कर्ज, किसान और आत्महत्या



सन्तोष कुमार राय
          कर्ज ने भारतीय किसानों को आज आत्महत्या तक पहुंचा दिया है ।  दिनोंदिन लगातार बढ़ता यह अमानुषिक नरसंहार थमने का नाम नहीं ले रहा है, इसे क्या कहा जाय ? किसे इसका दोषी माना जाय ? सरकार को या उसके तंत्र को, या उन व्यक्तियों को जिन्होंने आत्महत्या करने वाली पीढ़ी को पैदा किया ? यह  बहुत ही जटिल सवाल है जिसका जबाब खोजना आसान नहीं है । भारतीय इतिहास में किसानों का जितना शोषण हुआ है उतना और किसी भी वर्ग का नहीं हुआ है । जब हमारा देश गुलाम था तब भी किसानों का शोषण होता था और आज भी हो रहा है लेकिन आज की स्थिति उस समय से शायद आधिक खराब है । वह इसलिए कि इतनी बड़ी संख्या में और इतने लंबे समय तक किसी भी काल में किसानों ने आत्महत्या नहीं  किया । किसानों की आत्महत्या के मद्देनजर अगर यह कहा जाय कि आज की शासन व्यवस्था अँग्रेजी हुकुमत से अधिक खराब है तो हैरान नहीं होना चाहिए । इस बात को जानकार कुछ लोगों ताज़्जुब होगा कि हमारे देश में आत्महत्या करने वाला हर सातवाँ व्यक्ति किसान है, लेकिन यह सच्चाई है जिसे न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ेगा । अगर यही स्थिति रही तो आने वाले समय में इसमें कमी आने के बजाय बढ़ने की संभावना है । ऐसा हमारे ही देश में हो सकता है कि आइसक्रीम की तुलना चावल से की जाती है और यह महान कार्य सरकार में शामिल वे लोग करते हैं जिन्हें इस देश के लोगों ने देश की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी दी है ।  इस तरह के वाक्य पर हमारे देश के पढ़े-लिखे और समझदार लोग मौन हो जाते हैं क्योंकि इसमें उनकी भलाई नहीं है । हमारे देश में पिछले डेढ़ दशक से चल रही इस प्रक्रिया को रोकने की कुछ नाम मात्र की कोशिश भी हुई है लेकिन उस कोशिश का परिणाम जमीन पर कितना हुआ, इसका कुछ पता नहीं है, जो बात पता है वह यह कि किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है । किसानों की आत्महत्या को लेकर कई सरकारी नुमाइन्दे काफी चिंतित दिखे लेकिन दिल्ली जाने के बाद किसानों के घर में बहाये गए उनके आँसू भी घड़ियाली ही सिद्ध हुए । ऐसे में इतने लंबे समय से चल रहे इस मानवद्रोही अपराध को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी है, इस पर सभी मौन हैं ।
          बहरहाल हम यहाँ कुछ दृश्य रखने की कोशिश करेंगे कि आखिर किसानों की अत्महत्या के मूल में कौन-कौन सी बातें हैं । सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न अबाध गति से बढ़ती हुई महँगाई का है, जिसने लाखों किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया है । आज यह कहना बड़ा मुश्किल है कि हमारे देश के किसान किस वर्ग में आते हैं । कुछ बड़े जमीदारों को छोड़ दिया जाय अधिकतम संख्या उन किसानों की है जो या तो निम्न मध्यवर्ग में आएंगे या फिर निम्न वर्ग में । पिछले दस वर्षों में जिस गति से महँगाई बढ़ी है उसने इन किसानों की कमर तोड़ दी है । आज खेती के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता है । जुताई-बुआई से लेकर खाद बीज तक सबका दाम आसमान छू रहा है। निम्न मध्यवर्गीय किसानों के पास उतना पैसा नहीं होता की वे यह सारा खर्च वहन कर सकें, लिहाजा उन्हें इस देश के गरीबों का खून चूसने वाले सूदखोरों से कर्ज लेना पड़ता है ।
          महंगाई के बाद बड़ा प्रश्न उनके जीवन में कर्ज़ का है । वे कर्ज़ किससे लें, किस आधार पर लें और किस तरह के ब्याज पर लें, यह किसानों के लिए बड़ी समस्या है । हमारे सरकारी आंकड़े भारत की शिक्षा व्यवस्था को चाहे जितना बढ़ा–चढ़ाकर दिखाये लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है । आज भी हमारे गांव में रहने वाले किसानों में ज़्यादातर संख्या उनकी है जो शिक्षित होने के नाम पर सिर्फ हस्ताक्षर ही कर सकते हैं । ऐसे में, इस तरह की व्यवस्था में सरकारी कर्ज़ लेना और उसके दांव-पेंच को समझना उनकी समझ से परे है । इसलिए उन्हें हारकर व्यक्तिगत सूदखोरों के पास जाना पड़ता है जो उनके खून पसीने की कमाई को ऐंठते हैं । सरकारी बैंकों से कर्ज लेना भारतीय किसानों के लिए आज भी बहुत डरावना है । सरकार के द्वारा किसानों को दी गई छूट और सुविधाओं का बहुतायत हिस्सा नौकरसाहों के हक़ में चला जाता है और उसकी भरपाई किसानों से की जाती है । सरकार जब तक किसानों को दी जाने वाली सुविधाओं को उन तक पहुंचाने का पुख्ता प्रबंध नहीं करेगी तब तक इस देश के किसान तड़प – तड़पकर जान देते रहेंगे ।
          भारत के विकास की कल्पना करने वाले लोग उनको कैसे भूल जाते हैं जिनके बलबूते देश के लोगों का पेट भरता है । अगर उनका पेट खाली रहेगा तो क्या देश का विकास होगा ? आज अगर उनकी स्थिति अच्छी रहती तो उनको आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता । लगातार बढ़ती हुई महंगाई ने उनको अत्यंत कमजोर बना दिया है । सरकार लगातार झांसा देती रही है कि महंगाई कम हो जाएगी लेकिन कम होने के बजाय उसमें लगातार बढ़ोत्तरी ही हुई है । अगर वास्तव में किसानों के साथ हमदर्दी है तो उनकी समस्याओं के मूल रूप पर विचार बहुत जरूरी है । यह एक मानवतवादी कदम होगा जिसे सरकार में बैठे लोगों को जरूर उठाना चाहिए ।
          आत्महत्या के सरकारी आंकड़ों पर भी विश्वास किया जाय तो ये आंकड़े भी उनके विषय में सोचने और उनकी समस्याओं पर कुछ करने के लिए पर्याप्त है । जिस देश में हर साल हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं उसे किस आधार पर यह कहा जाएगा कि उसका विकास हो रहा है ।  कोई भी देश जिसकी अर्थव्यवस्था के मूल आधार में परंपरा से कृषि हो, उस देश के किसान अगर इतनी तेजी से समाप्त होने लगे तो आखिर वह देश किसका विकास करेगा ।  मेरा मानना है कि विकास हमारी मानसिकता का होना चाहिए जो उन किसानों के दर्द को समझे और उनके लिए कुछ ऐसा करे जिससे यह सिलसिला रुके ।

राजनीतिक व्यापार और देश का भविष्य



सन्तोष कुमार राय
          भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर राजनीतिक व्यापार और व्यापारिक सरोकारों का है ।  यहाँ यह कहने का सीधा मतलब है कि अब हमारे देश में राष्ट्रपति का पद भी आपसी खींचतान और जोड़-जुगत से बाहर नहीं रह पाया है । कभी यह पद अत्यंत गरिमामय और वैश्विक प्रतिष्ठा का हुआ करती था लेकिन आज हमारे देश की ‘परम सम्माननीय’ राजनेताओं नेताओं की ‘महामहीमी राजनीति’ और माननीया सोनिया गांधी की ‘गांधीवादी संयोजन नीति’ ने जो स्वरूप तैयार किया है, हमारा देश आने वाले कई वर्षों तक नहीं भूल पाएगा ।
          आज भारतीय जनता के सामने भूख और गरीबी का प्रश्न सबसे अहम है । हमारे प्रधानमंत्री पिछले आठ वर्षों से ठीक करने का झांसा दे रहे हैं । हमें यह पता नहीं है कि उनका वादा करने और ठीक करने का कौन सा मुंह है । दोनों का एक ही है या फिर दोनों अलग-अलग हैं । बहुत ही दुख के साथ कहना पड़ता है कि जितनी ऊर्जा वर्तमान सरकार राष्ट्रपति बनाने की जोड़-जुगत में लगाया है अगर उसका चौथाई हिस्सा भी देश के गरीबों के नाम कर दिया होता तो पता नहीं कितना बचपन भूख की बलि चढ़ने से बच जाता ।  यहाँ सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं है, यह एक ऐसे पद की राजनीति का है जिसकी प्रतिष्ठा वैश्विक होती है ।
          राष्ट्रपति चुनाव को लेकर आज जैसी खबरें आ रही हैं उनको बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता । इसका कारण साफ है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी – अपनी तरह से मनमानी पर अड़ा हुआ है । हमारे देश के अधिकतर लोग इस बात से इत्तेफाक रखेंगे कि राष्ट्रपति पद के लिए किसी गैर राजनीतिक व्यक्ति को ही चुना जाय । लेकिन अफसोस की बात यह है कि कांग्रेस और सोनिया गांधी की मुसीबत प्रणव मुखर्जी हैं जिनको आजीवन राजनीति में सक्रिय रखने के लिए इस पद से अधिक उपयुक्त और क्या हो सकता है । इस पर रहते हुए प्रणव दा कांग्रेस की सेवा भी करते रहेगे और अपने जीवन काल के अंतिम दौर में खुश भी रहेंगे । चूंकि यह मामला प्रणव मुखर्जी के राजनीतिक व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ है इसलिए कुछ जरूरी सवाल उठेंगे ही । कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष की सारी बातें प्रणव दा बिना कुछ कहे ही मान लेंगे ? क्या अभी भी उनके मन में राजनीतिक लालच बची हुई है, और अगर है तो वे मौन क्यों हैं ? क्यों उनके लिए दूसरे लोग जोड़-घटाना कर रहे हैं । अभी तक तो कांग्रेस की अधिकतर आंतरिक राजनीति खुद प्रणव दा ही सुलझाते रहे हैं ।  पिछले दस वर्षों में तो यही देखने में आया है कि कांग्रेस पर जब-जब हमला हुआ है, चाहे वह विपक्ष का हो, मीडिया का या फिर समाजसेवियों का, प्रणव दा खुलकर सामने आए हैं ।  इस बार क्यों दूसरे साधकों को साध रहे हैं । एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रणव दा को जो पद देने की तैयारी हो रही है और जिस तरह से हो रही है, वे उस पद को इतने छीछालेदर के बाद भी स्वीकार करेंगे । अगर स्वीकार भी कर लें तो अपने स्वभाव और कार्य पद्धति के अनुसार खुद को कांग्रेस की इच्छा-आकांक्षा से अलग कैसे करेंगे । इस तरह के अनेक सवाल हैं जो आज हमारे सामने हैं ।
          अब यहाँ सवाल देश के भविष्य का भी है । आज जैसी स्थिति है उसमें सरकार अगले चुनाव में जनता के बीच कौन से मुद्दे लेकर जाएगी । क्या फिर वही बातें दोहराई जाएगी कि हम देश का विकास करना चाहते हैं और आगे भी करेंगे । और फिर चुनाव के बाद हमारे प्रधानमंत्रीजी अपनी ईमानदारी का भयानक परिचय देते हुए कहेंगे कि हमारे सामने गठबंधन की मजबूरी है । यह क्या है, किस तरह की राजनीति है जिसमें हर जगह मजबूरी आ जाती है । सरकार में बैठे हुए लोगों को इसका अंदाजा नहीं होगा कि उनकी छोटी–छोटी मजबूरियों का कितना बड़ा असर भारतीय लोगों पर हो रहा है ।
          बहरहाल अभी जो माहौल चल रहा है वह किसी भी तरह से स्वस्थ राजनीति का परिचायक नहीं है । अब राष्ट्रपति का चुनाव भी एक व्यापार की तरह हो गया है जिसे कोई चुनाव आयोग नहीं रोक सकता । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत के राष्ट्रपति भवन में कौन प्रवेश करता है ।

मुद्दा अधूरी ‘अर्थ-नीति’ का है!

                                                                                                          सन्तोष कुमार राय
          यूपीए सरकार की दूसरी पारी अधिकतर स्तर पर नाकामयाब ही रही है। तीन वर्ष के इस दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व की अनेकानेक कमियाँ सामने आयी हैं, लेकिन इसकी ओर ध्यान न देते हुए सरकार के लोग यह गिनाने में लगे हुए हैं कि उन्होंने कितना कुछ किया । होना यह चाहिए कि सरकार ने जो अच्छा किया, उसे उसी के लिए चुना गया था, लेकिन जो नहीं हुआ वह उससे अधिक महत्वपूर्ण है । अपने इस कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार सर्वाधिक विफल अपनी अर्थनीति पर रही है, जिसका असर भारत की गरीब जनता पर सीधा पड़ा है । लिहाजा भारतीयों की गरीबी का ग्राफ और अधिक बढ़ा है । सरकार ने कई हजार टेलीफोन लगवाया है जिसे वह अपनी उपलब्धियों में सुमार कर खुद अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन उसके पास इसका हिसाब कहीं भी नहीं है कि कितने गरीब परिवारों ने भूख से दम तोड़ दिया या अत्महत्या कर लिए।
          असल में किसी भी देश के आर्थिक विकास का सीधा असर वहाँ के आम आदमी पर पड़ता है । जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो आम जनजीवन के जीवन स्तर में सुधार होता है । भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति अपने अभी तक के सबसे खराब दौर से गुजर रही है । इसका कारण सिर्फ वैश्विक आर्थिक गिरावट नहीं है । अगर ऐसा होता तो भारत की आर्थिक स्थिति मे गिरावट उस समय आती जब पूरा विश्व आर्थिक बदहाली से जूझ रहा था । लेकिन उस समय ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उस समय हमारी आर्थिक नीतियाँ और हमारे संसाधन दोनों में आज जैसा बड़ा अंतर नहीं था । दिल्ली में रहते हुए सरकार ने अपनी सफलताओं की लंबी सूची गिना दिया और तीन साल पूरे होने का जश्न भी मना लिया । दरअसल यह जश्न मनाने का नहीं, मातम मनाने का समय है । आज जिस बदहाली की ओर देश जा रहा है, या यह कहा जाय कि जहां पहुँच गया है, वह दिन दूर नहीं जब यहाँ भूखे मरने वालों की तादात विश्व में सबसे बड़ी हो सकती है।
          सरकार की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया है कि यूपीए के इस कार्यकाल में प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि हुई है । यह वक्तव्य मंहगाई की आग में जली हुई जनता की जलन को बढ़ाने के लिए लाल मिर्च जैसा है । प्रधानमंत्री ने जिस प्रतिव्यक्ति आय में बृद्धि की बात की है वह इस देश के कुछ खास लोगों की आय की बृद्धि है । भारत में रहने वाला बड़ा तबका वह है जिसका इस आय-बृद्धि से कोई संबंध नहीं है । इस तरह की असमानता पर आधारित आर्थिक वितरण प्रणाली से देश में  असमानता की खाई को और बढ़ा रही है । विश्व के इतिहास में कहीं भी प्रतिव्यक्ति आय में इस तरह के विभेद के रहते उस देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती । जहाँ भी विकसित राष्ट्र की अवधारणा का विकास हुआ है वहाँ प्रतिव्यक्ति आय के बीच का फर्क ऐसा नहीं है । यह कहाँ का अधिकार है कि आम आदमी की जब देश की संपूर्ण आय की गणना हो तो प्रतिव्यक्ति आय में बड़ी बृद्धि हो, लेकिन जिनकी आय की गढ़ना हो रही है उसकी स्थिति आज भूखे मरने की है।
          बहुत सीधा सा जबाब है कि जब किसी भी व्यक्ति की आय में बृद्धि होती है तो उसके जीवन स्तर में सुधार होता है, लेकिन यहाँ तो आय बढ़ने पर आम आदमी के जीवन स्तर में और अधिक गिरावट आयी है। भारत के पूंजीपतियों और नौकरशाहों की आय में बेतहासा बृद्धि हुई है जिसे प्रधानमंत्री ने प्रतिव्यक्ति मान लिया है।
          सरकार ने अपने झूठे विकास के पुलिंदे में एक और बात शामिल किया है जो उसकी नासमझी के लिए काफी है । यह घोषणा की गई है कि इस साल हमारे देश में बहुत अधिक अनाज का उत्पादन हुआ है । इस उत्पादन को सरकार ने अपनी उपलब्धियों में गिना लिया । यह पूछा जाना चाहिये कि सरकार में शामिल लोगों ने इस उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्या किया है? कौन सा ऐसा काम कर दिया जिससे उत्पादन में ऐसी बृद्धि हो गई । दरअसल यह बृद्धि इस देश के किसानों की जी तोड़ मेहनत का परिणाम है । इसमें सरकार का कोई भी योगदान नहीं है । योगदान तब होता जब सरकार किसानों के लिए खाद बीज आदि का प्रबंध करती । लेकिन कुछ भी किए बिना इस तरह का झूठा श्रेय लेना किसी भी तरह से वाजिब नहीं है ।
          सरकार तीन साल का जश्न माना ले लेकिन देश की आर्थिक हालत बहुत ही खराब है । आने वाला समय आम आदमी के जीवन के लिए बहुत ही संघर्षपूर्ण होगा । अगर वास्तव में सरकार को विकास करना है तो आम आदमी की हालत में सुधार की चिंता करे ।  न सिर्फ चिंता करे बल्कि उसमें सुधार के उपाय किए जाय । इसके लिए जरूरी है कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की सार्थक कदम बढ़ाए ।

हाशिये का लेखन और आत्मकथा की संस्कृति



सन्तोष कुमार राय
       1 जुलाई के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ...
 
      हाशिये का लेखन आज की मुख्यधारा का लेखन है। जिस समाज को वर्चस्वशाली लोगों ने मनमाने तरीके से विधान बनाकर मुख्यधारा से अलग रखा हुआ था, उस समाज के लेखन ने भारतीय मानस की छद्म सामाजिकता को बेनकाब कर दिया है। भारत का सामाजिक विकास विभाजन के रूप में अधिक, संगठन के रूप में कम हुआ है। अपने को ऊंचा दिखाने की होड़ में एक बड़े मानव समुदाय को पशुवत जीवन जीने के लिए मजबूर करने वाला वर्चस्वशाली तबका आज भी हाशिये के समाज की समस्याओं को स्वीकार नहीं कर रहा है। आखिर एक जैसे दिखने वाले मनुष्यों में ही इस तरह का भेद करने का अधिकार किसने दिया? क्या भारतीय समाज की संरचना को बनाने वाले लोगों की बुद्धि उस समय भ्रष्ट हो गई थी जब वर्णव्यवस्था की आधारशिला राखी गई? इस तरह के मानवताविरोधी कदम को आम जनमानस पर थोपने का साहस कैसे हुआ? जाहीर सी बात है की उस समय के वर्चस्वशाली लोगों ने मनमने तरीके से समाज की संरचना निर्मित की जो बाद में चलकर जाती के भयावह रूप में हमारे समाज को अनगिनत हिस्सों में बाँट दिया और हम एक होते हुए भी इतने हिस्सों में बंट गए।
        जिस समाज की सामाजिक संरचना इतनी छद्म है उस समाज को अगर आज के दलित लेखक नकार रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है। अगर ये लोग अपने ऊपर हो रहे बर्बर और अमानुषिक व्यवहार को आत्मकथाओं में दिखा रही है तो इससे आज के समाज को सीख लेनी चाहिए जिससे पुरानी गलतियों को भुलाकर नए रास्ते की तलाश हो सके। पुरानी भारतीय सामाजिक संरचना ऐसी थी जिससे बाहर निकालना आत्महत्या करने जैसा था। परंपरा से चले आ रहे भारतीय समाज ने हाशिये के लोगों के साथ दोयम दर्जे का वर्ताव किया है। भारतीय समाज में यह दाग सदियों पुराना है, जिसे आज भी सामंतवादी और ब्राह्मणवादी मानसिकता जीवित रखने के पक्ष में है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय साहित्य में हाशिये के समाज की उपेक्षा है। इस समाज की संस्कृति से साहित्य में हम तब तक अनभिज्ञ रहे। आज इस अनभिज्ञता को दूर करके एक समतामूलक समाज बनाया जा सकता है। डॉ भीमराव अंबेडकर ने जाती व्यवस्था को सिरे से नकारा है जिसे आज भी बहू सारे लोग स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं जबकि जाति व्यवस्था के दंश ने भारतीय समाज को बहुत पीछे धकेला है।   
        ‘हाशिये का लेखन’ आज पारंपरिक लेखन से अलग एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के रूप में हमारे सामने है। यह लेखन दलित, आदिवासी और विस्थापितों के लेखन के रूप में है। भारतीय साहित्य में हाशिए के समाज को लेखर कम लिखा गया है और जो लिखा गया है वह उनकी सामाजिक स्थिति से बहुत दूर और अत्यधिक काल्पनिक है। असल में जब से दलित साहित्य दलित लेखकों के द्वारा लिखा जा रहा है तब से इस वर्ग के लेखन की विश्वसनीयता बढ़ी है। यह लेखन यथार्थवादी लेखन है और यह भारतीय पारंपरिक लेखन के समक्ष एक नई सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्स्थापन के साथ आ रहा है। वैश्विक चिंतन के केंद्र में शुरू से ही एक खास तरह की मानसिकता का परिचय मिलता है, जो हाशिये के समाज को अपनी कसौटी पर देखने का हिमायती रहा है। जाहिर सी बात है कि जब तक हाशिये के समाज का लेखन नहीं आया था तब तक भारतीय संस्कृति की पहचान एकपक्षीय ही थी। अब सामंती मानसिकता और भारतीय समाज की अवधारणा दोनों का खंडन हुआ है। आज हाशिये के लेखन ने खुद अपना रास्ता बनाया है। आज वे किसी वर्चस्व को स्वीकार करने के वजाय उसे नकारने में विश्वास रखते हैं। विषय से स्पष्ट है कि हाशिये के समानांतर जिस केंद्र का वर्चस्व रहा है आज उसका समूच स्वरूप प्रश्नांकित है। यही कारण है कि एक खास मानसिकता के लोग इस लेखन से तिलमिला रहे हैं।
        आज के इस लेखन ने सिर्फ सामाजिक बदलाव नहीं किया है, बल्कि उसने पूरी की पूरी परंपरा को ही बदल दिया है । इस लेखन आज सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव का जो स्वरूप हमारे सामने रखा है, दरअसल वह काही और से नहीं लाया गया है। यहीं के लोगों द्वारा दिया गया है जिसे झेलते-झेलते पीढ़ियाँ गुजर गई है। हाशिये की निर्मिति भी सामाजिक असमानता से ही हुई है। इस असमानता में के मूल में शोषणवादी समाज की मानसिकता है। दलित आत्मकथाओं ने इस असमानता को सबके सामने ला दिया है, जिससे सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रश्न सभी के सामने आया है। हाशिये के समाज का लेखन आज दलित, आदिवासी और अनेक शोषित तबकों की आवाज के रूप में हमारे सामने है। आज जब उनकी व्यथा-कथा उनके शब्दों में हमारे सामने है, तो हमें एक सांस्कृतिक बदलाव का दिखाई देना स्वाभाविक लगता है । जिस सामाजिक संरचना में मानव समाज को संगठित किया गया था, इस लेखन ने उसे बहुत हद तक गलत सिद्ध कर दिया है। ऐसे दौर में इस लेखन की सामाजिक उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता, इसलिए आज इसकी महती आवश्यकता है कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन के प्रश्नो पर बहस हो।

भारत का विकास लेकिन पिछड़े किसान


सन्तोष कुमार राय
2 जुलाई के राष्ट्रीय सहारा मे प्रकाशित....
 
किसी भी देश का विकास सिर्फ देश के मुट्ठी भर लोगों के विकास से तय नहीं होता, उसके लिए जरूरी है कि देश की बहुतायत जनता के विकास को ध्यान में रखा जाय। भारत में भी विकास का कुछ ऐसा ही पैमाना दिखाया जा रहा है जो एक खास वर्ग के विकास को दर्शाता है। आज भी भारत के किसान अन्य विकसित देशों की अपेक्षा बहुत पिछड़े हैं, चाहे आर्थिक स्थिति के मामले में हो या तकनीक के मामले में। इस पिछड़ापन का क्या कारण है? आखिर इसमें देश की सरकार की क्या भूमिका हो सकती है? कृषि कार्य में आज भी भारतीय ग्रामीण जनता का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा कार्यरत है, फिर भी सरकार उस वर्ग की उपेक्षा क्यों कर रही है? क्या देश के विकास में सिर्फ वही क्षेत्र आते हैं जो आर्थिक रूप से अधिक सहयोगी हैं। ऐसे अनेक सवाल हैं जो किसानों की समस्याओं से जुड़े हैं।
पिछले दस वर्षों से इस देश में किसानों के आत्महत्या की खबरें आ रही है। देश के विभिन्न हिस्सों के हजारों किसान आत्महत्या कर लिए लेकिन सरकार की ओर से कोई भी ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया गया जो किसानों तक पहुंचे और उन्हें राहत पहुंचा सके। दरअसल हमारे देश में इस तरह की समस्याओं को लगातार दबाने की कोशिश की जाती है जिससे सरकार और प्रशासन पर किसी तरह के आरोप न लगे।
पिछले बजट में सरकार की ओर से किसानों के लिए कई राहत पैकेज की घोषणा की गई लेकिन अभी तक उसका असर किसानों के आम जन जीवन पर दिखाई नहीं दे रहा है। केंद्र और राज्य के बीच में आखिर ये किसान क्यों पीस रहे हैं? अगर केंद्र सरकार की ओर से इस तरह के बजट की घोषणा होती है तो उसे किसानों तक पहुँचाने की व्यवस्था भी केंद्र को करनी चाहिए। इस तरह के विवादों मे उलझने के बाद आम आदमी क्या कर सकता है। देश के कई राज्यों में अभी विधान सभा चुनाव हुए हैं जिनमे उत्तर प्रदेश भी है। उत्तर प्रदेश में किसानों की बदहाली कैसी है इससे केंद्र अंजान नहीं है। महाराष्ट्र के विदर्भ की क्या हालत है इससे पूरा विश्व वाकिफ है कि यहाँ के कितने किसानों ने इस दुर्व्यवस्था के चलते जान दे दी और अभी भी यह सिलसिला थमा नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या विश्व के किसी भी क्षेत्र से अधिक है। आखिरकार इस आत्महत्या के लिए कौन जिम्मेदार है? किसानों की इस दुर्दशा के लिए सरकार की कोई ज़िम्मेदारी बनती है या नहीं? हम अपने नैतिक दायित्वों से कब तक पीछे हटते रहेंगे? क्या इस देश में आत्महत्या करने वाले किसान अधिकार विहिन हैं? क्या उनकी समस्या इस देश की समस्या नहीं है? क्या वे सिर्फ वोट देने तक सीमित हैं? पिछले तीन-चार महीने से उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार चल रहा था लेकिन किसी भी पार्टी ने खुलकर किसानों की समस्याओं को आधार नहीं बनाया। एकदूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप से बाहर निकलने की कोशिश किसी ने नहीं की। वही पुराने जुमले जाति और धर्म को इस बार भी भुनाने की कोशिश की गई।
उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने किसानों और मजदूरों के लिए क्या किया यह सारा देश जनता है। नोयडा में भूमि अधिग्रहण के समय सरकार के सुलूक को देखा गया कि वह कितनी किसान हितैषी है। केंद्र सरकार ने उस समय हस्तक्षेप जरूर किया था और राहुल गांधी ने अनेक तरह के जल्दबाज़ी में बयान भी दे डाले थे लेकिन चुनावी मुद्दों से वे किसान गायब थे, जिनके घर जाकर खाने का नाटक राहुल गांधी अनेक बार कर चुके हैं।
सरकार को अब किसानों की समस्याओं को देश की मुख्य समस्या में शामिल करना चाहिए। किसानों की रक्षा सरकार का कर्तव्य है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। किसान इस देश की संस्कृति और सभ्यता से जुड़े हैं,साथ ही किसानों की रक्षा के द्वारा ही इस देश की कृषि संस्कृति की रक्षा हो सकती है। किसानों के विकास को अनदेखा करके देश के विकास की परिकल्पना अधूरी है। देश के विकास को प्रतिशत में बताने देश की जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जनता पर तभी प्रभाव पड़ता है जब उसका जीवन आसान होता है। सरकार की नीतियों में शामिल राहत योजनाओं का सम्पूर्ण लाभ किसानों को मिले इसका ध्यान प्रशासन को रखना होगा, अन्यथा किसी भी कागजी योजना का कोई मतलब नहीं है।

संजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को करीने से....

                 
यह हमारी पीढ़ी से अदम गोंडवी की गुजारिश थी, और खुद भी उस बेबाक प्रतिरोधी परम्परा को जीवन भर उन्होंने न सिर्फ संजोया बल्कि लगातार उसे आगे बढ़ाते रहे। अदम गोंडवी का जाना, हिन्दी की प्रतिरोधी परम्परा का कमजोर पड़ना है। अदम गोंडवी एक ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने जीवन भर सत्ता और पूंजीवादी-सामंतवादी समाज का विरोध किया। कहीं भी समझौता नहीं किया, न तो जीवन में और न ही रचनात्मकता में ।
          हिन्दी साहित्य जगत उनकी लगातार उपेक्षा करता रहा । कभी भी उन्हें मुख्यधारा के साहित्यकारों में शामिल नहीं किया गया, जबकि उनके समानांतर अनेक ऐसे बौने कवि हैं जो जोड़-जुगत करके लगातार मुख्य धारा में बने रहे। उनकी उपेक्षा करने का जो साहित्यिक हथियार आलोचकों ने इस्तेमाल किया वह उनके गीत और गज़ल थे । उन लोगों का ऐसा मानना था कि वे मंचीय कवि थे लेकिन ऐसा नहीं है कि गीत और गज़ल सिर्फ मंच तक सीमित हैं। उनकी गज़ल नायिका की जुल्फों की तारीफ में नहीं बनी थी। वे गज़ल को आम जनता तक पहुँचाने वाले रचनाकारों में से थे....
             जो गजल मासूक के जल्वों से वाकिफ हो गई,
             उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।
             मुझको नज्मों-जब्त की तालीम देना बाद में,
             पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो।
अदम गोंडवी की रचनाएं यथार्थ से अनुप्राणित है । समाज के यथार्थ की अभिव्यक्ति ही उनकी रचनात्मकता की सीमा है...
                तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
                 मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी हैं ।  
                 लगी है होड़ सी देखो अमीरी औ गरीबी में
           ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है ।
अदम गोंडवी लगातार भारत की ग्रामीण जीवन की समस्याओं को लेकर चिंतित रहे। उनकी रचानाओं का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण किसानों के दुख और गरीबी को लेकर है। भारत के अनेक रचनाकार वैश्वीकरण का ढोल पीटकर अपने को वैश्विक घोषित करने पर तुले हुए थे, वहीं अदम गोंडवी उन्हीं किसानों के बीच में अपनी रचना का स्वर तलाश रहे थे। आज के समाज में लोलुपता जिस तरह से बढ़ रही है और मनुष्य अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए अपनी अस्मिता को बेचने के लिए तैयार है, ऐसे में अदम गोंडवी जैसा लिखना और अपने विचार और आचरण में दृढ़ बने रहना बहुत कठिन है।
आज की हिन्दी कविता पर बहुत लम्बे समय से जो आरोप लगाया जा रहा है कि उसकी पठनीयता लगातार कम होती जा रही है या वह अब पठनीय नहीं रही। यह बात अदम गोंडवी के लिए बिलकुल गलत है। अदम गोंडवी की रचनाए लोगों की जुबान पर होती थी। गरीब मजदूर-किसानों की समस्याओं को अदम गोंडवी ने बहुत सिद्दत से उठाया है..
         न महलों की बुलंदी से न लफ्जों के नगीने से
         तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से।
        कि अब मरकज में रोटी है, मुहब्बत हाशिए पर है
         उतर आई गजल इस दौर में कोठी के जीने से।
        अदब का आइना उन तंग गलियों से गुजरता है
       जहां बचपन सिसकता है लिपट कर मां के सीने से।
अदम गोंडवी लगातार सत्ता का विरोध करते रहे । वे जिस तरह से अपनी कविताओं में प्रतिरोधी थे वैसे ही जीवन में भी। कई बार इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। बहुत प्रसिद्ध रचना है उनकी..
               काजू भूनी पलेट में विस्की गिलास में
              रामराज उतरा है विधायक निवास में ।
नागार्जुन के बाद की हिन्दी कविता में धूमिल ने प्रतिरोधी धारा को आगे बढ़ाया । उसके बाद अदम गोंडवी की आवाज ने उसे आगे बढ़ाया, लेकिन यह बेबाक प्रतिरोधी धारा आज छोटे-छोटे स्वार्थों में दब कर अपने अवसान की ओर अग्रसर है । दूर=दूर तक हिन्दी कविता आज इस तरह के प्रतिरोधी स्वर का रचनाकार दिखाई नहीं दे रहा है । अदम गोंडवी को भी यह पता था, तभी तो उन्हों ने लिखा..
              अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है,
              संजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को करीने से।

पेट्रोल की बढती कीमत का सरकारी पैमाना

सन्तोष कुमार राय

पेट्रोल की बढी हुई कीमत देशवासियों को लिए नई परेशानी के रूप में हर रोज सामने आ रहा है। अब किसी को यह पता नहीं है कि किस चीज की कीमत कब बढेगी और कितनी बढेगी। आज भारत में जिस तरह से बेतहासा मंहगाई बढ़ रही है उसमें जीवन कितना कठिन होता जा रहा है इसका अंदाजा अभी भी सरकारी अमला को नहीं है। दिल्ली की नज़र से देश की अर्थव्यस्था को देखना कितना न्यायसंगत है। यह आज के राजनेताओं की समझ में न तो आ रहा है और न ही वे इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम आदमी की समस्या को कौन समझेगा, यह आज के मध्यवर्गीय समाज के लिए बड़ा प्रश्न है।

असल बात यह है कि आज का सत्ताधारी वर्ग इस बात से बेखबर है कि देश के लोगों पर क्या गुजर रहा है। जिस तरह से मंहगाई के बोझ तले आम आदमी का जीवन दबता जा रहा है उसे देखकर सरकार की बेखबरी का अंदाजा लगाया जा सकता है। मंहगाई की मार ऐसी बढ़ती जा रही है कि आम आदमी का जीवन दुर्लभ हो रहा है। नमूने के लिए पेट्रोल की बढी हुई कीमत को देखा जा सकता है। आखिर सरकार के इस रवैये के पीछे उसकी मंसा क्या है? वह इन बढ़ी हुई किमतों को किस रूप में देख रही है। कई बार छठे वेतनमान को इसका आधार बनाया गया लेकिन सरकार के पास तो यह आंकड़ा है कि इस देश में कितने लोगों को यह वेतनमान मिलता है फिर जो लोग इसके दायरे में नहीं आते है उनके लिए सरकार के पास क्या विकल्प है? इस बढ़ी हुई मंहगाई की सबसे बड़ी मार किसानों पर पड़ रही है जो किसी भी वेतनभोगी वर्ग में नहीं आते हैं। आज कृषि कार्य की बुनियादी जरूरतों में डीजल और पेट्रोल शामिल हो गया है, जिसकी कीमत बढ़ने पर उनकी परेशानी का बढ़ना लाजमी है। भारत में पिछले दश साल में पेट्रोल की जो मुल्यबृद्धि ही है उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक मध्यवर्गीय जीवन जीने वाला आदमी उसके साथ कैसे चल सकता है। साल 2002 में पेट्रोल की कीमत जून से दिसम्बर तक की अवधि में 11 बार परिवर्तित हुई। पहले यह कीमत पैसे में बढ़ती थी अब इसे रूपये में बढ़ाया जा रहा है। जून से लेकर अगस्त तक पेट्रोल की कीमत 29 रूपये के आस-पास थी, सितम्बर में इसमें कुछ पैसे की बृद्धि हुई, फिर अक्टूबर में भी बृद्धि हुई उसके बाद नवम्बर में कमी आयी और 1 दिसम्बर 2002 को पेट्रोल की कीमत 28.91 प्रति लीटर(दिल्ली) थी। 2003 के अंत तक यह बढ़कर 33.7 हो गया। 2004 के अंत में यह 37.84 तथा 2005 में बढाकर 43.49 कर दिया गया। 2006 में लगभग 1 रूपये की बृद्धि के साथ 44.45 तक ही पंहुचा। इसके बाद इसकी कीमत में थोड़ी कमी आयी और 2007 में यह 43.52 पर बना रहा। उसके बाद जो सिलसिला जारी हुआ वह आज मुम्बई में 68.33 तक पहुंच गया है। 2008 में 45.62, 2009 में 44.72 तथा 2010 के अंत तक यह बढ़कर 55.87 हो गया। जनवरी 2011 में तेल की कीमत बढ़ाकर 58.37 कर दिया गया। अब पिछ्क्ले तीन बार की बृद्धि के बाद पेट्रोल की कीमत 71 रूपये हो गयी है।

पिछले साल जून से लेकर अब तक पेट्रोल की कीमत दस बार बढाई जा चुकी है। अभी और बढने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि सरकार की उदारता जनता के साथ नहीं उद्योगपतियों के साथ है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेती है कि यह गठबन्धन की सरकार है और यह गठबन्धन की मजबूरी है, तो क्या यह मान लिया जाय कि मंहगाई भी गठबन्धन की ही मजबूरी है। हो सकता है कि सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले लोग इस मंहगाई को झेल जाय लेकिन गैरसरकारी और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का जीवन कैसे चलेगा, इसका सरकार के पास कोई जवाब है? मजबूरी में सरकार चलाने का मतलब यह नहीं है कि जनता को मंहगाई के बोझ तले दबाकर मार दिया जाय। सत्ताधारी वर्ग को इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

आज यह कहना कठिन है कि कौन समस्याओं से नहीं जूझ रहा है, लेकिन इसमें भी सर्वाधिक पीड़ित मध्यवर्गीय किसान ही हैं। किसान इसलिए क्योंकि उन्हें अपनी बुनियादी जरूरत की पुर्ति के लिए इस व्यवस्था व्दारा दी गयी सुव्यवस्थित मंहगाई से सीधे-सीधे जूझना पड़ता है। किसानों को गरीबी रेखा से नीचे की सरकारी सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं क्योंकि उनके पास थोड़ी बहुत जमीन भी है। दरअसल यह जमीन उन्हें और कुछ दे या न दे उनके क्लास को तो अवश्य ही परिवर्तित कर देती है और यह क्लास उन्हें समस्याओं के सिवा और कुछ नहीं देता है। जमीन के व्दारा मिले हुए क्लास और कमरतोड़ मंहगाई के बीच किसान पिसने के लिए अभिशप्त हैं। आने वाले समय में कम से कम सरकार के व्दारा कोई ऐसा कदम उठता नहीं दिख रहा है जो किसानों और भारत की बहुसंख्यक मध्यवर्गीय जनता के दर्द को समझे और दूर करे।

सरकार और देश के लिए यह खुशी की बात है कि आज हमारा देश किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं जूझ रहा है, जूझ रहा है तो अपनों के व्दारा दी गयी कुव्यवस्था से। ऐसा नहीं है कि इसका समाधान नहीं है, समाधान है लेकिन सरकारी अमला इस तरह की जहमत उठाना नहीं चाहता है। हमारे वित्त मंत्री ने लगातार देश की विकास दर में बृद्धि को अपना और सरकार का सराहनीय प्रयास बताया है लेकिन क्या उन्हें पता है कि इस देश के गरीब मजदूर और किसान अपना भरण-पोषण कैसे करते हैं? इस देश के नेताओं के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि वे चुनाव के बाद इस देश को दिल्ली की नजर से ही देखते हैं जबकि देश को दिल्ली होने में उतना ही समय लगेगा जितना समय दिल्ली को न्यूयार्क या लंदन, जो आज की स्थिति को देखते हुए असंभव के अलावा कुछ नहीं लग सकता है। जब तक हमारे नेता देश के रूप में गांवो को नहीं समझेंगे सुधार नहीं हो सकता। होना तो यह चाहिए कि विकास की गति गांवो की ओर से शुरू हो लेकिन यह इसके विपरीत दिल्ली से चल रही है। यह दृष्टि को दिग्भ्रमित करने का सबसे बड़ा कारण है। यहां के नेता और सरकार में सम्मिलित लोग नीचे से उपर देखने के वजाय उपर से नीचे देखते हैं। और जब तक वे उपर से नीचे देखते रहेंगे इस देश का विकास कागज पर ही होता रहेगा।

शहीदों की धरती आज खुद शहीद होने को तैयार...

संतोष कुमार राय

1942 के स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास बिना गाज़ीपुर का नाम लिए पूरा नहीं हो सकता। जिन गाँवों के लोग देश के लिए अपनी जान देने से पीछे नहीं हटे आज वे गाँव ऐसी जगह परे खड़े हैं जहाँ अब उनका नाम सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही रह जायेंगे। उनका अस्तित्व अब गंगा के पानी में घुलकर हमेशा के लिए अब समाप्त हो जायेगा। शेरपुर ग्राम पंचायत का अटूट हिस्सा सेमरा-शिवराय का पूरा आज ऐसी जगह खड़ा है जहाँ बहुत कुछ गंगा के पानी में चला गया है और बहुत कुछ आने वाले कुछ दिनों में चला जायेगा। इस ग्राम पंचायत की कृषि योग्य सारी जमीन पिछले कई वर्षों से लगातार गिर रही है जिसे हमेशा से सरकार ने उपेक्षित रखा। बलिया में ऐसे कई गाँव हैं जिन्हें बांध बनाकर बचाया गया है। इसका कारण है कि वहां के जनप्रतिनीधि जागरूक थे और उन्होंने इसके लिए प्रयास किया, लेकिन गाज़ीपुर के प्रतिनीधियों ने न तो प्रयास किया और न ही सरकार की ओर से कोई सकारात्मक कदम उठाया गया। लिहाजा आज ये गाँव गंगा की गोद में जा रहे हैं।

सरकार को इस बात की जानकारी कई वर्षों से दी जा रही थी लेकिन पूरा प्रशासन कान में तेल डालकर सोया रहा। अब जब चुनाव नज़दीक है और सेमरा कुछ गिर गया और कुछ गिर रहा है तो सभी लोग अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। विशेषकर सभी पार्टीयों के जन प्रतिनीधि। कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी से लेकर भाजपा, बसपा और सपा के स्थानीय नेता अपना ढोंग व्यक्त करने के लिए रोज़ आ-जा रहे हैं। पिछले दस सालों से प्रदेश में सपा और बसपा की सरकार है, क्यों नहीं उन गावों को बचाने का प्रयास हुआ। वर्तमान सरकार के विधायक पशुपति नाथ राय भी उसी क्षेत्र के रहने वाले हैं। पिछले पाँच सालों में उन्होंने क्या किया है? आप अगर अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को अपनी ही पार्टी के सरकार के सामने नहीं उठा सकते तो आपको राजनीति नहीं दुकानदारी करना चाहिए। अगर सरकार नहीं सुनती तो आप त्याग-पत्र तो दे सकते थे। तब समझ में आता कि आप अपने क्षेत्र के जनता के प्रतिनीधि हैं। पिछली सपा सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश सिंह भी उसी क्षेत्र से जीतते रहे हैं और गाज़ीपुर के ही रहने वाले हैं। उन्होंने भी वही किया जो गाज़ीपुर के साथ अन्य मंत्रियों ने किया। सपा के सांसद नीरज शेखर भी वहीं से जीतकर आये हैं, अन्ना के आन्दोलन पर टीवी चैनलों पर भाषण देने के लिए उनके पास समय है लेकिन अपने क्षेत्र के बारे में उन्हें पता ही नहीं है और अगर पता था तो अभी तक क्या किया। वह कौन सी राजनीति है जिसमें अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का निदान करना गलत है।

इस क्षेत्र की जमीनी सीमा बीस किलोमीटर से भी अधिक है। हजारों एकड़ जमीन गंगा की गोद में समा गयी। लोग भूखे मरने के कगार पर पहुँच गये। सारी की सारी कृषि योग्य उपजाऊ जमीन देखते-देखते रेत में तब्दील हो गयी। चुनाव आते रहे नेता जीतते रहे लेकिन किसी ने भी इसे बचाने की ओर ध्यान नहीं दिया। गाँव के गरीब किसान मजदूर इस आस में जी रहे थे कि सबकुछ गिर गया लेकिन अभी उनका गांव बचा है, घर बचा है लेकिन इस साल उनकी छोटी सी इस आशा का भी अंत हो गया। अब उनके सामने पुनर्वास की समस्या है। यह ऐसी समस्या है जिसके हल होने में पीढ़ीयाँ निकल जाती हैं। इस मंहगाई के दौर में जब लोग अपना पेट भरने में तबाह हैं ऐसे में वे गरीब लोग जिनके पास जिविकोपार्जन के नाम पर कुछ भी नहीं है कहां जायेंगे। उन लोगों की इस बदहाल स्थिति का जिम्मेदार कौन है? क्या सत्ता की रहनुमई करने वाले लोग, जो अपने को जनता का हितैषी बताते हैं और लम्बे-लम्बे भाषण देते हैं अभी तक क्या कर रहे थे। क्या उनका कोई कर्तव्य है या नहीं? बेघर होने वाले लोगों का दर्द कितना भयावह होता है इसका अंदाजा लगाना उन लोगों की क्षमता के बाहर है जिन्होंने कभी ऐसा दुख नहीं देखा।

सरकार के नुमाईंदो द्वारा की गयी उपेक्षा ने आज हजारों लोगों को सड़क पर खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर कर दिया है। भूखे बच्चों और महिलाओं का क्या कसूर है कि आज अपने अच्छे खासे घरों से निकलकर बरसात में भिगने के लिए बेबस हैं? क्या इसका जवाब किसी भी राजनेता के पास है? उस क्षेत्र के और भी गाँव हैं जो इस साल नहीं तो अगले कुछ सालों में जरूर गिर जायेंगे। फिर सरकार और सरकार के लोग अपने इस कृत्य का बखान करेंगे।

सरकार की विफलता या प्रशासनिक नाकामी

संतोष कुमार राय   उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...