कितना आत्मनिर्भर बना है पूर्वांचल

संतोष कुमार राय

‘आत्मनिर्भरता’ क्या है? इसे किस रूप में देखा जाय? स्वाधीनता के आठवें दशक में आज जब आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है तो इसका क्या मतलब निकाला जाय और इसे कैसे परिभाषित किया जाय? कुछ दिनों पहले जब भारत के प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत की बात की तो सहसा यह अचरज जैसा ही लगा कि आजादी के इतने सालों बाद आत्मनिर्भर भारत की बात क्यों हो रही है. ठीक वैसे ही जैसे  2014 में जब प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत किया तो आम जन में यह भाव पैदा हुआ कि क्या यह भी प्रधानमंत्री का विषय है. क्या आम लोगों को स्वच्छता के विषय में पता नहीं है. लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ. परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण भारत का अधिकांश हिस्सा दैनंदिन दुर्गन्ध से मुक्त हो गया. सरकारी सहायता और आम जन की जागरूकता से आज स्वच्छता अभियान उस मुकाम पर पहुँच गया है, एक समय में जिसका अनुमान लगाना कठिन था.लेकिन यहाँ हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि इतिहास में इस बात का अनके जगहों पर जिक्र है कि भारत के सभी गाँव आत्मनिर्भर थे. प्रत्येक गाँव की अपनी स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था थी. आखिरकार उसे कैसे क्षति पहुंची. आज फिर प्रधानमंत्री उसी की ओर क्यों संकेत कर रहे है.  

आज जब हम पिछले इतिहास पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि भारत कहाँ से चला था आज कहाँ पहुंचा है. वह कौन-कौन से क्षेत्र हैं जहाँ वास्तव में ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर हुआ है और कौन-कौन से क्षेत्र हैं जहाँ अभी काम करने की जरुरत है. यह सही है कि भारत में जिस अनुपात में और जिस गति से जनसंख्या बढ़ी है उस अनुपात में संसाधनों का विकास नहीं हुआ है. लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ भारत का बहुत तेजी से विकास हुआ है. सरकारी क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनों को समान रूप से काम करने की जरुरत है. लेकिन अभी भी भारत का निजी क्षेत्र सरकार की ओर देखता रहता है कि विकास का काम सरकार का है.

जब हम ग्रामीण भारत के विकास की पड़ताल करते हैं, कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आते हैं. इस दृष्टि से सबसे पहले हम मनुष्य की बुनियादी आवश्यकताओं पर ध्यान देते हैं. यानि आज से कई दशक पहले ग्रामीण विकास की बुनियादी जरूरतों में रोटी, कपड़ा और मकान का उल्लेख हुआ. उसके बाद इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार शामिल हुआ. उसके बाद बिजली, पानी और संचार शामिल हुआ. अर्थात ग्रामीण विकास का मतलब हुआ कि भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान, शौचालय, एलपीजी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बिजली, पानी, सड़क और संचार की मुकम्मल सुविधाएँ जब मिलेगी तभी पूर्णतः आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना सिद्ध होगी.

अब सवाल यह उठता है कि इन सारी आवश्यकताओं के बीच उत्तर प्रदेश कहाँ खड़ा है? इस संबंध में हमें कुछ बुनियादी चीजों की ओर नजर डालनी चाहिए जहाँ वास्तव में काम हुआ है. इस दृष्टि से जब हम देखते हैं तो सबसे पहले हमें रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली और पानी दिखाई देता है. वर्तमान सरकार और पिछली सरकारों ने भी अनेक तरह से अन्न वितरण योजनाओं के माध्यम से भारत से बहुत हद तक भुखमरी समाप्त करने का हरसंभव प्रयास किया है और इसमें बड़े पैमाने पर सरकार को सफलता भी मिली है. अभी कोरोना काल में जिस तरह से सरकार की ओर से मुफ्त राशन वितरण किया गया वह असाधारण था. दूसरी बड़ी कामयाबी सरकार को संपूर्ण विद्युतीकरण में मिली है. अब भारत के लगभग सभी गाँवों में बिजली पहुँच गई है. लेकिन गाँवों से लगे हुए सुदूर हिस्सों में अभी भी कुछ जगहें हैं जहाँ विद्युतीकरण का कार्य जारी है. इसे बड़ी सफलता के रूप में लिया जाना चाहिए.

वर्तमान सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना स्वच्छता मिशन के माध्यम से अनेक गरीब, मजबूर, दिव्यांग और बुजुर्ग लोगों को मकान और शौचालय देकर बुनियादी विकास की ओर एक बहुत बड़ा कदम बढ़ाया है. वैसे गरीबों के लिए आवास योजना की शुरुआत बहुत पहले हो जानी चाहिए थी लेकिन यह बहुत देर से हुई. अब जब भारत के गाँवों में रहने वाले अधिकांश लोगों को आवास मिल चुका है या मिल रहा है तो यह माना जाना चाहिए कि विकास का पहला चरण पूरी तरह समाप्त होने की ओर है. रोटी कपड़ा मकान के साथ शौचालय और उज्ज्वला योजना का भी भरपूर लाभ ग्रामीण समुदाय को मिला है. वहीं बिजली के विस्तार से लगभग वे सभी घर प्रकाशमान हो रहे हैं जिन्हें अँधेरा भारत बना दिया गया था. इसी से जुड़ा हुआ पक्ष पीने के पानी का भी है, क्योंकि बिजली के बिना पीने के शुद्ध पानी की उपलब्धता सुचारू रूप से नहीं हो सकती. लेकिन प्रदेश और केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से उत्तर प्रदेश के लगभग सभी गाँवों में पीने के पानी का कार्य चल रहा है. यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में पीने के स्वच्छ पानी का संकट लगभग समाप्त हो जायेगा. 

जहाँ तक संचार की बात है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले कुछ समय में संचार के क्षेत्र में भारत को अभूतपूर्व सफलता मिली है. इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश चहुओर सबल हुआ है. इसी तरह यातायात का विकास भी भारत के विकास का महत्वपूर्ण पक्ष है. पिछले दो दशक में सरकार की ओर से सभी गाँवों को मुख्य मार्गों से जोड़ने का जो सार्थक प्रयास हुआ है उसके परिणाम अब ग्रामीण भारत में दिखने लगे हैं. मसलन सड़कों से जुड़ने की वजह से भारत के शहर और महानगर ग्रामीणों की पहुँच में आ गए हैं. अर्थात गाँव से बाजार के जुड़ने से, शहर के जुड़ने से बहुत कुछ आसान हुआ है. इस तरह हम आत्मनिर्भर भारत की ओर उत्तर प्रदेश के बढ़ते हुए कदम को देख सकते हैं.

अब प्रश्न यह कि इतना होने से क्या भारत संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो गया है? शायद नहीं.. उसका कारण क्या है? इसकी पड़ताल बहुत आवश्यक है. इसका सबसे बड़ा कारण है ग्रामीण समुदाय में लम्बे समय से घर किया हुआ अविश्वास. यह वह अविश्वास है जो अब हीनभावना में बदल गया है. हीनभावना यह है कि उन्हें लगता है कि गाँव में रहते हुए कोई कार्य नहीं किया जा सकता है जबकि शहरों में लोग अधिक खर्च और अधिक मेंहनत करके वही कार्य करते हैं. इसके कुछ वाजिब कारण भी हैं जिसमें बिजली, सड़क और बाजार सर्वाधिक महत्वपूर्ण ही. आज स्थितियां बदली हैं और इस बदली हुई परिस्थितियों में सामान्य लोग आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. लेकिन अभी भी इसमें कुछ अड़चने हैं जिनका यदि निवारण हो गया तो भारत की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी.

इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य करने की जरुरत है. जैसे ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी अच्छी शिक्षा और अच्छी चिकित्सा के आभाव में जी रहा है. यही कारण है कि आम लोग सबकुछ दाव पर लगाकर, कठिन से कठिन जिंदगी जीते हुए भी शहरों की ओर भागते हैं, जिससे शहरों के जनसंख्या घनत्व में भारी वृद्धि हुई है. यदि शिक्षा और चिकत्सा की सुविधाओं का ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तर कर दिया जाता तो पलायन का बड़ा हिस्सा रूक जाता. उसके बाद आम तौर पर रोजगार करने के लिए जैसी सुविधाएँ शहरों में मिलती हैं, यदि वह उतने ही समय में और उतनी ही सहजता से गाँवों में भी मिलने लगे तो आत्मनिर्भरता और विकास की परिभाषा बदल जाती.

अंत में जब ग्रामीण भारत पर एक बार सम्पूर्णता से विचार किया जायेगा तो यह दिखेगा कि ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निजी क्षेत्रों के बड़े-बड़े लोगों को भी रूचि दिखानी होगी. जो चीज जहाँ पैदा होती है उससे बनने वाली चीजों की कंपनियाँ उसी क्षेत्र में लगाने से आम लोगों की रूचि में भी वृद्धि होगी और इसका बहुत बड़ा प्रभाव राष्ट्र के विकास पर पड़ेगा. इस प्रकार अभी यह नहीं कहा जा सकता कि उत्तर प्रदेश आत्मनिर्भर बन गया है बल्कि यह कहना ज्यादा अच्छा होगा कि प्रदेश अभी आत्मनिर्भरता की राह में आगे बढ़ रहा है.

(23 अगस्त, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


बी एच यू के कुलपति के नाम खुला पत्र, सन्दर्भ- कुलपति का बयान-महामना ने पैसे के पेंड़ नहीं लगाये

संतोष कुमार राय 





परम आदरणीय भटनागर चचा,
कुख्यात कुलनाशक
काशी हिंदू विश्वविद्यालय
चचा सबसे पहले आपको सादर प्रणाम करता हूँ...

प्रणाम इसलिए कि महामना के उस मंदिर ने नीच (जब तक उस पद पर रहे) को प्रणाम करने का संस्कार दिया है. आप तो समझ ही गए होंगे कि मैं कौन और क्यों यह सुझाव/सलाह आपको लिख रहा हूं. आप एकदम ठीक समझे हैं. उसी के लिए जो आपने पिछले दिनों एक लडके से फोन पर बात करते हुए मुंह से गोबर किया था. वैसे मैं आपको तभी से सुझाव देना चाह रहा था जबसे आपने धर्म विज्ञान संस्थान का नाम अपने कुकर्मों से पूरे भारत में रोशन किया था. आप बहुत शरीफ लीचड़ हैंयह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा है. आप जब आए थे तो लंबा-लंबाबड़ा-बड़ा भाषण फेंक रहे थे और हम लोग आपकी तरफ वको ध्यान लगाकर टुकुर-टुकुर देख रहे थे कि अब महामनाराधाकृष्णनशांति स्वरूप भटनागर जी के बाद सीधे आप ही उस परिसर में अवतरित हुए हैंजो कुछ बड़ा करके जाएंगे.

चचा आपको शायद जानकारी ना हो तो बता दूँ कि बीएचयू में एक वैज्ञानिक हुआ करते थे डॉ शांति स्वरूप भटनागरजिन्होंने लिखा है ना वही जो वहां गाया जाता हैजिसे आप अक्सर सुनते ही है... मधुर मनोहर अतीव सुंदरयह सर्व विद्या की राजधानी’ और उसके बाद सीधे आपका इस परिसर में प्रवेश हुआ और आपका प्रवेश किसी घुसपैठिए की तरह था जो पाकिस्तान से सीधा कश्मीर घुसता है और तड़ा-तड़तड़ा-तड़ बमबारी करके तहस-नहस करने की भरपूर कोशिश करता है और बहुत हद तक कर देता है. आप भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास में एक घुसपैठिया की तरह ही आए थे. आने से पहले आपने जो चालचरित्र और चेहरा प्रस्तुत किया थावह कुछ और था और आने के बाद आपने जो किया वह कुछ और है. आप इतने बड़े आदमी नहीं है कि आपके ऊपर हम लोग अपना समय जाया करें लेकिन आज जो खबर मीडिया में चल रही है कि आपने कहा है कि महामना को पैसों का पेड़ लगाकर जाना चाहिए था. उनको नहीं पता था कि आप जैसे दिमागी रुप से गरीब और नीच लोग इस परिसर में आएंगे और महामना को बताएंगे कि आपको पैसे का पेंड़ लगाकर जाना चाहिए था. आपने फोन पर कहा है कि यूजीसी आपको 60 करोड़ देती है और बिजली का बिल आपका 66 करोड़ का आता हैबाकी तो कोई साधन-संसाधन विश्वविद्यालय के पास है ही नहीं. मैं इसे आपकी बेशर्मी बिलकुल नहीं कहूँगा. मतलब यह कि जो इसकी पराकाष्टा पर खड़ा हो उसे यह भी कोई कहने की बात है. आपको याद नहीं है तो मैं बड़ा देता हूँ कि इतने बड़े परिसर में विद्यार्थियों की फीस मिलती हैहॉस्टल की फीस मिलती हैप्रतिदिन लाखों मरीज दिखाए जाते हैंउनकी फीस आती हैकैंपस में  और ना जाने कितने संसाधन हैं जिसका पैसा विश्वविद्यालय में आता हैऔर वह पैसा इसलिए आता है उसे विद्यार्थियों की  जरूरतों पर खर्च किया जाए.

महोदय यह विश्वविद्यालय 1916 से चल रहा है. यह अपने उम्र के 100 वर्ष पूरा कर चुका है फिर भी यह विश्वविद्यालय आपकी तरह मंदबुद्धि को प्राप्त नहीं हुआ है जिससे बहुत जलते हैं. आप चाहते हैं कि विश्वविद्यालय भी आप जैसा हो जाय. मंदबुद्धि क्या होता है आपको मैं बता देता हूँ. आप ठहरे विज्ञान के और मैं ठहरा साहित्य काऔर दोनों में ठीक वैसा ही संबंध है जैसा आपका महामना के विचार से है. जो बात मैं आपको समझाना चाह रहा हूँ वह भावपूर्ण बातें हैं और आप जो समझना चाह रहे हो तर्कपूर्ण बातें हैं. दिक्कत यही है कि आप अपने तर्कों से और मैं कह रहा हूं कि आप अपने कुतर्कों से हमारे भाव को और हमारे जैसे लाखों विद्यार्थी जो विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं और अलग-अलग जगहों पर हैं या पढ़ रहे हैंउनके भाव को कुचलना चाह रहे हैं. आप जिस तरह की भड़ैती विश्वविद्यालय में कर रहे हैं इसकी निकृष्टता का अनुमान आपको बखूबी है. चचा नैतिकता के आधार पर तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि वह तो आपके पास है ही नहीं तो अनैतिकता के आधार पर ही विश्वविद्यालय को जितनी जल्दी हो सके छोड़कर चले जाइए. जितना बेडा गर्क करना था आपने खूब किया है.

इसका कारण क्या हैयह भी आपको बता देता हूँ. चचा आप अब चौथे पन की ओर बढ़ रहे हैं. यह ऐसी उम्र है जिसमें आप जैसे लोग मानसिक दिवालिया और बौद्धिक कुपोषण का शिकार हो जाते हैं. आपकी उम्र बुद्धिविवेकज्ञानशील से बहुत आगर निकल चुकी है. ऐसी स्थिति में आपो मेरा सलाह है कि अब आपको सीधा बनवास चले जाना चाहिएउससे पहले रुकना ही नहीं चाहिए. आपको तो पता ही है कि वहाँ के बच्चे आपका कितना सम्मान करते हैं. यह बच्चे आपके आफिस में प्रवेश करने से पहले बाहर ही अपना जूता चप्पल उतार देते हैं और इसीलिए उतार देते हैं क्योंकि आपका सम्मान करते हैंलेकिन आप तो उसे कुछ और ही समझ रहे हैं. आप इतने बड़े परिसर में राष्ट्रपति की तरह विराजमान हैं और ज्ञान दे रहे हैं कि अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी. जो विश्वविद्यालय पूरे देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करता रहा हैजो विश्वविद्यालय पूरे देश की अर्थव्यवस्था में सहयोग करता रहा हैउस विश्वविद्यालय की अर्थव्यवस्था को आप बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी. आपको शर्म आने को तो मै नहीं कह सकता और डूब मरेना कहकर अशिष्टता तो कत्तई नहीं. मुझे पूरा भरोसा है इन दोनों स्थितियों में आपके लिए सबसे जरूरी दो चीजें हैं. महामना ने मंदबुद्धि और क्षीण शारीर के लोगों के लिए वहाँ एक गौशाला का निर्माण करवाया था. अभी भी वह डेयरी फार्म के नाम से चल रहा है. आप वहां से गाय का शुद्ध दूध मंगाइए और एग्रीकल्चर वालों से कहिए कि वहां जो सरसों पैदा होता है उसका एकदम शुद्ध सरसों का तेल भी मुहैया कराएँ. तो चचा दबा के दूध पीजिए और अपनी गंजी कटोरदान रूपी खोपड़ी पर आधा किलो सरसों का तेल लगाईये और अपने गठ्ठरनुमा शरीर को कुछ देर तेज धुप में सेकिये. इससे थोडा बहुत जो जीवन बचा हुआ है हो सकता है उसका निर्वाह हो जाये.

देखिये न चचा आपको पैसों के पेंड़ वाली सलाह पर ज्ञान देना तो भूल ही गया था. वह क्या है कि आपको पेड़ तो वहाँ बहुत हैं और आपने सभी को खूब हिलाया भी हैसमझ रहे हैं न. चिंता मत कीजिये मैं किसी को बताऊंगा नहीं. मुझे क्या मतलब है. लेकिन एक बात बता देता हूँ चचा ज्यादा पैसा-पैसा करना भी ठीक नहीं होता है. आप जहाँ इस समय हैं वहाँ की स्थानीय भाषा में पैसा का अर्थ बहुत खराब होता है. मुझे पता है आप बहुत उतावले हैं और इसका अर्थ जानने के लिए आप परेशान हो जायेंगे इसलिए बता देता हूँ. पैसा से ही पैसाना बना है. पैसाना का मतलब घुसाना होता है. चचा अब जरा सोचिये पैसा क्या क्या करा देगा. तो आपके बचे जीवन के लिए शुभकामनाएँ फेंकता हूँ और बाबा विश्वनाथ से अनुरोध करता हूँ कि आपको कुछ सदबुद्धि दें ताकि आपकी लोलुपता पर कुछ विराम लगे. अब खुद को रोकता हूँ चचा.

नमस्कार

एक पूर्व छात्र जो आपके कुकर्मों से आहत है.

 

ग्रामीण नयन में राम... (मर्यादा पुरुषोत्तम का मर्यादित समाधान)

संतोष कुमार राय

 


महाकवि तुलसीदास ने लिखा है कि ‘रामहि केवल प्रेम पियारा’. यह प्रेम ही है जो भगवान राम के भक्तों का उनके प्रति गहरी आस्था और अगाध श्रद्धा का परिचायक है. भारत का ग्रामीण समुदाय गोस्वामी तुलसीदास की आँखों से भगवान राम को देखता है. रामचरितमानस वह ग्रन्थ है जिसने भगवान राम को आम जनमानस के हृदय में कई सदियों से स्थापित किया है. दरअसल पिछले पांच शतक से भगवान राम की जन्मभूमि के प्रति अगाध और अटूट श्रद्धा का केंद्र भी यह ग्रन्थ ही है. वैसे तो भारत में भगवान राम को लेकर तीन सौ से अधिक रामायण लिखे गए हैं लेकिन रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्भुत है. सामान्यतः इन सभी का विषय एक ही है. वह यह कि भगवान राम के मर्यादित जीवन का चित्रण. आज जब राम मंदिर का शिलान्यास प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कर-कमलों से हुआ तो अपने इष्ट के प्रति वह असाधारण प्रेम ग्रामीण समुदाय की आँखों में ढाल के पानी की तरह उतर आया. एक ओर शिलापूजन करते हुए भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री और उनका साथ देते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को गदगद हृदय से आशीर्वाद देते ग्रामीण समुदाय को अलौकिक एहसास हो रहा था तो दूसरी ओर बहुप्रतीक्षित राम मंदिर का शिलान्यास ग्रामीण आँखों के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा ही था.

यह शिलान्यास कोई साधारण शिलान्यास नहीं था, बल्कि यह भारतीयों के लिए असाधारण और अलौकिक अनुभूति का समय था. भगवान राम के मंदिर तो हजारों हैं, लेकिन राम जन्मभूमि तो एक ही है. जिस तरह दुनिया में कैथोलिक ईसाईयों के लाखों चर्च और मुसलमानों की लाखों मस्जिदें हैं,लेकिन ईसाईयों के लिए वेटिकन सिटी और मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना एक ही है. उसी तरह दुनिया में भगवान श्रीराम के मंदिर अनेक हो सकते हैं लेकिन राम जन्मभूमि तो एक ही है. राम मंदिर का महत्व समस्त भारतीयों के लिए है. यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक धरोहर है. यही कारण है इस ऐतिहासिक दिन पर समस्त भारतीयों से खुले मन से प्रसन्नता व्यक्त की.

वैसे तो राम जन्मभूमि का आंदोलन बहुत लम्बा चला है लेकिन इस संदर्भ में जब हमने ग्रामीण समुदाय से बात की तो उनका कहना था कि हमें यह उम्मीद थी कि एक दिन हमारे भगवान अपने भव्य मंदिर में जरुर जायेंगे. उसका कारण यह है कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो देर से ही सही जाएंगे मर्यादित तरीके से ही. हुआ भी बिलकुल वैसा ही. राम मंदिर के दर्शन की ललक हृदय में समाये कई पीढियां गुजर गईं. रामभक्तों की वह पीढ़ी, जो अब अपने जीवन के अंतिम दिन की ओर बढ़ रही है, उसने 1980 के बाद के सभी आन्दोलनों को इसी आस में बहुत करीब से देखा और जिया है कि एक दिन रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होंगे. शिलान्यास को देखते हुए उन सभी की आँखों से झर-झर अश्रु वर्षा हो रही थी और हृदय में अद्भुत आह्लाद उठ रहा था, ठीक वैसे ही जैसे भगवान राम वनवास से लौटकर जब अयोध्या आये थे तो अयोध्यावासियों में जैसी खुशी थी वैसी ही खुशी आम जनमानस में देखने को मिली. उन लोगों को ऐसा लग रहा था जैसे उनका जीवन धन्य हो गया और उनकी सांसें बस इसी दिन के लिए रुकी हुई थीं. ऐसे अनेक लोग मिले जिन्होंने अपनी ख़ुशी जाहिर किया.

जन्मभूमि आंदोलन आस्था का आंदोलन था. उसमें शामिल ओगों से जब हमने इस सन्दर्भ में बात की तो उनका कहना था कि हम अपनी आस्था के लिए गए थे, वहाँ कोई लड़ाई लड़ने नहीं गए थे. लड़ाई तो अंग्रेजों से लड़ ही चुके थे. हम अपनी सांस्कृतिक विरासत और अपनी वैश्विक पहचान को स्थापित करने के लिए गए थे. आज जब हम अपनी आस्था को स्थापित होते हुए देखेते हैं तो हमें अपने नेतृत्व पर अटूट विश्वास पैदा होता है. ठीक है इसका समाधान न्यायलय द्वारा हुआ लेकिन उसके लिए जिन लोगों ने प्रयास किया, जिन लोगों ने इसका समाधान निकालने का संकल्प किया, निश्चित तौर पर वे कोरोड़ों आस्थावान लोगों के आशीर्वाद के पात्र हैं. स्वाधीनता के बाद ही इसका त्वरित समाधान होना चाहिए था लेकिन लोगों ने इसका खूब राजनीतिकरण किया. जबकि ऐसे मामले किसी एक धर्म, संप्रदाय या विचारधारा के नहीं होते. ये मामले सांस्कृतिक प्रतिष्ठा के होते हैं. वर्तमान नेतृत्व को धन्यवाद देते हुए  लोगों ने एक स्वर में कहा कि यह वह नेतृत्व है जिसने दबाई हुई सांस्कृतिक पहचान और प्रतिष्ठा को उसकी वास्तविक जगह दिलाई.

इस सन्दर्भ में एक और महत्वपूर्ण सवाल ग्रामीण समुदाय के सामने रखा तो उसका जैसा सकारात्मक उत्तर मिला वह वास्तव में संतोष देने वाला था. जब मैंने पूछा कि कई लोगों का मानना है कि इस शिलान्यास में संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को शामिल नहीं होना चाहिए क्योंकि यह शुद्ध रूप से धार्मिक मामला था. ग्रामीण मानस से जो हमें उत्तर मिला वह वास्तव में दृष्टि विस्तार करने वाला था. वह यह कि यह सांस्कृतिक कार्य है और सांस्कृतिक कार्य राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं करेगा तो कौन करेगा. विश्व के सामने हम कैसा उदहारण प्रस्तुत करेंगे. क्या हमारा चरित्र क्षद्म और ढोंगी हो गया है? क्या हम अपने सांस्कृतिक आस्था के प्रतीक को विश्व जन समक्ष हमारा प्रधानमंत्री नहीं रखेगा तो, रखेगा कौन? इसी डरपोकपन की वजह से तो अभी तक इसे रोका गया था. हम न्याय के मंदिर में किसकी शपथ लेते हैं. क्या उसका संबंध धर्म और संस्कृति से नहीं है. लोकतंत्र में नेतृत्वकर्ता की आस्था का केंद्र जनता होती है. जनता के द्वारा चुना गया प्रतिनिधि यदि जनता के मनोभावों के अनुकूल कार्य नहीं करेगा तो उसको पद पर बने रहने का कोई भी नैतिक अधिकार नहीं है. यह कार्य राष्ट्रीय अस्मिता और प्रतिष्ठा का कार्य था इसलिए राष्ट्रीय नेतृत्व के हाथों संपन्न हुआ. इस पर जो लोग सवाल खड़े करेंगे उन्हें राष्ट्रीयता और संस्कृति की समझ नहीं है.

ये सारी बातें ऐसी बातें थीं जिनका संबंध किसी तरह के व्यक्तिगत लाभ हानि से नहीं था. ग्रामीण समाज भारतीय संस्कृति का संरक्षक और पोषक समाज है. भारत की सांस्कृतिक चेतना गाँवों में ही विकसित हुई है. सभ्यता के जितने भी चरण विकसित हुए हैं उनका संबंध गाँवों से ही है. इसीलिए इस मुद्दे पर ग्रामीणों की राय का अलग महत्त्व है. शहर की एक निर्धारित गति होती है. वह उससे नीचे नहीं चल सकती लेकिन गाँव अपने ठहराव के लिए जाने जाते हैं. यही ठहराव भारत की वैश्विक पहचान का परिचायक है. विश्व के शहरों का रहन-सहन एक जैसा हो सकता है, शहरों की बनावट एक जैसी हो सकती है. क्योंकि हमेशा विकसित शहरों की तर्ज पर ही अविकसित शहरों का विकास किया जाता है.  लेकिन हर गाँव की अपनी व्यक्तिगत पहचान होती है. उसके अपनी जीवन शैली होती है. इसलिये विश्व के गाँव कभी भी एक जैसे नहीं हो सकते. यही कारण है कि भाषा, संस्कृति और समाज को देखने-समझने का नजरिया बिल्कुल अलग होता है. इसीलिए भगवान राम के मंदिर के शिलान्यास को ग्रामीण समुदाय ने बहुत अलग तरह से लिए. उसके लिए यह धर्म का नहीं पहचान और प्रतिष्ठा का विषय था.

इस तरह से ग्रामीण समुदाय ने शिलान्यास को लेकर खुशी व्यक्त किया. अब उसे अपनी पहचान को दिखने-बताने के लिए सोचना नहीं पड़ेगा. भारतीय समाज के संस्कृति पुरुष भगवान श्रीराम अब मंदिर में होंगे जहाँ से विश्व समुदाय प्रेरणा ग्रहण करेगा. साथ ही इससे समानता, सहृदयता और विश्व बंधुत्व का सन्देश भी विश्व समुदाय में गया है. धर्म, संस्कृति और समाज दबाने के नहीं उसे स्थापित करने के विषय हैं. इसलिए यह स्थापना नए भारत के नए युग की स्थापना है.

(16 अगस्त, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


नई शिक्षा नीति के अनसुलझे सवाल

 संतोष कुमार राय



नई शिक्षा नीति स्वागत योग्य है. भारतीय शिक्षा व्यवस्था में यह बहुप्रतीक्षित बदलाव हुआ है. वैसे तो यह बदलाव आज से बहुत पहले हो जाना चाहिए था लेकिन देर से ही सही यह सही दिशा में बदलाव हुआ है. इससे पहले 1986 राष्ट्रीय शिक्षा नीति आयी थी जिसका 1992 में विस्तार हुआ. लेकिन यह शिक्षा नीति ऐसी नहीं बन पायी जिससे शिक्षा के समग्र विकास का स्वरूप परिलक्षित हो सके. इस शिक्षा नीति में शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ साक्षर बनाना नहीं बल्कि शिक्षित व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास है. एक ओर प्राथमिक शिक्षा को विद्यार्थी की बुनियाद से जोड़ना और उसकी विशिष्ट क्षमताओं का विकास करना है, वहीँ उच्च शिक्षा में कुछ नए मानकों को शमिल करके विषय विशेषज्ञता और आधुनिक शिक्षा के वैश्विक रूप को अंगीकार करते हुए शिक्षा प्रक्रिया को जनोन्मुख बनाने पर जोर दिया गया है. यहाँ सवाल उच्च शिक्षा से जुड़े हुए कुछ मुद्दों का ही है जन्हें लेकर संदेह की स्थिति बनी हुआ है.

उच्च शिक्षा में सबसे बड़ा सवाल भाषा का है. भाषा को लेकर नई शिक्षा नीति में भी बहुत ढुलमुल रास्ता अपनाया गया है. वास्तव में यहाँ कठोर रास्ता अपनाते हुए एक व्यवस्थित दिशा निर्देश जारी करना चाहिए था. लेकिन ऐसा न करते हुए और शिक्षा नीति में भाषा के सवाल को लेकर होने वाले विवादों से पीछा छुड़ाते हुए इस मुद्दे पर संविधान के भाषा संबंधी अनुच्छेद का उल्लेख करते हुए यह कहा गया है कि जबरन किसी पर कोई भी भाषा थोपी नहीं जा सकती. फिर सवाल जस का तस बना हुआ है कि आखिरकार भारत में उच्च शिक्षा की वास्तविक भाषा का दर्जा किसे दिया जाएगा? और भाषा के बिना शिक्षा का कोई महत्त्व भी है क्या? भाषा का सवाल स्वाधीन भारत के सबसे पुराने और विवादित सवालों में से एक है जबकि यह सबसे बड़ा सवाल है जिसका निपटारा करने में सरकार चूक गई. यह बहुत अच्छा अवसर था जिसे शिक्षा के साथ जोड़कर बहुत आसानी से हल किया जा सकता था. लेकिन इसी के साथ भाषा को लेकर जिस संवैधानिक पक्ष को इसमे शामिल किया गया है क्या वाही उच्च शिक्षा पर भी लागू होगा? क्या उच्च शिक्षा में हिंदी को बढ़ावा दिया जायेगा? क्या सामाजिक विषयों तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हिंदी में अध्ययन, अध्यापन और शोध को भारतीय संस्थानों में सहज अनुमति मिलेगी? अभी तक की स्थिति को देखते हुए यह कहना बहुत गलत नहीं होगा कि कभी नहीं. फिर प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा पर जिस तरह से जोर देने और मातृभाषा को प्रारंभिक शिक्षा की भाषा के रूप में स्वीकृत करने का क्या अर्थ रह जायेगा.

इस शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक शिक्षा व्यवस्था के सामानांतर खड़ा करने की है. लेकिन कोई भी देश जिसने शिक्षा में ऊंचाई हासिल की है उसकी अपनी भाषा का बहुत बड़ा योगदान है. फिर भारतीय शिक्षाविदों को यह समझ में क्यों नहीं आया कि जिस तरह से प्रारंभिक शिक्षा में भाषा के बुनियादी रूप को तरजीह देने की कोशिश हुई वैसे ही उच्च शिक्षा और शोध की भाषा को भी एक व्यवस्थित रास्ता दे दिया जाय. दरअसल यह शिक्षा नीति अभी भी अधजल गगरी के छलकाव जैसी ही है. और इसकी पूर्णता अभी ताका के मौसौदे आधार पर संदिग्ध है.   

इस शिक्षा नीति में सबसे अच्छा बदलाव मंत्रालय के नाम का हुआ है. पिछले तीन-चार दशकों से शिक्षा और मनुष्य दोनों को जिस तरह से संसाधन बनाया गया था उससे बनाने वाले की मुर्खता का अंदाजा लगाया जा सकता है. यहाँ यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि पिछले सात दशकों में जिन दो बुनियादी क्षेत्रों को नजरंदाज किया गया है उनमें शिक्षा और स्वास्थ्य है. शिक्षा में सर्वाधिक उपेक्षित पक्ष भाषा ही रही है. इस नीति में भी जिन पक्षों का कहीं उलेख नहीं है उनमें उच्च शिक्षा की भाषा, सामाजिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा और शारीरिक और व्यावहारिक शिक्षा. पुस्तकीय और विषयी अवधारणा पर भरपूर जोर होने का बाद भी बहुत कुछ है जो खाली लग रहा है. वैश्विक स्वरूप को अपनाना बहुत अच्छी बात है लेकिन अपनी बुनियाद को खोने की शर्त पर अपनाना ठीक नहीं है.  इसका यह मतलब कत्तई नहीं निकाला जाना चाहिए कि नई शिक्षा नीति में कुछ भी नया ठीक नहीं है। बहुत कुछ है जिससे शिक्षा की स्थिति में बहुत बड़े और सार्थक बदलाव की उम्मीद छिपी है. स्कूली स्तर पर मातृभाषा को महत्त्व देना इस नीति की बहुत बड़ी पहल है.  इसमें मातृभाषा को महत्व मिला है।

उच्च शिक्षा में दूसरी बड़ी व्यवस्था विषय चयन के बदलाव और क्रेडिट सिस्टम का है. यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था. लेकिन देर से ही सही यह दुरुस्त बदलाव है. लेकिन इसके साथ जो संकट है वह भी कम नहीं है. एक ओर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में बहुत सरलता से इसे लागू कराया जा सकता है तो वहीं राज्यों के कम संसाधन या लगभग संसाधन विहीन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इसे कैसे लागू कराया जाएगा, यह बहुत बड़ा प्रश्न है. जहाँ तक अध्यापक- विद्यार्थी का अनुपात एक-तीस रखा गया है ऐसे में उन ग्रामीण महाविद्यालयों का क्या होगा जहाँ पांच सौ से एक हजार विद्यार्थियों पर एक ही अध्यापक हैं.

दूसरी ओर अनेक ऐसे महाविद्यालय हैं जहाँ बहुत कम विषयों की मान्यता ही मिली हुई है अर्थात वहां रूचि के अनुसार विषय चुनने का विकल्प ही मौजूद नहीं है, ऐसे में इस शिक्षा नीति को लागू करा पाना बहुत आसन नहीं दिखता. अध्यापक न्युक्तियों में जिस तरह का भ्रष्टाचार पूरे देश स्तर पर पांव पसारे हुए है, उसमें योग्य अध्यापक चुनना किस्त सहज और सरल होगा. इस पूरी नीति में कहीं भी प्रशासनिक अकर्मण्यता के लिए कहीं एक शब्द भी नहीं लिखा गया है. कहीं भी इसका भी उल्लेख नहीं है कि सरकार इसे लागू कराने का प्राथमिक स्रोत होगा लेकिन द्वितीयक और अन्य इसके स्रोत विश्वविद्यालय और महाविद्यालय ही होंगे. इससे पहले जैसी कार्यशैली विश्वविद्यालयों में देखने को मिली है क्या उसे देखते हुए इसके लागू होने पर आशंका नहीं व्यक्त की जा सकती. इस शिक्षा नीति का धरातल पर न उतरने की स्थिति में जिम्मेदारी कैसे तय होगी, होगी भी या नहीं इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है. ऐसा लगता है जैसे नीति नियंताओं ने पूर्व के नाकारेपन से आंखे चुराते हुए यह नीति बनाई है. किसी भी नीति को लागू करने में उसके निर्धारकों की बहुत बड़ी भूमिका होती है.

कुल मिलाकर यह शिक्षा नीति ऊपर से देखने में तो बहुत अच्छी और साफ-सुथरी दिख रही है लेकिन इसकी सफलता और असफलता फिलहाल भविष्य की गोद में है. साथ ही इसे लागू करने में आने वाली अड़चनों का भी पिटारा अभी खुल नहीं पाया है. इसलिए हमें बिना निराश हुए इसकी सफलता की उम्मीद करनी चाहिए, साथही यह भी सोचना चाहिए कि इसमें जो आवश्यक चीजें छूट गई हैं, उन्हें भी इसमें शामिल किया जायेगा. अंत यह कि यदि यह मुकम्मल लागू हो जाती है तो भारत की शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश को टक्कर दे सकती है. 

(9  अगस्त, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


संतोष कुमार राय 

पिछ्ले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है. यह स्थिति और भयावह हो उससे पहले उत्तर प्रदेश में लंबी अवधि की पूर्णबंदी बहुत जरुरी हो गई है. अब जैसे जैसे महानगरों की स्थिति में थोड़ा सुधार हो रहा है छोटे-छोटे जिलों में कोरोना प्रभावितों की प्रतिदिन मिलने वाली संख्या में वृद्धि हो रही है. प्रदेश सरकार की ओर से हर तरह की सजगता और प्रशासनिक कड़ाई के बावजूद कुल संख्या में प्रतिदिन कुछ न कुछ वृद्धि हो ही रही है.

पिछले कुछ दिनों के आंकड़ों पर नजर डाली जाय तो ये हमें डराने वाले आंकड़ें हैं. अब प्रतिदिन कोरोना संक्रमित केस मिलने का रिकॉर्ड बन रहा है. 24 जुलाई को अब तक का सर्वाधिक 2529 नए पॉजिटिव केस मिले. इससे पहले यह एक दिन में मिलने वाले मरीजों की सर्वाधिक संख्या है. जबकि 22 जुलाई को 2308, 19 जुलाई को 2250 पाजिटिव केस मिले थे। इसका असर यह हुआ है कि राज्य में कुल संक्रमितों की संख्या में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई. राज्य में कुल संक्रमितों का आंकड़ा अब 60000 के पार हो गया है, जो राज्य सरकार के लिए और आम जनमानस के लिए गहरी चिंता का विषय है. इसमें ख़ुशी की बात यह है कि प्रदेश में पाए गए कुल मरीजों में से 36000 से अधिक मरीज ठीक होकर अपने घर जा चुके हैं.  हैं, जबकि एक्टिव केस 21000 के आस-पास है. वहीँ केस बढ़ने के साथ ही प्रत्येक 24 घंटे के कोरोना से मरने वालों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है. यह सख्या अब 24 घंटे में 36 से ऊपर जा रही है. प्रदेश में मरने वालों की संख्या अब 1300 से अधिक हो गई है. उत्तर प्रदेश में जुलाई महीने में हर दिन कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी से लगातार रिकॉर्ड टूट रहा है। बीते 2३-24 दिनों में 36000 से अधिक रोगी मिल चुके हैं, जबकि मार्च से जून तक 23070 मरीज मिले थे।

यदि मार्च से जून तक के आंकड़ों पर नजर डाली जाय तो हम पाते हैं कि लॉक डाउन के दौरान कोरोना का संक्रमण उत्तर प्रदेश में बहुत नियंत्रण में था. लॉक डाउन खुलने के बाद से यह बेकाबू होता जा रहा है. पहले जो संख्या पुरे प्रदेश में आती थी अब वह प्रत्येक जिले से मिल रही है जो सरकार के लिए थोड़ी असहजता का कारण बनता जा रहा है. यदि शीघ्र इसका निदान नहीं हुआ तो आने वाला समय प्रदेश की जनता के लिए कितना भयावह होगा, इसका अनुमान लगा पाना कठिन है.

अब सवाल उठता है कि इसे कैसे रोका जाय और इसमें सरकार की क्या भूमिका हो सकती है. इसके लिए लॉक डाउन या पूर्णबंदी बहुत जरुरी है. इसके आलावा और कोई रास्ता भी नहीं है. आम जनमानस के भरोसे इसे रोक लगभग असंभव ही है. अभी भी प्रदेश के छोटे-छोटे शहरों में सामान्य बंदी या रात्रि कर्फ्यू का कोई बहुत मतलब नहीं है. लोग न तो सजग हैं और न ही सरकारी आदेशों के मान रहे हैं. विशेह्स्कर उन जगहों पर जो सार्वजनिक पहुँच की जगहें हैं. जैसे बैंक, बाजार, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन आदि. इन सभी जगहों को कुछ दिन के लिए बंद कर दिया जाना चाहिए जिससे संक्रमण की चेन टूटे और इसकी वृद्धि पर रोक लगे, क्योंकि इसके आलावा इसे रोकने का कोई दूसरा साधन नहीं है. अभी तक सरकार की ओर से इस सन्दर्भ में कोई न तो सूचना जारी हुई है और न ही कोई तैयारी दिख रही है. इस बीच अलग-अलग जिलों में प्रशासन की ओर से व्यवस्था की जा रही है जो कि नाकाफी है. अब जरुरत है एक बार फिर से सामूहिक प्रयास करने की. यदि ऐसा होता है तो कोरोना की चेन तोड़ने में सफलता मिलना कोई कठिन काम नहीं है.

(2 अगस्त, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित)


सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...