नेतृत्व क्षमता में राहुल गाँधी से क्यों बीस पड़ते हैं अमित शाह?

संतोष कुमार राय


राहुल गाँधी की अध्यक्षता में कांग्रेस अति उत्साह में मोदी सरकार का विरोध कर रही है. आम तौर पर विरोध करना विपक्ष की जिम्मेदारी होती है लेकिन विपक्ष को जिम्मेदारी और गैरजिम्मेदारी के बीच के फर्क की भी समझ होनी चाहिए. यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि पिछले चार वर्षों में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका अदा करना नहीं सीख पायी. उसका कारण बहुत साफ है. अभी तक कांग्रेसी नेताओं के मानस से सत्ता भोग का नशा उतरा नहीं है. दूसरा यह कि विपक्ष मानसिक और वैचारिक  बिखराव का शिकार है. आपसी सहमति और समझ के अभाव और अत्यधिक उतावलेपन में विपक्ष सत्ता का अंधाधुंध विरोध कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप उसे कई बार मुंह की भी खानी पड़ रही है. पिछले कई मुद्दों पर विपक्ष की ऐसी ही भूमिका रही है, जिससे आम जनमानस में बहुत अच्छा संदेश नहीं गया. इसका एक कारण नयी पीढ़ी के नेता भी हैं. कांग्रेस खुद को देश की सबसे पुरानी पार्टी के तौर पर देखने और दिखाने की कोशिश करती है, जबकि सत्तासीन भाजपा उससे कम उम्र की है. वैसे एक पार्टी के तौर पर कांग्रेस का नाम तो पुराना है, लेकिन संगठन के तौर पर वह कई बार टूटी, बिखरी और जुड़ी है. इंदिरा कांग्रेस’, ‘तिवारी कांग्रेसऔर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टीजैसे दल या शब्द ऐसे ही बिखराव की याद दिलाते हैं.

यहाँ यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद पर विराजे राहुल गाँधी या उनकी कार्यशैली की तुलना किसी दूसरी पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन व्यक्ति या उसकी कार्यशैली से ही की जानी चाहिए, न कि प्रधानमंत्री मोदी से. मीडिया ने जबरन राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री के बरक्स खड़ा किया हुआ है, जो तुलनात्मक दृष्टि से अस्वाभाविक है.  प्रधानमंत्री से तुलना के दो आधार हो सकते हैं, पहला यह कि आम चुनाव में वह व्यक्ति अपनी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित हुआ हो. दूसरा कि वह सदन में विपक्ष का नेता हो. राहुल गाँधी दोनों में से किसी श्रेणी में नहीं आते, लिहाजा उनकी तुलना उनके समकक्ष पद वाले व्यक्ति यानी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से ही होनी चाहिए.

किसी भी संगठन का दारोमदार उसके मुखिया पर होता है. भारतीय राजनीति की दोनों बड़ी पार्टियों में से एक सत्ता में है और दूसरी सत्ता पाने के संघर्ष में. दोनों पार्टियों की कार्यशैली को समझने की आवश्यकता है, क्योंकि पूरी भारतीय राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही है. इस परिप्रेक्ष्य में इस बात को भली-भांति समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस ने न तो अपने-आप को विपक्ष की पार्टी माना और न ही उसने विपक्ष का दायित्व निभाया. वह लगातार सत्ता पाने के लिए संघर्ष करती नजर आयी. यही सबसे बड़ा तथ्य है जिसकी वजह से आज तक वह विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करना नहीं सीख पायी. इसका निहितार्थ बहुत साफ है. दोनों पार्टियों के अध्यक्ष की कार्यशैली, योजनाएं और सांगठनिक स्थिति को समझना चाहिए.

राहुल गाँधी राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से अमित शाह की तुलना में कहीं अधिक अनुभवी हैं. राहुल गाँधी ने जन्मना राजनीति देखी है, जबकि अमित शाह की राजनीति पहली पीढ़ी है. राहुल गाँधी का भारतीय राजनीति में पदार्पण सीधे-सीधे राष्ट्रीय पटल और पार्टी की ओर से देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर हुआ. इस दृष्टि से अमित शाह बहुत पीछे हैं. एक युवा कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले अमित शाह ने लंबे समय तक गुजरात की क्षेत्रीय इकाइयों में कार्य किया. उन्होंने प्रदेश स्तर के नेतृत्व में काम करते हुए अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई है, लेकिन इतना होने के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा की ओर से वे प्रधानमंत्री के प्रत्याशी हो सकते हैं, क्योंकि भाजपा में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार इस तरह घोषित करने का न तो प्रावधान है और न ही परंपरा है.  राष्ट्रीय नेतृत्व और कार्यशैली की दृष्टि से दोनों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, तभी स्पष्ट होगा कि वास्तव में दोनों की राजनीतिक क्षमता और सांगठनिक नीति कैसी है.

पिछले चार वर्षों में गैर भाजपा शासित प्रदेशों में अमित शाह की रणनीतिक क्षमता और गैर कांग्रेस शासित राज्यों में राहुल गाँधी की राजनीतिक क्षमता की तुलना की जानी चाहिए. इस संदर्भ में चार राज्यों में हुए विधानसभा के चुनावों को ध्यान में रखना चाहिए, जिनमें  बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात हैं. इसमें से उत्तराखंड में पिछली सरकार कांग्रेस की थी तथा गुजरात में भाजपा की, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में दोनों ही पार्टियां लगभग नदारद थीं.

सबसे पहले बिहार चुनाव के आधार पर दोनों दलों का विश्लेषण करते हैं. बिहार में भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए खुद को स्थापित करने की चुनौती थी. मोटे तौर पर दोनों के लिए एक जैसी ही परिस्थिति थी. भाजपा के सामने पासवान, मांझी जैसे छोटे सहयोगियों के साथ मिलकर लड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि रामविलास पासवान की एलजेपी एनडीए में है और वे केंद्र में मंत्री भी हैं. जबकि कांग्रेस के सामने लालू और नीतीश के महागठबंधन के साथ जाने या अपने दम पर अकेले लड़ने के विकल्प थे. कांग्रेस चाहती तो दूरगामी रणनीति अपनाते हुए अकेले मैदान में उतर सकती थी, लेकिन उसने महागठबंधन में शामिल होने का आसान रास्ता चुना. अब यहीं से दोनों पार्टियों की कार्यशैली का मूल्यांकन होना चाहिए. महागठबंधन में शामिल होना रणनीतिक दृष्टि से तो ठीक था, लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी की दूरगामी दृष्टि से इसे प्रश्नांकित किया जाना चाहिए.

उत्तर प्रदेश में भी लगभग ऐसी ही स्थिति थी. कांग्रेस अपना विस्तार कर सकती थी या कांग्रेसी नेताओं को पार्टी हित में विस्तार करना चाहिए था लेकिन नहीं, वही पुरानी नीति. क्षेत्रीय पार्टियों के साथ चुनाव में शामिल होने का सिलसिला जारी रखा. परिणाम विपरीत गया. यानी बिहार में जो कुछ फायदा मिला, कुछ सीटें कांग्रेस के खाते में आ गईं. लेकिन यह कतई  जरूरी नहीं कि हर गठबंधन में फायदा ही मिले. बिहार में महागठबंधन का हिस्सा बनना यदि रणनीतिक लाभ की वजह बना तो उत्तर प्रदेश में इसे बड़ी रणनीतिक चूक मानना चाहिए. कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कांग्रेस के दोनों बड़े नेता वहीं से सांसद बनते रहे हैं. अब उत्तराखंड और गुजरात विधानसभा चुनाव की परिस्थितियों को भी समझने की जरूरत है. उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी जबकि विपक्ष में भाजपा थी. भाजपा के तेवर आक्रामक थे जबकि कांग्रेस कहीं भी भाजपा से लड़ने के मूड में नहीं दिखी. यानी चुनाव से पहले ही कांग्रेस ने हथियार रख दिया, जबकि गुजरात की परिस्थिति इसके उलट थी. गुजरात में लंबे समय से भाजपा की सरकार थी, जिसके विरोध में अनेक मुद्दे स्वाभाविक तौर पर सामने थे. लंबे समय तक सरकार में रहने की वजह से चुनाव के वक्त आम तौर पर सत्ताधारी पार्टी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ता है. गुजरात में भी ऐसा ही था. कांग्रेस के लिए खुद लड़ना आसान था, जबकि कांग्रेस ने वहां अपनी पार्टी को आक्रामक बनाने की बजाय दूसरे लोगों को आक्रामक किया और उनसे हाथ मिलाया. हालाँकि राहुल गाँधी की कार्यशैली गुजरात चुनाव में पहले की अपेक्षा परिवर्तित दिखी. लेकिन भाजपा नेतृत्व ने कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष का बहुत ही आक्रामक और रणनीतिक जवाब दिया. निश्चित तौर पर सत्ता विरोधी मानसिकता का कुछ लाभ कांग्रेस को मिला, लेकिन भाजपा अपनी सरकार बचा ले गई. एक तरफ उत्तराखंड में कांग्रेस लड़ने से पहले ही हार गई, वहीं दूसरी ओर भाजपा लड़ी भी और सरकार  बचाने में भी सफल भी रही. यही फर्क है भाजपा और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व की कार्यशैली में.

अमित शाह की कार्यशैली कार्यकर्त्ता से सीधे संवाद की है. वे बूथ स्तर से लेकर पन्ना प्रमुख तक कार्यकर्ताओं को जोड़ने का सूक्ष्मतम प्रयोग करते रहे हैं और इसमें उन्हें सफलता भी मिली है. कार्यकर्ताओं के घर जाना और उनके साथ भोजन करने जैसी अनेक बातें हैं, जो उनके मेहनती और कुशल नेतृत्वकर्ता होने का परिचायक है. प्रयास तो राहुल गाँधी भी कर ही रहे हैं, लेकिन उनके साथ जो पारिवारिक आभामंडल जुड़ा हुआ है, चाहकर भी वे उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

अमित शाह की तुलना में राहुल गाँधी की कार्यशैली बहुत धीमी और बिखरी हुई है. इसके लिए अभी हाल ही में घटित दो घटनाओं को देखा जा सकता है, दलित आरक्षण के मुद्दे पर और मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग के मुद्दे पर. दोनों ही मुद्दों पर राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता कमजोर दिखी. उनकी ही पार्टी के कई नेता उनके कार्य से सहमत नहीं थे. महाभियोग के मामले में तो पार्टी के कई बड़े नेता राहुल गाँधी के कदम से सहमत नहीं दिखे. लोकतंत्र में पार्टी के भीतर आपसी विरोध की जगह होनी चाहिए, ऐसा माना जाता है. लेकिन सांगठनिक दृष्टि से इसका कमजोर नीति और क्षमता के रूप में भी आकलन किया जाता है. अमित शाह अभी तक बहुत ही कम जगहों पर एक नेतृत्वकर्ता के रूप में कमजोर दिखे हैं. उनकी मजबूत कार्यशैली और सांगठनिक क्षमता ही पार्टी की मजबूती का राज है,जो एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी में अभी तक देखने को नहीं मिली हैं. यही नहीं लगभग सभी विधानसभा चुनाओं में वे लगातार क्षेत्रीय नेताओं के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे हैं.

(28 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित) 

 

आंध्र प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के बीच विवाद

संतोष कुमार राय 


पिछले कुछ दिनों से चली आ रही  टीडीपी और केंद्र सरकार के बीच की खींचतान, आरोप-प्रत्यारोप को गहराई से समझने की आवश्यकता है. इसके कई पहलू हैं. कुछ दिखाई दे रहे हैं और कुछ इस विवाद की जड़ में हैं. विशेष राज्य के दर्जे की मांग एक प्रत्यक्ष और स्पष्ट मुद्दा है लेकिन इसके पीछे जो मुद्दा है, वह नितांत राजनीतिक है. टीडीपी एनडीए की सहयोगी पार्टी रही है और पिछले चार वर्षों में केंद्र सरकार के हर फैसले का निर्विवाद समर्थन करती रही है. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि टीडीपी एनडीए से बाहर चली गई. अब सवाल उठता है कि जिस विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर टीडीपी ने खुद को एनडीए से बाहर किया क्या वह पिछले चार साल में याद नहीं आया? क्या इसका एक पहलू लोकसभा और विधानसभा चुनाव की प्राथमिक तैयारी नहीं है? क्या इससे पहले एनडीए सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसका विरोध किया जा सकता था? असल में इस पूरे प्रकरण में जो बात सामने आ रही है उसे ध्यान में रखते हुई एकबारगी यह नहीं कहा सकता कि इसका राज्य और केंद्र के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है.

विवाद में छिपे राजनीतिक हित

दरअसल, यह पूरी कवायद चंद्रबाबू नायडू की एक सधी हुई राजनीतिक चाल है. चंद्रबाबू नायडू ने पिछले चार वर्षों में एनडीए का हिस्सा होते हुए कभी भी इतना आक्रामक रुख अख्तियार नहीं किया, जैसा पिछले दिनों देखने को मिला. आखिर ऐसा कौन सा कारण है जिसकी वजह से चंद्रबाबू नायडू ऐसा कर रहे हैं. असल में नायडू अपने पूरे शासन काल को लेकर आम जन के विरोध को अपनी सत्ता पर न लेकर भाजपा पर थोपना चाहते हैं. आन्ध्र प्रदेश में 2014 से टीडीपी की सरकार है, जिसे लेकर आम जनता में कुछ नाराजगी है और यह आशंका जताई जा रही थी कि हो सकता है कि इसका लाभ वाईएसआर कांग्रेस को मिले. लिहाजा, इस तरह की नाराजगी की दिशा बदलने के लिए यह सुनियोजित तरीके से चली गई एक राजनीतिक चाल भी हो सकती है, ताकि आम जनमानस में यह सन्देश जाए कि टीडीपी प्रदेश के विकास के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार विकास कार्य को सहयोग नहीं कर रही है. दूसरी ओर इसका लाभ यह होगा कि आम जन के दिमाग में यह बात बैठ जायेगी कि भाजपा प्रदेश विरोधी है और टीडीपी आम जनमानस की नजर में साफ-सुथरी और विकास के प्रति प्रतिबद्ध पार्टी के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहेगी.

क्या है विशेष राज्य का दर्जा?

जब कोई राज्य किसी कारण से आर्थिक रूप से पिछड़ जाता है और उसकी विकास की गति अन्य राज्यों की अपेक्षा धीमी हो जाती है तो विशेष राज्य के दर्जे की मांग की जाती है. दूसरा कारण भौगोलिक बनावट भी है, जिसकी वजह से कुछ राज्यों में औद्योगिक इकाइयों को लगाना काफी कठिन होता है. ऐसे राज्यों में बुनियादी ढांचे की कमी होती है. ऐसे में विकास के मामले में ये पिछड़ते चले जाते हैं. इन राज्यों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केंद्र द्वारा विशेष राज्य का दर्जा देकर विकास गति को तेज करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. ताकि ये राज्य अन्य राज्यों के साथ चल सके.

विशेष राज्य का दर्जा किस आधार पर दिया जाता है?

राष्ट्रीय विकास परिषद के अनुसार वैसे राज्यों को ये दर्जा दिया जा सकता है, जहां संसाधनों की कमी हो, राज्य में प्रति व्यक्ति आय अन्य राज्यों और केंद्र के मानक की अपेक्षा कम हो, राज्य की आय के स्रोत कम हों, आबादी का बड़ा हिस्सा जनजातीय समुदाय का हो, राज्य पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में स्थित हो, वहां का जनसंख्या घनत्व कम हो या राज्य अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास स्थित हो.

इससे राज्य को क्या फायदा होता है?

चूँकि, यह सहायता केंद्र की ओर से दी जाती है, इसलिए इसमें विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से मिलने वाली राशि का 90 प्रतिशत मदद के रूप में मिलता है, जबकि सिर्फ 10 प्रतिशत राशि ही बतौर कर्ज होती है. वहीं सामान्य राज्यों को सिर्फ 30 प्रतिशत राशि मदद के रूप में मिलती है और इसका 70 प्रतिशत हिस्सा कर्ज होता है. इसके अलावा, विशेष राज्य का दर्जा जिस राज्य को मिलता है उसे एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, कॉरपोरेशन टैक्स, इनकम टैक्स के साथ कई अन्य करों में भी छूट दी जाती है.

किन-किन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिल चुका है

देश के 29 राज्यों में से अब तक 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिल चुका है. शुरुआत में 1969 में जब गाडगिल फॉर्मूला के आधार पर विशेष राज्य के दर्जे की शुरुआत हुई थी. उस समय असम, नागालैंड के साथ जम्मू और कश्मीर को ये दर्जा दिया गया था. बाद में केंद्र सरकार की तरफ से अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को भी ये दर्जा दे दिया गया.

आंध्र प्रदेश के साथ अन्य राज्य भी इस मांग को उठाते रहे हैं

फिलहाल विशेष राज्य के दर्जे की मांग आंध्र प्रदेश में टीडीपी सरकार उठा रही है. उनका तर्क है कि आंध्र प्रदेश से तेलंगाना के अलग होने और हैदराबाद का तेलंगाना की राजधानी बनने के बाद इस राज्य को काफी नुकसान हुआ है. इसलिए उसे यह दर्जा मिलना चाहिए. आंध्र के अलावा बिहार में भी काफी समय से विशेष राज्य के दर्जे की मांग की उठती रही है. 2005 में सत्ता में आने के बाद से ही वहां की सत्ताधारी पार्टी जेडीयू बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करती रही है. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी पिछले काफी समय से राज्य के लिए विशेष दर्जा की मांग कर रहे हैं. इन सबके अलावा, राजस्थान और गोवा से भी विशेष राज्य के दर्जे की मांग उठती रही है.

आंध्र प्रदेश सरकार आर्थिक आंकड़ों की बजाय राजनीतिक समझौते की बुनियाद पर केंद्र से यह मांग कर रही है, जबकि इस वित्त आयोग में विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने की बात हुई है. दूसरी ओर, केंद्र सरकार अतिरिक्त आर्थिक पैकेज देने पर तो राजी है लेकिन राज्य की स्थिति को देखते हुए विशेष राज्य के दर्जे के लिए तैयार नहीं है. भारत के अन्य राज्यों की स्थिति, वहां की बुनियादी सुविधाओं और प्रतिव्यक्ति आय को ध्यान में रखते हुए आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा देना संभव नहीं है.

 (21 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित) 



टकराव नहीं, आम सहमति से ही तय हो सकता है राम मंदिर का निर्माण

संतोष कुमार राय 

राम जन्मभूमि को लेकर आम लोगों के मन में एकबारगी मंदिर-मस्जिद विवाद और हिंदू-मुस्लिम टकराव की ही बात आती है, जो उसका एक पक्ष है. जबकि, वास्तविक स्थिति इससे इतर भी बहुत कुछ है. हिंदुओं के साथ ही मुसलमानों का एक तबका इस पर एकमत है और वह चाहता है कि जितनी जल्दी हो सके राम जन्मभूमि का आपसी सहमति से समाधान निकाल लिया जाय. यह वह वर्ग है जिसकी आस्था भारतीय संस्कृति और समाज की एकता में है. यह वर्ग टकराव से नहीं भाईचारे से समस्या का हल निकालना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी दोनों पक्षों से पूरे मसले का हल बातचीत से निकालने की अपील की थी. आखिर कोर्ट से बाहर बातचीत से हल करने की बात क्यों और कैसे आयी? अभी तक सभी लोग कोर्ट की ओर टकटकी लगाये हुए बैठे थे और अचानक कोर्ट बातचीत से मामले का हल करने की बात करने लगा. क्या इससे पहले बातचीत की पहल नहीं हुई ? ऐसा बिलकुनहीं है. इससे पहले भी इस पर अनेक दौर की बातचीत हुई, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों ने बातचीत और आम सहमति से रास्ता नहीं निकलने दिया.
बहरहाल, इस परिप्रेक्ष्य में आम सहमति बनाने के लिए समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा प्रयास हो रहे हैं. इस तरह के प्रयासों को एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए. इसे और विस्तृत किया जाना चाहिए, जिससे आम आदमी को यह पता चले कि वास्तव में जैसी टकराहट और द्वेष की स्थिति बताई जा रही है, आम जनमानस की उससे बिलकुल उलट सोच है. इस संदर्भ में दो बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहली यह कि हम किस इतिहास को देश का इतिहास मानें ? उसे, जो विदेशी आक्रांताओं और आक्रमणकारियों की प्रशंसा में लिखा गया है या फिर उसे जो देश का वास्तविक इतिहास है. दूसरी बात यह कि राम जन्मभूमि से जुड़े हुए तथ्यों को आम जनमानस तक कैसे पहुँचाया जा सकता है. अब इस बात को समझने की जरूरत है कि राम जन्मभूमि का निर्विवाद होना क्यों आवश्यक है ? इस संदर्भ में संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इन्द्रेश कुमार जी की बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. उनके मुताबिक, “किसी भी देश का इतिहास विदेशी आक्रांताओं से प्रेरित नहीं हो सकता, बल्कि उस देश के लोगों का इतिहास ही वास्तविक इतिहास हो सकता है. हकीकत तो यह है कि मो. बिन कासिम से लेकर औरंगजेब तक सभी ने इस देश को लूटने का काम किया है. इन शासकों ने देश में मंदिरों को तोड़कर हिंदू मुस्लिम को आपस में लड़वा दिया जो आज तक जारी है. तो क्या उन विदेशियों द्वारा की गई लूट और अत्याचार का इतिहास ही भारत का इतिहास होगा ? यह निर्विवाद सत्य है कि बाबर विदेश से आया हुआ एक आक्रांता था. वह यहाँ लोगों को गुलाम बनाने आया था. वे समाज सुधार के लिए नहीं, बल्कि देश को गुलाम बनाने और लूटने आए थे. उन्होंने लाखों लोगों को मारा, गुलाम बनाया, धर्मांतरण किया, मंदिर और अनेक भारतीय प्रतिष्ठान ध्वस्त किए. आक्रांताओं के खाते में एक भी विश्वविद्यालय और औद्योगिक क्षेत्र दर्ज नहीं हैं. हुनर को मारा, जिससे कि लोग गुलाम बन सकें. उसमें कौन हिंदू था और कौन मुस्लिम, इसका कोई मतलब नहीं है,  गुलाम तो गुलाम थे”.
इन्द्रेश कुमार ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर न्याय प्रक्रिया के साथ समाज प्रक्रिया की भागीदारी को रेखांकित करते हुए कहा, “तमाम सबूतों से सिद्ध हो चुका है कि विवादित ढांचे की जगह मंदिर था. ऐसे में, धर्म-जाति-उपजाति से ऊपर उठकर भारतीय जनमानस को मंदिर निर्माण के लिए सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए. राम मंदिर तो हजारों हैं, लेकिन राम जन्मभूमि तो एक ही है. जिस तरह दुनिया में कैथोलिक ईसाइयों के लाखों चर्च और मुसलमानों की लाखों मस्जिदें हैं, लेकिन ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी और मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना एक ही है. उसी तरह दुनिया में श्रीराम के मंदिर अनेक हो सकते हैं, लेकिन राम जन्मभूमि तो एक ही है”. दरअसल यह राम जन्मभूमि पर चिंतन से समाधान निकालने का रास्ता है.
इस बहस में प्रगतिशील मुस्लिम बुद्धिजीवियों का एक वर्ग आम सहमति के पक्ष में दिखाई पड़ रहा है. पूर्व मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, प्रो मोहम्मद साबिर और वसीम रिजवी जैसे लोग समाधान देने का प्रयास कर रहे हैं. आरिफ मोहम्मद खान मानते हैं, “भारतीय संस्कृति की विभिन्न धाराएं एक दूसरे के समानांतर नहीं, बल्कि एक दूसरे की पूरक हैं. राम मंदिर को समस्त भारतवासियों का सिरमौर बताते हुए उन्होंने कहा कि मंदिर जरूर बनना चाहिए लेकिन राम की मर्यादा के अनुकूल ही काम होना चाहिए”. यह स्वागत योग्य विचार है. भारतीय संस्कृति को स्थापित करने के पक्ष में इसे देखा जाना चाहिए. इसी कड़ी में प्रो. मो. साबिर के विचार भी दृष्टव्य हैं, “अब यह बहुत जरूरी हो गया है कि इस मुद्दे का हल शांति से अदालत के बाहर ही हो जाए, क्योंकि अदालत ने भी इस विषय पर बाहर चर्चा कर लेने की बात कही है. उन्होंने कहा कि इससे समुदायों की भावनाएं भी जुड़ी हैं, लेकिन समझौते के लिए आपसी तालमेल और बातचीत बेहद जरूरी है. वैसे भी खुदाई में जो तथ्य मिले हैं उसमें राम जन्मभूमि पर मंदिर के होने का दावा पुख्ता होता है”. यह ऐसी पहल है जिससे समाधान का रास्ता बहुत आसान हो जायेगा. यह पढ़े-लिखे लोगों की राय है, जो शांति के पक्षधर हैं. कुछ ऐसी ही धारणा वसीम रिज़वी की भी है, वे कहते हैं, “राम जन्मभूमि के संदर्भ में लिए जाने वाले सारे निर्णय हिंदुओं के द्वारा तय होना चाहिए. भगवान राम का जन्म कहां हुआ, इसे कोई और कैसे तय कर सकता ? अगर हिंदू ये कहता है कि अयोध्या में श्रीराम का जन्मस्थान है तो कट्टरपंथी मुसलमानों को भी देश के बारे में अपने हठधर्मिता से ऊपर उठकर यह सोचना चाहिए और और खुद सहयोग करते हुए वहां राम मंदिर बनने देना चाहिए. सच यह है कि बाबर कभी अयोध्या आया ही नहीं था. मुझे मालूम है कि बाबर का सेनापति मीर बांकी अयोध्या आया था. वहां उसने कत्लेआम कर मंदिरों को तोड़ा. फिर अपने सैनिकों के लिए मस्जिद के रूप में एक स्ट्रक्चर बनवाया. मुसलमान इसे बेहतर जानते हैं कि ऐसी जगह नमाज नहीं पढ़ी जा सकती, जो जगह आपकी है ही नहीं, छीनी या कब्जा की हुई है, जहां पर नमाज ही जायज नहीं है, उसे मस्जिद कैसे माना जा सकता”.
इस पूरे प्रसंग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण विचार विवादित ढांचे की खुदाई करने वाली टीम का हिस्सा रहे भारतीय पुरातात्विक विभाग के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक के.के. मुहम्मद के हैं. उनके मुताबिक, “विवादित ढांचे के नीचे कई स्तंभ मिले हैं, जिनमें पूर्ण कलश की आकृति बनी हुई है”. यहीं नहीं, उन्होंने वामपंथी इतिहासकारों की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा “पूरे विवाद के दौरान मंदिर के साक्ष्य मिलने पर एक ऐसा समय आया था जब मुस्लिम समुदाय ने मंदिर निर्माण के लिए हामी भर दी थी लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने उन्हें गुमराह कर दिया”. यह इस पूरे प्रकरण का ऐसा पक्ष है जिस पर शायद ही कभी विचार होता हो. यह सच है कि भारत के अनेक राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी इसे भरपूर उलझाने में लगातार लगे रहे. उदाहरण के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री और वरिष्ठ वकील का यह कहना कि इसकी सुनवाई पर 2019 तक रोक दी जाय. ये लोग किस भारत के हैं. मैथिलीशरण गुप्त ने ऐसे लोगों के लिए बहुत सही लिखा है कि ‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है. वह नर नही नर पशु निरा और मृतक समान है’.
किसी भी देश के गौरव को पुनर्सृजित करने का दायित्व वहां के आम लोगों पर ही होता है. राम मंदिर भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ विषय है. लेकिन इसमें इसका भी ध्यान रखना बहुत आवश्यक है कि इसका रास्ता आम सहमति से ही निकले. निकल भी रहा है. इसे लेकर आम जन में लगातार जागरूकता बढ़ रही है. आम जन भी अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर रहे हैं. यही इसका सही मतलब भी है कि आम जनमानस के बीच से सहमति की आवाज उठे और बेहद शांतिपूर्ण तरीके से इसे हल कर दुनिया के सामने एक उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जाये. अब देखना यह है कि यह कितना कारगर होता है और इसमें कितना समय लगता है. लेकिन एक बात तो साफ हो गई है कि इसका परिणाम तो आयेगा ही, समय चाहे जितना लगे. इससे यह उम्मीद की जा सकती है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण नई क्रांति की राह पर उन्मुख देश-दुनिया को नई दिशा देगा.

(14 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित)

समावेशी हिंदुत्व के सर्वमान्य चरित्रों का अंध विरोध

संतोष कुमार राय 


बड़ा ताज्जुब होता हैजब संकीर्ण मानसिकता से जबरन प्रगतिशीलता स्थापित करने की कोशिश होती हैवह भी किसी पौराणिक या मिथकीय चरित्र की सामाजिक स्थापनाओं और मान्यताओं को जाने बिना. दरअसल,  ‘शहरी माओवादियों’ की प्रकारांतर से रणनीतिक और सोची-समझी वैचारिकी ऐसी ही रही है कि हिंदू मान्यताओं को एकबारगी ध्वस्त कर दिया जायजिसे ये लंबे समय से करते भी रहे हैं. ‘द वायर’ न्यूज पोर्टल पर एक लेखिका ने ‘Militant Hinduism and the Reincarnation of Hanuman’ शीर्षक से पिछले दिनों एक आलेख लिखा. आलेख में जिस तरह की कहानी गढ़ी गई हैउसे देखकर यही लगा कि वास्तव में लेखिका के हिंदू चरित्रों और हिंदू त्योहारों से चिढ़ने के अनेक आत्मोत्पन्न कारण हैं. उनके आलेख में हिंदू मान्यताप्रतीक और प्रतिष्ठा को अधिकतम नकारात्मक घोषित किया गया हैवह भी हनुमान को केंद्र में रखते हुए.

संघ की चिंता क्योंअपने मिटते अस्तित्व की क्यों नहीं?

असल बात इस आलेख की कुछ और है. हनुमान को केंद्र में रखना तो एक माध्यम हैलेकिन उनकी वास्तविक चिंता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार और बढ़ती सक्रियता है. उन्होंने उल्लेख भी किया है कि पिछले दिनों मेरठ में होने वाले संघ समागम में लगभग तीन लाख स्वयंसेवक शामिल हुए थेजिनमें से चालीस हजार सिर्फ नोएडा के आस-पास से गये थे. जाहिर हैसंघ की गतिविधियों को लेकर ये लोग बेहद संजीदे और जागरूक हैं. संघ का यदि विस्तार हो रहा हैनोएडा में (उनके मुताबिक) अगर हर तीसरी कार के पीछे हनुमान की नई तस्वीर चस्पां है तो वे क्यों बेचैन हैं ? दूसरी बात इस संदर्भ में यह पूछी जा सकती है कि इस्लाम को मानने वाले लोग अनेक मस्जिदों में प्रत्येक सप्ताह इकट्ठा होते हैंउस पर इन्हें कभी कोई आपत्ति नहीं रही और न ही कभी कुछ लिखा गया. यह सभी को पता है कि संघ आज जिस जगह पहुंचा हैवहाँ पहुँचाने में उसकी संगठन नीति की बड़ी भूमिका है. आज संघ की स्वीकृति आम जन में बढ़ी है. अगर वामपंथियों की विचारधारा का संकुचन हुआ हैतो यह उनकी संगठन नीति और आम जन में बढ़ते अविश्वास के कारण ही हुआ है. उनके लिए दरअसल यह अस्तित्व का संकट भी है. 

Photo- अमर उजाला

उनकी चिंता के केंद्र में हिंदू नववर्ष हैजिसे उनके अनुसार नहीं मनाना चाहिएलेकिन उन्हें ईसाइयों के ईस्टर की भरपूर याद है. यह दोमुंही बातें हैं. लेकिन यह भी सही कारण नहीं है. इसके पीछे भी एक कारण है और वह है उनकी राजनैतिक मान्यताओं का आम जनमानस में अस्वीकार्यता. लंबे समय से भारत में वाम वैचारिकी दिनोंदिन न सिर्फ संकुचित हुई हैबल्कि आम जनमानस के मन में उसके प्रति आक्रोश भी बहुत अधिक बढ़ता गया. जाहिर सी बात हैइसके लिए कोई दूसरी विचारधारा तो जिम्मेदार नहीं ही है. आपका अस्तित्व संकट में है तो उसके लिए आपकी नीतियाँ जिम्मेदार हैंसाथ ही आपकी विचारधारा को पोषित करने वाले तथाकथित-स्वघोषित मुट्ठीभर बुद्धिजीवी भी हैं. बेहतर तो यह होता कि उनकी चिंता के केंद्र में संघ का विस्तार नहींबल्कि अपना वैचारिक अवसान और राजनैतिक संकुचन होता.

आपको नहीं पता है कि हनुमान कौन हैं ?

भारतीय वामपंथियों की आदत में शामिल है कि उनकी कोई भी बात भारतीय धार्मिक मान्यताओं पर बात किये बिनाउसका उल्लेख किये बिनाउस पर हमला किये बिनाउस पर अतार्किक बातों के बिना पूरी ही नहीं होती. क्या आपके विचारतर्क और संवाद का स्तर इतना उथला है कि बिना हिंदू प्रतीकों के आप अपनी बात तक नहीं रख पाते ? हिंदू रीति-रिवाजोंहिंदू मान्यताओंहिंदू देवताओं के माध्यम से जिस तरह की भाषा और शब्दों से उक्त आलेख में बात की गई हैवह वास्तव में आतंकवादी मानसिकता और आतंकवाद समर्थक विचार की पैदाइश है.

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि हनुमान कौन हैंसमाज में उनकी मान्यता किस रूप में हैहिंदू समाज उन्हें किस रूप में पूजता है और क्योंतमाम ग्रंथों में उनका वर्णन किस रूप में मिलता हैउनके चरित्र के माध्यम से समाज को क्या संदेश मिलता हैइसकी थोड़ी भी पड़ताल लेखिका ने की होती तो चंद उत्साही लोगों की गतिविधियों को वे कथित ‘आतंकवादी हिंदुत्व’ से न जोड़तींन ही हनुमान की नई और चर्चित तस्वीर में उन्हें इस ‘आतंकवादी हिंदुत्व’ की प्रेरणा दिखाई पड़ती. वास्तव में हनुमान का चरित्र भारतीय समाज के लिए सम्यक चरित्र का प्रतिनिधि उदाहरण है. शक्तिसंयम और समर्पण के देवता हनुमान भारत की सामासिक हिन्दू संस्कृति के बेजोड़ उदाहरण हैं.

हनुमान उस स्वाभिमान के प्रतीक हैं जिसे बालि जैसे अन्यायी राजा के साथ रहकर सुख-भोग करने की अपेक्षा सत्यनिष्ठ सुग्रीव के साथ जंगलों में रहना पसंद था. स्वामी-भक्ति ऐसी कि उन्हें उस समय के सबसे बड़े साम्राज्य अयोध्या के महाराज श्रीराम का सान्निध्य मिला हुआ था. फिर भीउन्होंने अपने स्वामी सुग्रीव का साथ नहीं छोड़ा था. हनुमान उस पौरुष के द्योतक हैं जिसने सुग्रीव की पत्नी रूमा के ऊपर बालि की कु-दृष्टि को सहन नहीं किया और माँ जानकी के सम्मान की रक्षा के लिये बिना किसी स्वार्थ और प्रलोभन के निडर होकर रावण की लंका में अकेले ही घुस गए और वहां तबाही मचा दी. हनुमान प्रतीक हैं उस सेतु के जिसने अयोध्या और किष्किंधा यानी नगरवासियों और वनवासियों को साथ जोड़ा था. रामायण के कथानक के आधार पर देखें तो हनुमानसुग्रीवताराअंगदनल-नील ये सब उस समय के वनवासी और जनजाति समाज का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं. ये उन लोगों में दिखाए गये हैं जिनकी भाषा संस्कृत नहीं थी और जो कथित उच्च वर्ण से भी नहीं आते थे और जो जंगलों में रहते थे. यह बात आज के वाम बुद्धिजीवियों को शायद न पचे. उसका कारण उनका दिमागी दिवालियापनअतार्किकता और अध्ययन से परे जब इस तरह की बात होती है तो उस पर तरस ही आ सकता है. लोहिया ने शिव के विषय में बहुत सम्मान जनक चीजें लिखीं हैंतो क्या लोहिया की वैचारिकी इन लोगों से कमजोर थीबिलकुल नहीं. उनका अध्ययन गंभीर और गहरा थाउनके मन में अपने लोगों के प्रतिअपनी परंपरा के प्रति अटूट सम्मान और आदर का भाव था.

दरअसलवाम वैचारिकी के लोग यह जाने बिना सवाल करते हैं कि भारत विविधताओं का देश है. तो क्या यह विविधताएँ विदेशी मान्यताओं के आने के बाद तय हुई हैं. क्या इनकी विचारधारा ने यही बताया है कि आप जिस देश में रहते हैं वहां की मूल संस्कृति और संस्कार का ज्ञान रखे बिना ही एकालाप करते जाएं. जहाँ तक नववर्ष मनाने की बात है तो यह समझने की जरूरत है कि भारत में मनाया जाने वाला नववर्ष सिर्फ भारत तक ही नहीं हैबल्कि इसे अफगानिस्तान से लेकर ईरान और पाकिस्तान के भी कई हिस्सों में ‘नवरोज’ कई अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. भारत में अलग-अलग प्रांतों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता हैजबकि उसका समय एक होता है यानी चैत्र मास. तिथियाँ अलग अलग हो सकती हैं. मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं और यही भारतीय संस्कृति की खूबसूरती है. यह चिंता की बात है कि विचारधारा के नाम पर भारतीय खूबसूरती भी आप लोगों की आँखों में चुभती है. पाश्चात्य संस्कृति का अंध-समर्थन और अति आधुनिकता अगर हावी होगी तो भारतीय समाज में सिर्फ खामियां ही नजर आयेंगी. असल में खामियां तो देखने वाले की दृष्टि में भी कई बार विद्यमान होती हैंजिसका बड़ा प्रभाव उसकी अभिव्यक्ति पर भी पड़ता है.

संघ की शाखाओं के बढ़ने से लेखिका ने एक गहरी चिंता व्यक्त की है. असल बात यह है कि संघ में जाने वाले लोग अपनी संस्कृति को मनाने वाले लोग हैं. उन्हें अपनी संस्कृति में उनकी तरह खामियां नजर नहीं आतीं. उन्हें गर्व होता है. यह गर्व भी कुछ विचारधारा विशेष के लोगों की चिंता और भय का कारण है.

 (14 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित) 

 




भारत बंदः क्या हिंसा के अलावा प्रतिरोध का कोई रास्ता नहीं बचा है ?

संतोष कुमार राय 

अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को अत्याचार और भेदभाव से बचाने वाले एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से 2 अप्रैल को बुलाए गये भारत बंद के दौरान हिंसा की जैसी घटनाएँ देखने को मिलीं,  वह निंदनीय होने के साथ ही कई परत के सवाल भी छोड़ गईं. सबसे पहला सवाल यह कि क्या सामाजिक बराबरी के लिए किये जाने वाले प्रतिरोध और आंदोलनों का स्वरूप ऐसा ही होना चाहिए ? क्या यही सामाजिक न्याय और बराबरी की वास्तविक पहचान हैआजादी के इतने सालों बाद भी क्या हमारा समाज यही सीख पाया हैऔर यह सवाल सिर्फ इस बार के भारत बंद के परिप्रेक्ष्य में नहीं हैबल्कि यह समूचे उस आंदोलन प्रणाली से हैजो सरकारी संसाधनों को क्षति पहुँचानेआम नागरिक के साथ दुर्व्यवहार करनेलूट-पाट और पत्थरबाजी करने का आंदोलन करते हैं. आखिर ऐसे आंदोलन किसके लिए होते हैं ? क्या हिंसा के अलावा भी प्रतिरोध  का कोई रास्ता है ?

Photo- Republic Hindi

यह पहला आंदोलन नहीं था जिसमें इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. अभी कुछ ही दिनों पहले करणी सेना के नाम से ऐसा ही आंदोलन कई दिनों तक चलता रहा और उसका अनेक स्तर पर समाज के अलग-अलग तबके को नुकसान उठाना पड़ा. कोरेगांव में जिस तरह से हिंसा की आग भड़काई गई उसकी लपटें अभी शांत नहीं हुई हैं. हरियाणा में जाटों के आंदोलन को गुजरे कुछ ही समय हुआ है, जिसमें नृशंसता की सारी हदें पर हो गई थीं. बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं के साथ जो व्यवहार हुआ, जैसी लूट-पाट और तोड़-फोड़ हुई उससे हम समाज को क्या बताना चाहते हैं?

दरअसल अब यह स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि भारत में होने वाले इस तरह के आंदोलनों का मकसद कोई प्रतिरोध जताना या अपने अधिकार की मांग करना कतई नहीं है, बल्कि अब यह क्षमता प्रदर्शन, सामर्थ्य प्रदर्शन और बल प्रदर्शन के औजार बन गये हैं. यह कौन सा समाज है जो यह स्वीकार करता है कि अपने प्रतिरोध को दिखाने के लिए हम औरों का जीना हराम कर देंगे. सरकारी संसाधनों को क्षति पहुँचाने से, आम लोगों के साथ अभद्रता करने से अधिकार मिलेगा क्या ? इसके लिए एकतरफा प्रदर्शन करने वालों को दोषी मानना भी जायज नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक दलों की भी बराबर की सहभागिता है.

क्या है वास्तविक मामला

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने को लेकर गाइडलाइन जारी की गई थी. यह सुनवाई महाराष्ट्र के एक मामले में हुई. आदेश जारी होने के तुरंत बाद ही यह गाइडलाइन लागू हो गई थी, जिसमें यह उल्लेख किया गया है कि किसी भी आरोपी सरकारी कर्मी की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी. सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अधिकारी की इजाजत से ही होगी. आम लोगों के लिए भी एक्ट में संशोधन किया गया है. इस एक्ट के तहत आरोपी की गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से होगी. अदालतों के लिए अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे.

पूरे मामले में भ्रम और अंतर्विरोध

दलित आंदोलन की तह में जाने की जरूरत है. यह सिर्फ एससी-एसटी एक्ट में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध में नहीं था. असल में इसके राजनीतिक निहितार्थ को भी समझना जरूरी है. इसमें बड़े पैमाने पर भ्रम और अंतर्विरोध को प्रचारित किया गया. इस पूरे आंदोलन को आरक्षण के विरोध में भारत बंद के नाम से प्रचारित किया गया और आम जनमानस में विपक्षी पार्टियों ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि सरकार आरक्षण के विरोध में है. इसमें सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर सोशल मीडिया ने भागीदारी निभाई. सभी पार्टियों ने बाकायदे पार्टी ऑफिस से इस तरह के संदेश अलग-अलग तरीके से प्रसारित किए. इसमें कौन आगे है कौन पीछे यह विचारणीय नहीं है. सबने अपनी क्षमता के अनुरूप हाथ धोया. यहाँ यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि राजनीतिक दलों की ऐसी परिस्थितियों में जिम्मेदारी क्या होती है ? भारत बंद के नाम पर समाज में गलत संदेश देना, फिर हिंसात्मक आंदोलन का समर्थन करना, हिंसा हो इसके लिए भरपूर प्रयास करना, यह किस स्तर की राजनीति है ?

पुनर्विचार से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

तीन अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सरकार की ओर से लगाई गई एससी-एसटी ऐक्ट से जुड़े फैसले पर पुनर्विचार याचिका को स्वीकार नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें बदलाव नहीं किया गया है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी के मामले में उनके हितों की रक्षा का प्रावधान किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को आतंकित करने के लिए नहीं किया जा सकता.

इस घटना के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने कर्तव्य के निर्वाह को लेकर संदेह के घेरे में हैं. अगर ऐसा ही रहा तो भारत जिस लोकतांत्रिक आधार पर टिका हुआ है, उसे ढहते देर नहीं लगेगी. यह अपनी जिम्मेदारियों को समझने का समय है. जनता जब उग्र होगी तो उसका प्रभाव आज नहीं तो कल सभी पर पड़ेगा, राजनेताओं पर भी. इसलिए यह बहुत जरूरी है कि समाज के हर तबके को राजनीति से ऊपर उठकर अपने उत्तरदायित्व का बोध हो.

(5 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित)

‘गाय हमारी माता है’- फिर भी गायों से क्यों दूर हो रहे हैं हमारे किसान ?'


संतोष कुमार राय 

एक दौर था जब गाय भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हुआ करती थी. पर, आज यह कहना कि गाय उसी रूप में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है, न सिर्फ आज अप्रासंगिक लगता है बल्कि जमीनी सच्चाई से कोसों दूर लगता है. किसी भी संस्कृति और सभ्यता का निर्माण उस समुदाय के रहन-सहन और जीवन निर्वाह से होता है. जीवन निर्वाह के तौर-तरीकों और संसाधनों का निरंतर विकास ही संस्कृति और सभ्यता का रूप ले लेता है. गाय मानव जीवन के निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन और संसाधन थी. गाय का या गो वंश का संबंध धर्म, संस्कृति और सभ्यता से जोड़ना अलग बात है. पर, वास्तविकता की अनदेखी कर हर हिन्दू परिवार, विशेषकर किसान परिवार से गाय पालने का आग्रह करना हास्यास्पद सा लगता है. यह आग्रह करने से पहले यह विचार करना ही होगा कि आखिरकार यह नौबत क्यों आ गई कि जो गाय पर ही आधारित थे, जिनका जीवन गाय के बिना या गो वंश के बिना चल ही नहीं सकता था, उन्हें ही गाय न पाल सकने वाले बुद्धिजीवी बता रहे हैं कि गाय को बचाइए और संरक्षित करिए.
देशी बनाम विदेशी गाय
अब प्रश्न उठता है कि हम भारतीय गायों की बात करें या फिर अभारतीय गायों की भी. यह एक बड़ा संकट है कि जब से भारत में अभारतीय गायों का प्रचलन बढ़ा है, तब से स्थिति बदल गई है. दुग्ध पैदावार की दृष्टि से अभारतीय गायें आज भारतीय किसानों की पहली पसंद बन गई हैं. एक गाय कई गायों के बराबर दूध देती है, जिसमें खर्च और मेहनत दोनों कम हो गई. लेकिन, इसी के साथ जो बड़ा संकट पैदा हुआ वह यह कि विदेशी नस्ल की गायों के बछड़ों की हमारे यहाँ कोई उपयोगिता नहीं है. फिर उनका क्या होगा ?
दरअसल, गाय भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हुआ करती थी, और यह 90 के दशक तक चलता रहा. यह भी समझने की जरूरत है कि जिन्हें गाय रखनी है, वे न तो गाय के लिए कोई आंदोलन कर रहे हैं और न ही किसी आंदोलन में शामिल हो रहे हैं. फिर गाय के लिए होने वाले आंदोलन किसके लिए और क्यों होते रहते हैं ? जो लोग ये कर रहे हैं उन्हें इस सवाल का जवाब भी देना होगा कि क्या केवल गोशालाओं के माध्यम से गोसेवा और गोरक्षा हो सकती है ? क्या इन आंदोलनों से किसान गाय पालना शुरू कर देंगे ?
उदारीकरण ने बदले हालात
इसका जवाब पाने के लिए हमें 90 के दशक का विश्लेषण करना होगा. इस विश्लेषण के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, पहला आर्थिक उदारीकरण और विदेशी कंपनियों के विस्तार का है. दूसरा, मांस के बेतहाशा निर्यात का है. 90 के दशक में भारतीय कृषि को पूरी तरह से बैंक आधारित ऋण के अधीन कर दिया गया. यह दूरगामी रणनीति के तहत किया गया. योजनाएँ और लालच ऐसा कि अनेक किसान अपने पूरे जीवन में भी ऋण चुका नहीं सके और उनकी बर्बादी की कहानी तैयार हो गई. बड़े किसानों को बैंकों और विदेशी कंपनियों ने तोड़ा और छोटे किसानों को मांस निर्यात ने. मांस का निर्यात किसानों को कृषि और पशुपालन से दूर करने का बहुत महत्वपूर्ण कारण है.
महंगाई की मार, गोपालक लाचार
लेकिन, यह पूरी सच्चाई नहीं है, बल्कि यह आधी-अधूरी सच्चाई है. पूरी सच्चाई को न तो आंदोलनकारी बुद्धिजीवी बता रहे हैं और न ही सरकार. यह सच्चाई पूरी तभी हो सकती है, जब इसमें महँगाई को शामिल किया जाएगा. 90 के दशक से 2016 तक गोवंश की कीमत कितनी बढ़ी है, इसका अंदाजा सिर्फ किसान को है या कुछेक श्रद्धावान लोगों को. 90 के दशक में जिस गाय की कीमत 1500 रुपये होती थी, आज 50 हजार रुपये की है. ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा इसलिए हुआ कि मांस निर्यात में दुधारी गायें कटती गईं और देखते-देखते मात्र 25 वर्षों में उनकी संख्या बहुत कम हो गई. किसान जिस गाय की कीमत आज 15 हजार लगाता है, गोमांस का व्यापारी उसकी कीमत 30 हजार देता है.
मजदूर बनने को मजबूर किसान
साफ है कि बढ़ती हुई महँगाई का असर किसानों और पशुपालकों पर भी हुआ है. गाय ले लेना अगर संभव भी हुआ तो उसका खर्च वहन करना बहुत कठिन है. गाय की उपयोगिता अब सिर्फ दूध देने तक सिमट गई है. अब वह जीवन निर्वाह का साधन या संसाधन नहीं रह गई है. पहले उसके दूध के साथ-साथ गोबर और बछड़ों का उपयोग होता था. अब गोबर की जगह अनेक प्रकार के उर्वरक आ गए. उपले की जगह एलपीजी गैस आ गई. फिर गोबर का स्वरूप अब कचरे से अधिक कुछ नहीं है. मशीनों के बेतहाशा उपयोग ने बछड़ों की उपयोगिता खत्म कर दी. बढ़ती हुई महँगाई का असर यह हुआ कि छोटे किसानों ने बड़े पैमाने पर कृषि कार्य छोड़ दिया और शहरों में जाकर मजदूरी करने लगे. किसानों की क्षमता महँगाई के अनुसार नहीं बढ़ पायी है और न ही इसका कोई वैकल्पिक उपाय निकाला गया है.
गाय को बचाने के आंदोलन का कोई मतलब नहीं होगा जब तक सीधे तौर पर किसान खुद इसका नेतृत्व नहीं करेंगे. किसान तभी नेतृत्व करेंगे जब उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी होगी कि वे गाय रखने में सक्षम होंगे. इसलिए बहुत जरूरी है कि गाय के आंदोलन के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और महँगाई को रोकने की दिशा में सरकार के स्तर पर व्यवस्थित योजनाएँ लायी जाएं और उनका सीधा लाभ किसानों को मिले. अन्यथा सरकार गाय खरीदकर दे देगी तो भी किसान नहीं लेगा. यही जमीनी हकीकत है. इससे आँख नहीं चुरायी जा सकती. गोसेवा-गोरक्षा के लिए आंदोलन चलाने वाले महानुभाव लोग इस पर भी ध्यान देंगे तभी कुछ सार्थक परिणाम निकल सकता है.

(3अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित)

सिस्टम के हाथों तबाह होने को मजबूर है देश का पेट भरने वाला किसान

संतोष कुमार राय


पिछले लगभग बीस वर्षों से भारत में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं. सरकारी अमले के संज्ञान में होने के बावजूद आत्महत्याओं का सिलसिला घटा नहीं है. आंकड़ों को सरकारी बाबुओं द्वारा छोटा-बड़ा किया जाता रहा है, लेकिन अभी भी किसानों की मूल समस्या, जो आत्महत्या का मुख्य कारण बनती रही है, किसी स्थाई निदान की ओर बढ़ती नजर नहीं आ रही. अब सवाल यह है कि आखिर वह कौन से कारण हैं जिनका निदान नहीं हो सकता या जो अभी तक किसानों की एक बड़ी आबादी को इसमें धकेल चुके हैं ? क्या सरकारी स्तर पर इसकी जवाबदेही बनती है या नहीं ? और यदि बनती है तो उसका क्या स्वरूप है तथा इस ओर अभी तक किस तरह के प्रयास हुए हैं ?
आत्महत्या के प्रमुख क्षेत्र और स्थिति
दरअसल, सबसे पहले किसानों की आत्महत्या की खबरें 1997-98 में विदर्भ से आयीं, जो कि महाराष्ट्र का एक हिस्सा है. उसके बाद बुंदेलखंड, आंध्र और तेलंगाना से. हालांकि, 97 से अब तक किसानों के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएँ भी बनाई गईं, जिनमें कर्जमाफ़ी, सिंचाई, फसल बीमा और मूल्य निर्धारण आदि. इन सबके बावजूद जमीनी सच्चाई यही है कि अभी भी किसानों की आत्महत्या पूरी तरह रुकी नहीं है. एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में आत्महत्याओं को रिकॉर्ड में दर्ज किया गया, जिसके अनुसार, 1997-98 में छह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. 2006 से 2008 के बीच पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि इन घटनाओं में हुई. 2012 से आंकड़ों के स्वरूप में कुछ गणितीय बदलाव कर दिया गया है, लेकिन किसानों की आत्महत्या न तो कम हुई है और न ही बंद हुई है. इन आत्महत्याओं के रिकॉर्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रोत हैं, जो किसी वर्ष संख्या बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है, जहां आत्महत्या करने वाले किसानों के अनाथ बच्चों की चीत्कार न गूंजती हो.
चिंताजनक स्थिति
एक चिंताजनक बात यह देखने में आयी है कि आज से बीस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनकी भावी पीढ़ी भी उसी राह पर जाने को मजबूर है. किसान व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करने को अभिशप्त हैं. जबकि हमारा समाज आज एक भी ऐसा ठोस कदम बता पाने की स्थिति में नहीं है जो इस पीढ़ी के लिए उठाया गया हो. दूसरों का भरण करने वाले आज जिस तरह से दुनिया छोड़ रहे हैं, वह किसी भी सभ्य और विकसित समाज के लिए कलंक से कम नहीं है. यह भी विचारणीय है कि जिन किसानों ने आत्महत्या कर लिया, उनके बच्चों और विधवाओं के लिए सरकारी स्तर पर अभी तक कोई भी ऐसा प्रयास नहीं किया गया जिससे उनका भरण-पोषण हो सके. यह नैतिक पतन, अमानवीयता और संवेदनाहीनता की  पराकाष्ठा है.
प्रमुख कारण : सरकारी कर्ज या निजी कर्ज
किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं. पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदाएं तथा फसल नुकसान. कर्ज की व्याख्या सरकारी अमला अपने तरीके से करता रहा है. दरअसल, किसानों द्वारा लिया जाने वाला कर्ज का बड़ा हिस्सा गैर सरकारी है, जो सरकारी तंत्र की आड़ में विकराल रूप धारण कर चुका है. यदि इस पूरे प्रकरण को विदर्भ के संदर्भ में देखा जाय तो स्थिति साफ हो जायेगी. विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण कृषि पैदावार में होने वाली कमी, प्राकृतिक आपदाएँ, खराब बीज और उर्वरक की उपलब्धता है. साथ ही वह कर्ज, जिसे किसान अच्छी फसल की उम्मीद में लेता है, लेकिन नुकसान होने पर ब्याज के नाम पर निरंतर चुकाने के लिए अभिशप्त हो जाता है और मूलधन यथावत बना रहता है. दरअसल, विदर्भ में निजी तौर पर दिया जाने वाला ऐसा कर्ज बड़े व्यवसाय के रूप में प्रशासन की नाक के नीचे चोरी-छुपे खूब फल-फूल रहा है. इसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है. लिहाजा, एक बड़ा वर्ग किसानी छोड़ रहा है. उसकी बजाय वह शहरी मजदूरी को अच्छा समझता है जो कहीं से भी उचित नहीं है. आने वाले समय के लिए यह एक नये संकट की आहट है.
कुछ दिन पहले एक किसान ने तीस हजार रुपये का कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली. सवाल उठा कि इतनी सी रकम के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा. लेकिन, जब उसकी पड़ताल हुई तो पता चला कि उसने तीन साल पहले कपास की फसल बर्बाद होने पर जो कर्ज लिया था, बाद में खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा, लेकिन मूलधन जहां का तहां बना रहा. बराबर ब्याज चुकाते रहने से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा था. यहाँ तक तो गनीमत थी, लेकिन उसके लिए जो बात सबसे अधिक परेशान करने वाली थी, वह यह कि ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से सेठ पैसा मांगने घर आ गया और पूरे गांव के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को भला-बुरा कहने लगा. किसान को इसका पता चला तो उसने खेत पर ही आत्महत्या कर ली. आम नागरिक के लिए यह बहुत बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन किसान समाज के लिए इससे बड़ी बात नहीं हो सकती. सारी लड़ाई मर्यादा की रक्षा की है. इसे समझने की जरूरत है कि जिस देश का किसान मर्यादा-विहीन हो जाएगा, वह देश मर्यादित कैसे हो सकता है. दूसरा, एक बड़ा कारण विदेशी कंपनियों के बेतहाशा शोषण का भी है. सामान्यतः देशी बीज और खाद के स्वरूप को कुछ देशी और कुछ विदेशी कंपनियों ने खत्म कर दिया. अब किसानों के सामने यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि उन्हें हर साल नए बीज खरीदने होते हैं, जिसमें एक बहुत बड़ी रकम की आवश्यकता होती है और कर्ज का किस्सा असल में यहीं से शुरू होता है. दूसरा बड़ा कारण है जमाखोरी का, जिसमें किसानों के उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिलता और कई बार तो उतना भी नहीं मिलता जितनी उनकी लागत होती है. उदाहरण के लिए प्याज को देखा जा सकता है. अनेक ऐसे किसान हैं, जिन्होंने प्याज 2 रुपये किलो की दर से बेचा, जो आज 60 रुपये की दर से मिल रहा है. सरकार की ओर से इसकी व्यवस्था नहीं होगी तो किसान मरेगा ही. आर्थिक संरक्षण के नाम पर किसानों के लिए किसी आयोग की सिफारिश नहीं की जाती. ऐसे में क्या उन्हें अपनी पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना चाहिए? इस सवाल का जवाब कौन देगा? सरकार या किसान. सच यह है कि सरकार ने किसानों के लिए अब तक जो कुछ किया है, उसकी तुलना में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है.
यदि कृषि क्षेत्र उपेक्षित होगा और किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो शेष आधुनिकता और विकास का कम से कम उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा, जिनका जीवन कृषि आधारित है. उन्हीं का क्यों, हम सभी का क्यों नहीं. ऐसा कौन है, जिसका जीवन कृषि आधारित नहीं है. यह चिंता सिर्फ किसानों की नहीं है, बल्कि यह चिंता हम सभी की है. किसान नहीं रहेंगे तो हम नहीं रहेंगे. इस बात को अपने दिल-दिमाग में बैठाना होगा. किसानों पर एहसान करने की कतई जरूरत नहीं है. अपने जीवन के लिए उन्हें बचाने की जरूरत है. जिस तरह से हमें स्वस्थ रहने के लिए पर्यावरण की जरूरत है, उसी तरह जिंदा रहने के लिए किसान की जरूरत है. किसान खुशहाल हों और कृषि संस्कृति को बल मिले, तभी विकास की असल अर्थवत्ता सिद्ध होगी.

(1 अप्रैल 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित)

सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...