सोमवार, 29 अगस्त 2011

शून्य से उभरेगा विकल्प

मुद्दा

सन्तोष कुमार राय

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित.....

आज भ्रष्टाचार हमारे देश की संसदीय राजनीति का अहम हिस्सा बन गया है। जब से राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर चला है, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल होता जा रहा है। वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर पर दो गठबंधन हैं। जनता दोनों को आजमा चुकी है। आज देश के मतदाता विकल्पहीनता की स्थिति में है। किसे चुना जाय और किस तरीके से चुना जाय, यह प्रश्न आज भारतीय मतदाताओं के सामने एक बड़े रूप में खड़ा है। जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो देश की जनता को यह भरोसा हुआ कि इस बार देश को एक समझदार प्रधानमंत्री मिला है। यह भरोसा कु छ अधिक लम्बा चला और मनमोहन सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बन गये। जाहिर सी बात है कि उनको जनता के विास की रक्षा करनी चाहिए थी, लेकिन वे भ्रष्टाचार जैसे अहम विषय पर हाथ खड़ा करते हुए अपनी गठबंधन की मजबूरी गिनाने लगे। दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद जब भ्रष्टाचार का पहला मामला आया था तो उन्होंने जनता को सम्बोधित करते हुए कहा था कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। उसके बाद तो जैसे इस देश में भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गयी। अब सीबीआई भी क्या कर लेगी जब भ्रष्टाचार ने इस देश में ईमानदारी और नैतिक मूल्यकी जगह ले ली है। आज अगर कोई नेता यह कहे कि भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा और आने वाले समय में हम भ्रष्टाचार मुक्त देश के निवासी होंगे तो यह मान लेना चाहिए कि या तो वह जनता को धोखा दे रहा है, या फिर अपने समय की हकीकत से आंख चुरा रहा है। यह भी कहा जा सकता है कि उसे वर्तमान राजनीति का ज्ञान भी नहीं है। भ्रष्टाचार की बात आते ही नेता जनता पर भी यह आरोप लगाते हैं कि उसका चुनाव गलत था, उसे सही प्रतिनिधि का चुनाव करना चाहिए। लेकिन जनता की स्थिति एक विकल्पहीन की है, वह मजबूर है किसी न किसी को अपना मत देने के लिए। और चुनाव के समय तो सभी ईमानदार होते हैं लेकिन जैसे चुनाव जीतते हैं उनके करोड़पति बनने का श्रीगणोश हो जाता है। इसमें भी पकड़े वे ही जाते हैं जो कु छ अधिक लूटते लगते हैं। आज यह कहना बहुत कठिन है कि कौन ईमानदार है और कौन भ्रष्ट है, वस्तुत: हमाम में सब नंगे हैं कोई कम है तो कोई अधिक। अगर ऐसा नहीं होता तो संसद में इतनी भारी संख्या करोड़पतियों की नहीं होती। यहां यह भी सवाल उठाया जा सकता है कि सांसद ही करोड़पति क्यों होते हैं? क्या वे इस देश के बाकी लोगों से अधिक मेहनत करते हैं? और अगर मेहनत के हिसाब से करोड़पति होने का पैमाना तय होना होता तो सबसे पहले देश के किसानों को अमीर होना चाहिए था। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि मौजूदा नियम ऐसे लोगों को देश का प्रतिनिधित्व करने से रोक नहीं पाता है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। इसलिए चुनाव प्रक्रिया में बदलाव अतिआवश्यक हो गया है। अपने चुनाव क्षेत्र का 10 और 20 प्रतिशत वोट पाने वाला भी इस देश में सांसद बन जाता है। ऐसे में वह उन 80 प्रतिशत लोगों को उपेक्षित रखता है जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया। फिर कैसे सम्यक विकास की बात होगी। अब एक निश्चित प्रतिशत में वोट पाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह एक बार इसका भी सर्वे करा ले कि कितने लोग इस तरह की चुनाव पद्धति में विास रखते हैं और कितने लोग इसमें बदलाव चाहते हैं। फिलहाल जो चुनाव पद्धति भारत में चल रही है वह भाई-भतीजावाद की परम पोषक है। ऐसे में गुणवत्ता और क्षमता का कोई मतलब नहीं रह जाता। हमें समझना होगा कि सियासी मजबूरी स्वीकार कर लेने से न तो देश बच सकता है और न ही विकास हो सकता है। नेताओं की यही कथित मजबूरी भारतीय राजनीति को पैतृक धंधे का रूप दे रही है, और इस धंधे के घाटे का खमियाजा देश की आम जनता भुगत रही है। बेकाबू भ्रष्टाचार और महंगाई के आलम में जीवन हर रोज कु छ और कठिन होता जा रहा है। यूरोपीय देशों की तर्ज पर हमारे यहां भी चुनाव प्रक्रिया में कुछ बुनियादी बदलाव जरूरी हो गया है। फिलवक्त जरूरत है कि एक ऐसी पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया बनाई जाए जो अधिकाधिक जनता के समर्थन का प्रतिनिधित्व करे। हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाते वक्त उम्मीद नहीं की होगी कि उनके द्वारा जनता के हित के लिए बनाई गई लोकतांत्रिक व्यवस्था कभी ऐसे भी विकृत स्वरूप ग्रहण कर सकती है। यदि डॉ. अम्बेडकर जैसे लोगों को इसका जरा भी भान होता तो उनके द्वारा जरूर कोई दूसरा रास्ता बनाया गया होता। लेकिन अब बदलाव अवश्यंभावी लगता है। कई बार कु छ बुनियादी परिवर्तन वक्त की जरूरत बन जाते हैं। यह समय भी कु छ ऐसा ही जरूरतमंद है जिसे देश तथा जनहित में स्वीकार किया जाना चाहिए।

शनिवार, 27 अगस्त 2011

इस जनसमर्थन को सही दिशा देने की जरूरत है!

सन्तोष कुमार राय

अभी तक विश्व में जितनी भी जनक्रांतियां हुई हैं उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिला है। बिना जनसमर्थन के जनक्रांति नहीं हो सकती। वर्तमान भारत भी ऐसे ही जागरूक जनता के जनसमर्थन के साथ आगे बढ़ रहा है| अब जरूरत है इसे सही दिशा देने की, लेकिन क्या वर्तमान समय में कार्यरत राजनीतिक दल इस समाज को सही दिशा दे सकते हैं? मुझे लगता है कि अभी तक की स्थिति को देखकर यह नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस और भाजपा दोनों अभी तक अपने विचारों में स्पष्ट नहीं दिख रहे हैं जिससे यह उम्मीद की जाय।

सरकार बार-बार यह आश्वासन दे रही है कि हम भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहते हैं, यह अच्छी बात है इसमें किसी को कोई समस्या नहीं है , सभी लोग यही चाहते हैं। अन्ना के साथ भ्रष्टाचार के विरूद्ध अभियान में शामिल लोग भी यही चाहते हैं, फिर सरकार को समस्या क्यों हो रही है। बार-बार अन्ना हज़ारे के विरूद्ध अनाप-सनाप बयानबाजी क्यों हो रही है। कल संसद में राहुल गांधी ने बहुत दिनों बाद कुछ कहा लेकिन किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि उनके और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के बयान में सिर्फ भाषागत भिन्नता होगी। उन्होंने अन्ना के आन्दोलन को लोकतंत्र पर हमला बताया। अब सवाल यह उठता है यह लोक तंत्र किसका है, किसके लिए है और इसका रक्षक कौन है? भारत में लोकतंत्र को स्थापित करने वाले कौन थे। वे लोग यहीं के थे और आज जब लोकतंत्र खतरे में है तो उसकी रक्षा करने वाले भी यहीं के होंगे। अब यह भी जटिल प्रश्न है कि भारत में लोकतंत्र को किससे खतरा है, जनता से या फिर नेताओं से। अभी तक के हालात को देखते हुए हम यही कह सकते हैं कि जो लोग लोकतंत्र की रक्षा का नारा लगा रहे हैं और आम जनता को उसका विरोधी बता रहे हैं, वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं। इस आन्दोलन में आने वाली जनता से लोकतंत्र को कम सरकार को अधिक खतरा है। ऐसे में सरकार के लोगों का बौखलाना स्वाभविक है। उनके पास कहने को कुछ नहीं है तो अपने को लोकतंत्र का हितैसी ही सिद्ध करने पर तुले हुए है।

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस देश का लोकतंत्र देशवासियों का है, देशवासियों के लिए है और इसकी रक्षा करने वाले भी भारत के ही लोग हैं। किसी भी देश में जनक्रांति कब और क्यों होती है? जहां तक मैं समझता हूँ कोई भी जनक्रांति या जनआन्दोलन तभी होते हैं जब सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का हनन होता है। वर्तमान भारत में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जिसे सरकार भी करना चाहती है और अन्ना के साथ आन्दोलन कर रही जनता भी। यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है आखिर सरकार सिर्फ अपनी बात जनता पर थोपने का प्रयास क्यों कर रही है, उसे जनता की बात सुनाई क्यों नहीं दे रही है।

दरअसल सरकार को चिंता अपने अस्तित्व को बचाने की है। वह बौखलाहट में कई बार गलत बयानबाजी में उलझ रही है। सरकार को लगता है कि यह आन्दोलन उसके खिलाफ है लेकिन यह उसकी गलतफहमी है। यह आन्दोलन सरकार के खिलाफ नहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ है। हां इससे जुड़ी एक बात महत्व की है कि यह भ्रष्टाचार जरूर सरकार समर्थित है। मेरी जानकारी के मुताबिक यह पहला अवसर है जब जनता इतनी जागरूक हुई है और यह भारत के लिए अच्छा संकेत है कि आने वाले समय में कोई भी सरकार इसे नजरंदाज़ नहीं कर पायेगी। उसे जनता के प्रतिरोध का सामना करना ही पड़ेगा।

यह भी पहली बार हुआ है जब प्रतिरोध के मानकों को जनता ने तय किया है किसी विपक्षी पार्टी ने नहीं। ऐसे में विपक्ष की भूमिका भी बहुत अच्छी नहीं है। विपक्षी न तो अपना पक्ष स्पष्ट कर रहे हैं और न ही जनता के आन्दोलन में सहयोग कर रहे हैं, इसलिए उनकी भी भूमिका कम संदिग्ध नहीं है।

अब जनता के सामने इस व्यवस्था से लड़ने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। सरकार और विपक्ष अपना रास्ता तय करे कि उन्हें किसके साथ जाना है और क्या करना है। लोकतंत्र की रक्षा करने वाली जनता के साथ या फिर बचाने वाली सत्ता के साथ। एक बात स्पष्ट है कि अब लोकतंत्र बच जायेगा लेकिन वह बचा हुआ लोकतंत्र किसका होगा जनता का या सत्ता यह भविष्य की गोद में है।

इस आन्दोलन ने हमें जो दिया है उस पर भी विचार करने की जरूरत है। इसमें युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है। यहां समर्थन और विरोध की बात नहीं है कि किसका समर्थन मिल रहा है और किसका विरोध प्राप्त है। खुशी की बात यह है कि बड़े पैमाने पर जागरूकता दिखाई दे रही है और इसका निर्णय भी किसी न किसी रूप में आयेगा ही, अभी आये या कुछ दिनों बाद। अच्छा तो तब होता जब जनतंत्र को मजबूत बनाने के लिए इसमें सभी लोग आगे आते। साथ ही इस जनसमर्थन का उपयोग एक साफ सुथरे लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में हो जाता। आने वाले समय के लिए यह उम्मीद की जा सकती है कि इसे कोई न कोई सकारात्मक रास्ता जरूर मिलेगा।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

दिशाहीन विकास का पैमाना

सन्तोष कुमार राय
25/8/11 के राष्ट्रीय सहारा मे प्रकाशित....

वर्तमान भारत एक दिशाहीन विकास के दौर से गुजर रहा है। जब से सत्ता के गलियारे में भ्रष्टाचार का मामला उठा है भारत में विकास कार्य न के बराबर हुआ है, लिहाजा मंहगाई बेकाबू हो रही है और सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को निर्दोष सिद्ध करने की जुगत में जितना परेशान है उतना विकास में नहीं। विगत दो वर्षों के विकास का लेखा-जोखा हम देख सकते हैं कि किस तरह का काम हुआ। विकास की जो योजनाएं यूपीए के पिछले कार्यकाल में चल रही थी उनके अलावा कोई ऐसा कार्य नहीं हुआ जिसे इस सरकार की बड़ी उपलब्धि के रूप में याद किया जाय, और अगर कागज पर उन योजनाओं का नाम भी आ जाय तो जमीन पर उनका कोई रूप नहीं दिखाई दे रहा है। सरकार ने भ्रष्टाचार पर सफाई देने के सिवा और कोई भी बड़ा कार्य नहीं किया है। लेकिन क्या सफाई दे देने भर से भारत का विकास हो जायेगा? अगर ऐसा होता तो जिस तरह से प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री पिछले दो साल से कह रहे हैं कि मंहगाई कम हो जायेगी, अब तक कम हो गयी होती। उसे सिर्फ जुबानी कम किया गया है हकीकत में वह आज भी वैसी ही है। अब सरकार में शामिल लोगों का एकसूत्रीय कार्य भ्रष्टाचारियों का बचाव करना हो गया है विकास के मुद्दो पर बात करना नहीं। इससे पहले ऐसा नहीं होता था, विपक्ष ही इस तरह के कार्यों में विरोध करता था। इस बार स्थिति बहुत बदल गयी है, इस पूरे प्रकरण में विपक्ष की जगह जनता ने ले लिया है विपक्ष भी पक्ष की तरह तमाशाई बना हुआ है और इस अंधेरपन को देख रहा है। सरकार ने जनता को भी अपनी अज्ञानता का परिचय देते हुए तरजीह नहीं दिया जिसका असर अन्ना के साथ दिखाई दे रहा है।

जनता अब विरोध तक सीमित नहीं है उसमें अब आक्रोश दिखाई दे रहा है। यह आक्रोश अब सिर्फ विकास या भ्रष्टाचार तक ही नहीं है अब तो व्यवस्था परिवर्तन तक की आवाज उठ रही है। विश्व मंच पर इसके कई उदाहरण अभी हाल ही में देखने को मिले हैं। मिस्र की जनता ने क्या किया? यह अलग बात है की वहां तानाशाही थी भारत मे लोकतंत्रात्मक तानाशाही है। लोकतंत्र की दुहाई देकर सत्ताधारी वर्ग जिस तरह का खेल खेल रहा है वह अब असहनीय हो गया है और जनता आज उसी विकास को नकारने के लिए सड़क पर उतर रही है। सरकार के लोग यह राग अलाप रहे हैं कि जनलोकपाल को लोकतंत्र के हिसाब से बनाया गया है। जो लोकतंत्र व्यापक जनसमुदाय का हितैसी नहीं है उस लोकतंत्र को हम नकारते हैं और आज के भारत में कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है।

आज विकास की जगह अपना बचाव महत्वपूर्ण हो गया है। सरकार अपनी बात पर क्यों अड़ी हुई है जब जनता उसे नकारते हुए सड़क पर उतर रही है। लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ नेताओं की नहीं है, वे इसे सिर्फ अपना कर्तव्य न समझें। जनता लोकतंत्र का मूल आधार है इसलिए इसकी रक्षा की सर्वाधिक जिम्मेदारी जनता की ही है। लगभग एक साल से यह चल रहा है और आगे भी इसके समाप्त होने का कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहा है। अब यह बड़ा प्र्श्न हमारे सामने है कि आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा। जनता की परेशानी दिनोदिन बढ़ती जा रही है। देश में जब भी ऐसा कुछ होता है तो जनता ही पिसती है। उसके सामने कौन सा रास्ता है, वह क्या करे? ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो गया है कि जनता के हितों का ध्यान रखते हुए सरकार कोई ठोस कदम उठाए और अपनी बुद्धिमत्ता और जिम्मेदारी का परिचय दे। जनता की परेशानी को कम करना सरकार की जुबानी नहीं, कर्मणीय प्राथमिकता होनी चाहिए। सारी समस्याओं की जड़ में अदूरदर्शिता ही है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार विकास को सही-सही दर्शाए जिससे जनता के सामने उसे झुकना न पड़े।

रविवार, 14 अगस्त 2011

किस विकास पर हम गर्व करें?

सन्तोष कुमार राय

15 अगस्त को, कल सुबह फिर एक बार राष्ट्रध्वज को फहराया जायेगा, उसे सलामी भी दी जायेगी, कई तरह की घोषणाएं भी होंगी, नेता से लेकर अधिकारी तक सभी अपने-अपने ओहदा के अनुसार इसमें सरीक होंगे। इसके प्रति भाव और प्रेम में किसी भी तरह की कमी नहीं है लेकिन इस बार एक चीज नहीं होगी और वह है आत्म गौरव का बोध! यही नहीं वास्तव में जिन्हें इस देश से प्रेम होगा वे दुखी होंगे, यह दुख अपने शहीदों के प्रति जिनके बहते हुए खून पर हम भ्रष्टाचार और नाईंसानियत का अन्धा खेल खेल रहे हैं। कायदे के अनुसार तो अब शहीदों का नाम लेना और झण्डे को फहराना हमें तब तक के लिए बन्द कर देना चाहिए जब तक हम सुखी और मानव रक्षक भारत की ओर कदम नहीं बढ़ाते। भारत एक देश है, वह धर्म वाली गंगा नहीं है कि आप चाहे जितना पाप करें एक बार नहा लेने से सारे पाप धुल जायेंगे। इस देश को आजादी किस तरह से मिली, किन कर्मों से मिली, कितनी मेहनत से मिली और जिन लोगों ने इसमें अपनी जान कुर्बान कर दिया, उसकी अहमियत से आज की राजनेताओं को रत्ती भर भी लेना देना नहीं है। इस देश की आजादी का दर्द उन लोगों से पूछा जा सकता है जिनके उपर से बाप का साया उठ गया और उसके बाद उन लोगों ने कैसा जीवन बिताया।

आज जिस जगह हम खड़े हैं वह बहुत कठिनाई से प्राप्त हुई है, इसकी रक्षा और सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन यह वर्ष भारत के इतिहास में जिसके लिए जाना जायेगा वह गौरव का विषय नहीं है। न सिर्फ अपने देश के लिए बल्कि विश्व मंच पर भी बहुत अच्छी छवि नहीं बनी। वर्तमान सरकार ने जैसा विकास किया है उससे कोई अंजान नहीं है। महंगाई और भ्रष्टाचार के बाद यह वर्ष सतही-आरोपवादी राजनीति के लिए भी जाना जायेगा, जिसे यदि इमानदारी से देशवासियों के सामने रख दिया जाता तो यह माना जा सकता है कि हमारे राजनेताओं को वास्तविक आजादी और तिरंगे से प्रेम है। यह एक तरह की कोरी कल्पना ही है। ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है, इस वर्ष के विकास का जुबानी पुलिन्दा खुलेगा और भारत की आशावादी-पीड़ित जनता सुनकर फुले नहीं समाएगी।

आने वाले समय में इस देश का क्या हाल होगा उसका भी पैमाना मिल सकता है लेकिन वह कब उलट जायेगा, नहीं कहा जा सकता। फिर तो सरकार अपनी मजबूरी गिना कर अगले साल भी झण्डा फहरा दिया जायेगा। विगत चौसठ सालों में हमारा देश जिस तरह की तरक्की को हासिल किया है वह पार्टी के लिए तो ठीक है लेकिन देशवासियों को इससे क्या मिलेगा। उनके हिस्से का अनाज भी तो भण्डारण के अभाव में सड़ जाता है और उनकी भूख से या तो मौत हो जाती है या फिर आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए सरकार के पास क्या जवाब है? विकास हो रहा है, विकास होगा, विकास होने वाला है- यह अब सिर्फ जुमला साबित हो रहा है। यह हकीकत कब बनेगा, आज की स्थिति को देखकर कुछ भी कहना गलत ही होगा। वैसे हम आजादी को सलाम करते हैं, लेकिन आज भ्रष्टाचार की गोद में छटपटाते हुए तिरंगे को लेकर चिंता जरूर है और आगे भी रहेगी।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अन्ना हजारे के संघर्ष का महत्व और सरकार की नीति और नियति

सन्तोष कुमार राय

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह आरोप किस मुद्दे पर, किस व्यक्ति पर और किस जगह लगाया जाय, यह जरूर विचारणीय है। भारतीय राजनीति के लिए यह विडम्बना ही है कि आज जनता के द्वारा लगने वाले आरोप से निजात पाने के बजाय लगातार दूसरे लोगों पर आरोप लगाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की जा रही है। कुछ इसी तरह के विचार अन्ना हजारे के लोकपाल मुद्दे पर देखने को मिल रहा है। सवाल यह है कि जब सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गम्भीर है तो फिर वह घटने के वजाय रोज नया क्यों हो रहा है? आम जनता का आक्रोश क्यों बढ़ रहा है? सरकार के द्वारा बनाई गयी कमेटी पर टीका-टिप्पणी क्यों हो रही थी? जबकि उसमें सरकार के लोग भी शामिल थे? यह कौन सी राजनीति है जिसमें जनता द्वारा चुने जाने के बाद जनता के अविश्वास को विश्वास में न लेकर उल्टा उसी पर प्रतिरोप किया जा रहा है? जन लोकपाल बिल और ड्राफ्टिंग कमेटी के विरूद्ध सबसे पहले सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के कुछ नेताओं ने ही सवाल उठाया, वह भी इस आशय के साथ कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए इस लोकपाल बिल को कांग्रेस का पूरा-पूरा समर्थन है। इस समर्थन और विरोध के बीच कमेटी बन गयी, लेकिन फिर वही पुराना राग और पुरानी डफ़ली। यह लोकपाल, जो सरकार के कुछ काबिल लोगों ने बनाया वे लोग उसमें नहीं आयेगे और अगर आ ही जायेंगे तो क्या कुछ वर्षों की जांच पड़ताल से गुजरने के बाद पुनः बरी हो जायेंगे, इसकी पूरी इमानदारी से इसमें रक्षा की गयी है। अन्ना हजारे क्या साबित करना चाहते है कि उनके दबाव के कारण सत्ताधारी वर्ग ने अपने आपको फंसा ले, यह भारत में नहीं होता है। इस दुनिया में किसे ऐसी महानता प्रिय होगी जो अपने पर अंकुश लगाने के लिए खुद नियम बनाये और उसे लागू करे।

ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस के लोग कैसा लोकतंत्र चाहते हैं। पिछले दो साल में भ्रष्टाचार के जितने मामले सामने आये हैं उतने स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी भी सरकार के प्रारम्भिक दो वर्ष के कार्यकाल में नहीं आये थे। सत्ताधारी वर्ग लोकपाल की अहमियत से भले ही इत्तेफाक नहीं रखे लेकिन यह सचाई है कि इसे राजनीतिक दाव-पेंच में फंसाकर न सिर्फ इसकी अर्थवत्ता को कम कर दिया गया है बल्कि अन्ना के साथ-साथ इस देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं का मजाक बनाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में भारत का आम आदमी किस पर विश्वास करेगा।

सरकार के मनमाने तंत्र का नया नमूना फिर देखने को मिला है। जिस तरह का लोकपाल बना है वह कुछ पन्नों में जगह घेरने के सिवाय कुछ भी नहीं है। अन्ना बार–बार यह अनशन करने की घोषणा कर रहे हैं, लेकिन सरकार उससे स्थाई निजात पाने के बजाय लगातार जिन्दा रखना चाहती है कि लोगों का ध्यान अन्य मुद्दों की ओर से हटा रहे। भ्रष्टाचार और मंहगाई के इस आलम में कौन पिस रहा है सरकार के नुमाईंदे या जनता? सरकार की ओर से बार-बार यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि मंहगाई और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जायेगी लेकिन होता ठीक इसके विपरीत है, जितनी बार सरकार की ओर से समय लिया जाता है कि आने वाले इतने समय में महगाई कम हो जायेगी ठीक उतने समय में मँहगाई कुछ और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में जनता के पास कौन सा रास्ता है, वह क्या करे? क्या मूक बनकर सब कुछ सहे या अपना विरोध जताए? राहुल गांधी का एक बयान आया था जिसमें उन्होंने यह कहा था कि जो लोग भ्रष्टाचार में दोषी पाये जायेंगे उन्हें बख्सा नहीं जायेगा। राहुल गांधी के स्वभावानुसार तो यह बयान ठीक था लेकिन भारत के राजनीतिक धुरन्धरों के बीच इसकी क्या कीमत हो सकती है। अभी तक उनके अन्दर कहीं से भी भावी प्रधानमंत्री का न तो तेवर दिखाई दे रहा है और न क्षमता, बावजूद इसके लोग लगातार उनके लिए घोषणाएं करते आ रहे हैं, यह उनकी सदासयता है। अन्ना हजारे के मुद्दे पर तो राहुल ने अपना बयान दिया लेकिन बाबा रामदेव के मुद्दे पर वे चुप रहे, क्यों? क्या रात में होने वाली रामलीला मैदान की घटना की खबर नहीं मिली। भट्टापारसौल की जनता भारत की है और रामदेव के साथ धरना पर बैठने वाली नहीं, उनके साथ क्या हुआ यह भी दिखना चाहिए तभी निष्पक्ष और इमानदार राजनीति सामने आती। बहरहाल उन्हें लगा होगा कि यह उनकी सरकार के विरूद्ध आन्दोलन है तो इसमें मध्यम मार्ग ही अपनाया जाय जबकि अन्ना हजारे और रामदेव का आन्दोलन सरकार के विरूद्ध नहीं भ्रष्टाचार के विरूद्ध था।

सरकार में शामिल लोगों का यह मानना कि लोकपाल उनके अनुसार बन गय है जिसे लागू किया जाना चाहिए, लेकिन यह कितना कारगर है यह तो इसके स्वरूप से सिद्ध हो गया है। आखिर भारत के राजनीतिज्ञ इस बात को कब समझेंगे कि सरकार किसी नेता या मंत्री की नहीं होती है वह जनता की होती है, और जन-आन्दोलन भी जनता के ही होते हैं जिसे विवादों और बयानों में फंसा कर बार-बार दिशाहीन बनाने की कुछ कोशिश हुई और कुछ हो रही है। यह वर्तमान समय के राजनीतिक दाव-पेंच और विचारहीन राजनीति का एक नमूना है।

महात्मा गांधी और जयप्रकाश के बाद इस देश में जनता के द्वारा इस तरह के आन्दोलन न के बराबर हुए। इन्हें इतने व्यापक स्तर पर समर्थन क्यों मिला। यह समर्थन किसका था, क्या इसमें सिर्फ सरकार विरोधी जनता थी? ऐसा नहीं है। इन दोनों आन्दोलनों में वे लोग भी शामिल थे जो सरकार के समर्थक हैं। किसी मुद्दे पर असहमति का मतलब यह नहीं होता है कि वह आपका विरोधी है। असहमति और विरोध की बुनियाद में फर्क है। दोनों को एक ही रूप में नहीं लिया जा सकता। यह समय असहमति का है जिस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। अगर सबकुछ ठीक है तो फिर लोगों मे असहमति क्यों है। क्या ये यूपीए के ‘सुशासन’ के समर्थन में है? नहीं, ऐसा नहीं है। यह वर्तमान भारत सरकार के कार्यप्रणाली के प्रति आम लोगों की अनास्था है। और यदि यूपीए सरकार इससे सीख नहीं लेगी तो फिर राजनीति लोकतंत्र की नहीं, पार्टी-तंत्र की ही होगी।

अच्छा तो तब हुआ होता जब सरकार बयानों और विवादों से बाहर निकलकर सर्वसहमति से लोकपाल को बनाने मे मदद की होती। यह स्वस्थ राजनीति का परिचय होता, जिसकी इस देश को अत्यधिक जरूरत है। इस देश के साथ ही कांग्रेस के लिए भी यह इतिहास में दर्ज करने योग्य कदम होता जिसे उसने बड़े सस्ते में गवां दिया। भ्रष्टाचार के विरूद्ध सरकार को सही कदम उठाने के लिए जो अवसर मिला था वह जनता द्वारा दिया गया। अन्ना हजारे किसी के विरोधी नहीं हैं बल्कि इस देश को साफ सुथरा बनाने वालों के सहयोगी हैं। उनकी भावनाएं इस देश के करोड़ो लोगों की भावनाएं हैं, जिनका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। अन्ना के जन लोकपाल बिल के साथ भ्रष्टाचार के उन मुद्दों की ओर कार्य करना चाहिए जो जनता द्वारा उठाये गये हैं। एक बार फिर अन्ना अनशन की घोषणा कर रहे हैं अब देखना यह है कि इसका कौन सा रूप सामने आता है।