रविवार, 9 सितंबर 2012

अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे.....


          सन्तोष कुमार राय
मुक्तिबोध ने लिखा है कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे, तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब’... असीम पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उसे गिरफ्तार किया गया, यह कितना सही है ?  समाज कितना बदल गया है, हम कितने छोटे हो गये हैं, हमारा आत्म कितना दूषित हो गया है, हम कितने आत्ममुग्ध होते जा है, वास्तव में हम कितने कायर और डरपोक हो गये है । हिन्दी साहित्य में एक लंबी परम्परा रही है जो लगातार सत्ता के विरोध में लिखती रही है । इस परंपरा में नागार्जुन, हरिशंकर परसाई, धूमिल, रघुवीर सहाय के अतिरिक्त स्वाधीन भारत में और स्वाधीनता से पहले भी ऐसे अनेक लेखक और विचारक हुए हैं जिन्होंने सत्ता का विरोध किया है लेकिन किसी के साथ ऐसा अन्याय नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो शायद ये सभी लेखक या तो जेल में रहे होते या फिर इयानके लेखन पर रोक लगा दिया गया होता ।
          भारत सरकार की हालत आज 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' की हो गई है । ये लोग कभी भी अपने गिरेबान में झाँकने की कोशिश नहीं करते । आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहने के बावजूद जनता के सामने सफाई दे रहे हैं । यह तो तानाशाही है, जो लोग इसे लोकतन्त्र कहते हैं उन्हें लोकतन्त्र की तमीज नहीं है । और अगर यह लोकतन्त्र है तो लानत है ऐसे लोकतन्त्र पर जिसमें आदमी को सही बात कहने के लिए देशद्रोही करार दिया जाता है ।
          असीम त्रिवेदी के ऊपर मुकदमा चलाना एक तरह से आज के राजनेताओं के छोटेपन को ही दर्शाता है । असीम सच के साथ हैं और म्हम उनके साथ । यह कहना गलत नहीं होगा की अब हमारी शासन व्यवस्था भी तालीबानी शासन जैसी हो गई है । लेकिन यह कोई नई बात नहीं है इससे पहले भी इस तरह के वाकया हो चुके हैं । हुसैन साहब के साथ जो हुआ वह क्या था ? कहाँ से वह लोकतन्त्र का समर्थक था और कुछ वैसा ही रूख असीम के साथ भी व्यक्त किया जा रहा है ।
          आज भारत का हर नागरिक डरा-डरा महसूस कर रहा है । उसे लगातार यह चिंता सता रही है कि पता नहीं कल उसे किस जुर्म में गिरफ़्तारकर लिया जाएगा जो उसने किया ही नहीं है । भारतीय राजनीति में लोकतन्त्र के नाम पर जैसे परिवार तंत्र पल रहा है और जो लोग उसकी वकालत कर रहे हैं वे खुद इस देश के गद्दार हैं । अगर शर्म नाम की भी कोई चीज होती है तो आज के नेता जैसे जैसे घोटालों में फंसे हैं नैतिकता के आधार पर और उनकी लोकतंत्रीय दुहाई के आधार पर खुद राजनीति से बाहर क्यों नहीं निकाल जाते हैं । भूख, गरीबी और महंगाई से त्रस्त जनता की आवाज को देशद्रोह करार देना तानाशाही मानसिकता का ही द्योतक है ।
          मीडिया के द्वारा यह आवाज़ उठाई जा रही है कि लेखकों, विचारकों को अपनी सीमा निर्धारित करनी चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति का दायरा क्या होगा । मुझे लगता है कि यही सवाल आज इस देश के कर्णधारों से पूछा जाना चाहिए कि आपकी सीमा क्या है ? सरकार में शामिल लोग मनमानी लूट करें और इस देश की जनता नमाशबीन की तरह देखती रहे । उसे अपना विरोध दर्ज करने की भी अधिकार नहीं है ? क्या यह देश सिर्फ लूटेरों और भ्रष्टाचारियों का है ? अगर ऐसा है तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में दूसरी बार स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा जाएगा । बड़ी कुर्बानियों के बाद यह देश बचा है । असीम को जेल में बंद कर देने से अभिव्यक्ति बंद नहीं होगी। हजारों ऐसे लोग पैदा हो जाएंगे जो विरोध करेंगे ।

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