शुक्रवार, 2 मई 2014

बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता पूर्वांचल


आज़ादी के इतने सालों बाद भी पूर्वांचल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। किसी भी समाज के विकास जो बुनियादी सुविधाएं है उनमें बिजली, पानी, सड़क, इलाज और शिक्षा है। आप जैसे ही बनारस से पूर्व की ओर बढ़ेंगे आपको सहज विश्वास नहीं होगा कि आप उसी देश या प्रदेश में जा रहे हैं जो भारत का ही एक अहम हिस्सा है। सड़कें ऐसी हैं कि आप 2 घंटे का रास्ता 5 घंटे में तय करेंगे। घोर अशिक्षा का शिकार है यह क्षेत्र। कई कई दिनों तक बिजली नहीं रहती हैम पानी की तो बात ही नहीं है आज भी कई गांवों के लोग नदियो का प्रदूषित पानी पीते हैं। किसानों के लिए किसी प्रकार की सुविधा नहीं है जबकि कृषि ही एकमात्र इस क्षेत्र के जीविकोंपार्जन का साधन है। स्वास्थ्य की हालत तो पूछिए मत बस किसी दिन मंत्री और मुख्यमंत्री को बोल दीजिये की अपनी अम्मा को सामान्य लाइन में दिखा के बता दें। नानी याद आ जाएगी। मतलब यह कि आज जिस हालत में यह क्षेत्र पहुंचा है उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाय? किसी जमाने में देश का वह हिस्सा अँग्रेजी हुकूमत की जड़ हिला देता था उसे इन सरकारों ने बिकलांग बना दिया। दो सरकारों का नाम मैं यहाँ खुलकर लेना चाहूँगा जिसने पूर्वांचल के साथ सौतेला व्यवहार किया और ये दोनों हैं सपा और बसपा। मजे की बात यह है कि जब भी इनकी प्रदेश में सरकार रही है सर्वाधिक सहभागिता इस क्षेत्र की ही रही है। ये वोट पूर्वांचल से लेते रहे और विकास पश्चिमी उत्तर प्रदेश और सैफई करते रहे। मैं किसी भी क्षेत्र के विकास को बुरा नहीं मानता हूँ लेकिन उसमे भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस क्षेत्र में गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, कुशीनगर और देवरिया प्रमुख हैं। क्षेत्रीय पार्टियों ले आत्मविश्वास का एक नमूना देखिये। सपा ने बसपा के समय के प्रख्यात घोटालेबाज बाबूसिंह कुशवाहा की पत्नी को खड़ा किया है। बसपा ने पड़ोसी जिले के किसी कैलाश यादव को खड़ा किया है जो कभी सपा में हुआ करते थे। दोनों मूलरूप से बाहर के हैं और आपस में अदला-बदली करते रहे हैं। यही नहीं दिली के पास के कोई नेता डी पी यादव हैं, वे भी पहुंचे हैं। सपा-बसपा ऐसे चुनाव लड़ रही है जैसे उन्होने विकास का सारा पैसा वहीं लगाया है। भाजपा ने गाजीपुर के सबसे पुराने नेता मनोज सिन्हा को खड़ा किया है। सिन्हाजी बेहद ईमानदार और सुलझे हुए नेता हैं। 1999 से 2004 तक सिन्हाजी यहाँ के सांसद थे। उस दौरान उनके फंड का समुचित और सही उपयोग क्षेत्र के विकास में हुआ था। पहली बार उस क्षेत्र के अनेक गाँवो को पक्की सड़के नसीब हुई। उससे पहले सड़के नहीं थी लोग घुटने तक कीचड़ में धंस के बाहर जाते थे। लेकिन सिन्हाजी ने जिला के विकास को जहां छोड़ा था वह आज भी उसी जगह खड़ा है। मसलन ग्रामीण इलाके में जो सड़के बनीं थी आज तक उन पर दूसरे लोगों एक टुकड़ा तक नहीं डाला। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे वहाँ की जनता वाकिफ है। इस बार के चुनाव में स्थिति बिलकुल बदल गई है। इस बार जाति और धर्म छोटा पड़ गया है। इस बार का मतदान पूर्वांचल के लोग विकास के मुद्दे पर करने जा रहे हैं।

रविवार, 16 मार्च 2014

बनारसी राजनीतिक मिज़ाज और इस बार का चुनाव

                                                                                                सन्तोष कुमार राय
          इस बार के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम को जिस तरह से चर्चा का केंद्र बनाया गया है उस लिहाज से मोदी का बनारस से चुनाव लड़ना बनारस और मोदी दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बनारस के साथ बने रहेंगे? मेरा अनुमान है कि ऐसा होगा नहीं और पिछले 60 वर्षों से अपनी भावुकता और बनारसीयत के अंदाज में ठगे गए बनारसी इस बार भी ठगे जाएंगे और नरेंद्र मोदी चुनाव के बाद इस सीट को छोड़ देंगे और फिर गुजरात की सीट को लेकर प्रधानमंत्री बन जाएंगे। बहरहाल यह एक कयास है सच्चाई नहीं है। जहाँ तक फायदे की बात है तो मोदी के बनारस आ जाने से भाजपा के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आएगा और उसका प्रभाव पूर्वांचल के साथ बिहार पर भी पड़ेगा। मतदाताओं के लिए जिन सीटों पर असमंजस की स्थिति रहेगी उन सीटों पर भी वे मोदी के नाम पर भाजपा जे जुड़ सकते हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि जाति और धर्म का जो बीज इन क्षेत्रों में बहुत पहले बोया गया था उसका फल कई पार्टियों ने काट लिया है। जहाँ तक भाजपा का सवाल है तो उसने भी धर्म के आधार पर अपना आंदोलन यूपी के अयोध्या में ही शुरू किया था जिसके कुछ छींटे बनारस भी आए थे और इस सीट को 90 से 2009 तक, बीच में 2004 को छोड़कर भाजपा का बना दिये। इस बार का चुनाव कई मायनों में दूसरे तरह का है। इस लिहाज से वाराणसी में मोदी की दावेदारी का विश्लेषण बहुत जरूरी है। अभी तक मुख्य रूप से वाराणसी की दावेदारी में तीन नाम आए हैं जिन्हे ध्यान में रखकर वाराणसी के मतदाताओं पर विचार होना चाहिए। मोदी के समानांतर इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल भी आ रहे हैं। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे पूर्वांचल के प्रख्यात बाहुबली मुख्तार अंसारी भी मोदी के समक्ष होंगे, जिनका अतीत कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में घूमता रहा है। इस क्षेत्र के अतीत पर अगर ध्यान दिया जाय तो यह क्षेत्र भाजपा के बाहुबली विधायक कृष्णानंद राय का कार्य क्षेत्र रहा है। कृष्णनन्द और मुख्तार की लड़ाई में निश्चित तौर पर मतदाताओं के दो पक्ष बने हैं और वे आज भी उसी तेवर के साथ काम कर रहे हैं जिसके नमूने कभी-कभी देखने को मिल जाते हैं। यह सच्चाई है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी मुस्लिम वोटरों का एक बड़ा तबका मोदी को स्वीकार नहीं कर रहा है। बनारस में मुस्लिम वोटरों की संख्या ठीक-ठाक है। दूसरा वर्ग वह है जो यहाँ जाति की लड़ाई लड़ता है। अतीत के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा को बनारस में कुछ एक अपवादों को छोड़कर सवर्ण वोटरों की पार्टी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी स्थिति में परंपरागत भाजपा विरोधी वोटर खुद को मोदी के विरोध में स्थापित करेगा। जहां तक केजरीवाल की बात है तो उन्हे भाजपा जिस तरह हल्के में ले रही है दरअसल वैसी स्थिति है नहीं। भाजपा के नेताओं की सबसे बड़ी कमी है कि वे कभी भी अपने विरोधियों की क्षमता को स्वीकार नहीं करते और अपनी राग ही अलापने में अपनी बहदुरी समझते हैं। इसका परिणाम 2004, 2009 और कुछ महीने पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखा चुके हैं फिर भी सच्चाई से आंखे मोड़ रहे हैं। केजरीवाल जितने खतरनाक कांग्रेस के लिए हैं उससे कम भाजपा के लिए नहीं हैं। जहाँ तक बनारस में वोटरों की बात है तो हम इसे तीन वर्गों में देख सकते हैं। पहला वह है जो परंपरागत भाजपा का वोट है। दूसरा वह है जो क्षेत्रीय पार्टियाँ, मसलन सपा, बसपा और मुख्तार की पार्टी के वोटर हैं जो कभी सपा तो कभी बसपा पर वोट करते रहे हैं। तीसरा वर्ग कांग्रेस का है। कांग्रेस का वोट बँटेगा यह तय है लेकिन यह भी तय है कि वह मोदी को उस हिसाब से नहीं मिलेगा जैसा भाजपा अनुमान लगा रही है। अगर इस चुनाव में केजरीवाल नहीं होते तो शायद मोदी को इसका लाभ मिल जाता लेकिन केजरीवाल अगर सेंध लगायेंगे तो मोदी के लिए खतरा हो सकता है जो कि 2009 में मुरली मनोहर जोशी को नहीं था।
          मोदी के बनारस आने से निश्चित तौर पर भाजपा को लाभ होगा। लेकिन 90 के दशक मे भाजपा ने राजनीति में जो प्रयोग किया था उसका प्रभाव इस चुनाव में मोदी की सीट पर भी पड़ेगा। देश के विकास की जगह राजनीति में भाजपा ने नया प्रयोग किया और एक खास समुदाय की आस्था को मुद्दा बनाया और राम मंदिर के आधार पर आम चुनाव में आए जिसका कई प्रान्तों में त्वरित लाभ मिला। वह पहला दौर था जब राजनीति में सत्ता की नाकामियों को गिनाने की बजाय लीक से हटकर बिलकुल नायाब मुद्द सामने आया। भाजपा की पारंपरिक सीट की तलाश करते हुए नरेंद्र मोदी बनारस आ गये। अब यह देखना होगा कि इस सीट पट भाजपा के साथ अन्य दल किस तरह से आते हैं। अगर सपा और बसपा ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया तो मोदी की सीट का निकालना बहुत मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है और मुख्तार अंसारी सपा के पूर्व नेता भी हैं आज सपा से उनकी नज़दीकियाँ भी है और इसका लाभ मुख्तार को मिल सकता है। वैसे अभी कुछ भी साफ साफ नहीं कहा जा सकता है लेकिन भाजपा और मोदी का यह फैसले को बहुत योग्य नहीं कहा जा सकता।

           

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

आंदोलनधर्मी राजनीति बनाम राजनीतिक स्थायित्व का प्रश्न

 सन्तोष कुमार राय
                                                                              
लोकतंत्र में परिवर्तन एक सच्चाई है और यह सच्चाई समय-समय पर घटित होती रही है। प्रतिरोध और परिवर्तन का बहुत ही गहरा रिश्ता है। भारतीय राजनीति के संदर्भ यह बात अधिक सही और सटीक है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध भी हमारे लोकतंत्र का हिस्सा है। हर परिवर्तन से हम स्थायित्व की अपेक्षा करते हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है। । आखिर क्या कारण है कि आज तक भारतीय जनमानस का मिजाज परंपरागत राजनीति के प्रति स्थिर नहीं हुआ है या फिर हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था आम जनमानस की आकांक्षा-अपेक्षा और विचार के अनुकूल विकसित नहीं हो पाई है ? इसके लिए हमें स्वातंत्र्योत्तर राजनीति को कई टुकड़े में देखने की जरूरत है। इसका पहला हिस्सा 1975 से पहले का है। यह दौर भारतीय राजनीति की एकदलीय व्यवस्था का दौर है। यहाँ यह कहना गलत होगा कि उस दौर में विपक्ष-विहीन सरकार काम करती रही है लेकिन सच्चाई यही है कि सत्ता के लिए वह दौर विपक्ष-विहीन ही रहा है। इसका कारण बहुत साफ है। वह पूरा का पूरा दौर बिखरे हुए विपक्ष का दौर रहा है जबकि लोकतंत्र की मर्यादा को बचाने के लिए सबसे जरूरी है संगठित और व्यवस्थित विपक्ष। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब-जब विपक्ष संगठित और व्यवस्थित हुआ है भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव हुए हैं।
            इमरजेंसी के बाद का दौर संगठित विपक्ष का दौर है। भारतीय लोकतंत्र के स्वरूपगत बदलाव का दौर है। जो राजनीति सिर्फ दिल्ली को ओर देखती रहती थी उसकी दिशा बदल गई। भारत के गाँव जिस विकास की बाट जोहते-जोहते पाँच साल में मृत प्राय हो जाते थे, पहली बार उनकी ओर दिल्ली को मुड़कर देखना पड़ा। तात्पर्य यह कि भारत में राजनीति का विकेन्द्रीकरण हुआ। क्षेत्रीय राजनीति का उभार हुआ। लगभग सभी प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके नफा-नुकसान अलग हुए। वह एक अलग बहस का विषय है।  लेकिन एक बात साफ है कि भारत जैसे बहुभाषा-भाषी, बहु-सांस्कृतिक, बहु-जातीय और बहु-धार्मिक देश में राजनीतिक पार्टी एक क्यों ? इस तरह के बदलाओं को दिशा देने के लिए समय-समय पर बदलाव धर्मी नेताओं का उदय हुआ, जिन्होने भारतीय समाज के प्रतिरोध को सार्थक और सही दिशा दी।
            दरअसल प्रतिरोध लोकतंत्र की अहम ईकाई है। इस इकाई के अनेक नेता हुए हैं। इनमें लोहिया, जेपी, राजनारायण वाजपेयी, आडवाणी जैसे नेताओं का नाम लिया जा सकता है। इन नेताओं ने आम जनता के मानस को न सिर्फ समझा बल्कि उसके सहारे भारत की राजनीतिक सत्ता की दिशा को भी परिवर्तित करने का साहस किया। यह कहना गलत नही होगा कि भारतीय जनमानस बदलाव-धर्मी है। उसे राजनीति और समाज की एकरसता स्वीकार नहीं है। वह किसी भी ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं करता जो एक समय के बाद परंपरागत हो जाय, या जो सामाजिक बदलाव की गति में आम जनमानस के कदम से कदम मिलाने के बजाय अपनी जड़ मानसिकता को थोपने का काम करे।
            स्वाधीन भारत के जितने भी राजनीतिक आंदोलन हुए हैं वे सभी किसी-न-किसी अस्वीकार भावना को लेकर ही हुए हैं। कुछ बुद्धिजीवी भारत के राजनीतिक आंदोलनों को असफल मानते हैं, साथ ही यह आरोप भी लगाते हैं कि ये आंदोलन दिशाहीन थे और आमजन को दिग्भ्रमित कर दिये थे, इसीलिए सफल नहीं हुए। मेरा मानना है कि राजनीतिक आंदोलन में असफलता के लिए न तो कोई जगह होती है, और न ही असफलता जैसी कोई चीज होती है। उसमें जो कुछ भी होता है वह सिर्फ सफलता का प्रतीक होता है। स्वतंत्रता के बाद से सन् 75 तक भारतीय जनता ने उस समय की सरकार को कई मौके दिये और लगातार आशा की निगाह से देखती रही कि सुधार के दिन आएंगे, लेकिन वे दिन नहीं आए और जनता का सरकार से मोहभंग हो गया। इस मोहभंग का ही नतीजा था कि एक जमी-जमाई सरकार को जनता ने सत्ता से अपदस्थ कर दिया। उस दौर में इंदिरा गांधी जैसी नेता को राजनारायण ने हरा दिया। कोई तो ऐसी बात रही होगी जिसे जनता ने अस्वीकार किया। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले नेताओं ने भारतीय राजनीति का केन्द्रीकरण कर दिया। 47 से लेकर आज तक भारत की राजनीति और सत्ता तंत्र कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। केंद्रीकृत राजनीति को तोड़ने के अनेक प्रयास हुए। जनसंघ का विकसित रूप आज भाजपा है जिसने निरंतर कांग्रेस का विरोध किया और सत्ता में भी आए लेकिन कांग्रेस ने फिर कब्जा जमा लिया। मनमोहन सिंह की सरकार को इन पांच वर्षों में जितने आंदोलनों का सामना करना पड़ा है शायद ही किसी सरकार को ऐसी दुर्दशा से गुजरना पड़ा होगा। भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के रूप में अनेक आंदोलनो में सक्रिय भूमिका निभाया तो वहीं अलग-अलग समाज के लोगों ने भी आंदोलन किया जो अपने प्रारूप में सफल रहे।
            आंदोलन से पैदा हुई राजनीति पर सत्ताधारी वर्ग अक्सर यह आरोप लगता है कि अमुक पार्टी और अमुक नेता संविधान विरोधी हैं, अराजक हैं, फासिस्ट हैं। सत्ताधारी वर्ग खुद को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक और जनता का हितैषी बताता है। 77 के आंदोलनकारी नेता संवैधानिक ढांचे के विरोधी नहीं थे। लेकिन उनका विरोध इस ढांचे के अंदर आई औपनिवेशिक मानसिकता से जरूर था। लोहिया और जयप्रकाश नारायण द्वारा खड़ा किए गए समाजवादी आंदोलन को राजनारायण जैसे कार्यकर्ताओं ने ही सही मुकाम तक पहुंचाया। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि अगर उस चुनाव में कांग्रेस की हार नहीं होती तो देश का राजनीतिक दंभ कहाँ होता। सरकार और आम आदमी  के बीच कितनी दूरी होती। उस दौर में भारतीय जनता ने सत्ताधारी नेताओं को यह एहसास करा दिया कि वह जिसे चुनकर सदन तक पहुंचा सकती है उसे जमीन पर भी ला सकती है।
            प्रतिरोध की राजनीति के त्वरित परिणाम नहीं होते। इसके परिणाम दूरगामी होते हैं। त्वरित परिणाम प्रतिकात्मक और अस्थिर होते हैं। अगर जनता पार्टी की सरकार से यह उम्मीद की जाती कि वह पाँच वर्ष तक शासन करेगी तो यह असंभव था। उस सरकार में शामिल लोगों की राजनीतिक चेतना सत्ता-गामी नहीं बल्कि प्रतिरोधी परंपरा की थी। प्रतिरोधी परंपरा कहीं भी समझौतावादी नहीं हो सकती। उसका धर्म और स्वभाव दोनों ही विरोध का होता है। यह विरोध ही है जो उसे अपनों से भी अलग करता है। जिन लोगों के साथ विरोध किया गया बाद में वे भी विरोधी हो गए।

            प्रतिरोधी राजनीति की सफलता और असफलता का संदर्भ सरकार चलाने से नहीं है। मैंने उपर कहा भी है कि इस तरह की राजनीति के परिणाम त्वरित नहीं होते, बल्कि दूरगामी होते हैं। उस समय के प्रतिरोध ने स्वतंत्र भारत की राजनीति की परिभाषा ही बदल दिया। पहली बार भारतीय राजनीति में विपक्ष की अहमियत का एहसास हुआ। 77 तक छुट्टे घोड़े की तरह चल रही मनमानी राजनीति को लगाम लगी और प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इस प्रतिरोध का आकलन उस दौर में कैसा हुआ या किस तरह का परिणाम रहा यह उतना अहम नहीं है। उसकी अहमियत यह है कि उसने प्रतिरोध की राजनीति की संस्कृति को नया और वास्तविक जन्म दिया। इससे पहले तक स्वतंत्र भारत में प्रतिरोध भी उन नेताओं के एहसान तले दबकर हो रहा था और वह अपनी क्षमता खो चुका था। राजनीति के इस मोड़ ने भविष्य के लिए जो नींव तैयार की उसने भारतीय राजनीति की परिभाषा बदल दी। एकपक्षीय और एक-दलीय राजनीति का अवसान हो गया। क्षेत्रीय राजनीति का विकास हुआ। आम जनमानस, जो लगातार एक असहाय की तरह दिल्ली को देख रहा था उसने अपने होने का एहसास कराया और दिल्ली को भी अपनी ओर देखने के लिए मजबूर किया। जनता पार्टी की सरकार के बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका बिखरना था, ऐसा मैं मानता हूँ। अगर वह सत्ता चला ले जाती तो फिर इस देश को कई दशक तक प्रतिरोधी मस्तिष्क के पैदा होने के लिए इंतजार करना पड़ता। उन नेताओं को अपने होने का ज्ञान था और वे ऐसे थे जिन्हे राजभवन से ज्यादा प्रिय आमजन का साथ था। उन्होने पुनः उसे ही चुना। अंत में हम इस बिन्दु पर भी विचार कर सकते हैं कि आज जिस तरह से प्रतिरोध की राजनीति मुख्यधारा के परेशानी का सबब बन जा रही है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ सरकार को चलाने में अपनी भूमिका अदा कर रही हैं उनकी पृष्ठभूमि में वे ही प्रतिरोध हैं जिन्हें असफल और आलोकतांत्रिक कहा जाता है। अगर इस देश में आंदोलन नहीं होते तो शायद इस देश का चेहरा और बुरा होता और लोकतंत्र के नाम पर कौन सा तंत्र चलता इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। इतने प्रखर विरोध और बदलाव के बावजूद भारतीय राजनीति जिस तरह से परिवारवाद के चंगुल में जकड़ती जा रही है वह भविष्य के लिए चिंता का विषय है। बावजूद इसके प्रतिरोध है और रहेगा।