गंगा किनारे
शवदाह गृह की जरूरत
(30 मार्च 2018 को janbhav.com
पर प्रकाशित)
गंगा किनारे
शवदाह गृह की जरूरत
(30 मार्च 2018 को janbhav.com
पर प्रकाशित)
सन्तोष कुमार राय
विकसित
भारत का सपना सँजोये जो लोग बहुत आपाधापी में आगे बढ़ रहे हैं वे बढ़ें, लेकिन उन्हें पीछे मुड़कर एकबार भारतीय समाज के उस पक्ष को भी देख लेना चाहिए
जो विकसित भारत के स्याह को उजागर करता है। पिछले दिनों बरेली से एक खबर आयी। खबर
यह थी कि एक महिला ने अपने पति के इलाज के लिए 42 हजार रुपये में 15 दिन के अपने
बेटे को बेच दिया। सुनने में थोड़ा अजीब लगा लेकिन यह सही है और इसकी छानबीन में
प्रशासन भी लगा। प्रशासन ने पूरी मुस्तैदी दिखाई। पूरे मामले की छानबीन भी हुई
जिसका निष्कर्ष यह निकाला कि उसने बेचा नहीं, बल्कि किसी
परिचित ने उसे गोद लिया। मामला खत्म हो गया। खबर भी बन गई,
जांच भी हो गई और निष्कर्ष भी आ गया। लेकिन इस घटना ने अपने पीछे जिस तरह के सवाल
छोड़े वे खत्म नहीं हुए, बल्कि हमें सोचने के लिए मजबूर कर
गये।
इस पूरे प्रकरण में दो पक्ष हैं। इसका
पहला पक्ष समाज है और दूसरा पक्ष व्यवस्था। व्यवस्था से मतलब सरकारी व्यवस्था और
सरकारी में भी चिकित्सा विभाग। गोरखपुर में आक्सीजन के अभाव में अनेक बच्चों को
मरे हुए अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं। थोड़ी देर के लिए यह मान लिया जाय कि बच्चे को
किसी परिचित ने गोद ही लिया तो क्या इसकी जांच हुई कि इलाज के पैसे कहाँ से आए, किसने दिये और क्यों दिये? और यदि उसी परिचित ने
दिया जिसने बच्चा लिया तो उसने बच्चा लेने से पहले क्यों नहीं दिया? सिर्फ किसी महिला को डराकर या उसके साथ ऐसा बर्ताव करके स्वीकार करा लेना
कि उसएन बहुत गलत किया है ठीक है? इसमें निहित अनेक सवाल हैं
जो समाज और व्यवस्था दोनों के लिए कलंक हैं। कोई भी महिला अपने पति का इलाज करा
रही है और ऐसी हालत में उसने किसी तरह से पैसे की व्यवस्था की उसके बाद यदि उसे
सरकारी अधिकारियों के प्रकोप का सामना करना पड़े तो वह क्या बोलेगी? वह वही बोलेगी जो सरकारी बाबू चाहेंगे और वही सत्य भी कहा जायेगा। लेकिन
एचएम विचार करें क्या यह सत्य है।यह सरकारी दबाव में कहलवाया गया झूठ है। सत्य
उसकी परिस्थिति है, सत्य उसकी गरीबी है। सत्य समाज और सरकारी
बाबुओं की संवेदनहीनता है।
सवाल
यह है कि आखिर गरीबी क्यों? किसके लिए? और कब तक? मेरा मानना है कि इसके लिए गरीबी
जिम्मेदार नहीं है और ऐसी स्थिति सिर्फ गरीबी के कारण भी नहीं आती। इस घटना के बाद
अनेक लोगों ने यह कहा कि कैसी माँ और कैसे बाप हैं जिन्होंने अपने बच्चे को बेच
दिया। दरअसल यह मुद्दा मानवीयता और संवेदनशीलता का है। सबसे पहले वे अमानवीय और
असंवेदनशील हैं जिन्होंने ऐसा समाज निर्मित किया और उस महिला को पति को बचाने के
लिए अपना बच्चा बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। दूसरा इसका भी मूल्यांकन होना चाहिए
कि उनकी गरीबी बुरी है या सरकारी व्यवस्था? गरीबों के खत्म
हो जाने से गरीबी नहीं जा सकती। यह सर्वमान्य सत्य है। इस बात को समझने की
आवश्यकता है कि गरीबी अवस्था और परिस्थिति से उत्पन्न होती है। परिस्थितियाँ किसी
की भी विपरीत हो सकती हैं लेकिन विपरीत परिस्थितियों से उबरने में समाज और आस-पास
के लोग हमेशा सहायक होते रहे हैं।
लेकिन
भारतीय समाज अंधाधुंध विकास की दौड़ में अपनी मानवीय पहचान लगभग खो चुका है। सबकुछ
सरकार करेगी, सबकुछ सरकारी होगा। इस घटना ने सरकारी व्यवस्था
और सामाजिक व्यवस्था दोनों को कलंकित किया है। सरकारी तंत्र ऐसा निर्मम और कठोर
होता जा रहा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती, खासकर सरकारी
चिकित्सा विभाग। सरकारी चिकत्सा का सीधा संबंध गरीब और ग्रामीण समुदाय से है और
इसी का एक उदाहरण इस घटना में भी निहित है।
किसी को भी अपने 15 दिन के बच्चे को बेचने तक पहुँचने में कितना घुटना पड़ा होगा आप अपने ऊपर सोच कर देखिये, समझ मे आ जायेगा। गरीब इस दुनिया के सबसे संवेदनशील लोग हैं। चाहे वे किसी भी देश के हो। पूरी दुनिया में व्यक्तिगत सेवा का कार्य गरीब ही करते हैं। मैंने किसी अमीर को किसी बूढ़े बीमार के घर जाकर सेवा करते, उसके कपड़े बदलते, उसकी शौच साफ करते नहीं देखा है, वह भी बहुत मामूली पैसों पर। दुनिया में जीने वाले करोड़ों लोगों के जीवन और सेवा के आधार होते हैं ये गरीब लोग। मानवता, सेवा और दया का सागर बसता है इनमें। इसलिए व्यवस्था और समाज दोनों को अपना नजरिया बदलना होगा।
(21 जनवरी, 2018 के युगवार्ता में प्रकाशित)
संतोष कुमार राय
खाप पंचायतों के द्वारा हाल ही में समाज को लेकर कुछ सकारात्मक बदलाओं की बात की गई है। यह बदलाव उस समय हुआ है जब हरियाणा की मानुषी छिल्लर ने मिस वर्ल्ड का खिताब हासिल किया है। हरियाणा और दिल्ली के 11 गांवों से मिलकर बने छिल्लर-छीकारा खाप ने वैवाहिक समारोहों में हर्ष फायरिंग के रिवाज को प्रतिबंधित कर दिया है। इसी के साथ खाप नेताओं ने शादियों में डीजे बजाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद समाचारों में खाप नेताओं के जो बयान सामने आये हैं वह रोचक भी हैं, उन्हें प्रगतिशील भी कहा जा रहा है, उनसे बदलाव की उम्मीद भी की जा रही है, उनका सामाजिक विश्लेषण भी हो रहा है। अब यहाँ यह समझने वाली बात है कि क्या वाकई खाप पंचायतें अपने रूढ़िवादी, तानाशाही और घनघोर अंधविश्वासी आवरण से बाहर निकालने की कोशिश कर रही हैं ? यदि इसे सकारात्मकता के तौर पर देखा भी जाये तो हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि खाप पंचायतों के अनेक फरमानों की अनदेखी करते हुए हरियाणा की लड़कियां देश-विदेश में अपनी सफलता का लोहा मनवा रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि क्या खाप पंचायतें अब अपने रुख में सुधारवादी हो रहीं हैं?
दरअसल इस पूरे प्रकरण को दो भागों में बांटकर देखना जायदा समीचीन होगा। एक ओर खाप पंचायतों के फैसले और दूसरी ओर मानुषी छिल्लर का मिस वर्ल्ड बनना। यदि खाप वास्तव में प्रगतिशील रुख अख़्तियार कर रहा है तो सबसे पहले उसे अपने पुराने प्रतिबंधों को खत्म करने की घोषणा करनी चाहिए। जो नहीं हुआ। ऐसे अनेक कठोर, अमानवीय, पुरुषवादी और अप्रासंगिक फैसले खाप ने महिलाओं के लिए दिये हैं जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। क्या उनमें से एक को भी खत्म करने या उनके अमान्य होने की बात हुई है ? नहीं हुई है। फिर एक छोटे से बदलाव के आदेश के आधार पर लहालोट होने वाली मीडिया भ्रम की जमी हुई परत से बाहर निकले। कोई भी सामाजिक बदलाव सिर्फ एक या दो बिंदुओं से तय नहीं किया जाना चाहिए।
इसका दूसरा पक्ष भी है, जो निश्चित ही सकारात्मक और विचारणीय है। असल बात यह है कि खापों की जद में आने वाले लोगों का अब दो वर्ग है। यह समुदाय अब उच्चवर्ग और निम्नवर्ग में पूरी तरह विभाजित हो गया है। उच्चवर्ग वह है जो ज्यादातर शहरी समुदाय के रूप में है या जिसने गाँव छोड़ दिया है। ग्रामीण समुदाय का अधिकतर हिस्सा और शहरी मजदूर, जिनका जुड़ाव अभी भी गाँव से है, ये निम्न वर्ग में हैं। खाप के सारे फैसले मानने के लिए निम्नवर्ग ही अभिशप्त है। उच्चवर्ग के लिए किसी खाप का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा होता तो मानुषी छिल्लर मिस वर्ल्ड में भागीदारी नहीं करती। इस संदर्भ में खापों के पुराने फरमानों को ध्यान में रखना चाहिए।
खापों की ओर से मानुषी के स्वागत की घोषणा और उनके नेताओं की ओर से इससे जुड़े हुए बड़े-बड़े बयान भी जारी किए गए हैं। दो बातें बहुत स्पष्ट हैं। पहली कि यह कदम खापों की हताशा लगातार हो रही अवमानना से उठे हैं और दूसरा कि लगातार कम होती विश्वसनीयता को पुनर्जीवित करने के लिए मानुषी जैसी लड़कियों की सफलता के माध्यम से खापों को प्रगतिशील घोषित करने कि साजिश। इन बयानो को समझने की जरूरत है। खाप के इन फैसलों का ऐलान दिल्ली के निजामपुर और झज्जर के कह्नोद गांव में हुई महापंचायत के बाद और अचानक हुआ है। कुछ अखबारों के अनुसार उनके नेता मानुषी की जीत को खाप के लिए गौरव का लम्हा मान रहे हैं। उनका कहना है कि 'हम पर पूरी दुनिया की नजर है, इसलिए हम इस मौके का फायदा उठाकर समाजिक परिवर्तन लाना चाहते हैं। हमारे फैसलों से समारोहों में अनाप-शनाप खर्चों की संस्कृति पर रोक लगेगी।' उनके अनुसार “शादी जैसा खुशी का मौका अक्सर परिवार पर बड़ा बोझ बन जाता है। नतीजतन कई परिवारों पर बहुत कर्ज हो जाता है।”— असल बात यह है । वहीं छिल्लर समुदाय इस फैसले से खाप का प्रगतिशील चेहरा उजागर होने की बात कर रहा है। उनका कहना है कि 'हमारा जोर सामाजिक सुधार पर है।' वहीं वे मानुषी छिल्लर के लिए खाप की ओर से शानदार स्वागत करने का फैसला भी लिया है।
कुल मिलाकर इसे ऐसे किसी प्रगतिशील बदलाव के रूप में अभी देखना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। आने वाले समय में खापों के द्वारा लिए गये निर्णयों को देखना जरूरी होगा यदि खप पंचायतें अपने रुख और विचार में अतीत से अलग कोई राह बनाती हैं तो ही इसे प्रगतिशील रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए अन्यथा यह नितांत अवसरवादी और सामयिक के अलावा और कुछ भी नहीं है।
(17 सितंबर, 2017 के युगवार्ता में प्रकाशित)
संतोष कुमार राय उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं को विफल करने में यहाँ का प्रशासनिक अमला पुरजोर तरीके से लगा हुआ है. सरकार की सदीक्षा और योजन...