रविवार, 14 अगस्त 2011

किस विकास पर हम गर्व करें?

सन्तोष कुमार राय

15 अगस्त को, कल सुबह फिर एक बार राष्ट्रध्वज को फहराया जायेगा, उसे सलामी भी दी जायेगी, कई तरह की घोषणाएं भी होंगी, नेता से लेकर अधिकारी तक सभी अपने-अपने ओहदा के अनुसार इसमें सरीक होंगे। इसके प्रति भाव और प्रेम में किसी भी तरह की कमी नहीं है लेकिन इस बार एक चीज नहीं होगी और वह है आत्म गौरव का बोध! यही नहीं वास्तव में जिन्हें इस देश से प्रेम होगा वे दुखी होंगे, यह दुख अपने शहीदों के प्रति जिनके बहते हुए खून पर हम भ्रष्टाचार और नाईंसानियत का अन्धा खेल खेल रहे हैं। कायदे के अनुसार तो अब शहीदों का नाम लेना और झण्डे को फहराना हमें तब तक के लिए बन्द कर देना चाहिए जब तक हम सुखी और मानव रक्षक भारत की ओर कदम नहीं बढ़ाते। भारत एक देश है, वह धर्म वाली गंगा नहीं है कि आप चाहे जितना पाप करें एक बार नहा लेने से सारे पाप धुल जायेंगे। इस देश को आजादी किस तरह से मिली, किन कर्मों से मिली, कितनी मेहनत से मिली और जिन लोगों ने इसमें अपनी जान कुर्बान कर दिया, उसकी अहमियत से आज की राजनेताओं को रत्ती भर भी लेना देना नहीं है। इस देश की आजादी का दर्द उन लोगों से पूछा जा सकता है जिनके उपर से बाप का साया उठ गया और उसके बाद उन लोगों ने कैसा जीवन बिताया।

आज जिस जगह हम खड़े हैं वह बहुत कठिनाई से प्राप्त हुई है, इसकी रक्षा और सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन यह वर्ष भारत के इतिहास में जिसके लिए जाना जायेगा वह गौरव का विषय नहीं है। न सिर्फ अपने देश के लिए बल्कि विश्व मंच पर भी बहुत अच्छी छवि नहीं बनी। वर्तमान सरकार ने जैसा विकास किया है उससे कोई अंजान नहीं है। महंगाई और भ्रष्टाचार के बाद यह वर्ष सतही-आरोपवादी राजनीति के लिए भी जाना जायेगा, जिसे यदि इमानदारी से देशवासियों के सामने रख दिया जाता तो यह माना जा सकता है कि हमारे राजनेताओं को वास्तविक आजादी और तिरंगे से प्रेम है। यह एक तरह की कोरी कल्पना ही है। ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है, इस वर्ष के विकास का जुबानी पुलिन्दा खुलेगा और भारत की आशावादी-पीड़ित जनता सुनकर फुले नहीं समाएगी।

आने वाले समय में इस देश का क्या हाल होगा उसका भी पैमाना मिल सकता है लेकिन वह कब उलट जायेगा, नहीं कहा जा सकता। फिर तो सरकार अपनी मजबूरी गिना कर अगले साल भी झण्डा फहरा दिया जायेगा। विगत चौसठ सालों में हमारा देश जिस तरह की तरक्की को हासिल किया है वह पार्टी के लिए तो ठीक है लेकिन देशवासियों को इससे क्या मिलेगा। उनके हिस्से का अनाज भी तो भण्डारण के अभाव में सड़ जाता है और उनकी भूख से या तो मौत हो जाती है या फिर आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए सरकार के पास क्या जवाब है? विकास हो रहा है, विकास होगा, विकास होने वाला है- यह अब सिर्फ जुमला साबित हो रहा है। यह हकीकत कब बनेगा, आज की स्थिति को देखकर कुछ भी कहना गलत ही होगा। वैसे हम आजादी को सलाम करते हैं, लेकिन आज भ्रष्टाचार की गोद में छटपटाते हुए तिरंगे को लेकर चिंता जरूर है और आगे भी रहेगी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. तिरंगे आसमान में लहराकर कुछ सवाल खड़े कर रहे हैं, हमारे देश के नेताओं से खासकर भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में....। यह आलेख इसका जीवंत दस्तावेज है।

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  2. ऐसे ही लोगों के हितों के लिए लिखना एक अच्छे लेखक की पहचान है जिसकी आज सबसे ज्यादा कमी है | एक बार फिर बहुत सुन्दर |

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