बुधवार, 21 सितंबर 2011

अभी तक चुप क्यों थे...

सन्तोष कुमार राय

कांग्रेस के बड़े नेता और भारत सरकार के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब आपको पता था कि टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला अगर चिदंबरम चाहते तो नहीं होता या इस देश को इतने बड़े घोटाले से बचाया जा सकता था तो यह प्रयास इतने दिनों बाद क्यों ? क्या इस बात को समझ में आने में इतने अधिक दिन लग गएयहाँ सवाल किसी एक आदमी या मंत्री पर नहीं है, यह सवाल कहीं कहीं कांग्रेस की आतंरिक रणनीति और राजनीति भी है कि आखिरकार कांग्रेस सरकार अपनी किस मजबूरी के चलते कुछ नेताओ के कुकृत्य को बचाने में लगी हुई है| इसमे प्रधानमंत्री कार्यालय भी शामिल है कि जब यह पत्र मार्च में लिखा गया था तो सामने आने में इतना अधिक समय क्यों लगाअगर चिदंबरम दोषी नहीं है (हम भी ऐसी कामना करेंगे कि वे निर्दोष हो जाय ) तो कांग्रेस को इस आरोप का खुलकर और जांच कराकर जवाब देना चाहिएअगर इस तरह की बात सामने आयी है तो इसकी महक दूर तक जायेगी, इसलिए भलाई इसी में है कि कांग्रेस इससे घबराने के बजाय जांच प्रक्रिया पर भरोषा दिखाए जिससे जनता के बीच अपने खोए हुए विश्वास को कुछ हासिल कर सके
जब से चिदंबरम पर सवाल उठा है कांग्रेस ने हमेशा की तरह गोल मोल जवाब देना शुरू कर दिया हैयह पहली बार नहीं हुआ हैइससे पहले भी जब -जब इस तरह मुद्दे उठाये गए सरकार और कांग्रेस के प्रवक्ता अपने सारे के सारे नए पुराने हथियारों के साथ मैदान में आकर खूब बहस किये हैंइस बार भी यह सिलसिला शुरू हो गया है, लेकिन अब इसा पर बेमतलब बहस करने के बजाय मूल मुद्दे पर विचार होइस समय के हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि कहीं कही कांग्रेसी नीति या फिर मनमोहन सिंह सरकार की असफलता ही सामने आयी हैअभी तक इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने अपना विचार स्पष्ट नहीं किया है, हमेशा की तरह इस बार भी वे उसी मासूमियत का सहारा ले रहे हैं और अपने उसी पुराने भोलेपन के साथ इससे अनजान बन रहे हैं हमारे देश के साथ एक यह भी बड़ी समस्या है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री अल्पभाषी है इसकी वजह से लगातार असमंजस की स्थिति बनी रहती है और बहुत सारे मुद्दे अस्पष्ट रह जाते है। इस तरह के मुद्दों पर तो प्रधानमंत्री की राय स्पष्ट होनी ही चाहिए।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार देश के सामने किस तरह से अपना बचाव करती है या फिर इसे भी किसी ठन्डे बसते में डाल देती है। इस तरह से देश की रक्षा की कसम खाने वाले इन लोगो से हम क्या उम्मीद करेइस सन्दर्भ में प्रणव मुखर्जी की तारीफ़ की जानी चाहिए कि उन्होंने यह कदम उठाने का साहस किया है। प्रणव मुखर्जी के लिए भी यह राह बहुत आसान नहीं है, हो सकता है कि उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़े, क्योकि इससे पहले राजीव गांधी की सरकार में कुछ इसी तरह के कार्य के लिए कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया और प्रणव मुखर्जी ने लगभग गुमनामी का जीवन बिताया. इस बार थोड़ीस्थिति अलग जरूर है फिर भी इस आशंका से मुक्त नहीं हुआ जा सकताएक बात साफ़ हो गयी है कि कांग्रेस में अब प्रणव मुखर्जी और चिदंबरम दोनों का का एक साथ रहना कठिन है और अगर कठिन भी हो तो अब मीडिया और विपक्ष की कृपा से हो जाएगापिछले दिनों एक वाकया सामने आया था जिसमे कहा था कि गृहमंत्रालय प्रणव मुखर्जी के दफ्तर की ख़ुफ़िया जांच करवा रहा बाद अब यह आया है जिससे साफ़ हो गया है कि गृहमंत्रालयऔर वित्त मंत्रालय में बहुत कुछ मैत्रीपूर्ण नहीं हैबहरहाल जो भी हो देश के साथ न्याय होना चाहिएअभी तक जो भी हुआ उससे कुछ ऐसा निकले जो देश हित में हो। वैसे इसे अभी संदेह के रूप में ही लिया जाना चाहिए लेकिन जो लोग भी इसमें सम्मिलित है उनका नकाब हटाना जरूरी है तभी कांग्रेस और और लोकतंत्र दोनों की रक्षा हो सकेगी क्योकि लोकतंत्र सिर्फ खतरे में ही नहीं खतरे से बाहर है

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