बुधवार, 23 मई 2012

मुद्दा अधूरी ‘अर्थ-नीति’ का है!

                                                                                                          सन्तोष कुमार राय
          यूपीए सरकार की दूसरी पारी अधिकतर स्तर पर नाकामयाब ही रही है। तीन वर्ष के इस दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व की अनेकानेक कमियाँ सामने आयी हैं, लेकिन इसकी ओर ध्यान न देते हुए सरकार के लोग यह गिनाने में लगे हुए हैं कि उन्होंने कितना कुछ किया । होना यह चाहिए कि सरकार ने जो अच्छा किया, उसे उसी के लिए चुना गया था, लेकिन जो नहीं हुआ वह उससे अधिक महत्वपूर्ण है । अपने इस कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार सर्वाधिक विफल अपनी अर्थनीति पर रही है, जिसका असर भारत की गरीब जनता पर सीधा पड़ा है । लिहाजा भारतीयों की गरीबी का ग्राफ और अधिक बढ़ा है । सरकार ने कई हजार टेलीफोन लगवाया है जिसे वह अपनी उपलब्धियों में सुमार कर खुद अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन उसके पास इसका हिसाब कहीं भी नहीं है कि कितने गरीब परिवारों ने भूख से दम तोड़ दिया या अत्महत्या कर लिए।
          असल में किसी भी देश के आर्थिक विकास का सीधा असर वहाँ के आम आदमी पर पड़ता है । जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो आम जनजीवन के जीवन स्तर में सुधार होता है । भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति अपने अभी तक के सबसे खराब दौर से गुजर रही है । इसका कारण सिर्फ वैश्विक आर्थिक गिरावट नहीं है । अगर ऐसा होता तो भारत की आर्थिक स्थिति मे गिरावट उस समय आती जब पूरा विश्व आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था । लेकिन उस समय ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उस समय हमारी आर्थिक नीतियाँ और हमारे संसाधन दोनों में आज जैसा बड़ा अंतर नहीं था । दिल्ली में रहते हुए सरकार ने अपनी सफलताओं की लंबी सूची गिना दिया और तीन साल पूरे होने का जश्न भी मना लिया । दरअसल यह जश्न मनाने का नहीं, मातम मनाने का समय है । आज जिस बदहाली की ओर देश जा रहा है, या यह कहा जाय कि जहां पहुँच गया है, वह दिन दूर नहीं जब यहाँ भूखे मरने वालों की तादात विश्व में सबसे बड़ी हो सकती है।
          सरकार की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया है कि यूपीए के इस कार्यकाल में प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि हुई है । यह वक्तव्य मंहगाई की आग में जली हुई जनता की जलन को बढ़ाने के लिए लाल मिर्च जैसा है । प्रधानमंत्री ने जिस प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि की बात की है वह इस देश के कुछ खास लोगों की आय की बृद्धि है । भारत में रहने वाला बड़ा तबका वह है जिसका इस आय-बृद्धि से कोई संबंध नहीं है । इस तरह की असमानता पर आधारित आर्थिक वितरण प्रणाली से देश में  असमानता की खाई को और बढ़ा रही है । विश्व के इतिहास में कहीं भी प्रतिव्यक्ति आय में इस तरह के विभेद के रहते उस देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती । जहाँ भी विकसित राष्ट्र की अवधारणा का विकास हुआ है वहाँ प्रतिव्यक्ति आय के बीच का फर्क ऐसा नहीं है । यह कहाँ का अधिकार है कि आम आदमी की जब देश की संपूर्ण आय की गणना हो तो प्रतिव्यक्ति आय में बड़ी बृद्धि हो, लेकिन जिनकी आय की गढ़ना हो रही है उसकी स्थिति आज भूखे मरने की है।
          बहुत सीधा सा जबाब है कि जब किसी भी व्यक्ति की आय में बृद्धि होती है तो उसके जीवन स्तर में सुधार होता है, लेकिन यहाँ तो आय बढ़ने पर आम आदमी के जीवन स्तर में और अधिक गिरावट आयी है। भारत के पूंजीपतियों और नौकरशाहों की आय में बेतहासा बृद्धि हुई है जिसे प्रधानमंत्री ने प्रतिव्यक्ति मान लिया है।
          सरकार ने अपने झूठे विकास के पुलिंदे में एक और बात शामिल किया है जो उसकी नासमझी के लिए काफी है । यह घोषणा की गई है कि इस साल हमारे देश में बहुत अधिक अनाज का उत्पादन हुआ है । इस उत्पादन को सरकार ने अपनी उपलब्धियों में गिना लिया । यह पूछा जाना चाहिये कि सरकार में शामिल लोगों ने इस उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्या किया है? कौन सा ऐसा काम कर दिया जिससे उत्पादन में ऐसी बृद्धि हो गई । दरअसल यह बृद्धि इस देश के किसानों की जी तोड़ मेहनत का परिणाम है । इसमें सरकार का कोई भी योगदान नहीं है । योगदान तब होता जब सरकार किसानों के लिए खाद बीज आदि का प्रबंध करती । लेकिन कुछ भी किए बिना इस तरह का झूठा श्रेय लेना किसी भी तरह से वाजिब नहीं है ।
          सरकार तीन साल का जश्न माना ले लेकिन देश की आर्थिक हालत बहुत ही खराब है । आने वाला समय आम आदमी के जीवन के लिए बहुत ही संघर्षपूर्ण होगा । अगर वास्तव में सरकार को विकास करना है तो आम आदमी की हालत में सुधार की चिंता करे ।  न सिर्फ चिंता करे बल्कि उसमें सुधार के उपाय किए जाय । इसके लिए जरूरी है कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की सार्थक कदम बढ़ाए ।

शुक्रवार, 4 मई 2012

हाशिये का लेखन और आत्मकथा की संस्कृति



सन्तोष कुमार राय
       1 जुलाई के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ...
 
      हाशिये का लेखन आज की मुख्यधारा का लेखन है। जिस समाज को वर्चस्वशाली लोगों ने मनमाने तरीके से विधान बनाकर मुख्यधारा से अलग रखा हुआ था, उस समाज के लेखन ने भारतीय मानस की छद्म सामाजिकता को बेनकाब कर दिया है। भारत का सामाजिक विकास विभाजन के रूप में अधिक, संगठन के रूप में कम हुआ है। अपने को ऊंचा दिखाने की होड़ में एक बड़े मानव समुदाय को पशुवत जीवन जीने के लिए मजबूर करने वाला वर्चस्वशाली तबका आज भी हाशिये के समाज की समस्याओं को स्वीकार नहीं कर रहा है। आखिर एक जैसे दिखने वाले मनुष्यों में ही इस तरह का भेद करने का अधिकार किसने दिया? क्या भारतीय समाज की संरचना को बनाने वाले लोगों की बुद्धि उस समय भ्रष्ट हो गई थी जब वर्णव्यवस्था की आधारशिला राखी गई? इस तरह के मानवताविरोधी कदम को आम जनमानस पर थोपने का साहस कैसे हुआ? जाहीर सी बात है की उस समय के वर्चस्वशाली लोगों ने मनमने तरीके से समाज की संरचना निर्मित की जो बाद में चलकर जाती के भयावह रूप में हमारे समाज को अनगिनत हिस्सों में बाँट दिया और हम एक होते हुए भी इतने हिस्सों में बंट गए।
        जिस समाज की सामाजिक संरचना इतनी छद्म है उस समाज को अगर आज के दलित लेखक नकार रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है। अगर ये लोग अपने ऊपर हो रहे बर्बर और अमानुषिक व्यवहार को आत्मकथाओं में दिखा रही है तो इससे आज के समाज को सीख लेनी चाहिए जिससे पुरानी गलतियों को भुलाकर नए रास्ते की तलाश हो सके। पुरानी भारतीय सामाजिक संरचना ऐसी थी जिससे बाहर निकालना आत्महत्या करने जैसा था। परंपरा से चले आ रहे भारतीय समाज ने हाशिये के लोगों के साथ दोयम दर्जे का वर्ताव किया है। भारतीय समाज में यह दाग सदियों पुराना है, जिसे आज भी सामंतवादी और ब्राह्मणवादी मानसिकता जीवित रखने के पक्ष में है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय साहित्य में हाशिये के समाज की उपेक्षा है। इस समाज की संस्कृति से साहित्य में हम तब तक अनभिज्ञ रहे। आज इस अनभिज्ञता को दूर करके एक समतामूलक समाज बनाया जा सकता है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने जाती व्यवस्था को सिरे से नकारा है जिसे आज भी बहू सारे लोग स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं जबकि जाति व्यवस्था के दंश ने भारतीय समाज को बहुत पीछे धकेला है।   
        हाशिये का लेखन आज पारंपरिक लेखन से अलग एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के रूप में हमारे सामने है। यह लेखन दलित, आदिवासी और विस्थापितों के लेखन के रूप में है। भारतीय साहित्य में हाशिए के समाज को लेखर कम लिखा गया है और जो लिखा गया है वह उनकी सामाजिक स्थिति से बहुत दूर और अत्यधिक काल्पनिक है। असल में जब से दलित साहित्य दलित लेखकों के द्वारा लिखा जा रहा है तब से इस वर्ग के लेखन की विश्वसनीयता बढ़ी है। यह लेखन यथार्थवादी लेखन है और यह भारतीय पारंपरिक लेखन के समक्ष एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्स्थापन के साथ आ रहा है। वैश्विक चिंतन के केंद्र में शुरू से ही एक खास तरह की मानसिकता का परिचय मिलता है, जो हाशिये के समाज को अपनी कसौटी पर देखने का हिमायती रहा है। जाहिर सी बात है कि जब तक हाशिये के समाज का लेखन नहीं आया था तब तक भारतीय संस्कृति की पहचान एकपक्षीय ही थी। अब सामंती मानसिकता और भारतीय समाज की अवधारणा दोनों का खंडन हुआ है। आज हाशिये के लेखन ने खुद अपना रास्ता बनाया है। आज वे किसी वर्चस्व को स्वीकार करने के वजाय उसे नकारने में विश्वास रखते हैं। विषय से स्पष्ट है कि हाशिये के समानांतर जिस केंद्र का वर्चस्व रहा है आज उसका समूच स्वरूप प्रश्नांकित है। यही कारण है कि एक खास मानसिकता के लोग इस लेखन से तिलमिला रहे हैं।
        आज के इस लेखन ने सिर्फ सामाजिक बदलाव नहीं किया है, बल्कि उसने पूरी की पूरी परंपरा को ही बदल दिया है । इस लेखन आज सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव का जो स्वरूप हमारे सामने रखा है, दरअसल वह काही और से नहीं लाया गया है। यहीं के लोगों द्वारा दिया गया है जिसे झेलते-झेलते पीढ़ियाँ गुजर गई है। हाशिये की निर्मिति भी सामाजिक असमानता से ही हुई है। इस असमानता में के मूल में शोषणवादी समाज की मानसिकता है। दलित आत्मकथाओं ने इस असमानता को सबके सामने ला दिया है, जिससे सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रश्न सभी के सामने आया है। हाशिये के समाज का लेखन आज दलित, आदिवासी और अनेक शोषित तबकों की आवाज के रूप में हमारे सामने है। आज जब उनकी व्यथा-कथा उनके शब्दों में हमारे सामने है, तो हमें एक सांस्कृतिक बदलाव का दिखाई देना स्वाभाविक लगता है । जिस सामाजिक संरचना में मानव समाज को संगठित किया गया था, इस लेखन ने उसे बहुत हद तक गलत सिद्ध कर दिया है। ऐसे दौर में इस लेखन की सामाजिक उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता, इसलिए आज इसकी महती आवश्यकता है कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन के प्रश्नो पर बहस हो।