मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

आंदोलनधर्मी राजनीति बनाम राजनीतिक स्थायित्व का प्रश्न

 सन्तोष कुमार राय
                                                                              
लोकतंत्र में परिवर्तन एक सच्चाई है और यह सच्चाई समय-समय पर घटित होती रही है। प्रतिरोध और परिवर्तन का बहुत ही गहरा रिश्ता है। भारतीय राजनीति के संदर्भ यह बात अधिक सही और सटीक है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ा अंतर्विरोध भी हमारे लोकतंत्र का हिस्सा है। हर परिवर्तन से हम स्थायित्व की अपेक्षा करते हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है। । आखिर क्या कारण है कि आज तक भारतीय जनमानस का मिजाज परंपरागत राजनीति के प्रति स्थिर नहीं हुआ है या फिर हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था आम जनमानस की आकांक्षा-अपेक्षा और विचार के अनुकूल विकसित नहीं हो पाई है ? इसके लिए हमें स्वातंत्र्योत्तर राजनीति को कई टुकड़े में देखने की जरूरत है। इसका पहला हिस्सा 1975 से पहले का है। यह दौर भारतीय राजनीति की एकदलीय व्यवस्था का दौर है। यहाँ यह कहना गलत होगा कि उस दौर में विपक्ष-विहीन सरकार काम करती रही है लेकिन सच्चाई यही है कि सत्ता के लिए वह दौर विपक्ष-विहीन ही रहा है। इसका कारण बहुत साफ है। वह पूरा का पूरा दौर बिखरे हुए विपक्ष का दौर रहा है जबकि लोकतंत्र की मर्यादा को बचाने के लिए सबसे जरूरी है संगठित और व्यवस्थित विपक्ष। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब-जब विपक्ष संगठित और व्यवस्थित हुआ है भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव हुए हैं।
            इमरजेंसी के बाद का दौर संगठित विपक्ष का दौर है। भारतीय लोकतंत्र के स्वरूपगत बदलाव का दौर है। जो राजनीति सिर्फ दिल्ली को ओर देखती रहती थी उसकी दिशा बदल गई। भारत के गाँव जिस विकास की बाट जोहते-जोहते पाँच साल में मृत प्राय हो जाते थे, पहली बार उनकी ओर दिल्ली को मुड़कर देखना पड़ा। तात्पर्य यह कि भारत में राजनीति का विकेन्द्रीकरण हुआ। क्षेत्रीय राजनीति का उभार हुआ। लगभग सभी प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टियों की बाढ़ आ गई। इसके नफा-नुकसान अलग हुए। वह एक अलग बहस का विषय है।  लेकिन एक बात साफ है कि भारत जैसे बहुभाषा-भाषी, बहु-सांस्कृतिक, बहु-जातीय और बहु-धार्मिक देश में राजनीतिक पार्टी एक क्यों ? इस तरह के बदलाओं को दिशा देने के लिए समय-समय पर बदलाव धर्मी नेताओं का उदय हुआ, जिन्होने भारतीय समाज के प्रतिरोध को सार्थक और सही दिशा दी।
            दरअसल प्रतिरोध लोकतंत्र की अहम ईकाई है। इस इकाई के अनेक नेता हुए हैं। इनमें लोहिया, जेपी, राजनारायण वाजपेयी, आडवाणी जैसे नेताओं का नाम लिया जा सकता है। इन नेताओं ने आम जनता के मानस को न सिर्फ समझा बल्कि उसके सहारे भारत की राजनीतिक सत्ता की दिशा को भी परिवर्तित करने का साहस किया। यह कहना गलत नही होगा कि भारतीय जनमानस बदलाव-धर्मी है। उसे राजनीति और समाज की एकरसता स्वीकार नहीं है। वह किसी भी ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं करता जो एक समय के बाद परंपरागत हो जाय, या जो सामाजिक बदलाव की गति में आम जनमानस के कदम से कदम मिलाने के बजाय अपनी जड़ मानसिकता को थोपने का काम करे।
            स्वाधीन भारत के जितने भी राजनीतिक आंदोलन हुए हैं वे सभी किसी-न-किसी अस्वीकार भावना को लेकर ही हुए हैं। कुछ बुद्धिजीवी भारत के राजनीतिक आंदोलनों को असफल मानते हैं, साथ ही यह आरोप भी लगाते हैं कि ये आंदोलन दिशाहीन थे और आमजन को दिग्भ्रमित कर दिये थे, इसीलिए सफल नहीं हुए। मेरा मानना है कि राजनीतिक आंदोलन में असफलता के लिए न तो कोई जगह होती है, और न ही असफलता जैसी कोई चीज होती है। उसमें जो कुछ भी होता है वह सिर्फ सफलता का प्रतीक होता है। स्वतंत्रता के बाद से सन् 75 तक भारतीय जनता ने उस समय की सरकार को कई मौके दिये और लगातार आशा की निगाह से देखती रही कि सुधार के दिन आएंगे, लेकिन वे दिन नहीं आए और जनता का सरकार से मोहभंग हो गया। इस मोहभंग का ही नतीजा था कि एक जमी-जमाई सरकार को जनता ने सत्ता से अपदस्थ कर दिया। उस दौर में इंदिरा गांधी जैसी नेता को राजनारायण ने हरा दिया। कोई तो ऐसी बात रही होगी जिसे जनता ने अस्वीकार किया। स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले नेताओं ने भारतीय राजनीति का केन्द्रीकरण कर दिया। 47 से लेकर आज तक भारत की राजनीति और सत्ता तंत्र कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। केंद्रीकृत राजनीति को तोड़ने के अनेक प्रयास हुए। जनसंघ का विकसित रूप आज भाजपा है जिसने निरंतर कांग्रेस का विरोध किया और सत्ता में भी आए लेकिन कांग्रेस ने फिर कब्जा जमा लिया। मनमोहन सिंह की सरकार को इन पांच वर्षों में जितने आंदोलनों का सामना करना पड़ा है शायद ही किसी सरकार को ऐसी दुर्दशा से गुजरना पड़ा होगा। भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के रूप में अनेक आंदोलनो में सक्रिय भूमिका निभाया तो वहीं अलग-अलग समाज के लोगों ने भी आंदोलन किया जो अपने प्रारूप में सफल रहे।
            आंदोलन से पैदा हुई राजनीति पर सत्ताधारी वर्ग अक्सर यह आरोप लगता है कि अमुक पार्टी और अमुक नेता संविधान विरोधी हैं, अराजक हैं, फासिस्ट हैं। सत्ताधारी वर्ग खुद को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक और जनता का हितैषी बताता है। 77 के आंदोलनकारी नेता संवैधानिक ढांचे के विरोधी नहीं थे। लेकिन उनका विरोध इस ढांचे के अंदर आई औपनिवेशिक मानसिकता से जरूर था। लोहिया और जयप्रकाश नारायण द्वारा खड़ा किए गए समाजवादी आंदोलन को राजनारायण जैसे कार्यकर्ताओं ने ही सही मुकाम तक पहुंचाया। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि अगर उस चुनाव में कांग्रेस की हार नहीं होती तो देश का राजनीतिक दंभ कहाँ होता। सरकार और आम आदमी  के बीच कितनी दूरी होती। उस दौर में भारतीय जनता ने सत्ताधारी नेताओं को यह एहसास करा दिया कि वह जिसे चुनकर सदन तक पहुंचा सकती है उसे जमीन पर भी ला सकती है।
            प्रतिरोध की राजनीति के त्वरित परिणाम नहीं होते। इसके परिणाम दूरगामी होते हैं। त्वरित परिणाम प्रतिकात्मक और अस्थिर होते हैं। अगर जनता पार्टी की सरकार से यह उम्मीद की जाती कि वह पाँच वर्ष तक शासन करेगी तो यह असंभव था। उस सरकार में शामिल लोगों की राजनीतिक चेतना सत्ता-गामी नहीं बल्कि प्रतिरोधी परंपरा की थी। प्रतिरोधी परंपरा कहीं भी समझौतावादी नहीं हो सकती। उसका धर्म और स्वभाव दोनों ही विरोध का होता है। यह विरोध ही है जो उसे अपनों से भी अलग करता है। जिन लोगों के साथ विरोध किया गया बाद में वे भी विरोधी हो गए।

            प्रतिरोधी राजनीति की सफलता और असफलता का संदर्भ सरकार चलाने से नहीं है। मैंने उपर कहा भी है कि इस तरह की राजनीति के परिणाम त्वरित नहीं होते, बल्कि दूरगामी होते हैं। उस समय के प्रतिरोध ने स्वतंत्र भारत की राजनीति की परिभाषा ही बदल दिया। पहली बार भारतीय राजनीति में विपक्ष की अहमियत का एहसास हुआ। 77 तक छुट्टे घोड़े की तरह चल रही मनमानी राजनीति को लगाम लगी और प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इस प्रतिरोध का आकलन उस दौर में कैसा हुआ या किस तरह का परिणाम रहा यह उतना अहम नहीं है। उसकी अहमियत यह है कि उसने प्रतिरोध की राजनीति की संस्कृति को नया और वास्तविक जन्म दिया। इससे पहले तक स्वतंत्र भारत में प्रतिरोध भी उन नेताओं के एहसान तले दबकर हो रहा था और वह अपनी क्षमता खो चुका था। राजनीति के इस मोड़ ने भविष्य के लिए जो नींव तैयार की उसने भारतीय राजनीति की परिभाषा बदल दी। एकपक्षीय और एक-दलीय राजनीति का अवसान हो गया। क्षेत्रीय राजनीति का विकास हुआ। आम जनमानस, जो लगातार एक असहाय की तरह दिल्ली को देख रहा था उसने अपने होने का एहसास कराया और दिल्ली को भी अपनी ओर देखने के लिए मजबूर किया। जनता पार्टी की सरकार के बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका बिखरना था, ऐसा मैं मानता हूँ। अगर वह सत्ता चला ले जाती तो फिर इस देश को कई दशक तक प्रतिरोधी मस्तिष्क के पैदा होने के लिए इंतजार करना पड़ता। उन नेताओं को अपने होने का ज्ञान था और वे ऐसे थे जिन्हे राजभवन से ज्यादा प्रिय आमजन का साथ था। उन्होने पुनः उसे ही चुना। अंत में हम इस बिन्दु पर भी विचार कर सकते हैं कि आज जिस तरह से प्रतिरोध की राजनीति मुख्यधारा के परेशानी का सबब बन जा रही है और तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ सरकार को चलाने में अपनी भूमिका अदा कर रही हैं उनकी पृष्ठभूमि में वे ही प्रतिरोध हैं जिन्हें असफल और आलोकतांत्रिक कहा जाता है। अगर इस देश में आंदोलन नहीं होते तो शायद इस देश का चेहरा और बुरा होता और लोकतंत्र के नाम पर कौन सा तंत्र चलता इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। इतने प्रखर विरोध और बदलाव के बावजूद भारतीय राजनीति जिस तरह से परिवारवाद के चंगुल में जकड़ती जा रही है वह भविष्य के लिए चिंता का विषय है। बावजूद इसके प्रतिरोध है और रहेगा। 

1 टिप्पणी:

  1. भैया , भारतीय राजनीति मे सत्ता का विकेद्रीकरण कब ,कैसे हुआ ?इसको समझना चाहता हूँ । कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो मुझे लगता है की विकेन्द्रीकरण नहीं हो पाया । कॉंग्रेस के विरोध मे जितनी क्षेत्रीय पार्टियां खड़ी हुई थी ,जिसे आप वैकल्पिक राजनीति कह रहे है वे सभी आगे चलकर कॉंग्रेस को मज़बूत करने या बनाये रखने तथा परिवारवाद मे लग गये । वो भी कॉंग्रेस के अनुसरण मे जुट गये ,जनता छली गयी । जनता को विकल्प नहीं मिल पाया । अब आप पार्टी कुछ उम्मीद लेकर आई है तो जनता मे कुछ आस जगी है ।

    उत्तर देंहटाएं