रविवार, 18 सितंबर 2011

बाल अधिकारों की उपेक्षा

सन्तोष कुमार राय

24 सितम्बर के राष्ट्रीय सहारा में 'उपेक्षा नहीं संरक्षण मिले शीर्षक ' से प्रकाशित...

बच्चे किसी भी देश,समाज तथा राष्ट्र के भविष्य होते हैं। बच्चों का भविष्य आने वाले समय में देश के विकास की दिशा तय करता है। भारत के सन्दर्भ में भी यह बात उतनी ही सच है, लेकिन क्या भारत में इसे लेकर सरकार तथा अन्य लोग सचेत हैं? क्या बाल अधिकारों पर सरकार की ओर से कोई ऐसा कदम उठया गया है जिससे कुपोषण, तथा बालश्रम पर रोक लगाई जा सके? और जो योजनाएं पहले से चल रही थीं क्या उनका समुचित क्रियांवयन हो रहा है? आज इस तरह के अनेक सवाल बाल अधिकारों के सन्दर्भ में उठाये जा रहे हैं, जो आज भी भारत में बाल अधिकारों को उपेक्षित रखने की लागातार साजिस की ओर संकेत कर रहे हैं। आज की यह उपेक्षा कल की दिशाहीनता है। कल का भारत कैसा होगा या कल के भारत में रहने वाले लोगों में किस तरह का और कितना अंतर होगा अभी इसका अन्दाजा लगाना कठिन होगा।

भारत में अपने अधिकारों के प्रति सजगता कोई नयी बात नहीं है, और समय-समय पर इसे लेकर अनेक तरह के आन्दोलन भी होते रहे हैं। लेकिन तेजी से बदलते भारतीय समाज में बच्चों की स्थिति पर कम गौर किया जा रहा है। आज की यह उपेक्षा आने वाले कल के लिए एक बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने आ रही है। उससे हम सभी आंख चुराने की कोशिश कर रहे हैं। आज भारत में ऐसे बच्चों की बड़ी तादात है जिन्हें यह पता नहीं है कि उनके मां-बाप कौन हैं, और उनका कुसुर क्या है जिसकी वजह से उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। वही नहीं उनके साथ-साथ वे बच्चे भी है जो गरीबी और भूखमरी के चलते शोषण के शिकार हो रहे हैं।

यूनीसेफ की रिपोर्ट के आधार पर कहा जाय तो विश्व में बच्चों की सर्वाधिक संख्या भारत में है। यहां प्रतिवर्ष 2.5 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे जन्म लेते हैं। यह किसी भी देश में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या से अधिक है। आज जब प्राथमिक शिक्षा को कानूनी मान्यता प्राप्त है फिर भी तीन-चार करोड़ बच्चे विद्यालयों में नहीं जा पाते। इस देश में लगभग इतने ही बच्चे बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त हैं। बाल मजदूरी हमारे यहाँ शौकिया नहीं है, वास्तव में वह एक मजबूरी है जिसके बिना उनका गुजारा नहीं हो सकता। बाल मजदूरी का नतीजा यह होता है कि मजदूरी करने वाले आधे से अधिक बच्चे क्षमता से अधिक कार्य करने की वजह से अनेक जानलेवा बिमारियों के शिकार हो जाते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है।

भारतीय संविधान के अनु. 15 के अनुसार राज्य को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए विशिष्ट प्रावधान की शक्ति प्राप्त है। हमारा संविधान बालश्रम को रोकने के पक्ष में है और उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित न किया जाय इसका हिमायती है फिर भी भारत में इसे अनदेखा किया जा रहा है। अनु. 45 में शिक्षा का प्रावधान है। इन संवैधानिक और कानूनी बातों को छोड़कर आज के भारत की यह कड़वी सचाई है जो हमें भारत के भविष्य से रूबरू कराती है।

बाल अधिकार के सन्दर्भ भारत की सबसे बड़ी समस्या बालश्रम है। तमाम प्रयासों के बावजूद आज भी बालश्रम यथावत बना हुआ है। स्वयं सेवी संस्थाओं के द्वारा समय-समय पर बालश्रम का विरोध किया जाता रहा है लेकिन जब तक सरकार की ओर से कोई कारगर कदम नहीं उठाया जायेगा इससे निजात नहीं मिल सकती। सारे आरक्षण और जागरूकता के बाद आज भी बालश्रम अपने मूल रूप से बहुत कम नहीं हुआ है। विभिन्न होटलों और ढाबो में काम करने वाले तथा सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चों को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। उन्हें यह काम करने के लिए किसने मजबूर किया है। बचपन की मासूमियत और खूबसूरती को छोड़कर वे इस तरह का कार्य करते हैं। यह उनके जीवन की मजबूरी है, आदत नहीं।

आज भारत के विकास का दंभ भरने वाले लोगों को इस ओर की सचाई को भी देख लेना चाहिए सारा विकास का ढोंग काफूर हो जायेगा। जब तक भारत में बाल अधिकारों का उचित समाधान नहीं होगा और इस देश के बच्चों को अनुचित श्रम से नहीं रोका जायेगा तब तक किसी भी तरह के विकास की बात बेमानी होगी। मिसाईल और कारखाने बनाने से विकास नहीं होगा। बेहतर मनुष्य बनाने से विकास होता है, इसलिए यह आवश्यक है कि अब मनुष्य और मनुष्यता दोनों को बचाया जाय तथा इस देश के बच्चों को उनके अधिकार दिये जाय जिससे सुन्दर भारत का निर्माण हो सके साथ ही वे अपने जीवन की सार्थक दिशा तय कर सकें।

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