मैली गंगा को स्वच्छ करने के लिए उठाने ही होंगे कुछ जरूरी कदम



संतोष कुमार राय

गंगा को सिर्फ एक नदी के रूप में नहीं देखा जा सकता. गंगा जिन क्षेत्रों से होकर गुजरी है वहाँ उसे सिर्फ एक नदी नहीं माना जाता है, बल्कि गंगा वहाँ के लोगों के संस्कार, सरोकार, आस्था और विश्वास की नदी है. गंगा से आम जनमानस के सद्भाव बहुत ही गहरे जुड़े हैं. ऐसे में गंगा को निर्मल करना उतना आसान नहीं है जितना राजनीतिक भाषणों में लगता है. गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के जन्म से लेकर मरण तक अनेक ऐसे अवसर हैं जो गंगा के बिना पूरे नहीं हो सकते. इसलिए उन लोगों को जागरूक किए बिना शायद ही यह संभव हो.
गंगा तेरा पानी अमृत
उत्तर प्रदेश और बिहार के वे गाँव जो गंगा के किनारे या आस-पास बसे हैं उनके द्वारा किये जाने वाले प्रदूषण का बड़ा हिस्सा अंतिम संस्कार से होता है. हिन्दू धर्म में अंतिम संस्कार की अपनी रीति और नीति है, जिसकी न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे बंद किया जा सकता है. उन लोगों के साथ मिलजुल कर उनके रिवाजों में कुछ बदलाव जरूर किए जा सकते हैं. यह कह देने से कि गंगा में अंतिम संस्कार नहीं होगा या गंगा में प्रदूषित करने वाली चीजें डालने पर जुर्माना लगेगा, इसका कभी निदान नहीं हो सकता और यह पूरी योजना हवा-हवाई बनकर रह जाएगी.
गंगा में प्रदूषण को रोकने के लिए सबसे जरूरी है प्रदूषण के बुनियादी कारणों पर विचार करना और उसके लिए वैकल्पिक उपाय खोजना और उसका समुचित समाधान करना. गंगा में प्रदूषण दो तरह से होता है, एक तो औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट पदार्थों को गंगा में बहाने से, और दूसरा आम जनमानस के जीवन से जुड़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति में, और इसी में आम लोगों की नदियों के प्रति असंवेदनशीलता भी शामिल है. जहां तक औद्योगिक प्रदूषण का सवाल है तो उसके लिए अनेक तरह के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं. उसमें से कितने काम कर रहे हैं, इसका पता नहीं है. उसमें सरकार नीतियों के स्तर पर सीधे-सीधे सुधार कर सकती है और यह सुधार जितनी जल्दी किया जाएगा, उतना ही अच्छा होगा. लेकिन आम लोगों के बीच गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने की अवधारणा विकसित करना थोड़ा कठिन है. जहाँ तक अंतिम संस्कार की बात है, उसके भी दो तरीके हैं. पहला, जिसमें मनुष्य के मृत शरीर को जलाकर उसकी राख को गंगा में प्रवाहित किया जाता है. दूसरा, जिसमें अधजले या बिलकुल नहीं जलाए गए शव को ही प्रवाहित कर दिया जाता है. प्रदूषण दोनों से होता है, लेकिन बिना जला हुआ शरीर न जाने कितने हजार लीटर पानी को प्रदूषित करता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है. पहले स्थिति ऐसी नहीं थी क्योंकि गंगा में अनेक तरह के जीव-जन्तु होते थे जिनका भोजन ही मृतक शरीर होता था और वह एक दिन में ही खत्म हो जाता था. पहले गंगा में पानी का बहाव अधिक होता था, इसलिए खराब चीजों के किनारे लगने की संभावना कम होती थी. अब स्थिति वैसी नहीं है. जबसे गंगा में केमिकल युक्त पानी आने लगा है तबसे गंगा में जीने वाले जीवों में भारी कमी आई है. गंगा में प्रवाहित किया गया शव कुछ किलोमीटर तक तो बहता है फिर कहीं न कहीं किनारे लग जाता है और कई दिनों तक सड़ता रहता है. इससे आस-पास रहने वाले लोगों का जीना हराम हो जाता है और पानी में जो प्रदूषण होता है वह अलग.

गंगा किनारे शवदाह गृह की जरूरत

अब सवाल उठता है कि इसका उपाय क्या है ? इसे कैसे रोका जाय ? इसे रोकने के लिए दिल्ली में बैठकर नियम बना देने और कुछ किताबी विद्वानों की समिति बना देने से कुछ नहीं होगा. इसके लिए व्यावहारिक और जनोन्मुख सुविधाओं की जरूरत है. पुराने समय में गाँवों के आस पास जंगल होते थे, बाग बगीचे होते थे जिससे जलाने की लकड़ी आसानी से मिल जाती थी तो कुछ लोग जलाते थे. अब लकड़ी का मिलना कठिन भी है और पेड़ों की कटाई से पर्यावरण से जुड़ी दूसरी बड़ी परेशानी को निमंत्रण भी मिलता है. इसका सीधा उपाय यह है कि गांवों के करीब जो भी श्मशान हैं, उनके आसपास कुछ जगहों को चिन्हित करके वहाँ विद्युत शवदाह संयंत्र लगाए जाएं. फिर आम लोगों भी बीच एक जागरूकता भी फैलाई जाए, जिससे कम से कम प्रदूषण हो. दूसरा यह कि जली हुई राख या अस्थियों को गंगा के किनारे बने किसी जगह पर गड्ढे में डाल दिया जाए जो बाढ़ के दिनों में अपने-आप बह जाएंगी. बाकी, सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए उसका न्यूनतम अंश प्रवाहित कर दिया जाय.
अभी तक सरकार ने जिन क्षेत्रों से प्रदूषण को खत्म करने की योजना बनाई है उसमें ये बिन्दु शामिल नहीं हैं. प्रदूषण रोकने के लिए सभाएं बहुत हुई हैं, योजनाएँ बहुत बनी है, पैसा भी ठीक-ठाक खर्च हुआ है, चाहे वह उनके खाने-पीने पर खर्च हुआ हो या विद्वानों की बेमतलब बहसों को आयोजित करके. पिछली सरकारों ने भी गंगा प्रदूषण को रोकने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किये हैं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वह पैसा प्रदूषण कम करने के लिए खर्च किया गया है या और बढ़ाने के लिए. इस सरकार की अभी तक की योजनाओं का ऐसा कोई व्यावहारिक पक्ष मुझे दिखाई नहीं देता, जिससे बहुत संतोष मिले. आगे आने वाले समय में अगर ये योजनाएँ आम जनजीवन के अनुकूल बनती हैं तो अच्छा है, अन्यथा दिल्ली से ही गंगा-गंगा चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। 

(30 मार्च 2018 को janbhav.com पर प्रकाशित)

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