रविवार, 25 दिसंबर 2011

संजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को करीने से....

                 
यह हमारी पीढ़ी से अदम गोंडवी की गुजारिश थी, और खुद भी उस बेबाक प्रतिरोधी परम्परा को जीवन भर उन्होंने न सिर्फ संजोया बल्कि लगातार उसे आगे बढ़ाते रहे। अदम गोंडवी का जाना, हिन्दी की प्रतिरोधी परम्परा का कमजोर पड़ना है। अदम गोंडवी एक ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने जीवन भर सत्ता और पूंजीवादी-सामंतवादी समाज का विरोध किया। कहीं भी समझौता नहीं किया, न तो जीवन में और न ही रचनात्मकता में ।
          हिन्दी साहित्य जगत उनकी लगातार उपेक्षा करता रहा । कभी भी उन्हें मुख्यधारा के साहित्यकारों में शामिल नहीं किया गया, जबकि उनके समानांतर अनेक ऐसे बौने कवि हैं जो जोड़-जुगत करके लगातार मुख्य धारा में बने रहे। उनकी उपेक्षा करने का जो साहित्यिक हथियार आलोचकों ने इस्तेमाल किया वह उनके गीत और गज़ल थे । उन लोगों का ऐसा मानना था कि वे मंचीय कवि थे लेकिन ऐसा नहीं है कि गीत और गज़ल सिर्फ मंच तक सीमित हैं। उनकी गज़ल नायिका की जुल्फों की तारीफ में नहीं बनी थी। वे गज़ल को आम जनता तक पहुँचाने वाले रचनाकारों में से थे....
             जो गजल मासूक के जल्वों से वाकिफ हो गई,
             उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।
             मुझको नज्मों-जब्त की तालीम देना बाद में,
             पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो।
अदम गोंडवी की रचनाएं यथार्थ से अनुप्राणित है । समाज के यथार्थ की अभिव्यक्ति ही उनकी रचनात्मकता की सीमा है...
                तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
                 मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी हैं ।  
                 लगी है होड़ सी देखो अमीरी औ गरीबी में
           ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है ।
अदम गोंडवी लगातार भारत की ग्रामीण जीवन की समस्याओं को लेकर चिंतित रहे। उनकी रचानाओं का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण किसानों के दुख और गरीबी को लेकर है। भारत के अनेक रचनाकार वैश्वीकरण का ढोल पीटकर अपने को वैश्विक घोषित करने पर तुले हुए थे, वहीं अदम गोंडवी उन्हीं किसानों के बीच में अपनी रचना का स्वर तलाश रहे थे। आज के समाज में लोलुपता जिस तरह से बढ़ रही है और मनुष्य अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए अपनी अस्मिता को बेचने के लिए तैयार है, ऐसे में अदम गोंडवी जैसा लिखना और अपने विचार और आचरण में दृढ़ बने रहना बहुत कठिन है।
आज की हिन्दी कविता पर बहुत लम्बे समय से जो आरोप लगाया जा रहा है कि उसकी पठनीयता लगातार कम होती जा रही है या वह अब पठनीय नहीं रही। यह बात अदम गोंडवी के लिए बिलकुल गलत है। अदम गोंडवी की रचनाए लोगों की जुबान पर होती थी। गरीब मजदूर-किसानों की समस्याओं को अदम गोंडवी ने बहुत सिद्दत से उठाया है..
         न महलों की बुलंदी से न लफ्जों के नगीने से
         तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से।
        कि अब मरकज में रोटी है, मुहब्बत हाशिए पर है
         उतर आई गजल इस दौर में कोठी के जीने से।
        अदब का आइना उन तंग गलियों से गुजरता है
       जहां बचपन सिसकता है लिपट कर मां के सीने से।
अदम गोंडवी लगातार सत्ता का विरोध करते रहे । वे जिस तरह से अपनी कविताओं में प्रतिरोधी थे वैसे ही जीवन में भी। कई बार इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। बहुत प्रसिद्ध रचना है उनकी..
               काजू भूनी पलेट में विस्की गिलास में
              रामराज उतरा है विधायक निवास में ।
नागार्जुन के बाद की हिन्दी कविता में धूमिल ने प्रतिरोधी धारा को आगे बढ़ाया । उसके बाद अदम गोंडवी की आवाज ने उसे आगे बढ़ाया, लेकिन यह बेबाक प्रतिरोधी धारा आज छोटे-छोटे स्वार्थों में दब कर अपने अवसान की ओर अग्रसर है । दूर=दूर तक हिन्दी कविता आज इस तरह के प्रतिरोधी स्वर का रचनाकार दिखाई नहीं दे रहा है । अदम गोंडवी को भी यह पता था, तभी तो उन्हों ने लिखा..
              अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है,
              संजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को करीने से।