शनिवार, 6 अगस्त 2011

आत्महत्या के लिए मजबूर किसान

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित.....

मुद्दा

संतोष कुमार राय

पिछले चौदह-पन्द्रह वर्षो से विदर्भ (महाराष्ट्र) के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी अमला अपने हिसाब से कार्य कर रहा है लेकिन आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की ओर सबसे पहले ध्यान 1997-98 में गया। हालांकि इस बीच उनके लिए कई तरह की कर्जमाफी की घोषणाएं हुई हैं पर इससे खास अंतर नहीं आया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में आत्महत्याओं को रिकार्ड में दर्ज किया गया। उसके अनुसार 1997-98 में छह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2006 से 2008 के बीच पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि इन घटनाओं में हुई। अब बुन्देलखंड, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से भी ऐसी खबरें आने लगी हैं। इन आत्महत्याओं के रिकार्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रेत हैं, जो किसी वर्ष संख्या बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों के अनाथ बच्चों की चीत्कार न गूंजती हो। एक चिंताजनक बात यह देखने में आयी है कि आज से दस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनकी भावी पीढ़ी भी उसी राह चल रहे हैं। हमारे किसान व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करने को अभिशप्त हैं। सारी लड़ाई भूख की है। किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदा। 2008 में किसानों के हित में कर्जमाफी की योजना आयी। यह सरकार का किसानों के लिए किया गया नेक और ईमानदार प्रयास था। देश के तमाम किसानों को इसका लाभ मिला लेकिन विदर्भ में इसका प्रभाव बहुत अधिक नहीं पड़ा क्योकि यहां के किसानों का कर्ज सरकारी से अधिक गैर-सरकारी था। मूल्यहीनता के आज के परिवेश में यदि किसानों के पास कोई रास्ता नहीं रहेगा तो वे क्या करेंगे? आज किसानों के साथ खड़ा होने वाला कोई नजर नहीं आता। न कोई विनोबा जैसा प्रखर समाज सेवक है और न स्वामी सहजानंद जैसा किसान हितैषी। आज समाज में उनके लिए काम करने वाले दो वर्ग हैं। पहला वर्ग राजनेताओं का है और दूसरा कुछ उन पेशेवर समाज चिंतकों का जो इस तरह के लोगों की मदद करने के बजाय उनके समस्या को लगातार जिंदा रखना चाहते हैं ताकि सेवा करने के एवज में मेवा पाते रहें और उनकी दुकान चलती रहे। अब तक जो आंकड़े कुछ समाज कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकारी दस्तावेज के रूप में मौजूद हैं, उनके अनुसार पिछले 14 वर्षो में सिर्फ विदर्भ में यह संख्या पचास हजार से कम नहीं होगी। दरअसल, विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण है कृषि पैदावार में लगातार होती कमी। साथ ही वह कर्ज, जिसे किसान अच्छी फसल की उम्मीद में लेता है लेकिन नुकसान होने पर ब्याज के नाम नाम पर निरंतर चुकाने के लिए अभिशप्त होता है और मूलधन जहां का तहां बना रहता है। दरअसल विदर्भ में निजी तौर पर दिया जाने वाला ऐसा कर्ज बड़े व्यवसाय के रूप प्रशासन की नाक के नीचे चोरी-छुपे खूब फल-फूल रहा है। इसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है। कुछ दिन पहले यहां एक किसान ने तीस हजार रुपये कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली। सवाल उठा कि इतनी सी रकम के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा लेकिन पता चला कि उसने तीन साल पहले कपास की फसल बर्बाद होने पर जो कर्ज लिया था बाद में खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा लेकिन मूलधन जहां का तहां बना रहा। बराबर ब्याज चुकाते रहने से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा था। ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से सेठ पैसा मांगने घर आ गया और पूरे गांव के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को भला-बुरा कहने लगा। किसान को इसका पता चला तो उसने खेत पर ही आत्महत्या कर ली। लगातार बढ़ती मंहगाई भी किसानों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है। यह इसी देश में होता है कि जब प्याज किसान के पास नहीं होता है तो अस्सी रु पये किलो के भाव से बिकता है और जब किसान के पास होता है तो आठ रुपये किलो भी नहीं बिकता है। आर्थिक संरक्षण के नाम पर किसानों के लिए किसी आयोग की सिफारिश नहीं की जाती। ऐसे में क्या उन्हें अपनी पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना चाहिए? यह सवाल सबसे पहले अपने को किसानों का हितैषी बताने वाली सरकार से पूछा जाना चाहिए। सच यह है कि सरकार ने किसानों के लिए अब तक जो कुछ किया है, उसकी तुलना में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। यदि कृषि क्षेत्र उपेक्षित होगा और किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो शेष आधुनिकता और विकास का कम से कम उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा जिनका जीवन कृषि आधारित है। किसान खुशहाल हों और कृषि संस्कृति को बल मिले, तभी विकास की असल अर्थवत्ता सिद्ध होगी।

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