संतोष कुमार राय
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17 मई, 2020 के पांचजन्य के अंक में प्रकाशित |
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10 मई, 2020 के युगवार्ता में प्रकाशित |
ग्रामीण
का तद्भव गँवार होता है लेकिन दोनों के प्रयोग के संदर्भ और व्याख्या में बहुत बड़ा
फर्क है। आम तौर पर आधुनिक और शहरी भारत में गँवार का मतलब अनपढ़ और मूर्ख जैसा ही
प्रतीत कराया जाता है। लेकिन ग्रामीण बोध या गंवई बोध जितना आत्मीय, संवेदनशील, मानवीय और बुद्धि-संपन्न होता है आधुनिक
शिक्षा संपन्न भारत में शायद ही देखने को मिले। इसका एक जीवंत और प्रेरणादायी
उदाहरण पूर्वी उत्तर प्रदेश और उससे लगे हुए बिहार के कुछ गाँवों में देखने को
मिला।
हम
सभी अच्छी तरह जानते हैं कि पूरे भारत को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सर्वाधिक
संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार से ही उपलब्ध होती है। यही वे श्रमिक हैं जिनके श्रम
से आज का भारत विकास के अनेक पायदान चढ़कर आगे बढ़ा है। पिछले एक माह से अधिक समय से
भारत में संपूर्ण बंदी लागू है। देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले मजदूर, जिन्हें हजारों की संख्या में दिल्ली की सरकार ने भयानक असंवेदनशीलता और
अमानवीयता का परिचय देते हुए बसों में भर-भरकर उत्तर प्रदेश की सीमा पर लावारिस और
लाचार बनाकर छोड़ दिया था, वे मजदूर तमाम संघर्ष के बाद जब
अपने गाँव पहुंचे तो उन्होने जिस संवेदनशीलता और जागरूकता का परिचय दिया उससे हमें
अद्भुत प्रेरणा और सीख मिलती है।
पिछले
महीने की 12 तारीख को बिहार के बक्सर जिले के एक गाँव के 40 कामगार लगभग 15 दिन के
संघर्ष के बाद अनेक दिन के भूखे-प्यासे अपने गाँव पहुँचे। गाँव आने के बाद उन्होने
गाँव के बाहर से ही गाँव में रहने वाले लोगों और गाँव के मुखिया को फोन करके
बुलाया और सभी ग्रामीणों के साथ एक बैठक किया और मुखिया के सामने उन लोगों ने
प्रस्ताव रखा कि हम सभी दिल्ली से आ रहे हैं और देश में जैसी महामारी फैली है
उसमें हमारा सीधे गाँव में प्रवेश करना ठीक नहीं है। हम सभी चाहते हैं कि हमें 14
दिन तक गाँव के बाहर रहने की व्यवस्था की जाय जिससे हम लोगों की वजह से गाँव में
किसी को भी किसी भी तरह का नुकसान न हो और कोरोना के संक्रमण से हमारा गाँव
सुरक्षित रहे। मुखिया के साथ ग्रामीणों ने इस प्रस्ताव का हृदय से स्वागत किया और
गाँव के बाहर एक विद्यालय में उनके रहने की व्यवस्था की गई। बिना किसी सरकारी
सहायता ग्रामीणों ने 14 दिनों तक उन कामगारों के रहने-खाने की उत्तम व्यवस्था
किया। उसके बाद सभी कामगार सहर्ष अपने-अपने घर गये। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे
अनेक उदाहरण देखने को मिले जिससे महानगरीय जीवन जीने वालों को सीख लेनी चाहिए।
यहीं ग्रामीण शिक्षा है। यही गाँव का संस्कार है। पिछले एक महीने में ग्रामीण
क्षेत्रों में ऐसा अनेक जगहों पर देखने को मिला जो किसी विद्यालय या विश्वविद्यालय
में नहीं पढ़ाया जाता। एक ओर शहर के लोग हस्पतालों से भाग र्हए थे, चिकित्सा सेवा में लगे लोगों पर हमला कर रहे थे ठीक उसी समय भारत के सुदूर
गाँवों में गहरी मानवता अपना संस्कार प्रकट कर रही थी।
आपदा
के समय सामान्यतः हम ऐसी जगहों की ओर जाते हैं जिन पर हमारा अटूट विश्वास होता है।
कोरोना महामारी ने महानगरों में जैसा भय और असंवेदनशीलता का माहौल पैदा किया गया
उसमें ग्रामीण समुदाय से जुड़े लोग अपने गाँवों में सुरक्षित पहुँचने के लिए बेताब
दिखे। एक बार फिर गाँव और गाँव के लोगों के प्रति विश्वास और सद्भाव मजबूत हुआ है।
यहीं वास्तविक भारत बसता है जो कभी विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित था।
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