गुरुवार, 8 नवंबर 2012

आम चुनाव के रिहर्सल होंगे विधानसभाओं के चुनाव


सन्तोष कुमार राय 
समकालीन सरोकार में प्रकाशित.... 

          किसी शायर ने लिखा है कितना मुश्किल होता है जवाब दे पाना, जब कोई खामोश रहकर भी सवाल करता है । आज भारत की जनता पर डर और खामोशी दोनों का असर है । पिछले दस वर्षों में बेकाबू महँगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है । बड़ी-बड़ी इमारतें और बड़े-बड़े पार्क तो बहुत बने और बन भी रहे हैं लेकिन आम जनता से उनका क्या सरोकार है ? लोगों के मन में डर इस बात का है कि आने वाला समय कैसा होगा और जीवन कैसे चलेगा ? लगातार भ्रष्टाचार और महँगाई से त्रस्त लोगों के लिए यह निर्णय लेना कठिन है कि वे किसे चुने और क्यों चुने ? आज की भारतीय राजनीति में आरोप और प्रत्यारोप का प्रयोग एक महत्वपूर्ण औज़ार के रूप हो रहा है । इसका कारण है देश की जनता के दिमाग को विकास के मुद्दों से भटकाया जाय और सभी पार्टियों के नेता आपस में तू-तू मैं-मैं का खेल खेलते रहें ।  देश का विकास आज महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं रह गया है । आज एक-दूसरे को कोसने और जनता के बीच में आत्मश्लाघा का प्रदर्शन और परनिंदा की कलात्मकता का दक्षतापूर्ण प्रदर्शन ही हमारे देश के राजनेताओं की प्राथमिक योग्यता बन गई है । इसके बहुत सारे नमूने हमें आए दिन दिखाई पड़ते हैं ।  इसका ताजा उदाहरण हमें आने वाले समय में गुजरात और हिमाचल प्रदेश तथा कुछ समय बाद महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में दिखाई दे सकते हैं ।
          गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित हो गई है लेकिन अभी महाराष्ट्र में कुछ देर है । गुजरात और महाराष्ट्र का इस बार का चुनाव कई मामलों में पिछले चुनाव से भिन्न होगा । तुलनात्मक रूप से यह चुनाव पिछले चुनावों से अधिक गंभीर होगा क्योंकि दोनों प्रदेशों में एकदूसरे की प्रबल विरोधी पार्टियों की सरकार है । गुजरात में बीजेपी है तो महाराष्ट्र में कांग्रेस एनसीपी गठबंधन । इस चुनाव को लेकर मौजू सवाल यह है कि यह चुनाव किन-किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा और जनता इस चुनाव में किस आधार पर वोट देगी ? दोनों प्रदेशों में दोनों पार्टियों की चुनावी रणनीति अलग होगी क्योंकि मुद्दे अलग-अलग हैं । यह चुनाव इसलिए भी और अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद लोकसभा चुनाव होगा जिस पर इसके परिणाम का प्रभाव पड़ सकता है, या यह कहा जाय कि इन दो बड़े राज्यों के चुनाव से ही लोकसभा के परिणाम की दिशा तय होगी । इसलिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होगा । यह चुनाव सिर्फ जनता के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहेगा । दोनों पार्टियों को अपना पक्ष जनता के सामने रखना होगा । गुजरात की लड़ाई सीधे-सीधे बीजेपी और कांग्रेस के बीच है जबकि महाराष्ट्र में यह चुनाव बहुमुखी होगा । इस चुनाव पर सभी पार्टियों की निगाह है और सभी अपने-अपने हिसाब से जनता के सामने अपनी शुद्धता को सिद्ध करने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं ।
          दरअसल आज की राजनीति में जनता की समस्याओं और विकास की कोई जगह बची ही नहीं है । भ्रष्टाचार और मंहगाई के दलदल में फांसी हुई भारत की जनता आज दर्दके mकेयारे कराह र है और उसकी कराह सुनने वाला कोई नहीं है । सभी लोग अपना हित साधने में लगे हुए हैं ।  सारे के सारे नेता एकदूसरे पर आरोप लगाने और जनता को बेवजह बहकाने की कोशिश करते हैं । सबसे पहले हम गुजरात पर नजर डालें । गुजरात का यह चुनाव पिछले चुनाव के  मामले में कई तरह से अलग होगा । इसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं । नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता का कोई पैमाना नहीं है लेकिन पिछले चुनाव की बात की जाय तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच बहुत बड़ा अंतर था जो कहीं न कहीं गुजरात में मोदी की लोकप्रियता का ही द्योतक है, पर आज जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं उसमें अपने मुंह मिया मिटठू बनाना की बात बहुत आम है । इस चुनाव में मोदी जिस विकास का दावा पेश कर रहे हैं वह कितना जमीनी है, यह तो आने वाले समय में गुजरात की जनता ही तय करेगी, और यह भी कि जनता को यह विकास कितना पसंद आया इसका पता परिणाम आने पर ही चलेगा । लेकिन कांग्रेस इस विकास के दावे को लगातार नीचा दिखाने की कोशिश जरूर करेगी । लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए की गुजरात की जनता कांग्रेस को अपना मत देगी । इस पर तो संदेह है । यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी है कि दोनों पार्टियों के अपने कमजोर पक्ष भी हैं जिसे अगर नजरंदाज किया गया तो उनको भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है । गुजरात बीजेपी में पिछले कई सालों से आंतरिक कलह की भी बात आती रही है और यह बहुत गलत भी नहीं है ।  मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी कार्यशैली कई नेताओं को पसंद नहीं है जिसका समय-समय पर वे विरोध भी होता रहा है । इन नेताओं ने एक नई पार्टी का गठन भी किया है जो चुनाव मैदान में आ गई है । यह बीजेपी के लिए बहुत सुखद नहीं है । इसका अगर थोड़ा भी प्रभाव पड़ेगा तो बीजेपी का नुकसान हो सकता है । कांग्रेस की लगातार कोशिश रहेगी कि वह इसे मजबूत करे जिससे बीजेपी की स्थिति कमजोर हो । इन सारी बातों के वावजूद भी कांग्रेस के लिए अपने को बेदाग सिद्ध करना बहुत मुश्किल है । पूरे भारत की निगाह केंद्र पर है । केंद्र में कांग्रेस समर्थित यूपीए की सरकार है जिसके घोटाले और भ्रष्टाचार की फेहरिस्त दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है । इस सरकार ने भ्रष्टाचार का ऐसा खुला खेल खेला है जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक नहीं हुआ था । बावजूद इसके कांग्रेस के नेता आम आदमी के हित की बात कर रहे हैं और इन लोगों ने आम आदमी को जहां तक पहुँचा दिया है वहाँ जनता इन्हें कैसे स्वीकार करेगी समझ से परे है ।
          दरअसल कांग्रेस के लिए यह चुनाव आसान नहीं है । पिछले आठ वर्षों के कांग्रेसी शासन पर अगर नजर दौड़ाई जाय और उसमें आम आदमी की जगह तय की जाय तो बहुत मुश्किल होगा यह खोजना की आम आदमी के लिए कांग्रेस ने कौन सी जगह दी है । गुजरात की जनता के सामने कांग्रेस किस तरह के विकास का दावा प्रस्तुत करेगी जिस पर यह विश्वास किया जाय कि वास्तव में ये दावे इस बार पूरे होंगे । कांग्रेस ने पिछले दोनों कार्यकाल में जैसा केन्द्रीय सुशासन भारत को दिया है उससे कोई भी अनजान नहीं है । यह बहुत मुश्किल सवाल है कि गुजरात की जनता कैसे कांग्रेस के इन दावों को स्वीकार करेगी । टू जी, कामनवेल्थ और अब कोयला जिस तरह से केंद्र सरकार की करतूत के नमूने सामने आए हैं उसे जनता के सामने झूठा साबित करना बहुत कठिन है । यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और इसके बाद भी कांग्रेस के नेता जनता के बीच में विकास की बात कर रहे हैं । समय के बदलाव ने भारतीय जनता के स्वभाव को थोड़ा बदल दिया है । वह समय समाप्त हो गया जब नेहरू परिवार के नाम पर भारत के लोग वोट दिया करते थे । आज की जनता पहले से अधिक तार्किक और जागरूक हुई है । उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव परिणामों को देखा जा सकता है । राहुल गांधी की चमक इतनी फीकी पड़ी कि आज पता ही नहीं चल रहा है कि भारतीय राजनीति में राहुल कहाँ हैं । लेकिन कांग्रेस को अभी भी सीख नहीं मिली है और वह इस चुनाव में भी विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है । गुजरात चुनाव इसलिए भी कांग्रेस के लिए कठिन होगा क्योंकि कांग्रेस अभी तक टूजी से उबरी नहीं थी कि कोयले ने काला कर दिया । उसके बाद कांग्रेस ने एफ़डीआई के माध्यम से खुद अपने वोट बैंक के बड़े हिस्से को अलग कर दिया । भारतीय जनता का एक बड़ा तबका जो कि छोटे व्यापारियों का है जिसे एक बड़ा नुकसान कांग्रेस ने एफडीआई के रूप में दिया है । इस वर्ग का वोट भी बीजेपी को ही मिलेगा । कांग्रेस जिन मुद्दों पर गुजरात में चुनाव लड़ेगी उससे वह खुद केन्द्र में घिरी हुई है ।
          केंद्र सरकार के सभी फैसलों का सीधा असर जनता पर पड़ता है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार दुहाई देते रहे हैं कि मंहगाई कम होगी लेकिन मंहगाई में लगातार बृद्धि हुई है । यह चुनाव मंहगाई की मार से छटपटाई हुई जनता का चुनाव होगा । राज्य सरकारों के लिए ऐसे मामलों में बहुत आसान होता है कि वह सारा का सारा दोष केंद्र के ऊपर थोप दे । और सही भी है राज्य सरकारें कुछ कर भी नहीं सकतीं । यहाँ कुछ मुद्दों पर बीजेपी कमजोर दिखाई दे रही है । सबसे पहला मुद्दा बीजेपी  का आंतरिक कलह ही है । यह भी कुछ हद तक इस चुनाव को प्रभावित कर सकता है ।
          दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न गुजरात सरकार के पिछले कार्यकाल में हुए दंगों का है । जांच एजेंसियों ने भले ही नरेंद्र मोदी को बेदाग साबित कर दिया हो लेकिन जनता के हृदय में उनकी छवि आज भी एक कट्टरतावादी नेता की ही है । इस छवि से बाहर निकलने के किए मोदी और बीजेपी लगातार सेकुलर होने के हथकंडे आजमा रही है लेकिन यह ऐसा मामला है जो किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है । यह बहुत हद तक सही भी है कि उनके कार्यकाल में अगर इस तरह की बर्बरता का प्रदर्शन हुआ है तो उसका खामियाजा भी उनको भुगतना चाहिए । यह मामला अभी और ताजा हो गया है जबसे उन दंगों में लिप्त गुनहगारों को सजा सुनाई गई है । मोदी की करीबी मंत्री को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है जो उनकी संलिप्तता के लिए काफी है । यह जरूरी नहीं कि किसी अपराध में आप खुलकर सामने आएं तभी आपको अपराधी करार दिया जाएगा । कहीं न कहीं मोदी की सह उन लोगों को थी जिन्होंने इस तरह के कुकृत्य को अंजाम दिया । अब अगर जनता के दिमाग में ऐसी छवि है तो इसका प्रभाव गुजरात चुनाव पर जरूर पड़ेगा ।
          कुल मिलाकर अगर समग्रता में इस चुनाव का मूल्यांकन किया जाय तो जो तस्वीर सामने आ रही है या जो अनुमान लगाया जा सकता है वह यह कि यह चुनाव भी मोदी का ही होगा । कांग्रेस पर जनता भरोसा करेगी, इसमें दुविधा है । रही बात विकास की तो उसमें भी गुजरात बहुत पीछे नहीं है । कांग्रेस कुछ सीटों को इधर-उधर जरूर कर सकती है लेकिन सरकार एक बार फिर मोदी बना सकते है अगर सारे समीकरण सही-सही रहे तो । इसप्रकार गुजरात का यह चुनाव बीजेपी का चुनाव हो सकता है ।
          अब एक नजर महाराष्ट्र पर । अभी महाराष्ट्र के चुनाव में काफी समय है लेकिन जिस तरह की राजनीतिक उठापटक चल रही है उसे देखकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता । एनसीपी कभी भी कांग्रेस का हाथ छोड़ सकती है । अभी महाराष्ट्र में जिस तरह के भ्रष्टाचार सामने आए हैं उससे बौखलाई एनसीपी के सभी मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया और अगर बात कुछ और आगे बढ़ी तो समर्थन भी वापस ले सकते हैं । इस प्रदेश में चुनावी समीकरण बहुमुखी है । बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन का भी कोई भरोसा नहीं है । उधर राज ठाकरे शिवसेना को लगातार नुकसान पहुंचाते रहे हैं ।  कांग्रेस लगातार राज ठाकरे को मौन समर्थन देती रही है । वही हालत कुछ-कुछ एनसीपी का भी होने वाला है । यहाँ भी चाचा-भतीजे की लड़ाई की सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी है । अगर अजीत पवार बगावत करते हैं तो इसका प्रभाव एनसीपी पर जरूर पड़ेगा । यह कहना गलत नहीं होगा कि जब भ्रष्टाचार के सभी मामले उजागर हो जाएंगे इनके आपसी आरोप-प्रत्यारोप शुरू होंगे और फिर इस पूरे मामले को मैं अच्छा और मैं अच्छा मे फंसाकर समाप्त कर दिया जाएगा । महाराष्ट्र के लिए अभी कुछ भी कहना बहुत कठिन है की यहाँ ऊँट किस करवट बैठेगा ।
          कुल मिलाकर दोनों प्रदेशों की राजनीतिक गहमागहमी में मुद्दा जनता को ही तय करना है और चुनाव भी जनता का ही होगा । दोनों प्रदेशों में जनता के लिए असमंजस की स्थिति बनी रहेगी । लेकिन एक बाट साफ है कि इन चुनावों के बाद यह तस्वीर साफ हो जाएगी की केंद्र पर किसका कब्जा होगा या फिर मिलीजुली सरकार बनाने के बाद मनमोहन सिंह की तरह रोना रोते रहेंगे कि सरकार को बचाना जरूरी । इन तमाम सवालों के बीच यह चुनाव हो रहा है और यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में कुछ जवाब मिलेंगे । 

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