का शहर है। अब समय ने यह संकेत दे दिया है कि माननीयों को भी दिल्ली के बाहर देखना होगा और समय रहते बाहर वालों के विषय में सोचना होगा। दिल्ली में अन्य जगहों की तरह खेती किसानी नहीं होती, लेकिन जहां खेती होती है, वहाँ का धुआँ दिल्ली के जीवन को दमघोंटू बना रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला दिल्ली की सघनता, जिसमें ऊंचे-ऊंचे भवनों के कारण हवा की गति अवरुद्ध हो जाती है। दूसरा सघन बसावट और पेंड-पौधों की कमी की वजह से यह अधिक देर तक वातावरण में रुका रहता है। दिल्ली से सटे अन्य क्षेत्रों में धुआँ ज्यादा देर तक नहीं टिकता क्योंकि वहाँ की हवा साफ है और उसमें आक्सीजन की मात्रा अधिक है, पेड़-पौधे अधिक हैं तथा ग्रामीण आबादी की सघनता कम है, जबकि दिल्ली-एनसीआर की सघनता वहाँ की अपेक्षा कई गुना अधिक है, साथ ही यहाँ की हवा में औद्योगिक और वाहनों से निकलने वाली अनेक जहरीली गैसों का प्रभाव भी बहुत अधिक है। दिल्ली के लोगों को यह सोचना पड़ेगा कि बाहर का धुआँ जहां से पैदा होता है उसकी समुचित और स्थायी व्यवस्था की जाय, जो आर्थिक दृष्टि से भी किसानों के लिए लाभकारी हो। तभी इससे निजात मिलेगी।  
            अब इसका समाधान क्या हो सकता है? या तो किसानों पर पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया जाय, जो नितांत अस्वाभाविक और तानासाही आदेश होगा। दूसरी बात यह कि यदि सरकारी तंत्र ने ऐसा कर भी दिया तो इसका सीधा असर कृषि उत्पाद पर पड़ेगा, जो इससे भी अधिक खतरनाक हो सकता है। वास्तव में समस्या की जड़ में किसानों की स्थिति है। आज की खेती का अधिकांश मशीनों से हो रहा है। लिहाजा पराली जैसे अनेक कृषि अपशिष्टों की जरूरत बहुत कम रह गई है। दूसरी ओर किसान को दूसरी फसल के लिए खेत को जल्द से जल्द खाली करना होता है इसलिए उसके सामने जलाने के सिवा कोई दूसरा आसान विकल्प नहीं ही। पहले पराली का उपयोग पशुओं के चारे के लिए होता था। कृषि मजदूरों की उपलब्धता अधिक थी इसलिए यह बहुत आसान होता था। आज वैसी स्थिति नहीं है। अब पराली को किसी नए उत्पाद के रूप में उपयोगी बनाना होगा जिससे कुछ धनोपार्जन भी हो।

            इसके दो रास्ते हैं—पहला सभी तरह के कृषि उत्पादों से कोयला बनानाऔर दूसरा इससे प्लाई बनाना तथा इसके उपयोग को बढ़ाना। इसका सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण के लिहाज से है और यह दो तरह का है। उद्योगों को चलाने के लिए जो कोयला उपयोग होता है उसके खनन में कमी आयेगी, जिससे हमारी खनिज सम्पदा लंबे समय तक सुरक्षित रहेगी और यह पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा सिद्ध होगा। इसका दूसरा लाभ यह होगा कि जो धन खदानों से कोयला निकालने में खर्च होता है उसका बेहतर उपयोग कृषि अपशिष्ट से कोयला बनाने में किया जाय तो इसका सीधा-सीधा आर्थिक लाभ किसानों और खेतिहर मजदूरों को मिलेगा। शहरों और औद्योगिक इकाइयों पर दिनोंदिन बढ़ने वाला बोझ भी कम होगा। उदाहरण के लिए नारियल के अपशिष्ट से बनने वाले कोयले को देखा जा सकता है जो अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में निर्यात होता है। दूसरा धन की भूसी का कोई उपयोग नहीं होता था लेकिन आज धान की भूसी से तेल निकलता है और उसकी अच्छी कीमत मिलती है। इस प्रकार पर्यावरण और कृषि के अनुकूल सरकार को ध्यान देना होगा तभी मुकम्मल समाधान निकल सकता है। बिना किसी व्यस्थित समाधान के इससे मुक्त होना लगभग असंभव है।  

गाय से क्यों दूर हुए किसान ?


सन्तोष कुमार राय

          आज यह कहना कि गाय भारतीय संस्कृति और सभ्यता में महत्वपूर्ण स्थान रखती है न सिर्फ आज के समय के लिहाज से अप्रासंगिक लगता है बल्कि जमीनी सच्चाई को देखने पर हास्यास्पद भी लगता है। किसी भी संस्कृति और सभ्यता का निर्माण उस समुदाय के रहन-सहन और जीवन निर्वाह से होता है। जीवन निर्वाह के तौर-तरीकों और संसाधनों का निरंतर विकास ही संस्कृति और सभ्यता का रूप ले लेता है। गाय मानव जीवन के निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन और संसाधन थी। गाय का या गो वंश का संबंध धर्म, संस्कृति और सभ्यता से जोड़ना बिना मतलब पांडित्य प्रदर्शन का एकालाप है। गाय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा है या नहीं है इसका आज के किसान जीवन से बहुत अधिक लेना देना नहीं है। आखिरकार यह नौबत क्यों आ गई कि जिनकी गाय थी, जो गाय पर ही आधारित थे, जिनका जीवन गाय के बिना या गो वंश के बिना चल ही नहीं सकता था, उन्हें आज के बुद्धिजीवी बता रहे हैं कि गाय को बचाइए और संरक्षित करिए। अब प्रश्न उठता है कि हम भारतीय गायों की बात करें या फिर आभारतीय गायों की भी। यह एक बड़ा संकट है कि जब से भारत में आभारतीय गायों का प्रचलन बढ़ा है तब से स्थिति बदल गई है। दुग्ध पैदावार की दृष्टि से आभारतीय गायें आज भारतीय किसानों की पहली पसंद बन गई है। एक गाय कई गायों के बराबर दूध देती है जिसमें खर्च और मेहनत दोनों कम हो गई। लेकिन इसी के साथ जो बड़ा संकट पैदा हुआ वह यह कि विदेशी नस्ल की गायों के बछड़ों की हमारे यहाँ कोई उपयोगिता नहीं है। फिर उनका क्या होगा ? 
          दरअसल गाय भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हुआ करती थी, और यह 90 के दशक तक चलता रहा। इसे समझने की महती आवश्यकता है कि जिन्हें गाय रखना है वे गाय के लिए न तो कोई आंदोलन कर रहे हैं और न ही किसी आंदोलन में शरीक हो रहे हैं। फिर ये आंदोलन किसके लिए और क्यों हो रहे हैं? किसानों के जीवन की वास्तविकता की अगर पड़ताल की जाय तो हमें 90 के दशक का विश्लेषण करना होगा। इस विश्लेषण के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, पहला आर्थिक उदारीकरण और विदेशी कंपनियों के विस्तार का है और दूसरा बेतहासा मांस निर्यात का है। 90 के दशक में भारतीय कृषि को पूरी तरह से बैंक आधारित ऋण के अधीन कर दिया गया और यह दूरगामी रणनीति के तहत किया गया। अनेक किसान अपने पूरे जीवन में भी ऋण चुका नहीं सके और उनकी बर्बादी की कहानी तैयार हो गई। बड़े किसानों को बैंकों और विदेशी कंपनियों ने तोड़ा और छोटे किसानों को मांस निर्यात ने। मांस का निर्यात किसानों को कृषि और पशुपालन से दूर करने का बहुत महत्वपूर्ण कारण है जिसने छोटे किसानों को कृषि से अलग कर दिया। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है, बल्कि यह अधूरी सच्चाई है। पूरी सच्चाई को न तो आंदोलनकारी बुद्धिजीवी बता रहे हैं और न ही सरकार। यह सच्चाई पूरी तभी हो सकती है जब इसमें महँगाई को शामिल किया जाएगा। 90 के दशक से 2016 तक गोवंश की कीमत कितनी बढ़ी है इसका अंदाजा सिर्फ किसान को है आंदोलनकारियों को नहीं। 90 के दशक में जिस गाय की कीमत 1500 रुपये होती थी आज 50 हजार है। ऐसा क्यों हुआ ? यह इसलिए हुआ कि मांस निर्यात में सारी दुधारी गायें कटती गईं और देखते-देखते मात्र 25 वर्षों में उनकी संख्या बहुत कम हो गई। किसान जिस गाय की कीमत आज 15 हजार लगता है कसाई उसकी कीमत 30 हजार देता है, मजे कि बात है कि पालक का खर्च भी लगभग 30 हजार ही आता है। बेचने वाला भी किसान है और लेने वाला भी किसान है फिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसका भी कारण बहुत साफ है। बढ़ती हुई महँगाई का असर किसानों और पशुपालकों पर भी हुआ है। गाय ले लेना अगर संभव भी हुआ तो उसका खर्च वहन करना बहुत कठिन है। गाय की उपयोगिता अब सिर्फ दूध देने तक सिमट गई है। अब वह जीवन निर्वाह का साधन या संसाधन नहीं रह गई है। पहले उसके दूध के साथ-साथ गोबर और बछड़ों का उपयोग होता था। अब गोबर की जगह अनेक प्रकार के उर्वरक आ गए। उपले की जगह एलपीजी गैस आ गई। फिर गोबर का स्वरूप अब कचरे से अधिक कुछ नहीं है। मशीनों के बेतहासा उपयोग ने बछड़ों की उपयोगिता खत्म कर दी। बढ़ती हुई महँगाई का असर यह हुआ कि छोटे किसानों ने बड़े पैमाने पर कृषि कार्य छोड़ दिया और शहरों में जाकर मजदूरी करने लगे। किसानों की क्षमता महँगाई के अनुसार नहीं बढ़ पायी है और न ही इसका कोई वैकल्पिक उपाय निकाला गया है।

          गाय को बचाने के आंदोलन का कोई मतलब नहीं होगा जब तक सीधे तौर पर किसान खुद इसका नेतृत्व नहीं करेंगे, और किसान तभी नेतृत्व करेंगे जब उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी होगी कि वे गाय रखने में सक्षम होंगे। इसलिए बहुत जरूरी है कि गाय के आंदोलन के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और महँगाई को रोकने की दिशा में सरकार के स्तर पर व्यवस्थित योजनाएँ लायीं जाय और उनका सीधा लाभ किसानों को मिले। अन्यथा सरकार गाय खरीदकर दे देगी तो भी किसान नहीं लेगा, और यही जमीनी सच्चाई है, इससे आँख नहीं चुराया जा सकता। अब इस आंदोलन के स्वरूप को बदलने और उसकी दिशा को परिवर्तित करने की जरूरत है। तभी कुछ सार्थक परिणाम निकल सकता है।  

मैं आता रहूँगा तुम्हारे लिए...


सन्तोष कुमार राय

          चंद्रकांत देवताले समकालीन कविता के लोकप्रिय और चहेते कवि रहे हैं। चंद्रकांत देवताले का जाना एक ऐसे कवि का जाना है, जिसने हमारे जीवन के अनेक मोहक और संघर्ष के क्षणों के साथ गहरी संवेदनाओं को पिरोकर कविता बना दिया। आम जीवन के साथ, उनकी कविताओं में वह सबकुछ समाहित है जिसे हम जीते हैं, जिसे हम जानते हैं, जिसे हम देखते हैं, जिसे हम महसूस करते हैं। उनकी कविताओं में जितनी बेबाकी है उतनी ही गहराई है। एक सकारात्मक दृष्टिकोण और विचार के कवि के रूप में हिंदी जगत में अपनी पहचान बनाने वाले चंद्रकांत देवताले के जाने से हिंदी जगत एक खालीपन का अनुभव कर रहा है। अपने जीवन की और कविता की भरपूर उम्र जीने के बाद उनका जाना बहुत अस्वाभाविक नहीं है। चंद्रकांत देवताले ने आधुनिक हिंदी कविता के जिस पक्ष को अपनी कविताओं में जगह दी वह कोई नायाब या बहुत अलग चीज नहीं थी। बहुत साधारण से साधारण विषय को उठाकर बड़ी कविता बना दिया। यह विशेषता आज बिरले दिखाई देती है। यदि वैचारिक प्रतिबद्धता से थोड़ा अलग होकर देखा जाय तो चंद्रकांत देवताले की कविताओं में एक आशा, उम्मीद, सकारात्मकता, जिजीविषा और रिश्तों के प्रति गहरी आत्मीयता दिखाई देती है। जबकि उनके समकालीन और समवैचारिक अनेक कवियों में अनेक तरह के नैराश्य और अवसाद का भाव दिखाई देता है।
          वैसे तो चंद्रकांत देवताले ने अस्सी वर्ष का अच्छा जीवन जिया, लेकिन रचनाकर का जीवन कभी लंबा कहाँ हो पाता है। हमेशा ऐसा लगता है कि कुछ दिन और रह जाते तो कुछ और दे जाते। लौटना चंद्रकांत देवताले की कविताओं में कई जगह आया है। बेटी के घर से लौटते हुए शीर्षक कविता में लिखते हैं कि-- सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते / दुनिया में सबसे कठिन है शायद / बेटी के घर लौटना।
          किसी भी साहित्यकार की अपनी वैचारिक पक्षधरता उसकी वैचारिक बनावट के अनुसार होती ही है और देवताले की कविताओं में भी उनका वैचारिक मोह कहीं-कहीं सामने आया ही है, लेकिन देवताले कविताओं में सजग और चौकन्ने दिखते हैं, जिससे कविताएं नारा नहीं बन पायी है, बल्कि गहरी संवेदनाओं के साथ अभिव्यक्त हुई हैं, जैसे—उसके कुचले सपनों की मुट्ठीभर राख / किस हंडिया में होगी या अथवा / और रोजमर्रा की चीजें / लाता होगा कितना जर्जर पारदर्शी शरीर पर / पेट में होंगे कितने दाने 
या घास-पत्तियां / उसके इर्द-गिर्द कितना घुप्प होगा / कितना जंगल में छिपा हुआ जंगल / मृत्यु से कितनी दुरी पर या नजदीक होगी।
देवताले ने जीवन और जगत के अनेक पक्षों को अपनी कविताओं में बहुत ही सहज ढंग से शामिल किया है। सामान्य जीवन की जरूरतों को, उसके अनेक रूपों को, संबंधों को, जनजीवन की रोज़मर्रा की अनेक समस्याओं पर कविताएं हैं, जैसे-- मैं उसे नहीं बता पाया / की कसाईख़ाने में काम करते शाकाहारी की तरह / मै ज़िन्दा हूँ इस दुनिया में / और शामिल हूँ उन्ही में जो / अपनी करुणा की तबाही और / अपने साहस की हत्या के लिए / दूसरों को अपराधी समझ रहे हैं।
          चंद्रकांत देवताले अपनी कविताओं माध्यम हमारे बीच हमेशा रहेंगे। मानवता की गहरी परख उनकी कविताओं का आधार है। उनकी कई कविताओं में बार-बार आने की बात आती है। और यह साचा भी है कि जब भी समकालीन कविता और काव्यात्मक संवेदना की चर्चा होगी, चंद्रकांत देवताले हमेशा हमारे बीच उपस्थित रहेंगे। यही कारण है बड़ा साहित्यकार कभी भी दुनिया से जाता नहीं है बल्कि वह जाने के बाद भी अमर हो जाता है। रचनाकार की रचनाएँ उसे अमरत्व प्रदान करती हैं। वह हमेशा अशेष रहता है। कुलमिलाकर श्रद्धांजलि स्वरूप यह कहा जा सकता है कि चंद्रकांत देवताले हिंदी कविता के वर्तमान हैं जो किसी न किसी रूप में साहित्य जगत को हमेशा झकझोरते रहेंगे।




आज का समय और साहित्य
सन्तोष कुमार राय
            एक समय में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया था और यह उस समय के साथ-साथ किसी भी काल-खंड के लिए सच है। आज जिस तरह से समय बदला है,  साहित्य में वैसा न तो बदलाव हुआ है और न ही आज के साहित्य में अपने समय को समेट लेने की कोई चाहत दिखाई देती है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी अपने समय के यथार्थ को क्यों नहीं देख पा रहे हैं? क्या कारण है कि हमारा समाज दिनोंदिन पतन के गर्त में समा जाने को आतुर है और इससे सचेत करने वाले देख नहीं प रहे हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं वह अपने हर रूप में संक्रमण काल है। हम दिशाहीन विकास की बुनियाद पर आगे बढ़ रहे हैं। हमारे पास कोई भी ऐसा प्रारूप नहीं है जिसे विकास की सही दिशा कहा जाय। असल में जिसे विकास कहा जा रहा है वही आज समय के समय के संक्रमण का जन्मदाता है। जीवन के भागदौड़ में ठहराव के लिए कहीं कोई जगह नहीं बची है।
            दरअसल ऐसी स्थिति में साहित्य दिशा-निर्माता या युग-निर्माता की भूमिका अदा करता रहा है। लेकिन आज वह खुद दिग्भ्रमित और दिशाहीन है। कुछ इसी तरह के ऊहापोह का समय 1857 के बाद का था, जब साहित्यकारों के लिए धार्मिक रूढ़ियों के नाम पर चलाये जा रहे सामाजिक बंधनों के विरुद्ध बोलना शुरू किया। उस समय सामाजिक रूढ़ियों पर बोलना आसान नहीं था। लेकिन उस समय के साहित्य निर्माताओं ने इसकी पहचान की और इसके खिलाफ एकजुट होकर लिखना-बोलना शुरू किया। जिसका परिणाम हमें आधुनिक राष्ट्र के रूप में मिला। वह समय एक बनती हुई भाषा और बनते हुए राष्ट्र का समय था। उस समय के साहित्यकारों ने जितनी मजबूती के साथ भाषा का पक्ष लिया उतनी ही मजबूती के साथ वे राष्ट्र के साथ भी खड़े हुए। इसके अनेक उदाहरण हमें उस दौर के साहित्य में मिल जाएंगे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद आदि अनेक रचनाकर ऐसे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष किया। उन साहित्यकारों ने भारत के अतीत को बार-बार उद्धृत किया और ज़ोर देकर बताया कि हमारा समाज कैसा था और आज हम कैसे हो गए हैं। जिसका सीधा-सीधा असर उस दौर के समाज पर पड़ा।
            आज के साहित्यकारों-रचनाकारों के लिए भी अपने समय की समस्याओं को पहचानने की जरूरत है। हम जिस समय में जी रहे हैं वह वास्तव में विसृंखल मान्यताओं के जबरन स्थापित होने का समय है। पारिवारिक-सामाजिक बंधन हमारी वैश्विक पहचान थी जो आज छिन्न-भिन्न हो गई है। व्यक्तिवाद इस कदर आगे बढ़ गया है कि हमारे पीछे क्या है और कैसा है इसे देखना तो बहुत दूर की बात है उस पर रुककर सोचना भी दुरूह हो गया है। ऐसी स्थिति में रचनाकारों का दायित्व बढ़ जाता है। इस समय की सचाई से आम जनमानस को रूबरू करना आज उनका नैतिक कर्तव्य है। समाज की विकृतियों की पहचान जितनी बारीकी से वे कर सकते हैं आम लोग नहीं कर सकते। फिर से एकबार उन्हे भारतीय संस्कृति के उन पहलुओं पर समाज का ध्यान आकर्षित करना होगा जिनसे हमारे समाज को सही दिशा मिल सकती है।
            यह कहना गलत नहीं होगा कि आज का साहित्यकार अपने समय की सच्चाई को नजरंदाज कर रहा है। वह अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की तरह समय और समाज से जुड़ नहीं पा रहा। सामाजिक मान्यताओं और जीवन शैली में लगातार आ रही गिरावट को वह गंभीरता से नहीं ले रहा है। कोई भी रचना तभी दीर्घायु होती है जब उसमें अपने समय के व्यापक जनसमुदाय का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ हो। जिन रचनाओं में व्यापक जनसमुदाय का यथार्थ निहित होता है वे अनायास ही उस समाज से जुड़ जाती हैं और उसका हिस्सा बन जाती हैं। आज इसका भाव खटकता है जबकि आज जितनी अधिक मात्र में रचनाएँ हो रहीं है शायद ही कभी हुई हो। आज रचनाकारों के लिए छपने का संकट नहीं है फिर भी हमारे अपने रचनाकार से उस तरह से नहीं जुड़ पा रहे हैं जैसा जुड़ना चाहिए।
            कुलमिलाकर यह कहना चाहिए कि आज के रचनाकारों पर हमरे समय का बहुत बड़ा दायित्व है। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी। आज जिस तरह से मनुष्य के जीवन को सुरक्षा देने वाली प्रकृति का दोहन हो रहा है, पर्यावरण में जतनी तेजी से बदलाव आ रहा है, जल, जंगल, पहाड़ आदि जिस तरह से खत्म किए जा रहे हैं उसके दुष्परिणामों की चेतावनी कौन देगा। आज के साहित्य को भी समाज का दर्पण बनाना पड़ेगा, समाज की प्रतिछाया को साहित्य में जगह देनी होगी, आम जनमानस को उसके यथार्थ से न सिर्फ अवगत कराना होगा बल्कि उसे आज की भयावहता के दुष्परिणामों से सचेत भी करना होगा तभी साहित्यकारों के दायित्व सही मायने में पूरे होंगे।