बुधवार, 5 जून 2013

पहले जैसा दिखाई नहीं देता


सन्तोष कुमार राय
मेरे द्वारा रचित एक छोटी सी कविता है जिसे आज ब्लाग पर आप लोगों के लिए प्रकाशित कर रहा हूँ। अगर अच्छी लगे तो.....
अब मुझे पहले जैसा दिखाई नहीं देता,
लेकिन ये क्या? अभी तो शास्त्रों के अनुसार एक चौथाई ही कटी है जिंदगी।
पहले की तरह अब बहुत कुछ बुरा भी नहीं लगता।
पहले किसी की छोटी से छोटी गलती पर भी उलझ जाता था।
क्यों?
लेकिन आज! आज तो बड़े से बड़े अपराध को भी देखकर चुप हो जाता हूँ,
और न सिर्फ चुप हो जाता हूँ, बल्कि आगे बढ़ जाता हूँ।
थोड़ी देर रुककर कुछ सोचने की जहमत भी नहीं उठाता।
अब मेरे कानों को भ्रष्टाचार, लूट, बलात्कार जैसे शब्दों से पहले जैसी घबराहट नहीं होती।
मेरे कान इन्हें सुनने के आदी हो चुके हैं...
कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं समाज के प्रति अपना उत्तरदायित्व खो चुका हूँ?
रात को सोते समय सोचता हूँ कि अब मुझे पहले जैसा दिखाई नहीं देता।
क्योंकि पहले दिल से देखता था अब आँख से देखता हूँ....

                         

फेसबुक पर ब्लाक करने के संदर्भ में...

सन्तोष कुमार राय

            मित्रों, आजकल फेसबुक पर अपने फ्रेंड्स को ब्लाक करने का मामला खूब चल रहा है। जैसे बचपन में हम अपने किसी दोस्त से नाराज हो जाते थे तो अक्सर कहा करते थे कि मैं तुमसे कट्टी हो गया और बातचीत उस दिन बंद हो जाती थी। उस समय अच्छी बात यह थी कि फिर हम जब अगले दिन मिलते थे तो हम उसी निश्छलता से मिलते थे जिससे हम पहले दिन मिले थे। कोई गिला-शिकवा नहीं रहता था। आज हम बहुत अधिक सिकुड़ गए हैं और व्यक्तिगत संवाद की नापसंदगी के आधार पर हम अपने दोस्तों से संबंध-विच्छेद कर लेते हैं। आज हम अपने आस-पास के लोगों की बुराइयों को पहले देखते हैं, अच्छाईयों को बाद में। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक आदमी में सिर्फ बुराई ही बुराई भरी पड़ी हो। बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे हम न तो देखने की इच्छा रखते हैं और न ही कोशिश करते है। कुछ दिन पहले ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। कई दिनों से मैं इस ऊहापोह में था कि इस बात को आप सभी से साझा करूँ या नहीं, लेकिन आज सोचा करना चाहिए। उस दिन ऐसा हुआ कि मैंने उस मित्र से आनलाईन बात कर रहा था जो कि खुद को प्रतिष्ठित साहित्यकार मानता है। असल में थोड़ी प्रतिष्ठा मिलने पर हम मनुष्यों के अंदर थोड़ा दंभ तो आ ही जाता है। हम लोग मर्यादापुरुषोत्तम तो हैं नहीं। वह अपनी आदत के अनुसार लगातार व्यंग्य करता जा रहा था (यह उसकी फितरत है। अपने से बड़े-बुजुर्गों पर व्यंग्य करके, उन्हें चिढ़ा करके खुद को श्रेष्ठ साबित करता रहता है।) बात आगे बढ़ती गई। मौका मिला मैंने भी उसी का व्यंग्य उठाकर उसी पर रख दिया, जिसका उसे अंदाजा नहीं था। वह तिलमिला गया, क्योंकि अभी तक मैं उससे बहुत ही आदर और सम्मान की भाषा में बात कर रहा था। उसके अंदर का वास्तविक मनुष्य जाग गया और फिर क्या मुझे मेरी औकात बताने से लेकर देख लेने तक पहुंचा दिया। जितना कह सकता था कहा। मुझे बहुत अच्छा लगा। अच्छा इसलिए लगा क्योंकि पहले तो यह पता चला कि वास्तव में इसकी व्यंग्य करने और बरदास्त करने की सीमा क्या है। दूसरा कि वास्तव में यह मी द्वारा दिये जाने वाले आदर और सम्मान का हकदार है या नहीं (वह यह भी कह सकता था कि वह मेरे पास आदर और सम्मान मांगने तो नहीं आया था)। उसने तुरंत मुझे ब्लाक कर अपने मानसिक छोटेपन का त्वरित परिचय दिया। मुझे अच्छा लगा जिसे आप सभी से साझा कर रहा हूँ......