गुरुवार, 8 नवंबर 2012

आम चुनाव के रिहर्सल होंगे विधानसभाओं के चुनाव


सन्तोष कुमार राय 
समकालीन सरोकार में प्रकाशित.... 

          किसी शायर ने लिखा है कितना मुश्किल होता है जवाब दे पाना, जब कोई खामोश रहकर भी सवाल करता है । आज भारत की जनता पर डर और खामोशी दोनों का असर है । पिछले दस वर्षों में बेकाबू महँगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है । बड़ी-बड़ी इमारतें और बड़े-बड़े पार्क तो बहुत बने और बन भी रहे हैं लेकिन आम जनता से उनका क्या सरोकार है ? लोगों के मन में डर इस बात का है कि आने वाला समय कैसा होगा और जीवन कैसे चलेगा ? लगातार भ्रष्टाचार और महँगाई से त्रस्त लोगों के लिए यह निर्णय लेना कठिन है कि वे किसे चुने और क्यों चुने ? आज की भारतीय राजनीति में आरोप और प्रत्यारोप का प्रयोग एक महत्वपूर्ण औज़ार के रूप हो रहा है । इसका कारण है देश की जनता के दिमाग को विकास के मुद्दों से भटकाया जाय और सभी पार्टियों के नेता आपस में तू-तू मैं-मैं का खेल खेलते रहें ।  देश का विकास आज महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं रह गया है । आज एक-दूसरे को कोसने और जनता के बीच में आत्मश्लाघा का प्रदर्शन और परनिंदा की कलात्मकता का दक्षतापूर्ण प्रदर्शन ही हमारे देश के राजनेताओं की प्राथमिक योग्यता बन गई है । इसके बहुत सारे नमूने हमें आए दिन दिखाई पड़ते हैं ।  इसका ताजा उदाहरण हमें आने वाले समय में गुजरात और हिमाचल प्रदेश तथा कुछ समय बाद महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में दिखाई दे सकते हैं ।
          गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित हो गई है लेकिन अभी महाराष्ट्र में कुछ देर है । गुजरात और महाराष्ट्र का इस बार का चुनाव कई मामलों में पिछले चुनाव से भिन्न होगा । तुलनात्मक रूप से यह चुनाव पिछले चुनावों से अधिक गंभीर होगा क्योंकि दोनों प्रदेशों में एकदूसरे की प्रबल विरोधी पार्टियों की सरकार है । गुजरात में बीजेपी है तो महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी गठबंधन । इस चुनाव को लेकर मौजू सवाल यह है कि यह चुनाव किन-किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा और जनता इस चुनाव में किस आधार पर वोट देगी ? दोनों प्रदेशों में दोनों पार्टियों की चुनावी रणनीति अलग होगी क्योंकि मुद्दे अलग-अलग हैं । यह चुनाव इसलिए भी और अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद लोकसभा चुनाव होगा जिस पर इसके परिणाम का प्रभाव पड़ सकता है, या यह कहा जाय कि इन दो बड़े राज्यों के चुनाव से ही लोकसभा के परिणाम की दिशा तय होगी । इसलिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होगा । यह चुनाव सिर्फ जनता के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहेगा । दोनों पार्टियों को अपना पक्ष जनता के सामने रखना होगा । गुजरात की लड़ाई सीधे-सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच है जबकि महाराष्ट्र में यह चुनाव बहुमुखी होगा । इस चुनाव पर सभी पार्टियों की निगाह है और सभी अपने-अपने हिसाब से जनता के सामने अपनी शुद्धता को सिद्ध करने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं ।
          दरअसल आज की राजनीति में जनता की समस्याओं और विकास की कोई जगह बची ही नहीं है । भ्रष्टाचार और मंहगाई के दलदल में फांसी हुई भारत की जनता आज दर्दके mकेयारे कराह र है और उसकी कराह सुनने वाला कोई नहीं है । सभी लोग अपना हित साधने में लगे हुए हैं ।  सारे के सारे नेता एकदूसरे पर आरोप लगाने और जनता को बेवजह बहकाने की कोशिश करते हैं । सबसे पहले हम गुजरात पर नजर डालें । गुजरात का यह चुनाव पिछले चुनाव के  मामले में कई तरह से अलग होगा । इसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं । नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता का कोई पैमाना नहीं है लेकिन पिछले चुनाव की बात की जाय तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच बहुत बड़ा अंतर था जो कहीं न कहीं गुजरात में मोदी की लोकप्रियता का ही द्योतक है, पर आज जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं उसमें अपने मुंह मिया मिटठू बनाना की बात बहुत आम है । इस चुनाव में मोदी जिस विकास का दावा पेश कर रहे हैं वह कितना जमीनी है, यह तो आने वाले समय में गुजरात की जनता ही तय करेगी, और यह भी कि जनता को यह विकास कितना पसंद आया इसका पता परिणाम आने पर ही चलेगा । लेकिन कांग्रेस इस विकास के दावे को लगातार नीचा दिखाने की कोशिश जरूर करेगी । लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए की गुजरात की जनता कांग्रेस को अपना मत देगी । इस पर तो संदेह है । यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है कि दोनों पार्टियों के अपने कमजोर पक्ष भी हैं जिसे अगर नजरंदाज किया गया तो उनको भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है । गुजरात बीजेपी में पिछले कई सालों से आंतरिक कलह की भी बात आती रही है और यह बहुत गलत भी नहीं है ।  मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी कार्यशैली कई नेताओं को पसंद नहीं है जिसका समय-समय पर वे विरोध भी होता रहा है । इन नेताओं ने एक नई पार्टी का गठन भी किया है जो चुनाव मैदान में आ गई है । यह बीजेपी के लिए बहुत सुखद नहीं है । इसका अगर थोड़ा भी प्रभाव पड़ेगा तो बीजेपी का नुकसान हो सकता है । कांग्रेस की लगातार कोशिश रहेगी कि वह इसे मजबूत करे जिससे बीजेपी की स्थिति कमजोर हो । इन सारी बातों के वावजूद भी कांग्रेस के लिए अपने को बेदाग सिद्ध करना बहुत मुश्किल है । पूरे भारत की निगाह केंद्र पर है । केंद्र में कांग्रेस समर्थित यूपीए की सरकार है जिसके घोटाले और भ्रष्टाचार की फेहरिस्त दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है । इस सरकार ने भ्रष्टाचार का ऐसा खुला खेल खेला है जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक नहीं हुआ था । बावजूद इसके कांग्रेस के नेता आम आदमी के हित की बात कर रहे हैं और इन लोगों ने आम आदमी को जहां तक पहुँचा दिया है वहाँ जनता इन्हें कैसे स्वीकार करेगी समझ से परे है ।
          दरअसल कांग्रेस के लिए यह चुनाव आसान नहीं है । पिछले आठ वर्षों के कांग्रेसी शासन पर अगर नजर दौड़ाई जाय और उसमें आम आदमी की जगह तय की जाय तो बहुत मुश्किल होगा यह खोजना की आम आदमी के लिए कांग्रेस ने कौन सी जगह दी है । गुजरात की जनता के सामने कांग्रेस किस तरह के विकास का दावा प्रस्तुत करेगी जिस पर यह विश्वास किया जाय कि वास्तव में ये दावे इस बार पूरे होंगे । कांग्रेस ने पिछले दोनों कार्यकाल में जैसा केन्द्रीय सुशासन भारत को दिया है उससे कोई भी अनजान नहीं है । यह बहुत मुश्किल सवाल है कि गुजरात की जनता कैसे कांग्रेस के इन दावों को स्वीकार करेगी । टू जी, कामनवेल्थ और अब कोयला जिस तरह से केंद्र सरकार की करतूत के नमूने सामने आए हैं उसे जनता के सामने झूठा साबित करना बहुत कठिन है । यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और इसके बाद भी कांग्रेस के नेता जनता के बीच में विकास की बात कर रहे हैं । समय के बदलाव ने भारतीय जनता के स्वभाव को थोड़ा बदल दिया है । वह समय समाप्त हो गया जब नेहरू परिवार के नाम पर भारत के लोग वोट दिया करते थे । आज की जनता पहले से अधिक तार्किक और जागरूक हुई है । उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव परिणामों को देखा जा सकता है । राहुल गांधी की चमक इतनी फीकी पड़ी कि आज पता ही नहीं चल रहा है कि भारतीय राजनीति में राहुल कहाँ हैं । लेकिन कांग्रेस को अभी भी सीख नहीं मिली है और वह इस चुनाव में भी विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है । गुजरात चुनाव इसलिए भी कांग्रेस के लिए कठिन होगा क्योंकि कांग्रेस अभी तक टूजी से उबरी नहीं थी कि कोयले ने काला कर दिया । उसके बाद कांग्रेस ने एफ़डीआई के माध्यम से खुद अपने वोट बैंक के बड़े हिस्से को अलग कर दिया । भारतीय जनता का एक बड़ा तबका जो कि छोटे व्यापारियों का है जिसे एक बड़ा नुकसान कांग्रेस ने एफडीआई के रूप में दिया है । इस वर्ग का वोट भी बीजेपी को ही मिलेगा । कांग्रेस जिन मुद्दों पर गुजरात में चुनाव लड़ेगी उससे वह खुद केन्द्र में घिरी हुई है ।
          केंद्र सरकार के सभी फैसलों का सीधा असर जनता पर पड़ता है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार दुहाई देते रहे हैं कि मंहगाई कम होगी लेकिन मंहगाई में लगातार बृद्धि हुई है । यह चुनाव मंहगाई की मार से छटपटाई हुई जनता का चुनाव होगा । राज्य सरकारों के लिए ऐसे मामलों में बहुत आसान होता है कि वह सारा का सारा दोष केंद्र के ऊपर थोप दे । और सही भी है राज्य सरकारें कुछ कर भी नहीं सकतीं । यहाँ कुछ मुद्दों पर बीजेपी कमजोर दिखाई दे रही है । सबसे पहला मुद्दा बीजेपी  का आंतरिक कलह ही है । यह भी कुछ हद तक इस चुनाव को प्रभावित कर सकता है ।
          दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न गुजरात सरकार के पिछले कार्यकाल में हुए दंगों का है । जांच एजेंसियों ने भले ही नरेंद्र मोदी को बेदाग साबित कर दिया हो लेकिन जनता के हृदय में उनकी छवि आज भी एक कट्टरतावादी नेता की ही है । इस छवि से बाहर निकलने के किए मोदी और बीजेपी लगातार सेकुलर होने के हथकंडे आजमा रही है लेकिन यह ऐसा मामला है जो किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है । यह बहुत हद तक सही भी है कि उनके कार्यकाल में अगर इस तरह की बर्बरता का प्रदर्शन हुआ है तो उसका खामियाजा भी उनको भुगतना चाहिए । यह मामला अभी और ताजा हो गया है जबसे उन दंगों में लिप्त गुनहगारों को सजा सुनाई गई है । मोदी की करीबी मंत्री को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है जो उनकी संलिप्तता के लिए काफी है । यह जरूरी नहीं कि किसी अपराध में आप खुलकर सामने आएं तभी आपको अपराधी करार दिया जाएगा । कहीं न कहीं मोदी की सह उन लोगों को थी जिन्होंने इस तरह के कुकृत्य को अंजाम दिया । अब अगर जनता के दिमाग में ऐसी छवि है तो इसका प्रभाव गुजरात चुनाव पर जरूर पड़ेगा ।
          कुल मिलाकर अगर समग्रता में इस चुनाव का मूल्यांकन किया जाय तो जो तस्वीर सामने आ रही है या जो अनुमान लगाया जा सकता है वह यह कि यह चुनाव भी मोदी का ही होगा । कांग्रेस पर जनता भरोसा करेगी, इसमें दुविधा है । रही बात विकास की तो उसमें भी गुजरात बहुत पीछे नहीं है । कांग्रेस कुछ सीटों को इधर-उधर जरूर कर सकती है लेकिन सरकार एक बार फिर मोदी बना सकते है अगर सारे समीकरण सही-सही रहे तो । इसप्रकार गुजरात का यह चुनाव बीजेपी का चुनाव हो सकता है ।
          अब एक नजर महाराष्ट्र पर । अभी महाराष्ट्र के चुनाव में काफी समय है लेकिन जिस तरह की राजनीतिक उठापटक चल रही है उसे देखकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता । एनसीपी कभी भी कांग्रेस का हाथ छोड़ सकती है । अभी महाराष्ट्र में जिस तरह के भ्रष्टाचार सामने आए हैं उससे बौखलाई एनसीपी के सभी मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया और अगर बात कुछ और आगे बढ़ी तो समर्थन भी वापस ले सकते हैं । इस प्रदेश में चुनावी समीकरण बहुमुखी है । बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन का भी कोई भरोसा नहीं है । उधर राज ठाकरे शिवसेना को लगातार नुकसान पहुंचाते रहे हैं ।  कांग्रेस लगातार राज ठाकरे को मौन समर्थन देती रही है । वही हालत कुछ-कुछ एनसीपी का भी होने वाला है । यहाँ भी चाचा-भतीजे की लड़ाई की सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी है । अगर अजीत पवार बगावत करते हैं तो इसका प्रभाव एनसीपी पर जरूर पड़ेगा । यह कहना गलत नहीं होगा कि जब भ्रष्टाचार के सभी मामले उजागर हो जाएंगे इनके आपसी आरोप-प्रत्यारोप शुरू होंगे और फिर इस पूरे मामले को मैं अच्छा और मैं अच्छा मे फंसाकर समाप्त कर दिया जाएगा । महाराष्ट्र के लिए अभी कुछ भी कहना बहुत कठिन है की यहाँ ऊँट किस करवट बैठेगा ।
          कुल मिलाकर दोनों प्रदेशों की राजनीतिक गहमागहमी में मुद्दा जनता को ही तय करना है और चुनाव भी जनता का ही होगा । दोनों प्रदेशों में जनता के लिए असमंजस की स्थिति बनी रहेगी । लेकिन एक बाट साफ है कि इन चुनावों के बाद यह तस्वीर साफ हो जाएगी की केंद्र पर किसका कब्जा होगा या फिर मिलीजुली सरकार बनाने के बाद मनमोहन सिंह की तरह रोना रोते रहेंगे कि सरकार को बचाना जरूरी । इन तमाम सवालों के बीच यह चुनाव हो रहा है और यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में कुछ जवाब मिलेंगे । 

रविवार, 9 सितंबर 2012

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे.....


          सन्तोष कुमार राय
मुक्तिबोध ने लिखा है कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे, तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब’... असीम पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उसे गिरफ्तार किया गया, यह कितना सही है ?  समाज कितना बदल गया है, हम कितने छोटे हो गये हैं, हमारा आत्म कितना दूषित हो गया है, हम कितने आत्ममुग्ध होते जा है, वास्तव में हम कितने कायर और डरपोक हो गये है । हिन्दी साहित्य में एक लंबी परम्परा रही है जो लगातार सत्ता के विरोध में लिखती रही है । इस परंपरा में नागार्जुन, हरिशंकर परसाई, धूमिल, रघुवीर सहाय के अतिरिक्त स्वाधीन भारत में और स्वाधीनता से पहले भी ऐसे अनेक लेखक और विचारक हुए हैं जिन्होंने सत्ता का विरोध किया है लेकिन किसी के साथ ऐसा अन्याय नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो शायद ये सभी लेखक या तो जेल में रहे होते या फिर इयानके लेखन पर रोक लगा दिया गया होता ।
          भारत सरकार की हालत आज 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' की हो गई है । ये लोग कभी भी अपने गिरेबान में झाँकने की कोशिश नहीं करते । आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहने के बावजूद जनता के सामने सफाई दे रहे हैं । यह तो तानाशाही है, जो लोग इसे लोकतन्त्र कहते हैं उन्हें लोकतन्त्र की तमीज नहीं है । और अगर यह लोकतन्त्र है तो लानत है ऐसे लोकतन्त्र पर जिसमें आदमी को सही बात कहने के लिए देशद्रोही करार दिया जाता है ।
          असीम त्रिवेदी के ऊपर मुकदमा चलाना एक तरह से आज के राजनेताओं के छोटेपन को ही दर्शाता है । असीम सच के साथ हैं और म्हम उनके साथ । यह कहना गलत नहीं होगा की अब हमारी शासन व्यवस्था भी तालीबानी शासन जैसी हो गई है । लेकिन यह कोई नई बात नहीं है इससे पहले भी इस तरह के वाकया हो चुके हैं । हुसैन साहब के साथ जो हुआ वह क्या था ? कहाँ से वह लोकतन्त्र का समर्थक था और कुछ वैसा ही रूख असीम के साथ भी व्यक्त किया जा रहा है ।
          आज भारत का हर नागरिक डरा-डरा महसूस कर रहा है । उसे लगातार यह चिंता सता रही है कि पता नहीं कल उसे किस जुर्म में गिरफ़्तारकर लिया जाएगा जो उसने किया ही नहीं है । भारतीय राजनीति में लोकतन्त्र के नाम पर जैसे परिवार तंत्र पल रहा है और जो लोग उसकी वकालत कर रहे हैं वे खुद इस देश के गद्दार हैं । अगर शर्म नाम की भी कोई चीज होती है तो आज के नेता जैसे जैसे घोटालों में फंसे हैं नैतिकता के आधार पर और उनकी लोकतंत्रीय दुहाई के आधार पर खुद राजनीति से बाहर क्यों नहीं निकाल जाते हैं । भूख, गरीबी और महंगाई से त्रस्त जनता की आवाज को देशद्रोह करार देना तानाशाही मानसिकता का ही द्योतक है ।
          मीडिया के द्वारा यह आवाज़ उठाई जा रही है कि लेखकों, विचारकों को अपनी सीमा निर्धारित करनी चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति का दायरा क्या होगा । मुझे लगता है कि यही सवाल आज इस देश के कर्णधारों से पूछा जाना चाहिए कि आपकी सीमा क्या है ? सरकार में शामिल लोग मनमानी लूट करें और इस देश की जनता नमाशबीन की तरह देखती रहे । उसे अपना विरोध दर्ज करने की भी अधिकार नहीं है ? क्या यह देश सिर्फ लूटेरों और भ्रष्टाचारियों का है ? अगर ऐसा है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में दूसरी बार स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा जाएगा । बड़ी कुर्बानियों के बाद यह देश बचा है । असीम को जेल में बंद कर देने से अभिव्यक्ति बंद नहीं होगी। हजारों ऐसे लोग पैदा हो जाएंगे जो विरोध करेंगे ।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

हाँ ! हम ही दोषी हैं....


सन्तोष कुमार राय
कितना मजेदार होता है दोष देने वाले को ही दोषी बना देना । बचपन में जब किसी गलती पर हम झूठ का सहारा लेते थे और अपने छोटे भाई या बहन को दोषी सिद्ध करा देते थे और मन ही मन अपने बच निकलने की खुशी से गदगद हो जाते थे ।  लेकिन अचानक हमारी खुशी काफ़ुर हो जाती थी और हमारा बाल मन भयभीत हो उठता था । हमारे अभिभावक जब भाई-बहन को पीटना शुरू करते थे तो उसके रोने की आवाज हमें भी दहशत में डाल देती थी और अचानक हमारे मुंह से अपनी गलती का स्वीकार भाव निकलता था और हम भी भाई बहनों के साथ रोना शुरू कर देते थे । लेकिन उस गलती को स्वीकार करने के बाद जो संतोष मिलता था उसको बयां करना कठिन है । एक बात सच है कि मनुष्य जिस दिन गलती स्वीकार करना सीख जाता है उसी दिन उसके अन्तर्मन में ईमानदारी का स्थायी वास हो जाता है ।  
          अब समय बादल गया है और आज हम जिस समाज में जी रहे हैं और जिस समाज को देख रहे हैं, वह समाज न तो गलती स्वीकार करने का है और न ही ईमानदारी को अपना उसूल बनाने का । आज के समय में जो व्यक्ति ऐसा कर रहा है या तो उसे आज का समाज पागल करार देता है (जैसा दिग्विजय सिंह ने अन्ना को और अरविंद केजरीवाल को कहा था) या फिर वह खुद पागल हो जाता है। भारत सरकार के हमारे ईमानदार प्रधान मंत्री जी को ही देख सकते हैं । कितने ईमानदार हैं ! जब वे बोलते हैं... क्या कहने । ऐसा लगता है जैसे एक–एक शब्द से ईमानदारी की गंगा बह रही हो और सारे देशवासी उसमें भीगकर उन्हें तहे दिल से आशीर्वाद दे रहे हों । और देखकर तो लगता है कि इतना आशीर्वाद तो भागीरथ को भी लोगों ने नहीं दिया होगा । और यही नहीं जब गंगा के बरक्स सोनिया जी बोलती है तो जो मातृत्व झलकता है उसके लिए इस संसार में शब्द नहीं हैं । लेकिन अब क्या किया जाय ये जो कोयला है न इसने पता नहीं कहाँ से कुछ काला कर दिया । कितनी मुश्किल से राजा और कलमाड़ी को किनारे किया था और राहुल जी के लिए रास्ते को साफ सुथरा किया जा रहा था कि इसी में कैग वालों ने नया तमाशा खड़ा कर दिया । और विपक्ष को तो बस ऐसे मौके का इंतजार ही है । जमीन पर कुछ नहीं कर सकते, जनता के लिए कुछ नहीं कर सकते, तो क्या हुआ अगर विपक्ष का दर्जा मिला है तो देशवासियों को यह तो बता ही सकते हैं कि अगर हमे नहीं चुनोगे तो हम संसद ही नहीं चलने देंगे । अपने पिताजी का क्या जाता है । सरकार भी जनता की है और देश भी जनता का है और संसद को चलाने के लिए जो पैसा आता है वह भी जनता का है । तो विपक्ष का क्या है ? विपक्ष को तो जनता ने चुना नहीं है । कितनी अजीब बात है हर जगह पक्ष का चुनाव होता है, कहीं भी विपक्ष का चुनाव नहीं होता है । तो फिर विपक्ष क्यों जनता के लिए काम करे । अब चुने हो तो भुगतो ।
          खैर ले देकर यह सत्र भी रूखा-सुखा समाप्त हो गया लेकिन जनता बबूल के पेड़ से आम की प्रतीक्षा में पेड़ को निहारती रही । अब सरकार अपने पर लगे हुए कोयले के दाग को धोने की मंसा जाहिर कर चुकी है, क्योंकि प्रधानमंत्री जी ने कल कह दिया कि विपक्ष अलोकतांत्रिक है और कैग ने जो भी आरोप लगाया है उसका जवाब दिया जाएगा । मुझे भी लगता है कि सरकार इस साल के इलाहाबाद के कुंभ में अपने दाग को पूरी तरह से भले न धो पाये लेकिन त्रिवेणी के पानी से पोछकर अगले चुनाव में जरूर आएगी अपनी प्यारी और ईमानदार दोषी जनता के बीच ।
          लेकिन दोष तो अभी भी बाकी है । आखिर कोयला का दोषी कौन है, अगर दोष दिखावे के छापे से अलग सिद्ध होता है तब । तो मेरा मानना है और मुझे लगता है कि हमारे पूर्व और वर्तमान कोयला मंत्री जी लोग भी यही कहेंगे कि साहब हम तो जनता के सेवक हैं आखिर कुछ लोगों को दिया तो वे भी तो इसी लोकतन्त्र के अंग हैं । इसमें बहुत बौखलाने की क्या जरूरत है । और अगर जनता ऐसे विपक्ष को चुनकर भेजेगी तो हम क्या कर सकते हैं । इसके लिए तो जनता ही दोषी है और मैं भी उसी दोषी जनता की ओर से हूँ ।

बुधवार, 1 अगस्त 2012

कर्ज, किसान और आत्महत्या



सन्तोष कुमार राय
          कर्ज ने भारतीय किसानों को आज आत्महत्या तक पहुंचा दिया है ।  दिनोंदिन लगातार बढ़ता यह अमानुषिक नरसंहार थमने का नाम नहीं ले रहा है, इसे क्या कहा जाय ? किसे इसका दोषी माना जाय ? सरकार को या उसके तंत्र को, या उन व्यक्तियों को जिन्होंने आत्महत्या करने वाली पीढ़ी को पैदा किया ? यह  बहुत ही जटिल सवाल है जिसका जबाब खोजना आसान नहीं है । भारतीय इतिहास में किसानों का जितना शोषण हुआ है उतना और किसी भी वर्ग का नहीं हुआ है । जब हमारा देश गुलाम था तब भी किसानों का शोषण होता था और आज भी हो रहा है लेकिन आज की स्थिति उस समय से शायद आधिक खराब है । वह इसलिए कि इतनी बड़ी संख्या में और इतने लंबे समय तक किसी भी काल में किसानों ने आत्महत्या नहीं  किया । किसानों की आत्महत्या के मद्देनजर अगर यह कहा जाय कि आज की शासन व्यवस्था अँग्रेजी हुकुमत से अधिक खराब है तो हैरान नहीं होना चाहिए । इस बात को जानकार कुछ लोगों ताज़्जुब होगा कि हमारे देश में आत्महत्या करने वाला हर सातवाँ व्यक्ति किसान है, लेकिन यह सच्चाई है जिसे न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ेगा । अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में इसमें कमी आने के बजाय बढ़ने की संभावना है । ऐसा हमारे ही देश में हो सकता है कि आइसक्रीम की तुलना चावल से की जाती है और यह महान कार्य सरकार में शामिल वे लोग करते हैं जिन्हें इस देश के लोगों ने देश की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी दी है ।  इस तरह के वाक्य पर हमारे देश के पढ़े-लिखे और समझदार लोग मौन हो जाते हैं क्योंकि इसमें उनकी भलाई नहीं है । हमारे देश में पिछले डेढ़ दशक से चल रही इस प्रक्रिया को रोकने की कुछ नाम मात्र की कोशिश भी हुई है लेकिन उस कोशिश का परिणाम जमीन पर कितना हुआ, इसका कुछ पता नहीं है, जो बात पता है वह यह कि किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है । किसानों की आत्महत्या को लेकर कई सरकारी नुमाइन्दे काफी चिंतित दिखे लेकिन दिल्ली जाने के बाद किसानों के घर में बहाये गए उनके आँसू भी घड़ियाली ही सिद्ध हुए । ऐसे में इतने लंबे समय से चल रहे इस मानवद्रोही अपराध को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी है, इस पर सभी मौन हैं ।
          बहरहाल हम यहाँ कुछ दृश्य रखने की कोशिश करेंगे कि आखिर किसानों की अत्महत्या के मूल में कौन-कौन सी बातें हैं । सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न अबाध गति से बढ़ती हुई महँगाई का है, जिसने लाखों किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया है । आज यह कहना बड़ा मुश्किल है कि हमारे देश के किसान किस वर्ग में आते हैं । कुछ बड़े जमीदारों को छोड़ दिया जाय अधिकतम संख्या उन किसानों की है जो या तो निम्न मध्यवर्ग में आएंगे या फिर निम्न वर्ग में । पिछले दस वर्षों में जिस गति से महँगाई बढ़ी है उसने इन किसानों की कमर तोड़ दी है । आज खेती के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता है । जुताई-बुआई से लेकर खाद बीज तक सबका दाम आसमान छू रहा है। निम्न मध्यवर्गीय किसानों के पास उतना पैसा नहीं होता की वे यह सारा खर्च वहन कर सकें, लिहाजा उन्हें इस देश के गरीबों का खून चूसने वाले सूदखोरों से कर्ज लेना पड़ता है ।
          महंगाई के बाद बड़ा प्रश्न उनके जीवन में कर्ज़ का है । वे कर्ज़ किससे लें, किस आधार पर लें और किस तरह के ब्याज पर लें, यह किसानों के लिए बड़ी समस्या है । हमारे सरकारी आंकड़े भारत की शिक्षा व्यवस्था को चाहे जितना बढ़ा–चढ़ाकर दिखाये लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है । आज भी हमारे गांव में रहने वाले किसानों में ज़्यादातर संख्या उनकी है जो शिक्षित होने के नाम पर सिर्फ हस्ताक्षर ही कर सकते हैं । ऐसे में, इस तरह की व्यवस्था में सरकारी कर्ज़ लेना और उसके दांव-पेंच को समझना उनकी समझ से परे है । इसलिए उन्हें हारकर व्यक्तिगत सूदखोरों के पास जाना पड़ता है जो उनके खून पसीने की कमाई को ऐंठते हैं । सरकारी बैंकों से कर्ज लेना भारतीय किसानों के लिए आज भी बहुत डरावना है । सरकार के द्वारा किसानों को दी गई छूट और सुविधाओं का बहुतायत हिस्सा नौकरसाहों के हक़ में चला जाता है और उसकी भरपाई किसानों से की जाती है । सरकार जब तक किसानों को दी जाने वाली सुविधाओं को उन तक पहुंचाने का पुख्ता प्रबंध नहीं करेगी तब तक इस देश के किसान तड़प – तड़पकर जान देते रहेंगे ।
          भारत के विकास की कल्पना करने वाले लोग उनको कैसे भूल जाते हैं जिनके बलबूते देश के लोगों का पेट भरता है । अगर उनका पेट खाली रहेगा तो क्या देश का विकास होगा ? आज अगर उनकी स्थिति अच्छी रहती तो उनको आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता । लगातार बढ़ती हुई महंगाई ने उनको अत्यंत कमजोर बना दिया है । सरकार लगातार झांसा देती रही है कि महंगाई कम हो जाएगी लेकिन कम होने के बजाय उसमें लगातार बढ़ोत्तरी ही हुई है । अगर वास्तव में किसानों के साथ हमदर्दी है तो उनकी समस्याओं के मूल रूप पर विचार बहुत जरूरी है । यह एक मानवतवादी कदम होगा जिसे सरकार में बैठे लोगों को जरूर उठाना चाहिए ।
          आत्महत्या के सरकारी आंकड़ों पर भी विश्वास किया जाय तो ये आंकड़े भी उनके विषय में सोचने और उनकी समस्याओं पर कुछ करने के लिए पर्याप्त है । जिस देश में हर साल हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं उसे किस आधार पर यह कहा जाएगा कि उसका विकास हो रहा है ।  कोई भी देश जिसकी अर्थव्यवस्था के मूल आधार में परंपरा से कृषि हो, उस देश के किसान अगर इतनी तेजी से समाप्त होने लगे तो आखिर वह देश किसका विकास करेगा ।  मेरा मानना है कि विकास हमारी मानसिकता का होना चाहिए जो उन किसानों के दर्द को समझे और उनके लिए कुछ ऐसा करे जिससे यह सिलसिला रुके ।

शुक्रवार, 15 जून 2012

राजनीतिक व्यापार और देश का भविष्य



सन्तोष कुमार राय
          भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर राजनीतिक व्यापार और व्यापारिक सरोकारों का है ।  यहाँ यह कहने का सीधा मतलब है कि अब हमारे देश में राष्ट्रपति का पद भी आपसी खींचतान और जोड़-जुगत से बाहर नहीं रह पाया है । कभी यह पद अत्यंत गरिमामय और वैश्विक प्रतिष्ठा का हुआ करती था लेकिन आज हमारे देश की परम सम्माननीय राजनेताओं नेताओं की महामहीमी राजनीति और माननीया सोनिया गांधी की गांधीवादी संयोजन नीति ने जो स्वरूप तैयार किया है, हमारा देश आने वाले कई वर्षों तक नहीं भूल पाएगा ।
          आज भारतीय जनता के सामने भूख और गरीबी का प्रश्न सबसे अहम है । हमारे प्रधानमंत्री पिछले आठ वर्षों से ठीक करने का झांसा दे रहे हैं । हमें यह पता नहीं है कि उनका वादा करने और ठीक करने का कौन सा मुंह है । दोनों का एक ही है या फिर दोनों अलग-अलग हैं । बहुत ही दुख के साथ कहना पड़ता है कि जितनी ऊर्जा वर्तमान सरकार राष्ट्रपति बनाने की जोड़-जुगत में लगाया है अगर उसका चौथाई हिस्सा भी देश के गरीबों के नाम कर दिया होता तो पता नहीं कितना बचपन भूख की बलि चढ़ने से बच जाता ।  यहाँ सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं है, यह एक ऐसे पद की राजनीति का है जिसकी प्रतिष्ठा वैश्विक होती है ।
          राष्ट्रपति चुनाव को लेकर आज जैसी खबरें आ रही हैं उनको बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता । इसका कारण साफ है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी – अपनी तरह से मनमानी पर अड़ा हुआ है । हमारे देश के अधिकतर लोग इस बात से इत्तेफाक रखेंगे कि राष्ट्रपति पद के लिए किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को ही चुना जाय । लेकिन अफसोस की बात यह है कि कांग्रेस और सोनिया गांधी की मुसीबत प्रणव मुखर्जी हैं जिनको आजीवन राजनीति में सक्रिय रखने के लिए इस पद से अधिक उपयुक्त और क्या हो सकता है । इस पर रहते हुए प्रणव दा कांग्रेस की सेवा भी करते रहेगे और अपने जीवन काल के अंतिम दौर में खुश भी रहेंगे । चूंकि यह मामला प्रणव मुखर्जी के राजनीतिक व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ है इसलिए कुछ जरूरी सवाल उठेंगे ही । कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष की सारी बातें प्रणव दा बिना कुछ कहे ही मान लेंगे ? क्या अभी भी उनके मन में राजनीतिक लालच बची हुई है, और अगर है तो वे मौन क्यों हैं ? क्यों उनके लिए दूसरे लोग जोड़-घटाना कर रहे हैं । अभी तक तो कांग्रेस की अधिकतर आंतरिक राजनीति खुद प्रणव दा ही सुलझाते रहे हैं ।  पिछले दस वर्षों में तो यही देखने में आया है कि कांग्रेस पर जब-जब हमला हुआ है, चाहे वह विपक्ष का हो, मीडिया का या फिर समाजसेवियों का, प्रणव दा खुलकर सामने आए हैं ।  इस बार क्यों दूसरे साधकों को साध रहे हैं । एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रणव दा को जो पद देने की तैयारी हो रही है और जिस तरह से हो रही है, वे उस पद को इतने छीछालेदर के बाद भी स्वीकार करेंगे । अगर स्वीकार भी कर लें तो अपने स्वभाव और कार्य पद्धति के अनुसार खुद को कांग्रेस की इच्छा-आकांक्षा से अलग कैसे करेंगे । इस तरह के अनेक सवाल हैं जो आज हमारे सामने हैं ।
          अब यहाँ सवाल देश के भविष्य का भी है । आज जैसी स्थिति है उसमें सरकार अगले चुनाव में जनता के बीच कौन से मुद्दे लेकर जाएगी । क्या फिर वही बातें दोहराई जाएगी कि हम देश का विकास करना चाहते हैं और आगे भी करेंगे । और फिर चुनाव के बाद हमारे प्रधानमंत्रीजी अपनी ईमानदारी का भयानक परिचय देते हुए कहेंगे कि हमारे सामने गठबंधन की मजबूरी है । यह क्या है, किस तरह की राजनीति है जिसमें हर जगह मजबूरी आ जाती है । सरकार में बैठे हुए लोगों को इसका अंदाजा नहीं होगा कि उनकी छोटी–छोटी मजबूरियों का कितना बड़ा असर भारतीय लोगों पर हो रहा है ।
          बहरहाल अभी जो माहौल चल रहा है वह किसी भी तरह से स्वस्थ राजनीति का परिचायक नहीं है । अब राष्ट्रपति का चुनाव भी एक व्यापार की तरह हो गया है जिसे कोई चुनाव आयोग नहीं रोक सकता । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत के राष्ट्रपति भवन में कौन प्रवेश करता है ।

बुधवार, 23 मई 2012

मुद्दा अधूरी ‘अर्थ-नीति’ का है!

                                                                                                          सन्तोष कुमार राय
          यूपीए सरकार की दूसरी पारी अधिकतर स्तर पर नाकामयाब ही रही है। तीन वर्ष के इस दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व की अनेकानेक कमियाँ सामने आयी हैं, लेकिन इसकी ओर ध्यान न देते हुए सरकार के लोग यह गिनाने में लगे हुए हैं कि उन्होंने कितना कुछ किया । होना यह चाहिए कि सरकार ने जो अच्छा किया, उसे उसी के लिए चुना गया था, लेकिन जो नहीं हुआ वह उससे अधिक महत्वपूर्ण है । अपने इस कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार सर्वाधिक विफल अपनी अर्थनीति पर रही है, जिसका असर भारत की गरीब जनता पर सीधा पड़ा है । लिहाजा भारतीयों की गरीबी का ग्राफ और अधिक बढ़ा है । सरकार ने कई हजार टेलीफोन लगवाया है जिसे वह अपनी उपलब्धियों में सुमार कर खुद अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन उसके पास इसका हिसाब कहीं भी नहीं है कि कितने गरीब परिवारों ने भूख से दम तोड़ दिया या अत्महत्या कर लिए।
          असल में किसी भी देश के आर्थिक विकास का सीधा असर वहाँ के आम आदमी पर पड़ता है । जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो आम जनजीवन के जीवन स्तर में सुधार होता है । भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति अपने अभी तक के सबसे खराब दौर से गुजर रही है । इसका कारण सिर्फ वैश्विक आर्थिक गिरावट नहीं है । अगर ऐसा होता तो भारत की आर्थिक स्थिति मे गिरावट उस समय आती जब पूरा विश्व आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था । लेकिन उस समय ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उस समय हमारी आर्थिक नीतियाँ और हमारे संसाधन दोनों में आज जैसा बड़ा अंतर नहीं था । दिल्ली में रहते हुए सरकार ने अपनी सफलताओं की लंबी सूची गिना दिया और तीन साल पूरे होने का जश्न भी मना लिया । दरअसल यह जश्न मनाने का नहीं, मातम मनाने का समय है । आज जिस बदहाली की ओर देश जा रहा है, या यह कहा जाय कि जहां पहुँच गया है, वह दिन दूर नहीं जब यहाँ भूखे मरने वालों की तादात विश्व में सबसे बड़ी हो सकती है।
          सरकार की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया है कि यूपीए के इस कार्यकाल में प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि हुई है । यह वक्तव्य मंहगाई की आग में जली हुई जनता की जलन को बढ़ाने के लिए लाल मिर्च जैसा है । प्रधानमंत्री ने जिस प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि की बात की है वह इस देश के कुछ खास लोगों की आय की बृद्धि है । भारत में रहने वाला बड़ा तबका वह है जिसका इस आय-बृद्धि से कोई संबंध नहीं है । इस तरह की असमानता पर आधारित आर्थिक वितरण प्रणाली से देश में  असमानता की खाई को और बढ़ा रही है । विश्व के इतिहास में कहीं भी प्रतिव्यक्ति आय में इस तरह के विभेद के रहते उस देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती । जहाँ भी विकसित राष्ट्र की अवधारणा का विकास हुआ है वहाँ प्रतिव्यक्ति आय के बीच का फर्क ऐसा नहीं है । यह कहाँ का अधिकार है कि आम आदमी की जब देश की संपूर्ण आय की गणना हो तो प्रतिव्यक्ति आय में बड़ी बृद्धि हो, लेकिन जिनकी आय की गढ़ना हो रही है उसकी स्थिति आज भूखे मरने की है।
          बहुत सीधा सा जबाब है कि जब किसी भी व्यक्ति की आय में बृद्धि होती है तो उसके जीवन स्तर में सुधार होता है, लेकिन यहाँ तो आय बढ़ने पर आम आदमी के जीवन स्तर में और अधिक गिरावट आयी है। भारत के पूंजीपतियों और नौकरशाहों की आय में बेतहासा बृद्धि हुई है जिसे प्रधानमंत्री ने प्रतिव्यक्ति मान लिया है।
          सरकार ने अपने झूठे विकास के पुलिंदे में एक और बात शामिल किया है जो उसकी नासमझी के लिए काफी है । यह घोषणा की गई है कि इस साल हमारे देश में बहुत अधिक अनाज का उत्पादन हुआ है । इस उत्पादन को सरकार ने अपनी उपलब्धियों में गिना लिया । यह पूछा जाना चाहिये कि सरकार में शामिल लोगों ने इस उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्या किया है? कौन सा ऐसा काम कर दिया जिससे उत्पादन में ऐसी बृद्धि हो गई । दरअसल यह बृद्धि इस देश के किसानों की जी तोड़ मेहनत का परिणाम है । इसमें सरकार का कोई भी योगदान नहीं है । योगदान तब होता जब सरकार किसानों के लिए खाद बीज आदि का प्रबंध करती । लेकिन कुछ भी किए बिना इस तरह का झूठा श्रेय लेना किसी भी तरह से वाजिब नहीं है ।
          सरकार तीन साल का जश्न माना ले लेकिन देश की आर्थिक हालत बहुत ही खराब है । आने वाला समय आम आदमी के जीवन के लिए बहुत ही संघर्षपूर्ण होगा । अगर वास्तव में सरकार को विकास करना है तो आम आदमी की हालत में सुधार की चिंता करे ।  न सिर्फ चिंता करे बल्कि उसमें सुधार के उपाय किए जाय । इसके लिए जरूरी है कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की सार्थक कदम बढ़ाए ।